Sri Kamala Stotram 2 – श्री कमला स्तोत्रम् (वर्ण-ग्रथित स्तवराजः)

श्री कमला स्तोत्रम् (स्तवराज) — विस्तृत परिचय
यह श्री कमला स्तोत्रम् (जिसे स्तवराज भी कहा गया है) श्रीरुद्रयामलतन्त्र के शिव-गौरी संवाद से उद्धृत अद्वितीय रचना है। यह सामान्य स्तुति नहीं, अपितु एक 'वर्ण-ग्रथित' (Varna-grathita) स्तोत्र है।
वर्ण-ग्रथित का अर्थ: इसके श्लोक संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों के क्रम से रचे गए हैं। प्रथम श्लोक 'अ' से (अनन्तरूपिणी...), द्वितीय 'आ' से (आपदुद्धारिणी...), तृतीय 'इ' से (इन्दुमुखी...), इसी प्रकार 'क्ष' तक। तंत्र विज्ञान में प्रत्येक अक्षर एक मातृका शक्ति है। अक्षरों के क्रम में स्तुति करने से यह स्तोत्र 'सर्वमन्त्रमय' (श्लोक २) बन जाता है।
शिव स्वयं इसकी महिमा में कहते हैं — "गुह्याद्गुह्यतरं पुण्यं सर्वदेवनमस्कृतम्" — यह गुह्य से भी गुह्यतर है और सभी देवताओं द्वारा नमस्कृत है। फलश्रुति में इसके पाप-नाशक और संतान-दायक प्रभाव का अत्यंत बलपूर्वक वर्णन है।
अमोघ फलश्रुति — शिव का आश्वासन
इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक ५७-७१) अत्यंत विस्तृत और प्रभावशाली है:
१. वन्ध्या और गर्भिणी के लिए: "वन्ध्या चापि लभेत् पुत्रं गर्भिणी प्रसवेत्सुतम्" (श्लोक ६७) — वन्ध्या स्त्री को भी पुत्र प्राप्त होता है और गर्भिणी को सुपुत्र। शिव "सत्यं वच्मि" (मैं सत्य कहता हूँ) कहकर इसकी पुष्टि करते हैं।
२. महापाप नाश: "ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः" (श्लोक ६५) — ब्रह्महत्या, शराब पीना, चोरी, गुरुपत्नी-गमन जैसे महापाप भी इसके कीर्तन से नष्ट हो जाते हैं।
३. वशीकरण और सम्मान: "राजानो वशमायान्ति" (श्लोक ६१) — राजा और अधिकारी वश में होते हैं। "तं दृष्ट्वा भवेन्मूको वादी" (श्लोक ६०) — वाद-विवाद करने वाले मूक (चुप) हो जाते हैं। "सुराश्च असुराश्चैव... प्रणमन्ति" (श्लोक ६३) — देवता और असुर सभी साधक को प्रणाम करते हैं।
४. भय नाश: "भूतप्रेतग्रहा यक्षा... विद्रवन्ति भयार्ता" (श्लोक ६२) — भूत, प्रेत, ग्रह बाधाएं साधक को देखते ही भयभीत होकर भाग जाती हैं।
५. वाक्सिद्धि और कवित्व: "गद्यपद्यमयी वाणी मुखात्तस्य प्रजायते" (श्लोक ६६) — मुख से सरस्वती प्रवाहित होती है, साधक कवि बन जाता है।
विशेष प्रयोग — भूर्जपत्र धारण विधि
श्लोक ६८-६९ में इस स्तोत्र के यन्त्रवत् प्रयोग की विधि दी गई है:
"भूर्जपत्रे समालिख्य रोचनाकुङ्कुमेन तु" — भूर्जपत्र (Bhojpatra) पर रोचना (गोरोचन) और कुंकुम (केसर/कुमकुम) की स्याही से इस पूरे स्तोत्र को लिखें।
"भक्त्या सम्पूजयेद्यस्तु" — गंध, पुष्प, अक्षत से उसकी पूजा करें।
"धारयेद्दक्षिणे बाहौ पुरुषः... योषिद्वामभुजे" — पुरुष दाहिनी भुजा में और स्त्री बाईं भुजा में ताबीज़ में भरकर धारण करें।
फल: "सर्वसौख्यमयी भवेत्" (सर्व सुख), "विषं निर्विषतां याति" (विष प्रभाव हीन), "अग्निर्याति च शीतताम्" (अग्नि भी शीतल हो जाती है — संकट टल जाते हैं)।
पाठ विधि
- त्रिसन्ध्या: "त्रिसन्ध्यं च दिने दिने" (श्लोक ५७) — प्रातः, मध्याह्न और सायं काल में नित्य पाठ करें।
- श्रवण और कीर्तन: केवल पाठ ही नहीं, "शृणुयाच्छ्रावयेदपि" (सुनना और सुनाना) भी समान रूप से फलदायी है।
- शुद्धता: पवित्र होकर, कमला (लक्ष्मी) के चित्र के समक्ष दीप जलाकर पाठ करें।
- भक्ति: "पठितव्यं प्रयत्नेन" — प्रयत्न और भक्ति के साथ पाठ करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. इसे 'वर्ण-ग्रथित' (Varna-grathita) क्यों कहते हैं?
