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Sri Anagha Deva Ashtottara Shatanama Stotram – श्री अनघदेव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Anagha Deva Ashtottara Shatanama Stotram – श्री अनघदेव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री अनघदेव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ दत्तात्रेयायाऽनघाय त्रिविधाघविदारिणे । लक्ष्मीरूपाऽनघेशाय योगाधीशाय ते नमः ॥ १ ॥ द्राम्बीजध्यानगम्याय विज्ञेयाय नमो नमः । गर्भादितारणायाऽस्तु दत्तात्रेयाय ते नमः ॥ २ ॥ बीजस्थवटतुल्याय चैकार्णमनुगामिने । षडर्णमनुपालाय योगसम्पत्कराय ते ॥ ३ ॥ अष्टार्णमनुगम्याय पूर्णाऽऽनन्दवपुष्मते । द्वादशाक्षरमन्त्रस्थायाऽऽत्मसायुज्यदायिने ॥ ४ ॥ षोडशार्णमनुस्थाय सच्चिदानन्दशालिने । दत्तात्रेयाय हरये कृष्णायाऽस्तु नमो नमः ॥ ५ ॥ उन्मत्तायाऽऽनन्ददायकाय तेऽस्तु नमो नमः । दिगम्बराय मुनये बालायाऽस्तु नमो नमः ॥ ६ ॥ पिशाचाय च ते ज्ञानसागराय च ते नमः । आब्रह्मजन्मदोषौघप्रणाशाय नमो नमः ॥ ७ ॥ सर्वोपकारिणे मोक्षदायिने ते नमो नमः । ओंरूपिणे भगवते दत्तात्रेयाय ते नमः ॥ ८ ॥ स्मृतिमात्रसुतुष्टाय महाभयनिवारिणे । महाज्ञानप्रदायाऽस्तु चिदानन्दाऽऽत्मने नमः ॥ ९ ॥ बालोन्मत्तपिशाचादिवेषाय च नमो नमः । नमो महायोगिने चाप्यवधूताय ते नमः ॥ १० ॥ अनसूयाऽऽनन्ददाय चाऽत्रिपुत्राय ते नमः । सर्वकामफलानीकप्रदात्रे ते नमो नमः ॥ ११ ॥ प्रणवाक्षरवेद्याय भवबन्धविमोचिने । ह्रीम्बीजाक्षरपाराय सर्वैश्वर्यप्रदायिने ॥ १२ ॥ क्रोम्बीजजपतुष्टाय साध्याकर्षणदायिने । सौर्बीजप्रीतमनसे मनःसङ्क्षोभहारिणे ॥ १३ ॥ ऐम्बीजपरितुष्टाय वाक्प्रदाय नमो नमः । क्लीम्बीजसमुपास्याय त्रिजगद्वश्यकारिणे ॥ १४ ॥ श्रीमुपासनतुष्टाय महासम्पत्प्रदाय च । ग्लौमक्षरसुवेद्याय भूसाम्राज्यप्रदायिने ॥ १५ ॥ द्राम्बीजाक्षरवासाय महते चिरजीविने । नानाबीजाक्षरोपास्य नानाशक्तियुजे नमः ॥ १६ ॥ समस्तगुणसम्पन्नायाऽन्तःशत्रुविदाहिने । भूतग्रहोच्चाटनाय सर्वव्याधिहराय च ॥ १७ ॥ पराभिचारशमनायाऽऽधिव्याधिनिवारिणे । दुःखत्रयहरायाऽस्तु दारिद्र्यद्राविणे नमः ॥ १८ ॥ देहदार्ढ्याभिपोषाय चित्तसन्तोषकारिणे । सर्वमन्त्रस्वरूपाय सर्वयन्त्रस्वरूपिणे ॥ १९ ॥ सर्वतन्त्राऽऽत्मकायाऽस्तु सर्वपल्लवरूपिणे । शिवायोपनिषदवेद्यायाऽस्तु दत्ताय ते नमः ॥ २० ॥ नमो भगवते तेऽस्तु दत्तात्रेयाय ते नमः । महागम्भीररूपाय वैकुण्ठवासिने नमः ॥ २१ ॥ शङ्खचक्रगदाशूलधारिणे वेणुनादिने । दुष्टसंहारकायाऽथ शिष्टसम्पालकाय च ॥ २२ ॥ नारायणायाऽस्त्रधरायाऽस्तु चिद्रूपिणे नमः । प्रज्ञारूपाय चाऽऽनन्दरूपिणे ब्रह्मरूपिणे ॥ २३ ॥ महावाक्यप्रबोधाय तत्त्वायाऽस्तु नमो नमः । नमः सकलकर्मौघनिर्मिताय नमो नमः ॥ २४ ॥ नमस्ते सच्चिदानन्दरूपाय च नमो नमः । नमः सकललोकौघसञ्चाराय नमो नमः ॥ २५ ॥ नमः सकलदेवौघवशीकृतिकराय च । कुटुम्बवृद्धिदायाऽस्तु गुडपानकतोषिणे ॥ २६ ॥ पञ्चकर्जाय सुप्रीतायाऽस्तु कन्दफलादिने । नमः सद्गुरवे श्रीमद्दत्तात्रेयाय ते नमः ॥ २७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इत्येवमनघेशस्य दत्तात्रेयस्य सद्गुरोः । वेदान्तप्रतिपाद्यस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ २८ ॥ ॥ इति श्री अनघदेव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री अनघदेव — दत्तात्रेय का परम तेजस्वी स्वरूप (Introduction)

