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Sri Datta Nama Bhajanam – श्री दत्त नाम भजनम् | Lyrics & Significance

Sri Datta Nama Bhajanam – श्री दत्त नाम भजनम् | Lyrics & Significance
॥ श्री दत्त नाम भजनम् ॥ (दत्तपुराणे) वेदपादनुततोषित दत्त । श्रावितशास्त्रविरोधक दत्त । सम्मतवेदशिरोमत दत्त । सम्पृष्टेश्वरसत्क्रिय दत्त । कर्मेट्तत्त्वज्ञापक दत्त । स्मृतितः सन्निधिकारक दत्त । सह्यमहीधरवासिन् दत्त । काशीगङ्गास्नायिन् दत्त । कमलापत्तनभिक्षुक दत्त । शाण्डिल्यानुग्राहक दत्त । योगाष्टाङ्गज्ञेश्वर दत्त । योगफलाभिज्ञेश्वर दत्त ॥ १ ॥ शिक्षितपातञ्जलप्रद दत्त । अर्पितसायुज्यामृत दत्त । विक्षेपावृतिवर्जित दत्त । असङ्ग अक्रिय अविकृत दत्त । स्वाश्रयशक्त्युद्बोधक दत्त । स्वैकांशाहितविश्वक दत्त । जीवेश्वरतास्वीकृत दत्त । व्यष्टिसमष्ट्यन्तर्गत दत्त । गुणतोरूपत्रयधर दत्त । नानाकर्मगतिप्रद दत्त । स्वभक्तमायानाशक दत्त । अनसूयात्र्याह्लादक दत्त । मत्स्याद्यवतारात्मक दत्त । प्रह्लादानुग्राहक दत्त । असुरसुरोरगशिक्षक दत्त । ज्ञानकाण्डसन्दर्शक दत्त ॥ २ ॥ नवविधभक्तिपरायण दत्त । स्वमन्त्रजापकतारक दत्त । योगभ्रष्टद्विजनुत दत्त । सतीमाहात्म्यप्रमुदित दत्त । सत्यनसूयात्र्यर्भक दत्त । कृतवीर्यानुग्राहक दत्त । जम्भाख्यासुरघातक दत्त । देवेन्द्राभीष्टार्पक दत्त । अर्जुनहृद्यवरप्रद दत्त । मोक्षेच्छ्वर्जुनसंस्तुत दत्त । शिल्पज्ञोद्गतिशंसक दत्त । कामशास्त्रविज्ञापक दत्त । सप्तग्रहविद्रावक दत्त । विष्णुदत्तवरदायक दत्त । कर्मविपाकाख्यापक दत्त । झुटिङ्गपीडाहारक दत्त । भीतप्राज्ञाह्लादक दत्त ॥ ३ ॥ श्रवणादिविधिद्योतक दत्त । सयोगविज्ञानार्पक दत्त । विमुक्तचर्याजल्पक दत्त । शक्तभक्तहितयोजक दत्त । भार्गवरामाह्लादक दत्त । अर्जुनसायुज्यप्रद दत्त । रेणुकाभीष्टार्थप्रद दत्त । पातितभूपकदम्बक दत्त ॥ ४ ॥ ऋतध्वजानुग्राहक दत्त । मदालसानुग्राहक दत्त । अलर्कराज्योत्कर्षक दत्त । अलर्कराज्यत्याजक दत्त । योगसिद्धिसन्दर्शक दत्त । योगसुचर्याभाषक दत्त । मृत्युलक्ष्मसञ्जल्पक दत्त । अलर्कगीतोत्तमगुण दत्त । विहितालर्कनृपाश्रय दत्त ॥ ५ ॥ आयुराजवरप्रद दत्त । नहुषाशेषारिष्टद दत्त । आयुःशोकद्रावक दत्त । इन्दुमतीहृद्धर्षक दत्त । प्रकटितनहुषसुतेजो दत्त । घातितहुण्डासुरबल दत्त । आयुर्लिप्सापूरक दत्त । यदुराजानुग्राहक दत्त । बहुगुरुतत्त्वग्राहक दत्त । श्रीयदुवंशाह्लादक दत्त । मन्वन्तरसत्कीर्तिग दत्त । सप्तद्वीपक्ष्माप्रिय दत्त । दिनकरवंशोत्कर्षक दत्त । हिमकरवंशोद्धारक दत्त । पूरितभक्तमनोरथ दत्त । उपासनाकाण्डप्रिय दत्त ॥ ६ ॥ देहाध्रौव्योद्बोधक दत्त । शरीरदोषादर्शक दत्त । तनुसाफल्यद्योतक दत्त । ऋचीकतप आख्यापक दत्त । भाषितसुन्दासुरमृत दत्त । जल्पितवैश्योत्तमगत दत्त । अभिहितविट्सुतदुर्गत दत्त । नानाधर्मद्योतक दत्त । निषेधविधिसन्दर्शक दत्त । वैष्णवधर्मादर्शक दत्त । सन्माहात्म्यद्योतक दत्त । माघस्नानख्यापक दत्त । भाषितराक्षसमोचन दत्त । सुकृतोत्सुकजनरोचक दत्त ॥ ७ ॥ सोमकीर्तिनृपतारक दत्त । अधर्मसाध्वसहारक दत्त । वर्णाश्रमवृषकारक दत्त । ब्रह्मचारिवृषबोधक दत्त । गृहस्थधर्मद्योतक दत्त । श्राद्धसुपद्धतिदर्शक दत्त । दर्शितसत्तिथिनिर्णय दत्त । कृतदुष्कर्मविनिर्णय दत्त । प्रायश्चित्तस्थापक दत्त । कर्मविपाकज्ञापक दत्त । सत्संसारद्योतक दत्त । वनस्थतप आदर्शक दत्त । पञ्चप्रलयासङ्गत दत्त । सम्मतसन्न्यासाश्रम दत्त ॥ ८ ॥ (स्वभक्तचित्ताह्लादक दत्त । सुकर्मयोगस्थापक दत्त ।) ॥ इति दत्तपुराणे श्री दत्त भजनम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री दत्त नाम भजनम् — गुरु तत्व की मधुर अनुभूति

