Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Bagalamukhi Stotram – श्री बगलामुखी स्तोत्रम् (नारद कृत)

Sri Bagalamukhi Stotram – श्री बगलामुखी स्तोत्रम् (नारद कृत)
॥ विनियोगः ॥
ओं अस्य श्रीबगलामुखीस्तोत्रस्य नारदऋषिः श्रीबगलामुखी देवता, मम सन्निहितानां विरोधिनां वाङ्मुख-पदबुद्धीनां स्तम्भनार्थे स्तोत्रपाठे विनियोगः ।
अर्थ: इस श्री बगलामुखी स्तोत्र के ऋषि नारद हैं, देवता श्री बगलामुखी हैं। मेरे समीपस्थ विरोधियों (शत्रुओं) की वाणी, मुख, पैर (गति) और बुद्धि को स्तम्भित (रोकने) करने के लिए इस स्तोत्र पाठ का विनियोग (प्रयोग) करता हूँ। ॥ ध्यानम् ॥
मध्ये सुधार्ब्धि मणिमण्डप रत्नवेदी सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम् । पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषिताङ्गीं देवीं भजामि धृतमुद्गरवैरिजिह्वाम् ॥ १ ॥
अर्थ: अमृत के सागर (सुधाब्धि) के मध्य में, मणियों से बने मण्डप और रत्नजड़ित वेदी पर रखे सिंहासन पर विराजमान, पूर्णतः पीतवर्ण (पीले रंग) वाली, पीले वस्त्र, आभूषण और मालाओं से सुशोभित अंगों वाली, तथा (एक हाथ में) मुद्गर (गदा) और (दूसरे हाथ में) शत्रु की जीभ धारण करने वाली देवी (बगलामुखी) का मैं भजन करता हूँ।
जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं वामेन शत्रून् परिपीडयन्तीम् । गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि ॥ २ ॥
अर्थ: जो अपने बाएँ हाथ से शत्रु की जीभ का अग्रभाग पकड़कर उसे पीड़ा दे रही हैं, और दाएँ हाथ से गदा के प्रहार से उसे नष्ट कर रही हैं; ऐसी पीताम्बरा (पीले वस्त्र वाली), दो भुजाओं वाली देवी को मैं नमन करता हूँ। ॥ स्तोत्रम् ॥
चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थलां लसत्कनकचम्पक-द्युतिमदिन्दुबिम्बाननाम् । गदाहत-विपक्षकां कलितलोलजिह्वाञ्चलां स्मरामि बगलामुखीं विमुखवाङ्मनस्स्तम्भिनीम् ॥ ३ ॥
अर्थ: जिनके सुंदर गालों पर हिलते हुए स्वर्ण कुण्डल चमक रहे हैं, जिनका मुख-मण्डल खिले हुए सोने के चम्पक पुष्प और चन्द्रमा के बिम्ब समान कांतिमान है; जो गदा के प्रहार से शत्रुओं का नाश करती हैं और उनकी चंचल जीभ को खींच लेती हैं; ऐसी विमुख (विरोधी) वाणी और मन को स्तम्भित करने वाली माँ बगलामुखी का मैं स्मरण करता हूँ।
पीयूषोदधि-मध्य-चारु-विलसद्-रक्तोत्पले मण्डपे सत्सिंहासन-मौलि-पातितरिपुं प्रेतासनाध्यासिनीम् । स्वर्णाभां करपीडितारिरसनां भ्राम्यद्गदां विभ्रमां इत्थं ध्यायति यान्ति तस्य विलयं सद्योऽथ सर्वापदः ॥ ४ ॥
अर्थ: अमृत सागर के मध्य सुंदर लाल कमलों से सुशोभित मण्डप में, सिंहासन पर (अथवा प्रेत आसन पर) विराजमान, स्वर्ण की आभा वाली, हाथ में शत्रु की जीभ को दबाए हुए और गदा को घुमाती हुई देवी का जो इस प्रकार ध्यान करता है, उसकी सभी विपत्तियां तत्काल नष्ट हो जाती हैं।
देवि त्वच्चरणाम्बुजार्चनकृते यः पीतपुष्पाञ्जलीन् भक्त्या वामकरे निधाय च मनुं मन्त्री मनोज्ञाक्षरम् । पीठध्यानपरोऽथ कुम्भकवशाद्बीजं स्मरेत्पार्थिव- स्तस्यामित्रमुखस्य वाचि हृदये जाड्यं भवेत्तत्‍क्षणात् ॥ ५ ॥
