Sri Bala Trailokya Vijaya Kavacham – श्री बाला त्रैलोक्यविजय कवचम् (सर्वत्र विजय प्राप्ति)

॥ श्रीरुद्रयामले श्री बाला त्रैलोक्यविजय कवचम् ॥
श्रीभैरव उवाच
अधुना ते प्रवक्ष्यामि कवचं मन्त्रविग्रहम् ।
त्रैलोक्यविजयं नाम रहस्यं देवदुर्लभम् ॥ १ ॥
श्रीदेव्युवाच
या देवी त्र्यक्षरी बाला चित्कला श्रीसरस्वती ।
महाविद्येश्वरी नित्या महात्रिपुरसुन्दरी ॥ २ ॥
तस्याः कवचमीशान मन्त्रगर्भं परात्मकम् ।
त्रैलोक्यविजयं नाम श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥
श्रीभैरव उवाच
देवदेवि महादेवि बालाकवचमुत्तमम् ।
मन्त्रगर्भं परं तत्त्वं लक्ष्मीसंवर्धनं परम् ॥ ४ ॥
सर्वस्वं मे रहस्यं तु गुह्यं त्रिदशगोपितम् ।
प्रवक्ष्यामि तव स्नेहान्नाख्येयं यस्य कस्यचित् ॥ ५ ॥
यद्धृत्वा कवचं देव्या मातृकाक्षरमण्डितम् ।
नारायणोऽपि दैत्येन्द्रान् जघान रणमण्डले ॥ ६ ॥
त्र्यम्बकं कामदेवोऽपि बलं शक्रो जघान हि ।
कुमारस्तारकं दैत्यमन्धकं चन्द्रशेखरः ॥ ७ ॥
अवधीद्रावणं रामो वातापिं कुम्भसम्भवः ।
कवचस्यास्य देवेशि धारणात्पठनादपि ॥ ८ ॥
स्रष्टा प्रजापतिर्ब्रह्मा विष्णुस्त्रैलोक्यपालकः ।
शिवोऽणिमादिसिद्धीशो मघवान् देवनायकः ॥ ९ ॥
सूर्यस्तेजोनिधिर्देवि चन्द्रस्ताराधिपः स्थितः ।
वह्निर्महोर्मिनिलयो वरुणोऽपि दिशां पतिः ॥ १० ॥
समीरो बलवांल्लोके यमो धर्मनिधिः स्मृतः ।
कुबेरो निधिनाथोऽस्ति नैरृतिः सर्वराक्षसाम् ॥ ११ ॥
ईश्वरः शङ्करो रुद्रो देवि रत्नाकरोऽम्बुधिः ।
अस्य स्मरणमात्रेण कुले तस्य कुलेश्वरि ॥ १२ ॥
आयुः कीर्तिः प्रभा लक्ष्मीर्वृद्धिर्भवति सन्ततम् ।
कवचं सुभगं देवि बालायाः कौलिकेश्वरि ॥ १३ ॥
॥ विनियोगः ॥
अस्य श्रीबालात्रिपुरसुन्दरी त्रैलोक्यविजय कवचस्य, दक्षिणामूर्तिः ऋषिः,
पङ्क्तिश्छन्दः, श्रीबालात्रिपुरसुन्दरी देवता,
ऐं बीजं, सौः शक्तिः, क्लीं कीलकं,
मम सर्वरक्षार्थे (अमुक कामना सिद्ध्यर्थे) पाठे विनियोगः ।
॥ ध्यानम् ॥
अकुलकुलमयन्ती चक्रमध्ये स्फुरन्ती
मधुरमधु पिबन्ती कण्टकान् भक्षयन्ती ।
दुरितमपहरन्ती साधकान् पोषयन्ती
जयतु जयतु बाला सुन्दरी क्रीडयन्ती ॥ १६ ॥
॥ कवचम् ॥
ऐं बीजं मे शिरः पातु क्लीं बीजं भ्रुकुटीं मम ।
सौः फालं पातु मे बाला ऐं क्लीं सौः नयने मम ॥ १७ ॥
अं आं इं ईं श्रुती पातु बाला कामेश्वरी मम ।
उं ऊं ऋं ॠं सदा पातु मम नासापुटद्वयम् ॥ १८ ॥
लुं लूं एं ऐं पातु गण्डौ ऐं क्लीं सौः त्रिपुराम्बिका ।
ओं औं अं अः मुखं पातु क्लीं ऐं सौः त्रिपुरेश्वरी ॥ १९ ॥
कं खं गं घं ङं करौ मे सौः ऐं क्लीं शत्रुमर्दिनी ।
चं छं जं झं ञं पातु मे कुक्षिं ऐं कुलनायिका ॥ २० ॥
टं ठं डं ढं णं मे पातु वक्षः क्लीं भगमालिनी ।
तं थं दं धं नं मे पातु बाहू सौः जयदायिनी ॥ २१ ॥
पं फं बं भं मं मे पातु पार्श्वौ परमसुन्दरी ।
यं रं लं वं पातु पृष्ठं ऐं क्लीं सौः विश्वमातृका ॥ २२ ॥
शं षं सं हं पातु नाभिं भगवत्यमृतेश्वरी ।
लं क्षं कटिं सदा पातु क्लीं क्लीं क्लीं मातृकेश्वरी ॥ २३ ॥
ऐं ऐं ऐं पातु मे लिङ्गं भगं मे भगगर्भिणी ।
सौः सौः सौः पातु मे ऊरू वीरमाताऽष्टसिद्धिदा ॥ २४ ॥
सौः ऐं क्लीं जानू मे पातु महामुद्राभिमुद्रिता ।
सौः क्लीं ऐं पातु मे जङ्घे बाला त्रिभुवनेश्वरी ॥ २५ ॥
क्लीं ऐं सौः पातु गुल्फौ मे त्रैलोक्यविजयप्रदा ।
ऐं क्लीं सौः पातु मे पादौ बाला त्र्यक्षररूपिणी ॥ २६ ॥
शीर्षादिपादपर्यन्तं सर्वावयवसम्युतम् ।
पायात्पादादि शीर्षान्तं ऐं क्लीं सौः सकलं वपुः ॥ २७ ॥
॥ दिग्बन्धन (दिशाओं की रक्षा) ॥
ब्राह्मी मां पूर्वतः पातु वह्नौ वाराहिकाऽवतु ।
माहेश्वरी दक्षिणे च इन्द्राणी पातु नैरृतौ ॥ २८ ॥
पश्चिमे पातु कौमारी वायव्ये चण्डिकाऽवतु ।
वैष्णवी पातु कौबेर्यां ईशान्यां नारसिंहका ॥ २९ ॥
प्रभाते भैरवी पातु मध्याह्ने योगिनी तथा ।
सायाह्ने वटुका पातु अर्धरात्रे शिवोऽवतु ॥ ३० ॥
निशान्ते सर्वगा पातु सर्वदा चक्रनायिका ।
रणे नागकुले द्यूते विवादे शत्रुसङ्कटे ॥ ३१ ॥
सर्वत्र सर्वदा पातु ऐं क्लीं सौः बीजभूषिता ॥ ३२ ॥
॥ फलश्रुति ॥
इतीदं कवचं दिव्यं बालायाः सारमुत्तमम् ।
मन्त्रविद्यामयं तत्त्वं मातृकाक्षरभूषितम् ॥ ३३ ॥
ब्रह्मविद्यामयं ब्रह्मसाधनं मन्त्रसाधनम् ।
यः पठेत्सततं भक्त्या धारयेद्वा महेश्वरि ॥ ३४ ॥
तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्यात्साधकस्य न संशयः ।
रवौ भूर्जे लिखित्वेदं अर्चयेद्धारयेत्ततः ॥ ३५ ॥
वन्ध्यापि काकवन्ध्यापि मृतवत्सापि पार्वति ।
लभेत्पुत्रान् महावीरान् मार्कण्डेयसमायुषः ॥ ३६ ॥
वित्तं दरिद्रो लभते मतिमानयशःस्त्रियः ।
य एतद्धारयेद्वर्म सङ्ग्रामे स रिपून् जयेत् ॥ ३७ ॥
जित्वा वैरिकुलं घोरं कल्याणं गृहमाविशेत् ।
बाहौ कण्ठे तथा देवि धारयेन्मूर्ध्नि सन्ततम् ॥ ३८ ॥
इह लोके धनारोग्यं परमायुर्यशः श्रियम् ।
प्राप्य भक्त्या नरो भोगानन्ते याति परं पदम् ॥ ३९ ॥
इदं रहस्यं परमं सर्वतस्तूत्तमोत्तमम् ।
गुह्याद्गुह्यमिमं नित्यं गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ ४० ॥
॥ इति श्रीरुद्रयामले श्री बाला त्रैलोक्यविजय कवचम् सम्पूर्णम् ॥
परिचय: देवताओं की विजय का रहस्य
श्री बाला त्रैलोक्यविजय कवचम् (Sri Bala Trailokya Vijaya Kavacham) अपने नाम के अनुरूप ही तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) पर विजय दिलाने वाला है। रुद्रयामल तन्त्र में भैरव जी स्वयं देवी को बताते हैं कि यह कवच इतना शक्तिशाली है कि इसी को धारण करके:
- भगवान नारायण (विष्णु) ने दैत्यों का संहार किया।
- श्री राम ने रावण का वध किया।
- कार्तिकेय ने तारकासुर को मारा।
- अगस्त्य मुनि ने वातापि राक्षस को पचा लिया।
यह केवल एक 'रक्षा कवच' नहीं, बल्कि 'विजय कवच' (Victory Shield) है। यह शत्रु को हराने और कठिन से कठिन कार्य को सिद्ध करने के लिए अमोघ अस्त्र माना जाता है।
कवच की संरचना (Structure of the Armor)
इस कवच की रचना बहुत ही वैज्ञानिक और तांत्रिक है। इसमें केवल देवी के नामों से रक्षा नहीं माँगी गई है, बल्कि मातृका वर्णों (संस्कृत वर्णमाला) और बीज मन्त्रों का प्रयोग किया गया है।
१. मातृका न्यास (Alphabet Protection):
इस कवच में 'अ' से लेकर 'क्ष' तक—पूरी संस्कृत वर्णमाला का शरीर के अंगों पर न्यास किया गया है।
उदाहरन: "अं आं इं ईं श्रुती पातु..." (अ, आ, इ, ई मेरे कानों की रक्षा करें)।
यह शरीर को 'अक्षर-ब्रह्म' बना देता है, जिससे कोई भी नकारात्मक ऊर्जा शरीर में प्रवेश नहीं कर पाती।
उदाहरन: "अं आं इं ईं श्रुती पातु..." (अ, आ, इ, ई मेरे कानों की रक्षा करें)।
यह शरीर को 'अक्षर-ब्रह्म' बना देता है, जिससे कोई भी नकारात्मक ऊर्जा शरीर में प्रवेश नहीं कर पाती।
२. बीजाक्षर सुरक्षा (Beeja Protection):
बाला के तीन बीज—ऐं (Aim), क्लीं (Kleem), सौः (Sauh)—का बार-बार प्रयोग करके शरीर को 'कीलित' (Lock) किया गया है।
उदाहरन: "ऐं बीजं मे शिरः पातु" (ऐं मेरे सिर की रक्षा करे)।
उदाहरन: "ऐं बीजं मे शिरः पातु" (ऐं मेरे सिर की रक्षा करे)।
३. दिग्बन्धन (Directional Lock):
श्लोक 28 से 30 तक आठों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि) को अष्ट-मात्रिकाओं (ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी आदि) द्वारा सील (Seal) किया गया है, ताकि किसी भी दिशा से हमला न हो सके।
पाठ के लाभ (Benefits per Phala Shruti)
फलश्रुति में इस कवच के अद्भुत लाभ बताए गए हैं:
- शत्रु और मुकदमा विजय: "रणे नागकुले द्यूते विवादे..." — युद्ध, कोर्ट-कचहरी, वाद-विवाद या जुए (Risk taking) में जो इसे पढ़ता है, उसकी जीत निश्चित है।
- दिव्य संतान: "वन्ध्यापि काकवन्ध्यापि..." — जिन स्त्रियों को संतान नहीं हो रही, या होकर मर जाती है, वे यदि इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर धारण करें, तो उन्हें दीर्घायु संतान (मार्कण्डेय जैसी) प्राप्त होती है।
- अकूत धन: "वित्तं दरिद्रो लभते..." — दरिद्र व्यक्ति इसे धारण करे तो उसे धन, यश और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
- अकाल मृत्यु से रक्षा: यह कवच अकाल मृत्यु (Accidental Death) को टालने में समर्थ है।
विस्तृत साधना विधि (Sadhana Vidhi)
इस कवच को सिद्ध करने या प्रभावी बनाने की दो विधियाँ हैं:
१. नित्य पाठ (Daily Chanting):
