Sri Bala Ashtottara Shatanama Stotram – श्री बालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (108 नाम)

श्री बालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का परिचय
श्री बालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Bala Ashtottara Shatanama Stotram) श्री विद्या उपासना का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह रुद्रयामल ग्रंथ के उमामहेश्वर संवाद खंड से लिया गया है — अर्थात् यह माता पार्वती और भगवान शिव के बीच का संवाद है। 'अष्टोत्तरशतनाम' का अर्थ है 108 नाम (अष्ट = 8, उत्तर = अधिक, शत = 100)।
"नाम्नामष्टोत्तरशतं पठेन्न्याससमन्वितम्। सर्वसिद्धिमवाप्नोति साधकोऽभीष्टमाप्नुयात्॥" — 108 नामों का न्यास सहित पाठ करने से सर्वसिद्धि और अभीष्ट फल प्राप्त होता है।
विनियोग की विशेषताएं: इस स्तोत्र के ऋषि दक्षिणामूर्ति हैं — जो स्वयं शिव का ज्ञान स्वरूप है। छंद अनुष्टुप है। बीज-शक्ति-कीलक में तीनों बाला बीज हैं — ऐं (बीज), सौः (शक्ति), क्लीं (कीलक)। विनियोग का उद्देश्य है: 'श्रीबालात्रिपुरसुन्दरी प्रसादसिद्ध्यर्थे नामपारायणे विनियोगः' — देवी की प्रसाद सिद्धि हेतु।
पंचपूजा का रहस्य: इस स्तोत्र में एक विशेष पंचपूजा विधि दी गई है जो पाँच तत्वों और पाँच बीजाक्षरों पर आधारित है। लं (पृथ्वी-गंध), हं (आकाश-पुष्प), यं (वायु-धूप), रं (अग्नि-दीप), वं (जल/अमृत-नैवेद्य), और सं (सर्वात्मिका-सर्वोपचार)।
ध्यान में देवी का स्वरूप: देवी रक्तवर्णा (लाल), त्रिनेत्रा, चन्द्रफाला (ललाट पर चंद्रमा), और सुरार्चिता (देवताओं द्वारा पूजित) हैं। उनके चार हाथों में पाश, अंकुश, पुस्तक और अक्षमाला हैं।
108 नामों में श्रीचक्र रहस्य: श्लोक 12-13 में श्रीचक्र के विभिन्न कोणों का वर्णन है — त्रिकोणमध्यनिलया (त्रिकोण के मध्य में), षट्कोणपुरवासिनी (षट्कोण में), नवकोणपुरावासा (नवकोण में), और बिन्दुस्थलसमन्विता (बिन्दु में)।
कुण्डलिनी और षट्चक्र: श्लोक 8 में कुण्डलिनी शक्ति के षट्चक्रों का वर्णन है — आधारा (मूलाधार), स्वाधिष्ठानसमाश्रया, आज्ञापद्मासनासीना, विशुद्धस्थलसंस्थिता। श्लोक 9 में सुषुम्ना नाड़ी का उल्लेख है।
विशिष्ट महत्व
- रुद्रयामल स्रोत: यह प्राचीन और प्रामाणिक रुद्रयामल तंत्र से है, जो शिव-पार्वती संवाद है।
- दक्षिणामूर्ति ऋषि: ज्ञान के देवता दक्षिणामूर्ति इसके द्रष्टा ऋषि हैं।
- सम्पूर्ण साधना पद्धति: विनियोग, न्यास, ध्यान, पंचपूजा — सब कुछ एक ही स्तोत्र में।
- षोढान्यास महाभूषा: देवी षोढान्यास रूपी महान आभूषण से अलंकृत हैं।
- पञ्चाशद्वर्णरूपिणी: देवी 50 वर्णों (मातृका अक्षर) का स्वरूप हैं।
- महाप्रणवरूपिणी: देवी ओंकार (प्रणव) का स्वरूप हैं।
फलश्रुति के लाभ
- सर्वसिद्धि: 'सर्वसिद्धिमवाप्नोति' — सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
- अभीष्ट प्राप्ति: 'साधकोऽभीष्टमाप्नुयात्' — साधक की इच्छित कामनाएं पूर्ण होती हैं।
- न्यास सहित विशेष फल: 'पठेन्न्याससमन्वितम्' — न्यास के साथ पाठ से विशेष फल।
- 108 नामों का पुण्य: प्रत्येक नाम एक मंत्र के समान है।
- त्रिपुरा सिद्धि: 'त्रिपुरा', 'त्रिपुरसुन्दरी', 'त्रिपुरवासिनी' — त्रिपुरा तत्त्व की सिद्धि।
- सर्वसम्पत्प्रदायिनी: देवी स्वयं सर्व सम्पत्ति प्रदान करती हैं (श्लोक 7)।
- कैवल्य प्राप्ति: 'कैवल्यरेखा' — मोक्ष का मार्ग।
- परब्रह्म साक्षात्कार: 'परब्रह्मस्वरूपिणी' — परब्रह्म का साक्षात्कार।
पाठ विधि और विशेष अवसर
- 1. विनियोग: स्तोत्र का उद्देश्य और ऋषि-छंद-देवता का स्मरण।
- 2. करन्यास: अंगुलियों पर ऐं-क्लीं-सौः का न्यास।
- 3. हृदयादिन्यास: हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र पर न्यास।
- 4. दिग्बन्ध: 'भूर्भुवस्सुवरोम्' से दिशाओं का बंधन।
- 5. ध्यान: देवी के स्वरूप का ध्यान।
- 6. पंचपूजा: पाँच तत्वों से प्रतीकात्मक पूजा।
- 7. स्तोत्र पाठ: 108 नामों का पाठ।
- 8. दिग्विमोक: बंधन का विमोचन।
- नवरात्रि के नौ दिन
- शुक्रवार (देवी का दिन)
- पूर्णिमा (विशेषकर चैत्र और आश्विन)
- ललिता जयंती