श्री दत्त नाम भजनम् (Sri Datta Nama Bhajanam) दत्तात्रेय सम्प्रदाय का एक अत्यंत तेजस्वी और भक्तिपूर्ण पाठ है। यह भजन महान योगी और दत्तात्रेय अवतार माने जाने वाले परम पूज्य श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) द्वारा रचित 'दत्त पुराण' का एक अभिन्न अंग है। इस भजन की अद्वितीयता इसकी रचना शैली में निहित है—प्रत्येक पद या पंक्ति के अंत में "दत्त" शब्द का प्रयोग किया गया है, जो साधक के मन को निरंतर 'नाम-स्मरण' (Continuous Chanting) की अवस्था में ले जाता है।

भगवान दत्तात्रेय को हिंदू धर्म में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के एकीकृत अवतार के रूप में पूजा जाता है। वे "आदि गुरु" हैं, जिन्होंने २४ गुरुओं के माध्यम से यह संदेश दिया कि संपूर्ण प्रकृति ही ज्ञान का स्रोत है। इस भजन में उनके इसी 'अवधूत' स्वरूप और उनके द्वारा विभिन्न युगों में किए गए लोक-कल्याणकारी कार्यों का वर्णन है। टेंबे स्वामी जी ने इस भजन के माध्यम से "श्री गुरुचरित्र" और "दत्त पुराण" की जटिल कथाओं को अत्यंत सरल और गेय रूप में प्रस्तुत किया है।

भजन का प्रारंभ "वेदपादनुततोषित दत्त" (वेदों के चरणों द्वारा स्तुत) से होता है, जो यह सिद्ध करता है कि भगवान दत्त स्वयं वेदमूर्ति हैं। यह पाठ उन लोगों के लिए विशेष रूप से वरदान है जो ध्यान की गहराई में उतरना चाहते हैं लेकिन चंचल मन के कारण एकाग्र नहीं हो पाते। "दत्त-दत्त" की यह निरंतर ध्वनि साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आभामंडल (Aura) निर्मित करती है और उसके भीतर सोई हुई चैतन्य शक्ति को जाग्रत करती है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व और अवतार गाथा

इस भजन का महत्व इसमें वर्णित ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों में है। टेंबे स्वामी जी ने इसमें भगवान दत्त के उन प्रमुख शिष्यों और भक्तों का उल्लेख किया है जिन्होंने गुरु कृपा से आत्मज्ञान प्राप्त किया:

  • कार्तवीर्यार्जुन (सहस्रार्जुन): जिन्हें भगवान दत्त ने १००० भुजाएं और अजेय राज्य प्रदान किया।
  • राजा अलर्क: जिन्हें मोह-माया से ग्रस्त होने पर प्रभु ने योग विद्या की दीक्षा दी।
  • यदु राजा: जिन्हें प्रभु ने अपने २४ गुरुओं के माध्यम से प्रकृति के रहस्यों का ज्ञान कराया।
  • प्रह्लाद और परशुराम (भार्गव राम): जिनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रभु ने उन्हें आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर किया।

भजन में "झुटिङ्गपीडाहारक दत्त" (श्लोक ३) जैसे शब्द आए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि भगवान दत्त नकारात्मक शक्तियों और प्रेत-बाधाओं का नाश करने वाले परम शक्तिशाली देव हैं। साथ ही, इसमें काशी, सह्याद्रि और कोल्हापुर जैसे सिद्ध क्षेत्रों का वर्णन है, जो भगवान दत्तात्रेय के नित्य निवास स्थान माने जाते हैं। यह भजन अद्वैत वेदांत (Non-duality) का सार है, जो हमें सिखाता है कि गुरु ही साक्षात परब्रह्म है।

श्री दत्त नाम भजनम् के फलश्रुति लाभ (Benefits)