अर्थ: हे देवि! जो साधक आपके चरण-कमलों की पूजा के लिए भक्तिपूर्वक पीले पुष्पों की अंजलि अर्पित करता है, और वाम हस्त में जपमाला लेकर आपके मनोज्ञ (सुंदर) मन्त्र का जप करता है; जो पीठ-ध्यान में मग्न होकर कुम्भक प्राणायाम के साथ 'पार्थिव बीज' (ह्लीं) का स्मरण करता है—उस क्षण उसके शत्रु के मुख, वाणी और हृदय में जड़ता (स्तम्भन) आ जाती है।
वादी मूकति रङ्कति क्षितिपतिर्वैश्वानरः शीतति क्रोधी शाम्यति दुर्जनः सुजनति क्षिप्रानुगः खञ्जति । गर्वी खर्वति सर्वविच्च जडति त्वद्यन्त्रणा यन्त्रितः श्रीनित्ये बगलामुखि प्रतिदिनं कल्याणि तुभ्यं नमः ॥ ६ ॥
अर्थ: (यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है) आपके यन्त्र (मन्त्र/कृपा) से नियंत्रित होने पर—बड़ा वक्ता (वादी) गूँगा हो जाता है, राजा (शक्तिशाली व्यक्ति) रंक (दीन) बन जाता है, अग्नि शीतल हो जाती है, क्रोधी व्यक्ति शांत हो जाता है, दुर्जन सज्जन बन जाता है, तेज चलने वाला लंगड़ा हो जाता है, घमंडी का गर्व चूर हो जाता है, और सर्वज्ञ (ज्ञानी) भी जड़ (मूर्ख) हो जाता है। हे नित्य कल्याणी बगलामुखी! आपको प्रतिदिन नमस्कार है।
मन्त्रस्तावदयं विपक्षदलने स्तोत्रं पवित्रं च ते यन्त्रं वादिनियन्त्रणं त्रिजगतां जैत्रं च चित्रं च ते । मातः श्रीबगलेति नाम ललितं यस्यास्ति जन्तोर्मुखे त्वन्नामग्रहणेन संसदि मुखस्तम्भो भवेद्वादिनाम् ॥ ७ ॥
अर्थ: हे माता! आपका मन्त्र शत्रु दल का नाश करने वाला है, आपका स्तोत्र अत्यंत पवित्र है। आपका यन्त्र वादियों (विरोधियों) को नियंत्रित करने वाला और तीनों लोकों में विजय दिलाने वाला अद्भुत है। जिसके मुख में आपका सुंदर नाम 'श्री बगला' रहता है, उसके द्वारा आपका नाम लेने मात्र से सभा में विरोधियों का मुख स्तम्भित (बंद) हो जाता है।
दुष्टस्तम्भनमुग्रविघ्नशमनं दारिद्र्यविद्रावणं भूभृद्भीशमनं चलन्मृगदृशां चेतस्समाकर्षणम् । सौभाग्यैकनिकेतनं समदृशः कारुण्यपूर्णामृतं मृत्योर्मारणमाविरस्तु पुरतो मातस्त्वदीयं वपुः ॥ ८ ॥
अर्थ: दुष्टों को स्तम्भित करने वाला, उग्र विघ्नों को शांत करने वाला, दरिद्रता को दूर भगाने वाला, राजा के भय को मिटाने वाला, चंचल नेत्रों वाली स्त्रियों के चित्त को आकर्षित करने वाला, सौभाग्य का एकमात्र निवास, और करुणा रूपी अमृत से परिपूर्ण—हे माता! आपका ऐसा दिव्य स्वरूप मेरे सामने प्रकट हो।
मातर्भञ्जय मे विपक्षवदनां जिह्वां च सङ्कीलय ब्रह्मीं मुद्रय नाशयाशुधिषणामुग्रां गतिं स्तम्भय । शत्रूम्श्चूर्णय देवि तीक्ष्णगदया गौराङ्गि पीताम्बरे विघ्नौघं बगले हर प्रणमतां कारुण्यपूर्णेक्षणे ॥ ९ ॥
अर्थ: हे माता! मेरे विपक्षियों (शत्रुओं) के मुख को तोड़ दो, उनकी जीभ को कील दो (बंद कर दो)। उनकी बुद्धि का नाश करो और उनकी उग्र गति को रोक दो। हे गौरांगी! हे पीताम्बरे! अपनी तीक्ष्ण गदा से शत्रुओं का चूर्ण बना दो। हे करुणा से पूर्ण दृष्टि वाली बगलामुखी! अपने शरणागतों के विघ्न-समूह का हरण करो।
मातर्भैरवि भद्रकालि विजये वाराहि विश्वाश्रये श्रीविद्ये समये महेशि बगले कामेशि रामे रमे । मातङ्गि त्रिपुरे परात्परतरे स्वर्गापवर्गप्रदे दासोऽहं शरणागतः करुणया विश्वेश्वरि त्राहिमाम् ॥ १० ॥
अर्थ: हे माता भैरवी, भद्रकाली, विजया, वाराही, विश्व की आश्रय, श्रीविद्या, समया, महेशी, बगला, कामेशी, रामा, रमा, मातंगी, त्रिपुरा, और परात्पर (सर्वोच्च)! हे स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली विश्वेश्वरी! मैं आपका दास हूँ, आपकी शरण में हूँ। करुणा करके मेरी रक्षा करें।