यह इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इसके श्लोक संस्कृत वर्णमाला के क्रम (A to Z equivalent) से शुरू होते हैं — अ, आ, इ, ई, उ... से लेकर क्ष तक। तंत्र में इसे 'मातृका योग' कहते हैं। इससे यह साधारण स्तुति न रहकर मन्त्र-शक्ति से संपन्न हो जाता है।
2. यह कमला स्तोत्र १ से कैसे अलग है?
स्तोत्र १: 40 श्लोक, 'प्रसन्ना भव सुन्दरि' ध्रुवपद, तीर्थ-महिमा प्रधान। स्तोत्र २ (यह): 71 श्लोक, रुद्रयामल तंत्र, वर्णमाला-क्रम (Alphabetical), और इसमें ताबीज़ (कवच) धारण और पाप-नाश का विशेष विधान है।
3. भूर्जपत्र पर धारण करने की विधि क्या है?
विधि स्पष्ट है (श्लोक ६८-६९): भूर्जपत्र लें। रोचना (गोरोचन) और कुंकुम (केसर) को मिलाकर स्याही बनाएं। अनार की कलम से पूरा स्तोत्र लिखें। पूजा करें। ताबीज़ (स्वर्ण या रजत) में भरकर पुरुष दाएं हाथ में और स्त्री बाएं हाथ में पहनें। इससे 'सर्वसौख्य' और रक्षा प्राप्त होती है।
4. क्या यह वन्ध्या/नि:संतान के लिए उपयोगी है?
अत्यधिक उपयोगी। श्लोक ६७ में शिव की विशेष घोषणा है — "वन्ध्या चापि लभेत् पुत्रं" — बांझ स्त्री को भी पुत्र प्राप्त होता है। गर्भिणी स्त्री को सुयोग्य सन्तान मिलती है। यह संतान गोपाल मंत्र की तरह प्रभावशाली है।
5. 'ब्रह्महत्या सुरापानं' श्लोक का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है कि यह स्तोत्र इतना पवित्र है कि इसके नियमित पाठ से गंभीर से गंभीर पापों (जैसे ब्रह्महत्या, मदिरापान, विश्वासघात) के संस्कार भी धुल जाते हैं और चित्त शुद्ध हो जाता है। यह प्रायश्चित के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
6. क्या इससे शत्रु और कोर्ट-कचहरी में लाभ मिलता है?
हाँ। श्लोक ६० — "भवेन्मूको वादी" (विपक्षी वकील/शत्रु मूक हो जाता है)। श्लोक ७० — "शत्रवो मित्रतां यान्ति" (शत्रु मित्र बन जाते हैं)। इसलिए विवाद, कोर्ट केस या शत्रु भय में इसका पाठ अमोघ अस्त्र है।
7. 'वाक्सिद्धि' क्या है?
श्लोक ६६ कहता है — साधक के मुख से काव्य (Poetry) और ज्ञान स्वतः प्रवाहित होने लगता है। जो वह बोलता है, वह सत्य होने लगता है। यह सरस्वती और लक्ष्मी का संगम है।
8. 'त्रिसन्ध्यं' पाठ न कर सकें तो?
यद्यपि त्रिसन्ध्या (तीन बार) का विधान है, परन्तु समयाभाव में प्रातःकाल या शुक्रवार की रात्रि को 'प्रयत्नेन' (प्रयत्नपूर्वक/एकाग्रता से) पाठ अवश्य करें। नियम और भक्ति में भक्ति प्रधान है।
9. 'स्तवराज' का क्या अर्थ है?
स्तवराज का अर्थ है — 'स्तुतियों का राजा'। शिव ने इसे यह उपाधि इसलिए दी क्योंकि यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि वर्णमाला-मन्त्र-विज्ञान है जो भोग (धन-पुत्र-राज्य) और मोक्ष (पाप-नाश-मुक्ति) दोनों एक साथ देता है।
10. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
यह स्तोत्र है, मन्त्र नहीं। यद्यपि रुद्रयामल तंत्र का है, पर इसकी प्रकृति 'स्तोत्र' की है। "पठनाच्छ्रवणाद्यस्य नरो मोक्षमवाप्नुयात्" (श्लोक १) — पढ़ने और सुनने मात्र से मोक्ष मिलता है। अतः बिना दीक्षा के भी भक्तिपूर्वक पढ़ा जा सकता है।