Sri Bala Vanchadatri Stotram – श्री बाला वाञ्छादात्री स्तोत्रम्

॥ श्री बाला वाञ्छादात्री स्तोत्रम् ॥
॥ वाङ्मयसिद्धि ध्यानम् ॥
विद्याक्षमालासुकपालमुद्रा-
-राजत्करां कुन्दसमानकान्तिम् ।
मुक्ताफलालङ्कृतशोभनाङ्गीं
बालां भजे वाङ्मयसिद्धिहेतोः ॥ १ ॥
॥ कल्पवृक्ष ध्यानम् ॥
भजे कल्पवृक्षाध उद्दीप्तरत्ना-
-ऽऽसने सन्निषण्णां मदाघूर्णिताक्षीम् ।
करैर्बीजपूरं कपालेषुचापं
सपाशाङ्कुशां रक्तवर्णां दधानाम् ॥ २ ॥
॥ चिद्रूपिणी ध्यानम् ॥
व्याख्यानमुद्रामृतकुम्भविद्यां
अक्षस्रजं सन्दधतीं कराब्जैः ।
चिद्रूपिणीं शारदचन्द्रकान्तिं
बालां भजे मौक्तिकभूषिताङ्गीम् ॥ ३ ॥
॥ त्रिपुरा ध्यानम् ॥
पाशाङ्कुशौ पुस्तकमक्षसूत्रं
करैर्दधानां सकलामरार्च्याम् ।
रक्तां त्रिणेत्रां शशिशेखरां तां
भजेऽखिलर्घ्यै त्रिपुरां च बालाम् ॥ ४ ॥
॥ रूपसम्पत्ति ध्यानम् ॥
आरक्तां शशिखण्डमण्डितजटाजूटानुबद्धस्रजं
बन्धूकप्रसवारुणाम्बरधरां रक्ताम्बुजाध्यासिनीम् ।
त्वां ध्यायामि चतुर्भुजां त्रिणयनामापीनरम्यस्तनीं
मध्ये निम्नवलित्रयाङ्किततनुं त्वद्रूपसम्पत्तये ॥ ५ ॥
॥ त्रिबीज सूक्ष्मपद ध्यानम् ॥
आधारे तरुणार्कबिम्बरुचिरं सोमप्रभं वाग्भवं
बीजं मन्मथमिन्द्रगोपकनिभं हृत्पङ्कजे संस्थितम् ।
रन्ध्रे ब्रह्मपदे च शाक्तमपरं चन्द्रप्रभाभासुरं
ये ध्यायन्ति पदत्रयं तव शिवे ते यान्ति सूक्ष्मं पदम् ॥ ६ ॥
॥ अरुणाम्बुजस्था ध्यानम् ॥
रक्ताम्बरां चन्द्रकलावतंसां
समुद्यदादित्यनिभां त्रिणेत्राम् ।
विद्याक्षमालाभयदानहस्तां
ध्यायामि बालामरुणाम्बुजस्थाम् ॥ ७ ॥
॥ परमा कला ध्यानम् ॥
अकलङ्कशशाङ्काभा त्र्यक्षा चन्द्रकलावती ।
मुद्रापुस्तलसद्बाहा पातु मां परमा कला ॥ ८ ॥
॥ धनसिद्धि ध्यानम् ॥
मातुलिङ्गपयोजन्महस्तां कनकसन्निभाम् ।
पद्मासनगतां बालां ध्यायामि धनसिद्धये ॥ ९ ॥
॥ ज्ञानप्राप्ति ध्यानम् ॥
वरपीयूषकलशपुस्तकाभीतिधारिणीम् ।
सुधां स्रवन्तीं ज्ञानाप्त्यै ब्रह्मरन्ध्रे विचिन्तये ॥ १० ॥
॥ आरोग्य ध्यानम् ॥
शुक्लाम्बरां शशाङ्काभां ध्यायाम्यारोग्यदायिनीम् ।
सृणिपाशधरां देवीं रत्नालङ्कारभूषिताम् ॥ ११ ॥
॥ सौमनस्य ध्यानम् ॥
अकारादिक्षकारान्तवर्णावयवशालिनीम् ।
प्रसन्नामरुणामीक्षे सौमनस्यप्रदां शिवाम् ॥ १२ ॥
॥ वागीश्वरी ध्यानम् ॥
पुस्तकजपवटहस्ते वरदाभयचिह्नबाहुलते ।
कर्पूरामलदेहे वागीश्वरि चोदयाशु मम चेतः ॥ १३ ॥
॥ इति श्री बाला वाञ्छादात्री स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
