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Sri Bhuvaneshwari Stotram (Rudra Yamala) – श्री भुवनेश्वरी स्तोत्रम्

Sri Bhuvaneshwari Stotram: Hymn from Rudra Yamala Tantra

Sri Bhuvaneshwari Stotram (Rudra Yamala) – श्री भुवनेश्वरी स्तोत्रम्
॥ श्री भुवनेश्वरी स्तोत्रम् (रुद्रयामल तन्त्र) ॥ अथानन्दमयीं साक्षाच्छब्दब्रह्मस्वरूपिणीम् । ईडे सकलसम्पत्त्यै जगत्कारणमम्बिकाम् ॥ १ ॥ आद्यामशेषजननीमरविन्दयोने- -र्विष्णोः शिवस्य च वपुः प्रतिपादयित्रीम् । सृष्टिस्थितिक्षयकरीं जगतां त्रयाणां स्तुत्वा गिरं विमलयाप्यहमम्बिके त्वाम् ॥ २ ॥ पृथ्व्या जलेन शिखिना मरुताम्बरेण होत्रेन्दुना दिनकरेण च मूर्तिभाजः । देवस्य मन्मथरिपोरपि शक्तिमत्ता- -हेतुस्त्वमेव खलु पर्वतराजपुत्रि ॥ ३ ॥ त्रिस्रोतसः सकलदेवसमर्चिताया वैशिष्ट्यकारणमवैमि तदेव मातः । त्वत्पादपङ्कजपरागपवित्रितासु शम्भोर्जटासु सततं परिवर्तनं यत् ॥ ४ ॥ आनन्दयेत्कुमुदिनीमधिपः कलानां नान्यामिनः कमलिनीमथ नेतरां वा । एकत्र मोदनविधौ परमे क ईष्टे त्वं तु प्रपञ्चमभिनन्दयसि स्वदृष्ट्या ॥ ५ ॥ आद्याप्यशेषजगतां नवयौवनासि शैलाधिराजतनयाप्यतिकोमलासि । त्रय्याः प्रसूरपि तथा न समीक्षितासि ध्येयासि गौरि मनसो न पथि स्थितासि ॥ ६ ॥ आसाद्य जन्म मनुजेषु चिराद्दुरापं तत्रापि पाटवमवाप्य निजेन्द्रियाणाम् । नाभ्यर्चयन्ति जगतां जनयित्रि ये त्वां निःश्रेणिकाग्रमधिरुह्य पुनः पतन्ति ॥ ७ ॥ कर्पूरचूर्णहिमवारिविलोडितेन ये चन्दनेन कुसुमैश्च सुजातगन्धैः । आराधयन्ति हि भवानि समुत्सुकास्त्वां ते खल्वखण्डभुवनाधिभुवः प्रथन्ते ॥ ८ ॥ आविश्य मध्यपदवीं प्रथमे सरोजे सुप्ता हि राजसदृशी विरचय्यविश्वम् । विद्युल्लतावलयविभ्रममुद्वहन्ती पद्मानि पञ्च विदलय्य समश्नुवाना ॥ ९ ॥ तन्निर्गतामृतरसैः परिषिक्तगात्र- -मार्गेण तेन विलयं पुनरप्यवाप्ता । येषां हृदि स्फुरसि जातु न ते भवेयु- -र्मातर्महेश्वरकुटुम्बिनि गर्भभाजः ॥ १० ॥ आलम्बिकुण्डलभरामभिरामवक्त्रा- -मापीवरस्तनतटीं तनुवृत्तमध्याम् । चिन्ताक्षसूत्रकलशालिखिताढ्यहस्ता- -मावर्तयामि मनसा तव गौरि मूर्तिम् ॥ ११ ॥ आस्थाय योगमविजित्य च वैरिषट्क- -माबद्ध्यचेन्द्रियगणं मनसि प्रसन्ने । पाशाङ्कुशाभयवराढ्यकरां सुवक्त्रा- -मालोकयन्ति भुवनेश्वरि योगिनस्त्वाम् ॥ १२ ॥ उत्तप्तहाटकनिभा करिभिश्चतुर्भि- -रावर्तितामृतघटैरभिषिच्यमाना । हस्तद्वयेन नलिने रुचिरे वहन्ती पद्मापि साभयवरा भवसि त्वमेव ॥ १३ ॥ अष्टाभिरुग्रविविधायुधवाहिनीभि- -र्दोर्वल्लरीभिरधिरुह्य मृगाधिराजम् । दूर्वादलद्युतिरमार्त्यविपक्षपक्षान् न्यक्कुर्वती त्वमसि देवि भवानि दुर्गा ॥ १४ ॥ आविर्निदाघजलशीकरशोभिवक्त्रां गुञ्जाफलेन परिकल्पितहारयष्टिम् । पीतांशुकामसितकान्तिमनङ्गतन्द्रा- -माद्यां पुलिन्दतरुणीमसकृत्स्मरामि ॥ १५ ॥ हंसैर्गतिक्वणितनूपुरदूरदृष्टे मूर्तैरिवार्थवचनैरनुगम्यमानौ । पद्माविवोर्ध्वमुखरूढसुजातनालौ श्रीकण्ठपत्नि शिरसा विदधे तवाङ्घ्री ॥ १६ ॥ द्वाभ्यां समीक्षितुमतृप्तिमतेव दृग्भ्या- -मुत्पाट्य भालनयनं वृषकेतनेन । सान्द्रानुरागतरलेन निरीक्ष्यमाणे जङ्घे शुभे अपि भवानि तवानतोऽस्मि ॥ १७ ॥ ऊरू स्मरामि जितहस्तिकरावलेपौ स्थौल्येन मार्दवतया परिभूतरम्भौ । श्रेणीभरस्य सहनौ परिकल्प्य दत्तौ स्तम्भाविवाङ्गवयसा तव मध्यमेन ॥ १८ ॥ श्रोण्यौ स्तनौ च युगपत्प्रथयिष्यतोच्चै- -र्बाल्यात्परेण वयसा परिहृष्टसारौ । रोमावलीविलसितेन विभाव्य मूर्तिं मध्यं तव स्फुरतु मे हृदयस्य मध्ये ॥ १९ ॥ सख्यः स्मरस्य हरनेत्रहुताशशान्त्यै लावण्यवारिभरितं नवयौवनेन । आपाद्य दत्तमिव पल्लवमप्रविष्टं नाभिं कदापि तव देवि न विस्मरेयम् ॥ २० ॥ ईशेऽपि गेहपिशुनं भसितं दधाने काश्मीरकर्दममनुस्तनपङ्कजे ते । स्नातोत्थितस्य करिणः क्षणलक्ष्यफेनौ सिन्दूरितौ स्मरयतः समदस्य कुम्भौ ॥ २१ ॥ कण्ठातिरिक्तगलदुज्ज्वलकान्तिधारा- -शोभौ भुजौ निजरिपोर्मकरध्वजेन । कण्ठग्रहाय रचितौ किल दीर्घपाशौ मातर्मम स्मृतिपथं न विलङ्घयेताम् ॥ २२ ॥ नात्यायतं रचितकम्बुविलासचौर्यं भूषाभरेण विविधेन विराजमानम् । कण्ठं मनोहरगुणं गिरिराजकन्ये सञ्चिन्त्य तृप्तिमुपयामि कदापि नाहम् ॥ २३ ॥ अत्यायताक्षमभिजातललाटपट्‍टं मन्दस्मितेन दरफुल्लकपोलरेखम् । बिम्बाधरं वदनमुन्नतदीर्घनासं यस्ते स्मरत्यसकृदम्ब स एव जातः ॥ २४ ॥ आविस्तुषारकरलेखमनल्पगन्ध- -पुष्पोपरिभ्रमदलिव्रजनिर्विशेषम् । यश्चेतसा कलयते तव केशपाशं तस्य स्वयं गलति देवि पुराणपाशः ॥ २५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ श्रुतिसुचरितपाकं श्रीमता स्तोत्रमेत- -त्पठति य इह मर्त्यो नित्यमार्द्रान्तरात्मा । स भवति पदमुच्चैः सम्पदां पादनम्र- -क्षितिपमुकुटलक्ष्मीलक्षणानां चिराय ॥ २६ ॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीभुवनेश्वरी स्तोत्रम् ॥

