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Sri Bala Pancharatna Stotram – श्री बाला पञ्चरत्न स्तोत्रम् (पाँच रत्न)

Sri Bala Pancharatna Stotram – श्री बाला पञ्चरत्न स्तोत्रम् (पाँच रत्न)
॥ श्री बाला पञ्चरत्न स्तोत्रम् ॥ आयी आनन्दवल्ली अमृतकरतली आदिशक्तिः परायी माया मायात्मरूपी स्फटिकमणिमयी मामतङ्गी षडङ्गी । ज्ञानी ज्ञानात्मरूपी नलिनपरिमली नाद ओङ्कारमूर्तिः योगी योगासनस्था भुवनवशकरी सुन्दरी ऐं नमस्ते ॥ १ ॥ बालामन्त्रे कटाक्षी मम हृदयसखी मत्तभाव प्रचण्डी व्याली यज्ञोपवीती विकटकटितटी वीरशक्तिः प्रसन्ना । बाला बालेन्दुमौलिर्मदगजगमना साक्षिका स्वस्तिमन्त्री काली कङ्कालरूपी कटिकटिकह्रीं कारिणी क्लीं नमस्ते ॥ २ ॥ मूलाधारा महात्मा हुतवहनयनी मूलमन्त्रा त्रिनेत्रा हारा केयूरवल्ली अखिलत्रिपदगा अम्बिकायै प्रियायै । वेदा वेदाङ्गनादा विनतघनमुखी वीरतन्त्रीप्रचारी सारी संसारवासी सकलदुरितहा सर्वतो ह्रीं नमस्ते ॥ ३ ॥ ऐं क्लीं ह्रीं मन्त्ररूपा शकलशशिधरा सम्प्रदायप्रधाना क्लीं ह्रीं श्रीं बीजमुख्यैः हिमकरदिनकृज्ज्योतिरूपा सरूपा । सौः क्लीं ऐं शक्तिरूपा प्रणवहरिसते बिन्दुनादात्मकोटिः क्षां क्षीं क्षूं‍कारनादे सकलगुणमयी सुन्दरी ऐं नमस्ते ॥ ४ ॥ अध्यानाध्यानरूपा असुरभयकरी आत्मशक्तिस्वरूपा प्रत्यक्षा पीठरूपी प्रलययुगधरा ब्रह्मविष्णुत्रिरूपी । शुद्धात्मा सिद्धरूपा हिमकिरणनिभा स्तोत्रसङ्क्षोभशक्तिः सृष्टिस्थित्यन्तमूर्ती त्रिपुरहरजयी सुन्दरी ऐं नमस्ते ॥ ५ ॥ ॥ इति श्री बाला पञ्चरत्न स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री बाला पञ्चरत्न स्तोत्रम् का परिचय (Introduction)

श्री बाला पञ्चरत्न स्तोत्रम् (Sri Bala Pancharatna Stotram) बाला त्रिपुरसुन्दरी की स्तुति के पाँच अनमोल रत्न हैं। 'पञ्चरत्न' का अर्थ है 'पाँच रत्न' (पञ्च = पाँच, रत्न = मणि)। ये पाँच श्लोक इतने मूल्यवान और शक्तिशाली हैं कि इन्हें रत्नों की उपमा दी गई है।

इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि प्रत्येक श्लोक के अंत में बाला बीज मंत्र के साथ देवी को नमस्कार किया गया है: प्रथम श्लोक में 'ऐं नमस्ते', द्वितीय में 'क्लीं नमस्ते', तृतीय में 'ह्रीं नमस्ते', और चौथे-पाँचवें में 'ऐं नमस्ते'। यह त्र्यक्षरी मंत्र (ऐं क्लीं सौः) का स्तोत्रात्मक रूप है।

"आयी आनन्दवल्ली अमृतकरतली आदिशक्तिः परायी..."


भावार्थ: माँ! आप आनन्द की लता हैं, अमृत हाथों वाली हैं, आदि शक्ति हैं, सर्वोच्च (परा) हैं...

यह स्तोत्र मंत्रात्मक स्तोत्र है क्योंकि इसमें अनेक बीज मंत्र प्रत्यक्ष रूप से समाहित हैं। चौथा श्लोक तो पूर्णतः मंत्रमय है — इसमें 'ऐं क्लीं ह्रीं', 'क्लीं ह्रीं श्रीं', 'सौः क्लीं ऐं', और 'क्षां क्षीं क्षूं' जैसे बीज मंत्र सीधे पाठ में आते हैं।

पाँच रत्नों का विवेचन (Analysis of Five Jewels)

प्रथम रत्न (आनन्दवल्ली): देवी को आनन्दवल्ली (आनन्द की लता), अमृतकरतली (अमृत हाथों वाली), आदिशक्ति, माया, ज्ञानात्मरूपी, ओंकारमूर्ति, योगासनस्था, और भुवनवशकरी (संसार को वश में करने वाली) कहा गया है। यह श्लोक देवी के ज्ञान और योग स्वरूप का वर्णन करता है।

द्वितीय रत्न (वीरशक्ति): इसमें देवी को बालामन्त्रे कटाक्षी (बाला मंत्र पर कृपा दृष्टि), हृदयसखी (हृदय की सखी), वीरशक्ति, बालेन्दुमौलि (बाल चंद्र धारिणी), और काली कङ्कालरूपी (काली के उग्र स्वरूप) कहा गया है। यह श्लोक देवी के उग्र और वीर स्वरूप का वर्णन करता है।

तृतीय रत्न (मूलमन्त्रा): देवी को मूलाधारा (मूलाधार चक्र में स्थित), मूलमन्त्रा, त्रिनेत्रा, वेदाङ्गनादा (वेद अंगों के नाद स्वरूप), वीरतन्त्रीप्रचारी (वीर तंत्र की प्रचारिणी), और सकलदुरितहा (सभी पापों का नाश करने वाली) कहा गया है। यह कुंडलिनी और तांत्रिक स्वरूप का वर्णन है।

चतुर्थ रत्न (बीज मंत्रात्मक): यह सबसे महत्वपूर्ण श्लोक है। इसमें बाला के सभी प्रमुख बीज मंत्र प्रत्यक्ष रूप में हैं: 'ऐं क्लीं ह्रीं', 'क्लीं ह्रीं श्रीं', 'सौः क्लीं ऐं', और 'क्षां क्षीं क्षूं'। देवी को सम्प्रदायप्रधाना (गुरु परंपरा की प्रमुख), बिन्दुनादात्मकोटि, और सकलगुणमयी कहा गया है।

पञ्चम रत्न (सृष्टिस्थित्यन्तमूर्ती): देवी को असुरभयकरी (असुरों को भय देने वाली), प्रलययुगधरा (प्रलय युग की धारिणी), ब्रह्मविष्णुत्रिरूपी (ब्रह्मा-विष्णु-शिव स्वरूप), सृष्टिस्थित्यन्तमूर्ती (सृष्टि, स्थिति, संहार की मूर्ति), और त्रिपुरहरजयी (त्रिपुरहर शिव की भी विजयी) कहा गया है।

पाठ के अद्भुत लाभ (Benefits)

इस पञ्चरत्न स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक को निम्नलिखित दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं (स्तोत्र के श्लोकों से प्रमाणित):

  • वाक सिद्धि: 'ऐं' बीज प्रत्येक श्लोक में होने से वाणी में अद्भुत प्रभाव और सत्यता आती है।
  • ज्ञान प्राप्ति: 'ज्ञानी ज्ञानात्मरूपी' — देवी ज्ञान के स्वरूप हैं और साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती हैं।
  • योग सिद्धि: 'योगी योगासनस्था' — योग साधना में सफलता और कुंडलिनी जागरण में सहायता।
  • आकर्षण शक्ति: 'भुवनवशकरी' — समस्त संसार को आकर्षित करने की शक्ति।
  • पाप नाश: 'सकलदुरितहा' — समस्त पापों और दुष्टता का नाश।
  • शत्रु भय: 'असुरभयकरी' — शत्रुओं और दुष्ट शक्तियों को भय उत्पन्न होता है।
  • मंत्र सिद्धि: चौथे श्लोक में सभी बीज मंत्र होने से मंत्र साधना में शीघ्र सिद्धि।
  • त्रिदेव कृपा: 'ब्रह्मविष्णुत्रिरूपी' — ब्रह्मा, विष्णु, शिव तीनों का आशीर्वाद।

साधना और पाठ विधि (Recitation Method)

