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Sri Bala Bhujanga Stotram – श्री बाला भुजङ्ग स्तोत्रम् (कालानलतन्त्रोक्तम्)

Sri Bala Bhujanga Stotram – श्री बाला भुजङ्ग स्तोत्रम् (कालानलतन्त्रोक्तम्)
॥ श्री बाला भुजङ्ग स्तोत्रम् ॥ (कालानलतन्त्रोक्तम्) ॥ श्रीनीललोहित उवाच ॥ जगद्योनिरूपां सुवेशीं च रक्तां गुणातीतसञ्ज्ञां महागुह्यगुह्याम् । महासर्पभूषां भवेशादिपूज्यां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥ १ ॥ महास्वर्णवर्णां शिवपृष्ठसंस्थां महामुण्डमालां गले शोभमानाम् । महाचर्मवस्त्रां महाशङ्खहस्तां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥ २ ॥ सदा सुप्रसन्नां भृतासूक्ष्मसूक्ष्मां वराभीतिहस्तां धृतावाक्षपुस्ताम् । महाकिन्नरेशीं भगाकारविद्यां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥ ३ ॥ तिनीं तीकिनीनां रवां किङ्किणीनां हहाहा हहाहा महालापशब्दाम् । तथैथै तथैथै महानृत्यनृत्यां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥ ४ ॥ ननाना रिरीरी महागीश शम्बू हुहूवू हुहूवू पशो रक्तपानाम् । धिमिन्धीं धिमिन्धीं मृदङ्गस्य शब्दां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥ ५ ॥ महाचक्रसंस्थां त्रिमात्रास्वरूपां शिवार्धाङ्गभूतां महापुष्पमालाम् । महादुःखहर्त्रीं महाप्रेतसंस्थां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥ ६ ॥ स्फुरत्पद्मवक्त्रां हिमांशोः कलापां महाकोमलाङ्गीं सुरेशेन मान्याम् । जगत्पालनैकाग्रचित्तां सुपुष्टां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥ ७ ॥ महादैत्यनाशीं सुरानित्यपालीं महाबुद्धिराशिं कवीनां मुखस्थाम् । जटीनां हृदिस्थां मनूनां शिरःस्थां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ भुजङ्गाख्यं महास्तोत्रं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् । महासिद्धिप्रदं दिव्यं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥ ९ ॥ सर्वक्रतुफलं भद्रे सर्वव्रतफलं तथा । सर्वदानोद्भवं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥ १० ॥ विवादे कलहे घोरे महादुःखे पराजये । ग्रहदोषे महारोगे पठेत् स्तोत्रं विचक्षणः ॥ ११ ॥ सर्वदोषाः विनश्यन्ति लभते वाञ्छितं फलम् । दूतीयागे पठेद्देवि सर्वशत्रुक्षयो भवेत् ॥ १२ ॥ महाचक्रे पठेद्देवि लभते परमं पदम् । पूजान्ते पठते भक्त्या महाबलिफलप्रदम् ॥ १३ ॥ पितृगेहे तुर्यपथे शून्यागारे शिवालये । बिल्वमूले चैकवृक्षे रतौ मधुसमागमे ॥ १४ ॥ पठेत् स्तोत्रं महेशानि जीवन्मुक्तः स उच्यते । त्रिकालं पठते नित्यं देवीपुत्रत्वमाप्नुयात् ॥ १५ ॥ ॥ इति श्रीकालानलतन्त्रे श्री बाला भुजङ्ग स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री बाला भुजङ्ग स्तोत्रम् का परिचय

श्री बाला भुजङ्ग स्तोत्रम् (Sri Bala Bhujanga Stotram) तांत्रिक साहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ कालानल तंत्र से लिया गया है। इस स्तोत्र की विशिष्टता यह है कि इसके वक्ता स्वयं श्रीनीललोहित अर्थात् भगवान शिव हैं। 'नीललोहित' शिव का एक गूढ़ नाम है जो उनके रुद्र स्वरूप को दर्शाता है।