श्री भुवनेश्वरी स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री भुवनेश्वरी दश महाविद्याओं में चौथी महाविद्या हैं। इनका नाम दो शब्दों से बना है: 'भुवन' (ब्रह्मांड/लोक) और 'ईश्वरी' (स्वामिनी)। अर्थात, वे समस्त ब्रह्मांड की अधीश्वरी हैं।

यह स्तोत्र रुद्रयामल तन्त्र (Rudra Yamala Tantra) से लिया गया है। इसमें देवी को केवल एक स्त्री रूप में नहीं, बल्कि उस परम चेतना (Supreme Consciousness) के रूप में पूजा गया है जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी शक्ति प्रदान करती है ("विष्णोः शिवस्य च वपुः प्रतिपादयित्रीम्" - श्लोक २)।

साधक इस स्तोत्र के माध्यम से देवी के उस विराट स्वरूप का दर्शन करता है जो पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) को संचालित करता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

पंचभूतों पर नियंत्रण: श्लोक ३ में स्पष्ट कहा गया है कि शिव (मन्मथरिपु) अष्टमूर्ति हैं (पंचतत्व + सूर्य + चंद्र + यजमान), लेकिन उनमें 'शक्ति' का संचार करने वाली केवल आप हैं। आपके बिना शिव 'शव' मात्र हैं।

