Sri Bala Tripurasundari Raksha Stotram – श्री बाला रक्षा स्तोत्रम्

॥ श्री बाला रक्षा स्तोत्रम् ॥
॥ क्षुद्रजाल-पातक रक्षा ॥
सर्वलोकैकजननी सर्वाभीष्टफलप्रदे ।
रक्ष मां क्षुद्रजालेभ्यः पातकेभ्यश्च सर्वदा ॥ १ ॥
॥ जगद्दुरित निवारण ॥
जगद्धिते जगन्नेत्रि जगन्मातर्जगन्मये ।
जगद्दुरितजालेभ्यो रक्ष मामहितं हर ॥ २ ॥
॥ जन्मशत पाप नाश ॥
वाङ्मनः कायकरणैर्जन्मान्तरशतार्जितम् ।
पापं नाशय देवेशि पाहि मां कृपयाऽनिशम् ॥ ३ ॥
॥ जन्मसहस्र दुष्कृत निवारण ॥
जन्मान्तरसहस्रेषु यत्कृतं दुष्कृतं मया ।
तन्निवारय मां पाहि शरण्ये भक्तवत्सले ॥ ४ ॥
॥ स्व-पर कृत पाप नाश ॥
मया कृतान्यशेषाणि मदीयैश्च कृतानि च ।
पापानि नाशयस्वाद्य पाहि मां परदेवते ॥ ५ ॥
॥ ज्ञान-अज्ञान कृत पाप ॥
ज्ञानाज्ञानकृतैः पापैः साम्प्राप्तं दुरितं क्षणात् ।
निवारय जगन्मातरखिलैरनिवारितम् ॥ ६ ॥
॥ सत्कार्य प्रवर्तन ॥
असत्कार्य निवृत्तिं च सत्कार्यस्य प्रवर्तनम् ।
देवतात्मानुसन्धानं देहि मे परमेश्वरि ॥ ७ ॥
॥ देशिक स्मृति ॥
सर्वावरणविद्यानां सन्धानेनानुचिन्तनम् ।
देशिकाङ्घ्रिस्मृतिं चैव देहि मे जगदीश्वरि ॥ ८ ॥
॥ निश्चल चित्त ॥
अनुस्यूतपरब्रह्मानन्दामृतनिषेवणम् ।
अत्यन्तनिश्चलं चित्तं देहि मे परमेश्वरि ॥ ९ ॥
॥ सदाशिवोपासित पद ॥
सदाशिवाद्यैर्धात्र्यन्तैः देवताभिर्मुनीश्वरैः ।
उपासितं पदं यत्तद्देहि मे परमेश्वरि ॥ १० ॥
॥ विघ्न निवारण ॥
इन्द्रादिभिरशेषैश्च देवैरसुरराक्षसैः ।
कृतं विघ्नं निवार्याशु कृपया रक्ष रक्ष माम् ॥ ११ ॥
॥ परिजन रक्षा ॥
आत्मानमात्मनः स्निग्धमाश्रितं परिचारकम् ।
द्रव्यदं बन्धुवर्गं च देवेशि परिरक्ष नः ॥ १२ ॥
॥ सुहृद रक्षा ॥
उपासकस्य यो यो मे यथाशक्त्यनुकूलकृत् ।
सुहृदं रक्ष तं नित्यं द्विषन्तमनुकूलय ॥ १३ ॥
॥ दैहिक-आदैहिक भय ॥
दैहिकादैहिकान्नानाहेतुकात्केवलाद्भयात् ।
पाहि मां प्रणतापत्तिभञ्जने विश्वलोचने ॥ १४ ॥
॥ निश्चला भक्ति ॥
नित्यानन्दमयं सौख्यं निर्मलं निरूपाधिकम् ।
देहि मे निश्चलां भक्तिं निखिलाभिष्टसिद्धिदे ॥ १५ ॥
॥ कर्तव्य बोध ॥
यन्मया सकलोपायैः करणीयमितः परम् ।
तत्सर्वं बोधयस्वाम्ब सर्वलोकहिते रते ॥ १६ ॥
॥ बुद्धियोग ॥
प्रदेहि बुद्धियोगं तं येन त्वामुपयाम्यहम् ।
कामानां हृद्यसंरोहं देहि मे कृपयेश्वरि ॥ १७ ॥
॥ भवाब्धि उद्धार ॥
भवाब्धौ पतितं भीतमनाथं दीनमानसम् ।
उद्धृत्य कृपया देवि निधेहि चरणाम्बुजे ॥ १८ ॥
॥ इति श्री बाला रक्षा स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
श्री बाला रक्षा स्तोत्रम् का परिचय
श्री बाला रक्षा स्तोत्रम् (Sri Bala Raksha Stotram) एक अत्यंत शक्तिशाली रक्षा-प्रार्थना है। 'रक्षा' का अर्थ है — सुरक्षा। इस स्तोत्र में देवी से सर्वप्रकार की रक्षा और कृपा की याचना है — भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक सभी स्तरों पर।
"रक्ष मां क्षुद्रजालेभ्यः पातकेभ्यश्च सर्वदा" — श्लोक 1: क्षुद्र (नीच) जालों और पातकों (पापों) से सदा रक्षा करो।
स्तोत्र की संरचना: 18 श्लोकों में विविध प्रकार की रक्षा और कृपा की प्रार्थना: (1-6) पाप-दुरित से रक्षा, (7-10) आध्यात्मिक उन्नति, (11-14) विघ्न-शत्रु-भय से रक्षा, (15-18) भक्ति-ज्ञान-मोक्ष प्राप्ति।