टेंबे स्वामी जी की वाणी से प्रकट इस सिद्ध भजन के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति और एकाग्रता: "दत्त" नाम के निरंतर उच्चारण से मन के विचार शांत होते हैं और गहरी शांति का अनुभव होता है।
  • नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा: यह भजन घर और कार्यस्थल से ऊपरी बाधाओं, बुरी नजर और "झुटिङ्ग" (प्रेत) जैसी व्याधियों को दूर करता है।
  • पाप क्षय और शुद्धि: "स्वभक्तमायानाशक" होने के कारण यह पाठ जन्मों-जन्मों के संचित पापों का दहन कर हृदय को निर्मल बनाता है।
  • गृहस्थ धर्म और कर्तव्यों में सफलता: श्लोक ८ में गृहस्थ और सन्यास धर्म के संतुलन का वर्णन है, जो साधक को सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन में सफल बनाता है।
  • पितृ दोष शांति: भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति हैं, अतः उनके नाम संकीर्तन से अतृप्त पूर्वजों को सद्गति मिलती है।
  • आरोग्य और दीर्घायु: "तनुसाफल्यद्योतक" होने के कारण यह शरीर की व्याधियों को दूर करने में भी सहायक माना जाता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method)

दत्तात्रेय साधना में 'भाव' (Devotion) का सबसे अधिक महत्व है। इस भजन को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है।

साधना के नियम

  • समय: गुरुवार (Thursday) गुरु का दिन है। पूर्णिमा और दत्त जयंती पर पाठ करना अनंत फलदायी है। सायंकाल (संध्या समय) सामूहिक रूप से इसका पाठ करना अत्यंत प्रभावी होता है।
  • आसन और दिशा: पीले रंग के ऊनी या कुशा के आसन पर बैठें। मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर होना चाहिए।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। भस्म (विभूति) का तिलक लगाना दत्त साधना में अनिवार्य माना जाता है।
  • दीप और नैवेद्य: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान दत्त को गुड़, चने की दाल या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
  • धुन: इसे किसी भी सरल और शांत लय में गाया जा सकता है। प्रत्येक "दत्त" शब्द पर अपना ध्यान आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) पर केंद्रित करें।

विशेष प्रयोग

यदि मन अत्यंत अशांत हो या जीवन में बड़ी बाधा हो, तो लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन ५ या ११ बार इस भजन का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' का कीर्तन अवश्य करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ Questions)

1. श्री दत्त नाम भजनम् की रचना किसने की है?

इस भजन की रचना १९वीं शताब्दी के महान योगी और दत्त अवतार श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी महाराज) ने की थी।

2. यह भजन किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह भजन 'दत्त पुराण' से उद्धृत है, जिसे स्वयं टेंबे स्वामी जी ने क्रमबद्ध किया था।

3. 'दत्त' शब्द का अर्थ क्या है?

'दत्त' का शाब्दिक अर्थ है— "दिया गया" (Gifted)। यहाँ इसका अर्थ उस परमात्मा से है जिसने स्वयं को अपने भक्तों की सेवा और मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया है।

4. क्या इस भजन से पितृ दोष शांत होता है?

जी हाँ। भगवान दत्तात्रेय को पितरों का अधिपति माना जाता है। इस भजन का लयबद्ध पाठ पूर्वजों को शांति प्रदान करता है और परिवार पर उनकी कृपा लाता है।

5. 'झुटिङ्ग' (श्लोक ३) का क्या अर्थ है?

दत्त संप्रदाय की भाषा में 'झुटिङ्ग' का अर्थ है नकारात्मक ऊर्जा या प्रेत बाधा। भगवान दत्त इन सभी बाधाओं को जड़ से मिटाने वाले 'पीड़ाहारक' हैं।

6. क्या स्त्रियाँ इस भजन का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भगवान दत्त की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। शुद्ध चित्त और मर्यादा का पालन करते हुए कोई भी श्रद्धालु इस भजन का आनंद ले सकता है।

7. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

भगवान दत्तात्रेय की साधना के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। चूंकि यह एक भजन है, इसे बिना माला के भी संकीर्तन रूप में किया जा सकता है।

8. 'सह्यमहीधरवासिन्' (श्लोक १) का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है— सह्याद्रि पर्वत पर निवास करने वाले। सह्याद्रि (महाराष्ट्र) को भगवान दत्तात्रेय का प्रमुख निवास स्थान माना जाता है।

9. क्या इस भजन से नौकरी या व्यापार में लाभ मिलता है?

जी हाँ। भगवान दत्त 'वरद' हैं और 'राज्यप्रद' (सफलता देने वाले) हैं। एकाग्र मन से पाठ करने से बुद्धि प्रखर होती है जो करियर में उन्नति का मार्ग खोलती है।

10. पाठ के दौरान किस खाद्य पदार्थ का दान करना शुभ है?

भजन के पश्चात गाय को भोजन कराना या कुत्तों को गुड़-रोटी देना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि ये दत्तात्रेय भगवान के साथ सदैव उपस्थित रहते हैं।