'भुजङ्ग' का अर्थ है सर्प। भुजङ्ग प्रयात छंद संस्कृत काव्य का एक विशिष्ट छंद है जिसमें यगण (य-ग-ण = लघु-गुरु-गुरु) की चार बार पुनरावृत्ति होती है। इस छंद की लय सर्प की सरकती हुई गति के समान होती है, जो मंत्र पाठ में एक अद्भुत प्रवाह उत्पन्न करती है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित शिवभुजंगम् इसी छंद में है।

"महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम्" — यह पंक्ति प्रत्येक श्लोक के अंत में आती है। शिव स्वयं कहते हैं कि मैं इस अत्युग्र बाला की नित्य भक्ति करता हूँ।

देवी का उग्र स्वरूप: इस स्तोत्र में बाला का अत्यंत उग्र तांत्रिक स्वरूप वर्णित है। वे महासर्पभूषा (महान सर्पों के आभूषण), महामुण्डमाला (मुण्डों की माला), महाचर्मवस्त्रा (चर्म वस्त्र), महाप्रेतसंस्था (प्रेत पर आसीन) हैं। साथ ही वे शिवपृष्ठसंस्था (शिव की पीठ पर विराजमान) और शिवार्धाङ्गभूता (शिव की अर्धांगिनी) हैं।

नृत्य और वाद्य: श्लोक 4 और 5 में देवी के तांडव नृत्य का वर्णन है — 'हहाहा हहाहा महालापशब्दाम्', 'तथैथै तथैथै महानृत्यनृत्याम्', 'धिमिन्धीं धिमिन्धीं मृदङ्गस्य शब्दाम्'। यह वर्णन अत्यंत जीवंत और शक्तिशाली है।

सौम्य स्वरूप: उग्र स्वरूप के साथ सौम्य स्वरूप भी वर्णित है — सदा सुप्रसन्ना (सदा प्रसन्न), वराभीतिहस्ता (वर और अभय मुद्रा), वाक्षपुस्तधारिणी (अक्षमाला और पुस्तक), स्फुरत्पद्मवक्त्रा (खिले कमल जैसा मुख), महाकोमलाङ्गी (अत्यंत कोमल अंग)।

विशिष्ट महत्व

  • त्रिलोक दुर्लभ: फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया — 'त्रिषु लोकेषु दुर्लभम्' — यह स्तोत्र तीनों लोकों में दुर्लभ है।
  • शिव वक्ता: स्वयं भगवान शिव इस स्तोत्र के वक्ता हैं, जो इसे अत्यंत प्रामाणिक और शक्तिशाली बनाता है।
  • त्रिमात्रा स्वरूप: देवी को 'त्रिमात्रास्वरूपां' कहा गया — वे ऐं-क्लीं-सौः तीन मात्राओं का स्वरूप हैं।
  • कविता शक्ति: 'कवीनां मुखस्थाम्' — देवी कवियों के मुख में निवास करती हैं।
  • जटियों और मनुओं में स्थान: 'जटीनां हृदिस्थां मनूनां शिरःस्थाम्' — जटाधारी तपस्वियों के हृदय में और मनुओं के शिर पर विराजमान।

फलश्रुति के लाभ

  • महासिद्धि: 'महासिद्धिप्रदं दिव्यं' — दिव्य महासिद्धि प्राप्त होती है।
  • चतुर्वर्ग फल: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं।
  • सर्वक्रतु फल: सभी यज्ञों का फल एक साथ मिलता है।
  • सर्वव्रत फल: सभी व्रतों का फल प्राप्त होता है।
  • सर्वदान पुण्य: सभी दानों का पुण्य एकत्र होता है।
  • विपत्ति निवारण: विवाद, कलह, महादुःख, पराजय, ग्रहदोष, महारोग — सभी से मुक्ति।
  • शत्रुनाश: दूतीयाग में पाठ से सभी शत्रुओं का क्षय।
  • परम पद: महाचक्र में पाठ से परम पद की प्राप्ति।
  • जीवन्मुक्ति: विशेष स्थानों पर पाठ से जीवन्मुक्त हो जाता है।
  • देवीपुत्रत्व: त्रिकाल पाठ से देवी का पुत्रत्व प्राप्त होता है।

पाठ विधि और विशेष अवसर

विशेष पाठ स्थान (फलश्रुति से):
  • पितृगेह: पैतृक घर में पाठ अत्यंत फलदायी है।
  • तुर्यपथ: चतुर्थ अवस्था (तुरीया) के मार्ग पर, अर्थात् ध्यान की गहरी अवस्था में।
  • शून्यागार: एकांत निर्जन स्थान में।
  • शिवालय: शिव मंदिर में पाठ विशेष फलदायी है।
  • बिल्वमूल: बेल वृक्ष की जड़ में बैठकर पाठ।
  • एकवृक्ष: एकाकी वृक्ष के नीचे।
पाठ काल:
  • त्रिकाल पाठ: प्रातः, मध्याह्न और सायं — तीनों समय पाठ से देवीपुत्रत्व।
  • पूजान्त: देवी पूजा के बाद पाठ से महाबलि का फल।
  • दूतीयाग: विशेष तांत्रिक अनुष्ठान में शत्रुनाश।
  • महाचक्र: श्रीचक्र पूजा में पाठ से परम पद।

FAQ

1. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से है?

कालानल तंत्र। कोलोफोन: 'इति श्रीकालानलतन्त्रे श्री बाला भुजङ्ग स्तोत्रम्'।

2. इस स्तोत्र के वक्ता कौन हैं?

श्रीनीललोहित अर्थात् भगवान शिव। स्तोत्र 'श्रीनीललोहित उवाच' से आरंभ होता है।

3. भुजङ्ग छंद क्या है?

भुजङ्ग प्रयात छंद में यगण (लघु-गुरु-गुरु) की चार बार पुनरावृत्ति होती है। इसकी लय सर्प गति के समान होती है।

4. 'महात्युग्रबाला' का अर्थ क्या है?

महा + अत्युग्र + बाला = अत्यंत उग्र स्वरूप वाली बाला देवी। यह उनके तांत्रिक उग्र स्वरूप को दर्शाता है।

5. चतुर्वर्ग फल क्या है?

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — ये चार पुरुषार्थ जो इस स्तोत्र से प्राप्त होते हैं।

6. विपत्ति में पाठ का क्या फल है?

'विवादे कलहे घोरे महादुःखे पराजये। ग्रहदोषे महारोगे पठेत्' — सभी दोष नष्ट होते हैं और वांछित फल मिलता है।

7. दूतीयाग क्या है?

एक विशेष तांत्रिक अनुष्ठान। इसमें पाठ से 'सर्वशत्रुक्षयो भवेत्' — सभी शत्रुओं का नाश होता है।

8. महाचक्र में पाठ का क्या फल है?

'महाचक्रे पठेद्देवि लभते परमं पदम्' — श्रीचक्र पूजा में पाठ से परम पद की प्राप्ति।

9. जीवन्मुक्ति के लिए कहाँ पाठ करें?

पितृगेह, तुर्यपथ, शून्यागार, शिवालय, बिल्वमूल, एकवृक्ष — इन स्थानों पर पाठ से जीवन्मुक्त हो जाता है।

10. देवीपुत्रत्व कैसे प्राप्त होता है?

'त्रिकालं पठते नित्यं देवीपुत्रत्वमाप्नुयात्' — प्रतिदिन तीनों समय पाठ करने से।

11. 'शिवार्धाङ्गभूता' का अर्थ क्या है?

शिव के अर्धांग (आधे शरीर) में स्थित — अर्धनारीश्वर स्वरूप का संकेत।

12. 'त्रिमात्रास्वरूपा' का अर्थ क्या है?

तीन मात्राओं (ऐं-क्लीं-सौः) का स्वरूप — बाला मूल मंत्र की तीन मात्राएं।