श्री बाला वाञ्छादात्री स्तोत्रम् का परिचय
श्री बाला वाञ्छादात्री स्तोत्रम् (Sri Bala Vanchadatri Stotram) एक अत्यंत विशिष्ट और व्यावहारिक स्तोत्र है। 'वाञ्छादात्री' का अर्थ है — 'इच्छाओं को पूर्ण करने वाली' (वाञ्छा = इच्छा, दात्री = देने वाली)। यह स्तोत्र 13 ध्यान श्लोकों का संग्रह है, जिसमें प्रत्येक श्लोक देवी बाला के एक विशिष्ट स्वरूप का ध्यान है और एक विशेष सिद्धि के लिए है।
"बालां भजे वाङ्मयसिद्धिहेतोः" — श्लोक 1 में ध्यान का उद्देश्य स्पष्ट: वाणी की सिद्धि के लिए बाला का भजन।
स्तोत्र की अनूठी संरचना: यह कोई कथात्मक स्तोत्र नहीं है, बल्कि यह एक ध्यान-मार्गदर्शिका है। प्रत्येक श्लोक में देवी का एक भिन्न स्वरूप वर्णित है — भिन्न वर्ण (रक्त, शुक्ल, कनक), भिन्न आसन (कल्पवृक्ष, पद्मासन, अरुणाम्बुज), भिन्न आयुध (पाश-अंकुश, पुस्तक-अक्षमाला, कपाल-बीजपूर), और प्रत्येक का एक विशिष्ट फल।
विविध सिद्धियाँ: श्लोक 1: वाङ्मयसिद्धि (वाक् शक्ति)। श्लोक 5: त्वद्रूपसम्पत्ति (देवी का रूप प्राप्ति)। श्लोक 6: सूक्ष्मपद (त्रिबीज ध्यान से मोक्ष)। श्लोक 9: धनसिद्धि। श्लोक 10: ज्ञानप्राप्ति। श्लोक 11: आरोग्य। श्लोक 12: सौमनस्य (मानसिक शांति)। श्लोक 13: वागीश्वरी चेतः (बुद्धि का जागरण)।
श्लोक 6 का विशेष महत्व: 'आधारे तरुणार्कबिम्बरुचिरं... ते यान्ति सूक्ष्मं पदम्' — यह श्लोक कुण्डलिनी साधना का संकेत देता है: आधार चक्र में वाग्भव बीज (ऐं), हृत्पद्म में कामराज बीज (क्लीं), ब्रह्मरन्ध्र में शाक्त बीज (सौः) का ध्यान करने वाले सूक्ष्म पद (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं।
व्यावहारिक उपयोग: यह स्तोत्र 'इच्छानुसार ध्यान' की सुविधा देता है। विद्यार्थी श्लोक 1 और 10 का, व्यापारी श्लोक 9 का, रोगी श्लोक 11 का, मानसिक शांति चाहने वाले श्लोक 12 का विशेष पाठ कर सकते हैं।
विशिष्ट महत्व — 13 ध्यान और उनका फल
- श्लोक 1 — वाङ्मयसिद्धि: कुन्द-कान्ति, मुक्ताफल अलंकृत देवी। वाक् शक्ति के लिए।
- श्लोक 2 — कल्पवृक्ष: रत्नासन पर विराजित, रक्तवर्णा। इच्छापूर्ति।
- श्लोक 3 — चिद्रूपिणी: शारद चन्द्र कान्ति, व्याख्यान मुद्रा। ज्ञान।
- श्लोक 4 — त्रिपुरा: त्रिणेत्रा, शशिशेखरा। सर्व अभीष्ट।
- श्लोक 5 — रूपसम्पत्ति: चतुर्भुजा, त्रिणयना। देवी का रूप प्राप्ति।
- श्लोक 6 — सूक्ष्मपद: त्रिबीज (ऐं-क्लीं-सौः) ध्यान। मोक्ष।