श्री अनघदेव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Anagha Deva Ashtottara Shatanama Stotram) भगवान दत्तात्रेय की उपासना का वह गुप्त पक्ष है जो साधक को "अघ" (पाप और दुख) से मुक्त कर "अनघ" (निर्मल) बना देता है। संस्कृत में 'अघ' का अर्थ है पाप, कष्ट या अज्ञान, और 'अनघ' का अर्थ है वह जो इन सब से सर्वथा मुक्त है। भगवान दत्तात्रेय, जिन्हें त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का सम्मिलित अवतार माना जाता है, जब अपनी शक्ति माँ अनघा लक्ष्मी के साथ विराजते हैं, तब वे "अनघदेव" कहलाते हैं।

यह स्तोत्र मुख्य रूप से दत्तात्रेय सम्प्रदाय की उस प्राचीन परंपरा से आता है जहाँ भगवान को एक पूर्ण गृहस्थ योगी के रूप में देखा गया है। दत्तात्रेय के "अवधूत" रूप में वे विरक्त हैं, लेकिन "अनघ" रूप में वे करुणा के सागर हैं जो अपने भक्तों को पारिवारिक सुख, आरोग्य और ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। इस स्तोत्र की रचना शैली और इसमें प्रयुक्त तांत्रिक बीज मंत्र (जैसे द्राम, ह्रीं, क्लीं) इसे केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली 'सिद्ध साधना' बनाते हैं।

महान दत्त अवतार श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेंबे स्वामी) और आधुनिक युग के महान सिद्ध श्री गणपथि सच्चिदानन्द स्वामी जी ने "अनघ" उपासना पर विशेष बल दिया है। उनके अनुसार, कलयुग के मानसिक तनाव और पारिवारिक क्लेशों का एकमात्र समाधान "अनघ-अनघा" की संयुक्त पूजा है। यह स्तोत्र उसी दिव्य ऊर्जा का शब्दात्मक विग्रह है, जिसके पाठ मात्र से साधक के चित्त की शुद्धि होती है और उसके घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक एवं तांत्रिक महत्व (Significance)

इस स्तोत्र की अद्वितीयता इसमें समाहित 'बीज मंत्रों' (Seed Mantras) के संगम में है। श्लोक १२ से १६ तक आप देखेंगे कि प्रत्येक नाम के साथ एक विशिष्ट तांत्रिक ध्वनि जुड़ी है। उदाहरण के लिए:

  • ह्रीम्बीज (Hrim): यह माया बीज है जो सर्वैश्वर्य प्रदान करता है (श्लोक १२)।
  • ऐम्बीज (Aim): यह सरस्वती बीज है जो वाक्-शक्ति और बुद्धि प्रदान करता है (श्लोक १४)।
  • क्लीम्बीज (Klim): यह कामराज बीज है जो त्रिलोक वशीकरण और आकर्षण प्रदान करता है (श्लोक १४)।
  • द्राम्बीज (Dram): यह दत्तात्रेय का साक्षात स्वरूप है जो रक्षा और मोक्ष का आधार है (श्लोक १६)।

दार्शनिक रूप से, अनघदेव स्वरूप यह सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी कैसे निर्लिप्त रहा जाए। श्लोक ६ में उन्हें 'बालोन्मत्तपिशाच' वेषधारी कहा गया है। यह दत्तात्रेय की तीन अवस्थाओं का वर्णन है— बालक (निर्दोषता), उन्मत्त (परमानंद में मग्न), और पिशाच (लोक-मर्यादा से परे)। यह स्तोत्र हमें अज्ञान के "त्रिविध अघ" (दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट) से बाहर निकालने की क्षमता रखता है।

स्तोत्र पाठ के फलश्रुति लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के नित्य पाठ से होने वाले लाभों का वर्णन स्वयं इसके नामों में ही छिपा है (श्लोक १७-२०):

  • ऋण और दारिद्र्य मुक्ति: "दारिद्र्यद्राविणे नमः" (श्लोक १८) — यह स्तोत्र आर्थिक तंगी को जड़ से मिटाने वाला है।
  • पारिवारिक सुख (Kutumbha Vriddhi): श्लोक २६ में स्पष्ट कहा गया है कि यह 'कुटुम्बवृद्धि' प्रदान करता है और घर में शांति लाता है।
  • नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा: "भूतग्रहोच्चाटनाय" (श्लोक १७) — यह ऊपरी बाधाओं, बुरी नजर और तंत्र-बाधाओं (अभिचार) को नष्ट करता है।
  • आरोग्य और देह-दृढ़ता: "देहदार्ढ्याभिपोषाय" (श्लोक १९) — यह शरीर को बलवान और रोगों से मुक्त (सर्वव्याधिहराय) रखता है।
  • मानसिक शांति: 'चित्तसन्तोषकारिणे' स्वरूप का स्मरण अवसाद और तनाव को दूर कर परम संतोष प्रदान करता है।
  • लक्ष्मी कृपा: चूंकि अनघदेव सदा अनघा लक्ष्मी के साथ रहते हैं, अतः इस पाठ से लक्ष्मी का सानिध्य सहज ही प्राप्त हो जाता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method)