संरम्भे चौरसङ्घे प्रहरणसमये बन्धने वारिमध्ये विद्यावादे विवादे प्रतिकृतिनृपतौ दिव्यकाले निशायाम् । वश्ये वा स्तम्भने वा रिपुवधसमये निर्जने वा वने वा गच्छंस्तिष्ठंस्त्रिकालं यदि पठति शिवं प्राप्नुयादाशु धीरः ॥ ११ ॥
अर्थ: युद्ध में, चोरों के समूह में, मार-काट के समय, बंधन (जेल) में, जल के मध्य (बाढ़/तूफान), विद्या-विवाद में, मुकदमे में, राजा के कोप में, रात्रि के समय, वशीकरण में, स्तम्भन में, शत्रु वध के समय, अथवा निर्जन वन में—चाहे चलते हुए या ठहरते हुए, जो धीर पुरुष तीनों काल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह शीघ्र ही कल्याण (शिव) को प्राप्त करता है।
त्वं विद्या परमा त्रिलोकजननी विघ्नौघसञ्छेदिनी योषाकर्षणकारिणी त्रिजगतामानन्दसंवर्धिनी । दुस्फोटौच्चाटनकारिणी जनमनस्संमोहसन्दायिनी जिह्वाकीलनभैरवी विजयते ब्रह्मास्त्रमन्त्रो यथा ॥ १२ ॥
अर्थ: आप परम विद्या हैं, तीनों लोकों की जननी हैं, विघ्नों के समूह को काटने वाली हैं। आप आकर्षण करने वाली और तीनों लोकों का आनंद बढ़ाने वाली हैं। आप दुष्टों का उच्चाटन (खदेड़ने) करने वाली और जन-मन को मोहित करने वाली हैं। आप जीभ को कीलने वाली 'भैरवी' हैं। आपकी जय हो, आप साक्षात् 'ब्रह्मास्त्र मन्त्र' स्वरूप हैं। ॥ फलश्रुति ॥
विद्या लक्ष्मीस्सर्वसौभाग्यमायुः पुत्रैः पौत्रैः सर्वसाम्राज्यसिद्धिः । मानो भोगो वश्यमारोग्यसौख्यं प्राप्तं तत्तद्भूतलेऽस्मिन्नरेण ॥ १३ ॥
अर्थ: (इस स्तोत्र के पाठ से) मनुष्य को इस पृथ्वी पर विद्या, लक्ष्मी, सौभाग्य, आयु, पुत्र-पौत्र, संपूर्ण साम्राज्य की सिद्धि, मान-सम्मान, भोग, वशीकरण, आरोग्य और सुख प्राप्त होता है।
यत्कृतं च जपं होमं गदितं परमेश्वरी । दुष्टानां निग्रहार्थाय तद्गृहाण नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥
अर्थ: हे परमेश्वरी! दुष्टों के निग्रह (दमन) के लिए मैंने जो भी जप, होम या पाठ किया है, उसे आप स्वीकार करें। आपको नमस्कार है।
ब्रह्मास्त्रमिति विख्यातं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । गुरुभक्ताय दातव्यं न देयं यस्य कस्यचित् ॥ १६ ॥
अर्थ: यह स्तोत्र तीनों लोकों में 'ब्रह्मास्त्र' नाम से विख्यात है। इसे केवल गुरु-भक्त (योग्य शिष्य) को ही देना चाहिए, किसी भी अयोग्य व्यक्ति को नहीं देना चाहिए।
नित्यं स्तोत्रमिदं पवित्रमिह यो देव्याः पठत्यादरात् धृत्वायन्त्रमिदं तथैव समरे बाहौ करे वा गले । राजानोऽप्यरयो मदान्धकरिणस्सर्पा मृगेन्द्रादिकाः ते वै यान्ति विमोहिता रिपुगणा लक्ष्मीः स्थिरास्सिद्धयः ॥ १७ ॥
अर्थ: जो व्यक्ति आदरपूर्वक प्रतिदिन देवी के इस पवित्र स्तोत्र का पाठ करता है, या इसके यन्त्र को युद्ध में/बाहरी संकट में अपनी भुजा, हाथ या गले में धारण करता है—उसके सामने राजा, शत्रु, मदमस्त हाथी, सर्प और शेर आदि भी विमोहित (शांत/वश में) हो जाते हैं। उसे स्थिर लक्ष्मी और सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ॥ इति श्री रुद्रयामले तन्त्रे श्री बगलामुखी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥ इतर पश्यतु ।

बगलामुखी स्तोत्र (रुद्रयामल) - परिचय

श्री बगलामुखी स्तोत्रम् (Narada Krit) एक अत्यंत शक्तिशाली 'ब्रह्मास्त्र विद्या' है जिसका उल्लेख रुद्रयामल तन्त्र में मिलता है। इस स्तोत्र की रचना स्वयं देवर्षि नारद ने की है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक 'तान्त्रिक अस्त्र' है जिसका प्रयोग घोर संकट, शत्रु बाधा, और जीवन-मरण के प्रश्नों के समय किया जाता है।
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'स्तम्भन' (Paralyzing) प्रभाव है। यह विरोधियों की बुद्धि को भ्रमित कर देता है और उनकी वाणी को रोक देता है, जिससे वे आपके विरुद्ध कोई अनिष्ट नहीं कर पाते। इसे 'सर्वकार्य सिद्धि' स्तोत्र भी कहा जाता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

इस स्तोत्र का छठा श्लोक (Verse 6) — "वादी मूकति..." — तंत्र जगत में अत्यंत प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इसके अनुष्ठान से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं:
  • वादी मूकति: बोलने में माहिर शत्रु (Debater/Lawyer) भी गूँगा हो जाता है।
  • रंकति क्षितिपति: राजा (शक्तिशाली व्यक्ति) भी रंक (दीन) की तरह व्यवहार करने लगता है।
  • क्रोधी शाम्यति: अत्यंत क्रोधी व्यक्ति का गुस्सा शांत हो जाता है।
  • क्षिप्राणुगः खञ्जति: तेजी से पीछा करने वाला (शत्रु/मुसीबत) लंगड़ा हो जाता है (रुक जाता है)।