पाप नाश: श्लोक 3: 'जन्मान्तरशतार्जितम्' — 100 जन्मों के पाप। श्लोक 4: 'जन्मान्तरसहस्रेषु' — 1000 जन्मों के दुष्कृत। श्लोक 5: 'मया कृतान्य... मदीयैश्च' — स्वयं और अपनों द्वारा किए पाप। श्लोक 6: 'ज्ञानाज्ञानकृतैः' — जाने-अनजाने में किए पाप।
आध्यात्मिक प्राप्ति: श्लोक 7: 'देवतात्मानुसन्धानम्' — देवता के साथ आत्मा का अनुसंधान। श्लोक 8: 'देशिकाङ्घ्रिस्मृतिम्' — गुरु चरणों की स्मृति। श्लोक 9: 'अत्यन्तनिश्चलं चित्तम्' — पूर्णतः स्थिर चित्त। श्लोक 10: 'सदाशिवाद्यैर्धात्र्यन्तैः उपासितं पदम्' — वह पद जो सदाशिव से धात्री तक सभी देवताओं द्वारा उपासित है।
अंतिम प्रार्थना: श्लोक 18: 'भवाब्धौ पतितं भीतमनाथं... उद्धृत्य कृपया देवि निधेहि चरणाम्बुजे' — संसार सागर में डूबे, भयभीत, अनाथ, दीन को उठाकर अपने चरण कमलों में स्थापित करो।
विशिष्ट महत्व — 18 प्रार्थनाएं
- श्लोक 1-2: क्षुद्रजाल, पातक, जगद्दुरित से रक्षा।
- श्लोक 3: 100 जन्मों के वाक्-मन-काय पाप नाश।
- श्लोक 4: 1000 जन्मों के दुष्कृत निवारण।
- श्लोक 5: स्वयं और अपनों के पाप नाश।
- श्लोक 6: ज्ञान-अज्ञान से किए पाप का क्षणिक निवारण।
- श्लोक 7: असत्कार्य निवृत्ति, सत्कार्य प्रवर्तन।
- श्लोक 8: सर्वावरण विद्या, गुरु स्मृति।
- श्लोक 9: परब्रह्मानन्द, निश्चल चित्त।
- श्लोक 10: सदाशिवादि उपासित पद।
- श्लोक 11: देव-असुर-राक्षस विघ्न निवारण।
- श्लोक 12: आत्म-बंधु-परिचारक-द्रव्यदाता रक्षा।
- श्लोक 13: सुहृद रक्षा, द्वेषी अनुकूलन।
- श्लोक 14: दैहिक-आदैहिक-अहेतुक भय से रक्षा।
- श्लोक 15: नित्यानन्द सुख, निश्चला भक्ति।
- श्लोक 16: कर्तव्य का बोध।
- श्लोक 17: बुद्धियोग, काम निर्मूलन।
- श्लोक 18: भवाब्धि उद्धार, चरणाश्रय।
पाठ विधि
- नियमित पाठ: प्रातः-सायं 18 श्लोकों का पाठ।
- संकट काल: भय-आपदा में विशेष पाठ।
- पाप शांति: प्रायश्चित्त हेतु 21/40 दिन पाठ।
- रक्षा हेतु: यात्रा, नए कार्य, विवाद में पाठ।
- भक्ति वृद्धि: श्लोक 15 का विशेष जप।
- मोक्ष प्राप्ति: श्लोक 18 का ध्यान सहित पाठ।
FAQ
1. 'रक्षा स्तोत्र' का क्या अर्थ है?
'रक्षा' = सुरक्षा। देवी से सर्वप्रकार की रक्षा की प्रार्थना।
2. इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
18 श्लोक — विभिन्न प्रकार की रक्षा और कृपा।
3. 'क्षुद्रजाल' का अर्थ?
श्लोक 1: नीच जाल — अभिचार, तंत्र प्रयोग, दुष्ट साधनाएं।
4. 'जन्मान्तरसहस्रेषु' का अर्थ?
श्लोक 4: 'हजारों जन्मों में' — अनेक जन्मों के पाप।
5. 'देशिकाङ्घ्रि' का अर्थ?
श्लोक 8: 'देशिक' = गुरु। गुरु के चरणों की स्मृति।
6. 'अत्यन्तनिश्चलं चित्तम्' का अर्थ?
श्लोक 9: पूर्णतः स्थिर मन — समाधि अवस्था।
7. 'सदाशिवाद्यैर्धात्र्यन्तैः' का अर्थ?
श्लोक 10: सदाशिव से धात्री (पृथ्वी) तक — सभी देवताओं द्वारा।
8. 'द्विषन्तमनुकूलय' का अर्थ?
श्लोक 13: द्वेषी को अनुकूल बनाओ — शत्रु को मित्र।
9. 'भवाब्धौ पतितम्' का अर्थ?
श्लोक 18: संसार सागर में डूबा हुआ।
10. 'निधेहि चरणाम्बुजे' का अर्थ?
श्लोक 18: चरण कमलों में स्थापित करो — शरणागति।
11. संकट में कौन सा श्लोक पढ़ें?
श्लोक 1, 11, 14 — क्षुद्रजाल, विघ्न, भय से रक्षा।
12. मोक्ष के लिए कौन सा श्लोक?
श्लोक 9 (निश्चल चित्त), 10 (उपासित पद), 18 (भवाब्धि उद्धार)।