इस पञ्चरत्न स्तोत्र की सिद्धि के लिए निम्न विधि से पाठ करें:
1. उत्तम समय
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या काल में पाठ श्रेष्ठ है। पाँच श्लोकों का पाठ लगभग 3-4 मिनट में पूर्ण होता है।
2. आसन और दिशा
लाल या सफेद आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। श्री चक्र या देवी प्रतिमा के समक्ष पाठ करें।
3. पाठ संख्या
नियमित पूजा में 5 बार पाठ विशेष शुभ है (पञ्चरत्न = पाँच)। विशेष अनुष्ठान में 11, 21, या 108 बार पाठ करें।
4. नैवेद्य
दूध, मिश्री, खीर, शहद, और ऋतु फल अर्पित करें। लाल और सफेद पुष्प (कमल, गुलाब, चमेली) विशेष प्रिय हैं।

विशेष: चौथा श्लोक मंत्रमय है। इसके अलग से 108 बार जप करने से मंत्र सिद्धि में अद्भुत सहायता मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. पञ्चरत्न स्तोत्र का अर्थ क्या है?

'पञ्चरत्न' का अर्थ है 'पाँच रत्न' (पञ्च = पाँच, रत्न = रत्न/मणि)। यह स्तोत्र बाला त्रिपुरसुन्दरी की स्तुति के पाँच अनमोल श्लोक हैं, जो पाँच रत्नों के समान बहुमूल्य हैं।

2. प्रत्येक श्लोक के अंत में 'ऐं नमस्ते' क्यों है?

'ऐं' बाला देवी का प्रथम और प्रधान बीज मंत्र है। प्रत्येक श्लोक के अंत में 'सुन्दरी ऐं नमस्ते' या समान वाक्य से देवी को नमस्कार किया गया है। यह मंत्रात्मक स्तोत्र की विशेषता है।

3. 'आदिशक्तिः परायी' का क्या अर्थ है?

'आदिशक्ति' = आदि (प्रथम) + शक्ति = सृष्टि की मूल शक्ति। 'परायी' = परा (सर्वोच्च) = सर्वोच्च शक्ति। अर्थात बाला देवी आदि काल से विद्यमान सर्वोच्च शक्ति हैं।

4. चौथे श्लोक में कौन-कौन से बीज मंत्र हैं?

चौथे श्लोक में बाला के सभी प्रमुख बीज मंत्र हैं: 'ऐं क्लीं ह्रीं' (त्र्यक्षरी), 'क्लीं ह्रीं श्रीं' (बीज त्रय), 'सौः क्लीं ऐं' (उल्टा क्रम), और 'क्षां क्षीं क्षूं' (छेदन बीज)। यह श्लोक मंत्र साधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

5. 'षडङ्गी' का क्या अर्थ है?

'षडङ्गी' का अर्थ है 'छः अंगों वाली'। यह षडंग न्यास (हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र) या वेद के छः अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) की अधिष्ठात्री को संदर्भित करता है।

6. 'मूलाधारा महात्मा' का क्या महत्व है?

तीसरे श्लोक में 'मूलाधारा' का अर्थ है — मूलाधार चक्र में स्थित। बाला देवी कुंडलिनी शक्ति के रूप में मूलाधार में निवास करती हैं और साधना से जागृत होकर सहस्रार तक पहुँचती हैं।

7. 'त्रिपुरहरजयी' का क्या अर्थ है?

'त्रिपुरहर' = शिव (जिन्होंने त्रिपुरासुर को हराया)। 'जयी' = विजयी। अर्थात बाला देवी त्रिपुरहर शिव की भी विजेता हैं, अर्थात वे शिव से भी श्रेष्ठ या शिव की प्रेरणा शक्ति हैं।

8. इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या काल में पाठ उत्तम है। शुक्रवार, नवरात्रि, और पूर्णिमा विशेष फलदायी हैं। पाँच बार पाठ विशेष शुभ माना जाता है।

9. 'भुवनवशकरी' का क्या अर्थ है?

'भुवनवशकरी' = भुवन (संसार) + वश (नियंत्रण) + करी (करने वाली) = समस्त संसार को अपने वश में रखने वाली। बाला देवी की उपासना से साधक को भी वशीकरण शक्ति प्राप्त होती है।

10. इस स्तोत्र के मुख्य लाभ क्या हैं?

इस स्तोत्र के पाठ से: (1) वाक सिद्धि (वाणी में प्रभाव), (2) ज्ञान प्राप्ति (ज्ञानात्मरूपी), (3) योग सिद्धि (योगासनस्था), (4) सर्व दुरित नाश (सकलदुरितहा), (5) भय निवारण (असुरभयकरी), और (6) आकर्षण शक्ति (भुवनवशकरी) प्राप्त होती है।