पाठ विधि (Recitation Ritual)

  • समय: यह उग्र साधना है, इसलिए रात्रि का समय (विशेषकर रात 9 बजे के बाद) या ब्रह्म मुहूर्त श्रेष्ठ है।
  • दीपक: संकल्प लेकर सरसों के तेल का दीपक जलाएं (शत्रु नाश हेतु)। उसमें 1-2 चुटकी हल्दी डाल दें।
  • वस्त्र व आसन: साधक को अनिवार्य रूप से पीले वस्त्र पहनने चाहिए और पीले आसन पर बैठना चाहिए।
  • माला: पाठ की गिनती के लिए हल्दी की माला का प्रयोग करें।
  • दिशा: शत्रु दमन के लिए पूर्व (East) मुख होकर पाठ करें।
  • नियम: पाठ के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करें और सात्विक भोजन (बिना प्याज-लहसुन) करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. बगलामुखी स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस स्तोत्र के रचयिता देवर्षि नारद (Narada Rishi) हैं। यह 'रुद्रयामल तन्त्र' के अंतर्गत आता है, जो शिव और शक्ति के संवाद रूप में है।

2. इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य 'स्तम्भन' (Stambhan) है। विनियोग में कहा गया है - 'विरोधिनां वाङ्मुख-पदबुद्धीनां स्तम्भनार्थे' (विरोधियों की वाणी, मुख, पैर और बुद्धि को रोकने के लिए)।

3. इस पाठ को कितनी बार करना चाहिए?

सामान्य सुरक्षा के लिए प्रतिदिन 1 बार पाठ पर्याप्त है। विशेष कार्य सिद्धि या शत्रु भय होने पर 11, 21, या 108 बार पाठ 41 दिनों तक करने का विधान है।

4. क्या स्त्रियाँ और गृहस्थ यह पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, गृहस्थ और स्त्रियाँ दोनों यह पाठ कर सकती हैं। यह एक 'स्तोत्र' है, जो बीज मन्त्रों की तुलना में सुरक्षित माना जाता है। मासिक धर्म के दौरान पाठ न करें।

5. पाठ के लिए कौन सा समय उत्तम है?

तांत्रिक स्तोत्र होने के कारण रात्रि काल (विशेषकर निशीथ काल) या ब्रह्म मुहूर्त श्रेष्ठ है। नवरात्र, अष्टमी, या चतुर्दशी तिथियां विशेष फलदायी होती हैं।

6. कौन से आसन और वस्त्र का प्रयोग करें?

माँ बगलामुखी को 'पीताम्बरा' कहते हैं, इसलिए 'पीला आसन' और 'पीले वस्त्र' (धोती/साड़ी) ही प्रयोग करें। काले वस्त्र वर्जित हैं।

7. 'वादी मूकति' श्लोक का क्या रहस्य है?

यह छठा श्लोक अत्यंत चमत्कारी है। यह वाक सिद्धि के लिए प्रयोग किया जाता है। यदि आप कोर्ट में गवाही देने या बहस करने जा रहे हैं, तो इस श्लोक का मानसिक जाप करते रहें।

8. क्या कोर्ट केस जीतने के लिए यह प्रभावी है?

अत्यंत प्रभावी है। यह शत्रु की 'बुद्धि' को कुंठित कर देता है, जिससे वह आपके विरुद्ध सही तर्क नहीं दे पाता और अंततः हार मान लेता है या समझौता कर लेता है।

9. पाठ के दौरान दीपक कौन सा जलाएं?

शत्रु नाश और स्तम्भन के लिए 'सरसों के तेल' का दीपक जलाना चाहिए। उसमें थोड़ी हल्दी डालने से प्रभाव बढ़ता है। शांति और धन के लिए घी का दीपक जलाएं।

10. क्या गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

स्तोत्र पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि आप किसी विशिष्ट 'काम्य प्रयोग' (Wish fulfillment ritual) का अनुष्ठान कर रहे हैं, तो गुरु का मार्गदर्शन लेना आवश्यक है।