नख-शिख वर्णन: श्लोक ११ से २५ तक देवी के अंगों का अत्यंत सुंदर और तांत्रिक वर्णन है। यह कोई साधारण शारीरिक वर्णन नहीं है, बल्कि 'ध्यान योग' की प्रक्रिया है। साधक उनके चरणों से लेकर केशपाश तक ध्यान करता है, जिससे उसकी कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है।

माया और मुक्ति: श्लोक ९ और १० में कुण्डलिनी योग का संकेत है - कैसे शक्ति मूलाधार से उठकर (पद्मानि पञ्च विदलय्य - ५ चक्रों को भेदकर) सहस्रार में शिव से मिलती है और अमृत वर्षा करती है।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • राजयोग और पद प्रतिष्ठा: श्लोक २६ की फलश्रुति में कहा गया है कि जो आर्द्र हृदय (भक्ति भाव) से इसका पाठ करता है, वह राजाओं द्वारा पूजित होता है और उच्च पद ("क्षितिपमुकुटलक्ष्मी") प्राप्त करता है।

  • दरिद्रता नाश: "सकलसम्पत्त्यै" (श्लोक १) - यह पाठ समस्त प्रकार की संपत्तियों को देने वाला है।

  • आकर्षक व्यक्तित्व: देवी के सौंदर्य का ध्यान करने से साधक के व्यक्तित्व में भी दिव्य आकर्षण और तेज उत्पन्न होता है।

  • मोक्ष: "तस्य स्वयं गलति देवि पुराणपाशः" (श्लोक २५) - देवी के केशपाश का ध्यान करने से जीव का 'पुराण पाश' (जन्म-मृत्यु का बंधन) स्वयं खुल जाता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त या रात्रि का समय (निशीथ काल) इस स्तोत्र के लिए उत्तम है।

  • सामग्री: "कर्पूरचूर्णहिमवारि..." (श्लोक ८) - कपूर मिश्रित जल, चंदन और सुगंधित पुष्पों से अर्चन करें।

  • दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

  • संकल्प: पाठ शुरू करने से पहले अपनी मनोकामना (धन, पद, या मोक्ष) का संकल्प अवश्य लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तोत्र किस तंत्र ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'रुद्रयामल तन्त्र' (Rudra Yamala Tantra) के अंतर्गत आता है, जो शिव और शक्ति के संवाद रूप में रचित एक प्रमुख आगम ग्रंथ है।

2. इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

इसमें कुल 26 श्लोक हैं। अंतिम श्लोक (फलश्रुति) में इसके पाठ का फल बताया गया है।

3. भुवनेश्वरी देवी का मुख्य तत्व क्या है?

भुवनेश्वरी 'आकाश' (Space) तत्व की अधिष्ठात्री हैं। वे वह विशाल अवकाश (Space) हैं जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड (पृथ्वी, जल आदि) स्थित है।

4. श्लोक ३ का क्या महत्व है?

श्लोक ३ में कहा गया है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान, सूर्य और चंद्र (अष्टमूर्ति शिव) - इन सबकी शक्ति का कारण केवल देवी भुवनेश्वरी हैं।

5. इस पाठ का सबसे बड़ा फल क्या है?

श्लोक २६ (फलश्रुति) के अनुसार, इसका साधक 'क्षितिपमुकुटलक्ष्मी...' अर्थात राजाओं के मुकुट की शोभा (राज्य/उच्च पद) और अपार संपदा प्राप्त करता है।

6. क्या इसमें 'वशीकरण' का प्रयोग है?

हाँ, भुवनेश्वरी को 'त्रैलोक्य मोहिनी' भी कहा जाता है। श्लोक १२ में योगी उन्हें 'पाशांकुश' धारण किए हुए ध्यान करते हैं, जो आकर्षण और नियंत्रण के आयुध हैं।

7. देवी के स्वरूप का ध्यान कैसे करें?

स्तोत्र के मध्य भाग (श्लोक ११-२५) में देवी के नख-शिख सौंदर्य का वर्णन है। साधक को उनके उदित सूर्य जैसे वर्ण ('उत्तप्तहाटकनिभा') का ध्यान करना चाहिए।

8. 'पर्वतराजपुत्रि' संबोधन क्यों?

वे हिमालय की पुत्री (पार्वती) रूप में भी पूजी जाती हैं। यहाँ उन्हें शिव की शक्ति ('शम्भोर्जटासु...') और पर्वतराजपुत्री दोनों रूपों में नमन किया गया है।

9. पाठ के लिए विशेष दिन?

शुक्रवार (Friday), पूर्णिमा, या नवरात्रि की चतुर्थी तिथि (जो भुवनेश्वरी को समर्पित है) पाठ के लिए सर्वोत्तम है।

10. साधना में किस फूल का प्रयोग करें?

श्लोक ७ और ८ में रक्त चंदन (Red Sandalwood) और सुगन्धित पुष्पों का उल्लेख है। लाल गुड़हल (Japa Kusum) उन्हें विशेष प्रिय है।