• स्नान करके पूर्व मुख होकर बैठें।
• अपने सामने बाला यन्त्र या चित्र रखें।
• पहले 'बाला त्र्यक्षरी मन्त्र' (ऐं क्लीं सौः) की 1 माला जपें।
• फिर इस कवच का 1, 3 या 11 बार पाठ करें।
• अंत में पुनः 1 माला मन्त्र जपें।
• अपने सामने बाला यन्त्र या चित्र रखें।
• पहले 'बाला त्र्यक्षरी मन्त्र' (ऐं क्लीं सौः) की 1 माला जपें।
• फिर इस कवच का 1, 3 या 11 बार पाठ करें।
• अंत में पुनः 1 माला मन्त्र जपें।
२. धारण विधि (Wearing Method):
• भोजपत्र या कागज पर लाल स्याही (अष्टगंध) से इस पूरे कवच को रविवार (Sunday) या पुष्य नक्षत्र में लिखें।
• इसे धूप-दीप दिखाकर, मोड़कर ताबीज (कावच) में भर लें।
• इसे गले में या दाहिनी भुजा (Right Arm) पर बाँध लें।
• यह 24 घंटे आपकी रक्षा करेगा।
• इसे धूप-दीप दिखाकर, मोड़कर ताबीज (कावच) में भर लें।
• इसे गले में या दाहिनी भुजा (Right Arm) पर बाँध लें।
• यह 24 घंटे आपकी रक्षा करेगा।
FAQ - साधक जिज्ञासा
1. क्या मैं इसे शत्रु नाश के लिए पढ़ सकता हूँ?
हाँ, यह विशेष रूप से 'शत्रु मर्दिनी' (Destroyer of Enemies) है। लेकिन ध्यान रहे, इसका प्रयोग केवल आत्मरक्षा (Self-defense) के लिए करें, किसी को अकारण नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं, अन्यथा शक्ति पलट सकती है।
2. 'कण्टकान् भक्षयन्ती' का क्या अर्थ है?
ध्यान श्लोक (16) में बाला को 'कण्टकान् भक्षयन्ती' कहा गया है। इसका अर्थ है—"कांटों (बाधाओं/शत्रुओं) को खा जाने वाली।" माँ बाला अपने भक्तों की राह के कांटों को स्वयं नष्ट कर देती हैं।
3. क्या इसे हिंदी में पढ़ सकते हैं?
कवच के फलश्रुति और महिमा को हिंदी में पढ़ सकते हैं, लेकिन न्यास वाले श्लोक (जैसे 'ऐं बीजं मे शिरः पातु') को संस्कृत में ही पढ़ना चाहिए। क्योंकि बीज मन्त्रों (ऐं, क्लीं, सौः) की ध्वनि (Sound vibration) में ही असली शक्ति है। अनुवाद में वह शक्ति नहीं होती।
4. क्या स्त्रियाँ मासिक धर्म में इसे पहन सकती हैं?
यदि आपने कवच को ताबीज में बनवाकर पहना है, तो उसे उतारने की जरूरत नहीं है (शरीर की रक्षा हर समय जरूरी है)। लेकिन पाठ (Chanting) मासिक धर्म के दौरान 4-5 दिन के लिए रोक देना चाहिए।
5. 'त्रैलोक्य' से क्या तात्पर्य है?
वैसे तो इसका अर्थ 'तीन लोक' है, लेकिन तन्त्र में इसका अर्थ हमारे जीवन के तीन स्तर भी हैं:
1. भौतिक: बीमारी, गरीबी, शत्रु।
2. दैविक: ग्रह दोष, दुर्भाग्य।
3. आध्यात्मिक: मन की अशांति, काम-क्रोध।
यह कवच इन तीनों स्तरों पर विजय दिलाता है।
1. भौतिक: बीमारी, गरीबी, शत्रु।
2. दैविक: ग्रह दोष, दुर्भाग्य।
3. आध्यात्मिक: मन की अशांति, काम-क्रोध।
यह कवच इन तीनों स्तरों पर विजय दिलाता है।