अनघदेव की साधना में सरलता और मिठास का विशेष महत्व है। इस स्तोत्र को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित विधि अनुशंसित है:

साधना के मुख्य अंग

  • शुभ दिन: मार्गशीर्ष मास की 'अनघ अष्टमी' (Anagha Ashtami) इस पाठ के लिए सर्वोत्तम है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक गुरुवार (Thursday) को पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • विशेष नैवेद्य: श्लोक २६ के अनुसार, अनघदेव 'गुडपानक' (Jaggery Water) और 'पञ्चकर्ज' (पाँच प्रकार के सूखे मेवे/खाद्य) से प्रसन्न होते हैं। गुड़ का शरबत उन्हें अवश्य अर्पित करें।
  • दिशा और आसन: पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करें। पीले रंग के ऊनी या कुशा के आसन पर बैठें।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। भस्म या गोपीचंदन का तिलक लगाएं।
  • ध्यान: भगवान अनघदेव और माता अनघा लक्ष्मी का ध्यान करें, जो कमल के पुष्प पर विराजित हैं और जिनके हाथ अभय मुद्रा में हैं।

संकल्प साधना

यदि जीवन में कोई बड़ा संकट हो, तो २१ दिनों तक प्रतिदिन ११ बार इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' मंत्र का जाप करना फल की तीव्रता को कई गुना बढ़ा देता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)

1. अनघदेव और दत्तात्रेय में क्या अंतर है?

तात्विक रूप से दोनों एक ही हैं। दत्तात्रेय जब अपनी शक्ति 'अनघा लक्ष्मी' के साथ गृहस्थ और करुणा के रूप में प्रकट होते हैं, तो उन्हें 'अनघदेव' कहा जाता है। यह उनका भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाला स्वरूप है।

2. 'अनघा' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

'न अघ इति अनघा' — जिसमें कोई दोष या पाप न हो, वह अनघा है। यह स्वरूप आत्मा की उस परम शुद्धि को दर्शाता है जहाँ पहुँचने के बाद मनुष्य को कोई दुख नहीं व्यापता।

3. क्या इस स्तोत्र का पाठ कर्ज मुक्ति के लिए किया जा सकता है?

जी हाँ, श्लोक १८ में उन्हें 'दारिद्र्यद्राविणे' (दरिद्रता को भगाने वाला) कहा गया है। श्रद्धापूर्वक नियमित पाठ ऋण से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।

4. 'गुडपानक' का क्या महत्व है?

अनघदेव को गुड़ का जल (शरबत) अत्यंत प्रिय है (श्लोक २६ - गुडपानकतोषिणे)। यह शीतलता और मिठास का प्रतीक है, जो जीवन की कड़वाहट को दूर करता है।

5. क्या स्त्रियाँ अनघदेव की साधना कर सकती हैं?

बिल्कुल। माता अनघा स्वयं शक्ति का स्वरूप हैं, इसलिए स्त्रियों के लिए यह साधना सौभाग्य, संतान सुख और अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाली मानी गई है।

6. अनघ अष्टमी व्रत कब आता है?

यह व्रत मुख्य रूप से मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है। इस दिन अनघदेव और अनघा लक्ष्मी की पूजा का अनंत गुना फल मिलता है।

7. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

सामान्य भक्ति भाव से पाठ करने के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि आप इसमें आए 'बीज मंत्रों' का विशेष अनुष्ठान करना चाहते हैं, तो दत्त सम्प्रदाय के किसी गुरु का मार्गदर्शन लेना श्रेयस्कर है।

8. 'त्रिविधाघ' (श्लोक १) क्या हैं?

त्रिविध अघ का अर्थ है— आध्यात्मिक (स्वयं के शरीर-मन के दुख), आधिभौतिक (अन्यों या परिस्थितियों से प्राप्त दुख), और आधिदैविक (प्रकृति या ग्रहों द्वारा प्राप्त दुख)। अनघदेव इन तीनों को नष्ट करते हैं।

9. पाठ के लिए सबसे उत्तम समय क्या है?

सूर्योदय का समय (ब्रह्म मुहूर्त) सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा गोधूलि बेला (सायंकाल) में भी पाठ करना अत्यंत प्रभावी होता है।

10. क्या यह पाठ घर की कलह दूर कर सकता है?

हाँ, अनघदेव का स्वरूप ही 'चित्तसन्तोष' और 'कुटुम्बवृद्धि' का है। जिस घर में अनघ-अनघा का स्मरण होता है, वहाँ कलह समाप्त होकर प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।