- श्लोक 7 — अरुणाम्बुजस्था: उदित सूर्य सम, अभयदान। रक्षा।
- श्लोक 8 — परमा कला: अकलंक शशांक, त्र्यक्षा। रक्षा कवच।
- श्लोक 9 — धनसिद्धि: कनक सन्निभा, पद्मासन। धन प्राप्ति।
- श्लोक 10 — ज्ञानप्राप्ति: सुधा स्रवन्ती, ब्रह्मरन्ध्र। ज्ञान।
- श्लोक 11 — आरोग्य: शुक्लाम्बरा, शशांकाभा। स्वास्थ्य।
- श्लोक 12 — सौमनस्य: अकारादि-क्षकारान्त, प्रसन्ना। मानसिक शांति।
- श्लोक 13 — वागीश्वरी: कर्पूर देह, जपवट हस्त। बुद्धि जागरण।
पाठ विधि
- सम्पूर्ण पाठ: सभी 13 श्लोकों का पाठ — सर्वार्थ सिद्धि।
- विशेष ध्यान: अपनी आवश्यकता के अनुसार विशेष श्लोक का ध्यान।
- वाक् सिद्धि: श्लोक 1 और 13 का विशेष पाठ।
- धन प्राप्ति: श्लोक 9 का 21/108 बार पाठ।
- ज्ञान: श्लोक 10 का ब्रह्मरन्ध्र पर ध्यान सहित पाठ।
- आरोग्य: श्लोक 11 का शुक्ल पक्ष में पाठ।
- मोक्ष: श्लोक 6 का त्रिबीज ध्यान।
FAQ
1. 'वाञ्छादात्री' का अर्थ क्या है?
'वाञ्छा' = इच्छा, 'दात्री' = देने वाली। अर्थात् सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली देवी।
2. इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
13 ध्यान श्लोक। प्रत्येक में देवी का भिन्न स्वरूप और भिन्न सिद्धि।
3. 'वाङ्मयसिद्धिहेतोः' का अर्थ?
श्लोक 1: 'वाणी की सिद्धि के लिए' — वाक् शक्ति, लेखन, वक्तृत्व।
4. धन प्राप्ति के लिए कौन सा श्लोक?
श्लोक 9: 'पद्मासनगतां बालां ध्यायामि धनसिद्धये'।
5. ज्ञान के लिए कौन सा श्लोक?
श्लोक 10: 'सुधां स्रवन्तीं ज्ञानाप्त्यै ब्रह्मरन्ध्रे विचिन्तये'।
6. आरोग्य के लिए कौन सा श्लोक?
श्लोक 11: 'शुक्लाम्बरां शशाङ्काभां ध्यायाम्यारोग्यदायिनीम्'।
7. 'सूक्ष्मं पदम्' का अर्थ?
श्लोक 6: मोक्ष — त्रिबीज ध्यान से प्राप्य।
8. 'वागीश्वरि चोदयाशु मम चेतः' का अर्थ?
श्लोक 13: 'हे वागीश्वरी! मेरी बुद्धि को शीघ्र प्रेरित करो।'
9. क्या विशेष श्लोक का ही पाठ कर सकते हैं?
हाँ। यह स्तोत्र 'इच्छानुसार ध्यान' की सुविधा देता है।
10. 'अकारादिक्षकारान्त' का अर्थ?
श्लोक 12: 'अ' से 'क्ष' तक — 50 वर्णों की देवी (मातृकावर्ण)।
11. 'परमा कला' कौन है?
श्लोक 8: बाला देवी — चन्द्र की 16वीं कला जो अमृतमयी है।
12. यह स्तोत्र किसके लिए उत्तम है?
विद्यार्थी, व्यापारी, साधक, रोगी — सभी के लिए अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार।