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Sri Bala Ashtottara Shatanama Stotram – श्री बालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (108 नाम)

Sri Bala Ashtottara Shatanama Stotram – श्री बालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (108 नाम)
॥ श्री बालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ (रुद्रयामले उमामहेश्वरसंवादे) ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्री बालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रमहामन्त्रस्य दक्षिणामूर्तिः ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीबालात्रिपुरसुन्दरी देवता, ऐं बीजं, सौः शक्तिः, क्लीं कीलकं, श्रीबालात्रिपुरसुन्दरी प्रसादसिद्ध्यर्थे नामपारायणे विनियोगः । ॥ करन्यासः ॥ ओं ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । क्लीं तर्जनीभ्यां नमः । सौः मध्यमाभ्यां नमः । ऐं अनामिकाभ्यां नमः । क्लीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । सौः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ हृदयादिन्यासः ॥ ऐं हृदयाय नमः । क्लीं शिरसे स्वाहा । सौः शिखायै वषट् । ऐं कवचाय हुम् । क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट् । सौः अस्त्राय फट् । भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः । ॥ ध्यानम् ॥ पाशाङ्कुशे पुस्तकाक्षसूत्रे च दधती करैः । रक्ता त्र्यक्षा चन्द्रफाला पातु बाला सुरार्चिता ॥ ॥ पञ्चपूजा ॥ लं पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि । हं आकाशात्मिकायै पुष्पाणि समर्पयामि । यं वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि । रं अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि । वं अमृतात्मिकायै अमृतोपहारं निवेदयामि । सं सर्वात्मिकायै सर्वोपचारपूजाः समर्पयामि ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ कल्याणी त्रिपुरा बाला माया त्रिपुरसुन्दरी । सुन्दरी सौभाग्यवती क्लीङ्कारी सर्वमङ्गला ॥ १ ॥ ह्रीं‍कारी स्कन्दजननी परा पञ्चदशाक्षरी । त्रिलोकी मोहनाधीशा सर्वेशी सर्वरूपिणी ॥ २ ॥ सर्वसङ्क्षोभिणी पूर्णा नवमुद्रेश्वरी शिवा । अनङ्गकुसुमा ख्याता ह्यनङ्गभुवनेश्वरी ॥ ३ ॥ जप्या स्तव्या श्रुतिर्नित्या नित्यक्लिन्नाऽमृतोद्भवा । मोहिनी परमानन्दा कामेशी तरुणी कला ॥ ४ ॥ कलावती भगवती पद्मरागकिरीटिनी । सौगन्धिनी सरिद्वेणी मन्त्रिणी मन्त्ररूपिणी ॥ ५ ॥ तत्त्वत्रयी तत्त्वमयी सिद्धा त्रिपुरवासिनी । श्रीर्मतिश्च महादेवी कौलिनी परदेवता ॥ ६ ॥ कैवल्यरेखा वशिनी सर्वेशी सर्वमातृका । विष्णुष्वसा देवमाता सर्वसम्पत्प्रदायिनी ॥ ७ ॥ आधारा हितपत्नीका स्वाधिष्ठानसमाश्रया । आज्ञापद्मासनासीना विशुद्धस्थलसंस्थिता ॥ ८ ॥ अष्टत्रिंशत्कलामूर्तिः सुषुम्ना चारुमध्यमा । योगीश्वरी मुनिध्येया परब्रह्मस्वरूपिणी ॥ ९ ॥ चतुर्भुजा चन्द्रचूडा पुराण्यागमरूपिणी । ओङ्कारादिमहाविद्या महाप्रणवरूपिणी ॥ १० ॥ भूतेश्वरी भूतमयी पञ्चाशद्वर्णरूपिणी । षोढान्यासमहाभूषा कामाक्षी दशमातृका ॥ ११ ॥ आधारशक्तिररुणा लक्ष्मीः श्रीपुरभैरवी । त्रिकोणमध्यनिलया षट्कोणपुरवासिनी ॥ १२ ॥ नवकोणपुरावासा बिन्दुस्थलसमन्विता । अघोरामन्त्रितपदा भामिनी भवरूपिणी ॥ १३ ॥ एषां सङ्कर्षिणी धात्री चोमा कात्यायनी शिवा । सुलभा दुर्लभा शास्त्री महाशास्त्री शिखण्डिनी ॥ १४ ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ नाम्नामष्टोत्तरशतं पठेन्न्याससमन्वितम् । सर्वसिद्धिमवाप्नोति साधकोऽभीष्टमाप्नुयात् ॥ १५ ॥ भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्विमोकः । ॥ इति श्रीरुद्रयामले उमामहेश्वरसंवादे श्री बाला अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री बालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का परिचय

श्री बालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Bala Ashtottara Shatanama Stotram) श्री विद्या उपासना का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह रुद्रयामल ग्रंथ के उमामहेश्वर संवाद खंड से लिया गया है — अर्थात् यह माता पार्वती और भगवान शिव के बीच का संवाद है। 'अष्टोत्तरशतनाम' का अर्थ है 108 नाम (अष्ट = 8, उत्तर = अधिक, शत = 100)।

"नाम्नामष्टोत्तरशतं पठेन्न्याससमन्वितम्। सर्वसिद्धिमवाप्नोति साधकोऽभीष्टमाप्नुयात्॥" — 108 नामों का न्यास सहित पाठ करने से सर्वसिद्धि और अभीष्ट फल प्राप्त होता है।

विनियोग की विशेषताएं: इस स्तोत्र के ऋषि दक्षिणामूर्ति हैं — जो स्वयं शिव का ज्ञान स्वरूप है। छंद अनुष्टुप है। बीज-शक्ति-कीलक में तीनों बाला बीज हैं — ऐं (बीज), सौः (शक्ति), क्लीं (कीलक)। विनियोग का उद्देश्य है: 'श्रीबालात्रिपुरसुन्दरी प्रसादसिद्ध्यर्थे नामपारायणे विनियोगः' — देवी की प्रसाद सिद्धि हेतु।

पंचपूजा का रहस्य: इस स्तोत्र में एक विशेष पंचपूजा विधि दी गई है जो पाँच तत्वों और पाँच बीजाक्षरों पर आधारित है। लं (पृथ्वी-गंध), हं (आकाश-पुष्प), यं (वायु-धूप), रं (अग्नि-दीप), वं (जल/अमृत-नैवेद्य), और सं (सर्वात्मिका-सर्वोपचार)।

ध्यान में देवी का स्वरूप: देवी रक्तवर्णा (लाल), त्रिनेत्रा, चन्द्रफाला (ललाट पर चंद्रमा), और सुरार्चिता (देवताओं द्वारा पूजित) हैं। उनके चार हाथों में पाश, अंकुश, पुस्तक और अक्षमाला हैं।

108 नामों में श्रीचक्र रहस्य: श्लोक 12-13 में श्रीचक्र के विभिन्न कोणों का वर्णन है — त्रिकोणमध्यनिलया (त्रिकोण के मध्य में), षट्कोणपुरवासिनी (षट्कोण में), नवकोणपुरावासा (नवकोण में), और बिन्दुस्थलसमन्विता (बिन्दु में)।

कुण्डलिनी और षट्चक्र: श्लोक 8 में कुण्डलिनी शक्ति के षट्चक्रों का वर्णन है — आधारा (मूलाधार), स्वाधिष्ठानसमाश्रया, आज्ञापद्मासनासीना, विशुद्धस्थलसंस्थिता। श्लोक 9 में सुषुम्ना नाड़ी का उल्लेख है।

विशिष्ट महत्व

  • रुद्रयामल स्रोत: यह प्राचीन और प्रामाणिक रुद्रयामल तंत्र से है, जो शिव-पार्वती संवाद है।
  • दक्षिणामूर्ति ऋषि: ज्ञान के देवता दक्षिणामूर्ति इसके द्रष्टा ऋषि हैं।
  • सम्पूर्ण साधना पद्धति: विनियोग, न्यास, ध्यान, पंचपूजा — सब कुछ एक ही स्तोत्र में।
  • षोढान्यास महाभूषा: देवी षोढान्यास रूपी महान आभूषण से अलंकृत हैं।
  • पञ्चाशद्वर्णरूपिणी: देवी 50 वर्णों (मातृका अक्षर) का स्वरूप हैं।
  • महाप्रणवरूपिणी: देवी ओंकार (प्रणव) का स्वरूप हैं।

फलश्रुति के लाभ

  • सर्वसिद्धि: 'सर्वसिद्धिमवाप्नोति' — सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
  • अभीष्ट प्राप्ति: 'साधकोऽभीष्टमाप्नुयात्' — साधक की इच्छित कामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • न्यास सहित विशेष फल: 'पठेन्न्याससमन्वितम्' — न्यास के साथ पाठ से विशेष फल।
  • 108 नामों का पुण्य: प्रत्येक नाम एक मंत्र के समान है।
  • त्रिपुरा सिद्धि: 'त्रिपुरा', 'त्रिपुरसुन्दरी', 'त्रिपुरवासिनी' — त्रिपुरा तत्त्व की सिद्धि।
  • सर्वसम्पत्प्रदायिनी: देवी स्वयं सर्व सम्पत्ति प्रदान करती हैं (श्लोक 7)।
  • कैवल्य प्राप्ति: 'कैवल्यरेखा' — मोक्ष का मार्ग।
  • परब्रह्म साक्षात्कार: 'परब्रह्मस्वरूपिणी' — परब्रह्म का साक्षात्कार।

पाठ विधि और विशेष अवसर

पाठ क्रम (स्तोत्र में दिया गया):
  • 1. विनियोग: स्तोत्र का उद्देश्य और ऋषि-छंद-देवता का स्मरण।
  • 2. करन्यास: अंगुलियों पर ऐं-क्लीं-सौः का न्यास।
  • 3. हृदयादिन्यास: हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र पर न्यास।
  • 4. दिग्बन्ध: 'भूर्भुवस्सुवरोम्' से दिशाओं का बंधन।
  • 5. ध्यान: देवी के स्वरूप का ध्यान।
  • 6. पंचपूजा: पाँच तत्वों से प्रतीकात्मक पूजा।
  • 7. स्तोत्र पाठ: 108 नामों का पाठ।
  • 8. दिग्विमोक: बंधन का विमोचन।
विशेष तिथियाँ:
  • नवरात्रि के नौ दिन
  • शुक्रवार (देवी का दिन)
  • पूर्णिमा (विशेषकर चैत्र और आश्विन)
  • ललिता जयंती

FAQ

1. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से है?

रुद्रयामल के उमामहेश्वर संवाद से। कोलोफोन: 'इति श्रीरुद्रयामले उमामहेश्वरसंवादे'।

2. इस स्तोत्र के ऋषि कौन हैं?

दक्षिणामूर्ति — शिव का ज्ञान स्वरूप। विनियोग में: 'दक्षिणामूर्तिः ऋषिः'।

3. अष्टोत्तरशतनाम का अर्थ क्या है?

अष्टोत्तर = 108 (अष्ट = 8, उत्तर = अधिक)। शत = 100। कुल 108 दिव्य नाम।

4. पंचपूजा क्या है?

पाँच तत्वों से प्रतीकात्मक पूजा: लं-पृथ्वी (गंध), हं-आकाश (पुष्प), यं-वायु (धूप), रं-अग्नि (दीप), वं-अमृत (नैवेद्य)।

5. षोढान्यास क्या है?

श्लोक 11 में: 'षोढान्यासमहाभूषा' — 16 प्रकार के न्यास, जो तांत्रिक साधना का महत्वपूर्ण अंग है।

6. श्रीचक्र में देवी का स्थान क्या है?

त्रिकोण, षट्कोण, नवकोण और बिन्दु — सभी में देवी विराजमान हैं (श्लोक 12-13)।

7. कुण्डलिनी चक्रों का उल्लेख कहाँ है?

श्लोक 8: आधारा (मूलाधार), स्वाधिष्ठान, आज्ञापद्म, विशुद्ध। श्लोक 9: सुषुम्ना नाड़ी।

8. 'विष्णुस्वसा' का अर्थ क्या है?

विष्णु की बहन। श्लोक 7 में: देवी को विष्णु की भगिनी के रूप में भी जाना जाता है।

9. 'पञ्चदशाक्षरी' का अर्थ क्या है?

15 अक्षर वाली — पञ्चदशी मंत्र की अधिष्ठात्री। श्लोक 2 में उल्लेख।

10. न्यास सहित पाठ का क्या फल है?

'पठेन्न्याससमन्वितम्। सर्वसिद्धिमवाप्नोति' — न्यास सहित पाठ से सर्वसिद्धि।

11. क्या बिना दीक्षा के पाठ कर सकते हैं?

हाँ। यह स्तोत्र (नाम पाठ) है, मंत्र नहीं। श्रद्धा से कोई भी पाठ कर सकता है।

12. 'अष्टत्रिंशत्कलामूर्तिः' का अर्थ क्या है?

38 कलाओं की मूर्ति — चंद्रमा की 16 + सूर्य की 12 + अग्नि की 10 = 38 कलाएं।