Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Chandra Ashtavimsati Nama Stotram – श्री चन्द्र अष्टाविंशति नाम स्तोत्रम्

Sri Chandra Ashtavimsati Nama Stotram – श्री चन्द्र अष्टाविंशति नाम स्तोत्रम्
॥ श्री चन्द्र अष्टाविंशति नाम स्तोत्रम् ॥ चन्द्रस्य शृणु नामानि शुभदानि महीपते । यानि शृत्वा नरो दुःखान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ १ ॥ सुधाकरो विधुः सोमो ग्लौरब्जः कुमुदप्रियः । लोकप्रियः शुभ्रभानुश्चन्द्रमा रोहिणीपतिः ॥ २ ॥ शशी हिमकरो राजा द्विजराजो निशाकरः । आत्रेय इन्दुः शीतांशुरोषधीशः कलानिधिः ॥ ३ ॥ जैवातृको रमाभ्राता क्षीरोदार्णवसम्भवः । नक्षत्रनायकः शम्भुश्शिरश्चूडामणिर्विभुः ॥ ४ ॥ तापहर्ता नभोदीपो नामान्येतानि यः पठेत् । प्रत्यहं भक्तिसम्युक्तस्तस्य पीडा विनश्यति ॥ ५ ॥ तद्दिने च पठेद्यस्तु लभेत्सर्वं समीहितम् । ग्रहादीनां च सर्वेषां भवेच्चन्द्रबलं सदा ॥ ६ ॥ ॥ इति श्री चन्द्र अष्टाविंशतिनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री चन्द्र अष्टाविंशति नाम स्तोत्रम् (Sri Chandra Ashtavimsati Nama Stotram) चंद्र देव के 28 दिव्य नामों का एक अत्यंत शक्तिशाली संग्रह है। वैदिक ज्योतिष में चंद्र (Moon) को मन का कारक माना गया है। जैसे चंद्रमा आकाश में चमकता है, वैसे ही वह हमारे मन को शांत और प्रसन्न रखने में सहायक है।



इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि पहले श्लोक में ही इसकी फलश्रुति दी गई है: "यानि शृत्वा नरो दुःखान्मुच्यते नात्र संशयः" - इन नामों को सुनने मात्र से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो मानसिक अशांति, अवसाद (Depression), या निद्रा संबंधी समस्याओं से पीड़ित हैं।

चंद्र के 28 दिव्य नाम (28 Names of Chandra)

इस स्तोत्र में वर्णित चंद्र देव के 28 नाम और उनके अर्थ इस प्रकार हैं:

  1. सुधाकर - अमृत का उत्पादन करने वाले
  2. विधु - चमकने वाले
  3. सोम - अमृत स्वरूप
  4. ग्लौ - गोलाकार
  5. अब्ज - जल से उत्पन्न
  6. कुमुदप्रिय - कुमुद (कमल) को प्रिय
  7. लोकप्रिय - सभी लोकों में प्रिय
  8. शुभ्रभानु - श्वेत किरणों वाले
  9. चन्द्रमा - आह्लादकारी
  10. रोहिणीपति - रोहिणी नक्षत्र के स्वामी
  11. शशी - शशक (खरगोश) के चिह्न वाले
  12. हिमकर - शीतलता प्रदान करने वाले
  13. राजा - नक्षत्रों के राजा
  14. द्विजराज - ब्राह्मणों के राजा
  15. निशाकर - रात्रि को प्रकाशित करने वाले
  16. आत्रेय - अत्रि ऋषि के पुत्र
  17. इन्दु - बिंदु स्वरूप
  18. शीतांशु - शीतल किरणों वाले
  19. ओषधीश - औषधियों के स्वामी
  20. कलानिधि - सोलह कलाओं के भंडार
  21. जैवातृक - जीवनदायी
  22. रमाभ्राता - लक्ष्मी के भाई
  23. क्षीरोदार्णवसम्भव - क्षीर सागर से उत्पन्न
  24. नक्षत्रनायक - नक्षत्रों के नेता
  25. शम्भु - कल्याणकारी
  26. शिरश्चूडामणि - शिव के सिर के आभूषण
  27. विभु - सर्वव्यापी
  28. तापहर्ता - ताप (दुख) हरने वाले

स्तोत्र के प्रमुख लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 5-6) में इसके अद्भुत लाभों का वर्णन है:

  • सभी दुखों से मुक्ति: "दुःखान्मुच्यते नात्र संशयः" - इन नामों को सुनने मात्र से सभी दुख दूर होते हैं।

  • पीड़ा निवारण: "तस्य पीडा विनश्यति" - भक्तिपूर्वक प्रतिदिन पाठ करने वाले की सभी पीड़ाएं नष्ट हो जाती हैं।

  • मनोकामना पूर्ति: "लभेत्सर्वं समीहितम्" - सोमवार (चंद्र का दिन) को पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

  • चंद्र बल में वृद्धि: "भवेच्चन्द्रबलं सदा" - सभी ग्रहों पर चंद्र का बल प्रबल होता है, जिससे कुंडली के अन्य ग्रह भी शुभ फल देते हैं।

  • मानसिक शांति: चंद्र मन का कारक होने से इसका पाठ अवसाद, चिंता और अनिद्रा में राहत देता है।

पाठ करने की विधि (Method of Chanting)

  • दिन: सोमवार (Monday) को विशेष फलदायी। पूर्णिमा की रात्रि को पाठ करना सर्वोत्तम है।

  • समय: रात्रि में, विशेषकर चंद्रोदय के समय पाठ करें। प्रातःकाल भी पाठ किया जा सकता है।

  • आसन और दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। श्वेत आसन का प्रयोग करें।

  • पूजन: चंद्र यंत्र या शिवलिंग के सामने पाठ करें (चंद्र शिव के मस्तक पर विराजमान हैं)।

  • अर्पण: सफेद फूल, चावल, दूध, और मिश्री अर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. चंद्र अष्टाविंशति नाम स्तोत्र में कितने नाम हैं?

इस स्तोत्र में चंद्र देव के 28 (अष्टाविंशति) दिव्य नाम हैं। ये नाम श्लोक 2, 3 और 4 में वर्णित हैं।

2. चंद्र को 'रमाभ्राता' क्यों कहा गया है?

समुद्र मंथन के समय चंद्र और लक्ष्मी (रमा) दोनों क्षीर सागर से उत्पन्न हुए थे। इसलिए चंद्र को लक्ष्मी का भाई (रमाभ्राता) कहा जाता है।

3. चंद्र को 'शम्भुशिरश्चूडामणि' क्यों कहते हैं?

भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया है। इसीलिए चंद्र को शिव (शम्भु) के शिर का चूड़ामणि (मुकुट रत्न) कहा जाता है।

4. क्या यह स्तोत्र चंद्र दोष निवारण में सहायक है?

हाँ, जिनकी कुंडली में चंद्र नीच, अस्त या पीड़ित हो, उन्हें इस स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। इससे चंद्र बल मजबूत होता है।

5. चंद्र को 'ओषधीश' क्यों कहा गया है?

वैदिक मान्यता के अनुसार चंद्रमा की किरणों से औषधियों में जीवन शक्ति आती है। इसीलिए चंद्र को औषधियों का स्वामी (ओषधीश) कहा जाता है।

6. इस स्तोत्र का पाठ किस दिन करना चाहिए?

स्तोत्र में "तद्दिने च पठेद्यस्तु" कहा गया है - चंद्र के दिन अर्थात सोमवार (Monday) को पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है।

7. चंद्र का बीज मंत्र क्या है?

चंद्र का बीज मंत्र है: ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः। स्तोत्र पाठ के बाद इसकी 1 माला (108 बार) जप करें।

8. चंद्र की शांति के लिए क्या दान करें?

चंद्र की शांति के लिए श्वेत वस्त्र, चावल, दूध, मोती, चांदी और सफेद फूल का दान शुभ होता है। सोमवार को गायों को चारा खिलाना भी लाभकारी है।

9. 'कलानिधि' का क्या अर्थ है?

चंद्रमा 16 कलाओं से युक्त माने जाते हैं - शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से पूर्णिमा तक प्रतिदिन एक कला बढ़ती है। इसीलिए चंद्र को 'कलानिधि' (कलाओं का भंडार) कहा जाता है।

10. क्या यह स्तोत्र मानसिक रोगों में लाभकारी है?

हाँ, चंद्र मन का कारक होने से इस स्तोत्र का पाठ अवसाद (Depression), चिंता (Anxiety), अनिद्रा (Insomnia) और मानसिक अशांति में विशेष लाभकारी माना जाता है।