Logoपवित्र ग्रंथ

Shri Durga Stotram (Brahmavaivarta Purana) – श्रीदुर्गास्तोत्रम्

Shri Durga Stotram (Brahmavaivarta Purana) – श्रीदुर्गास्तोत्रम्
॥ श्रीदुर्गास्तोत्रम् (ब्रह्मवैवर्ते) ॥ श्रीगणेशाय नमः । श्रीदुर्गायै नमः । नारायण उवाच । पुरा स्तुता सा गोलोके कृष्णेन परमात्मना । सम्पूज्य मधुमासे च संप्रीते रासमण्डले ॥ १॥ मधुकैटभयोर्युद्धे द्वितीये विष्णुना पुरा । तत्रैव काले सा दुर्गा ब्रह्मणा प्राणसङ्कटे ॥ २॥ चतुर्थे संस्तुता देवी भक्त्या च त्रिपुरारिणा । पुरा त्रिपुरयुद्धे च महाघोरतरे मुने ॥ ३॥ पञ्चमे संस्तुता देवी वृत्रासुरवधे तथा । शक्रेण सर्वदेवैश्च घोरे च प्राणसङ्कटे ॥ ४॥ तदा मुनीन्द्रैर्मनुभिर्मानवैः सुरथादिभिः । संस्तुता पूजिता सा च कल्पे कल्पे परात्परा ॥ ५॥ स्तोत्रञ्च श्रूयतां ब्रह्मन्सर्वविघ्नविनाशकम् । सुखदं मोक्षदं सारं भवसन्तारकारणम् ॥ ६॥ श्रीकृष्ण उवाच । त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी । त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका ॥ ७॥ कार्य्यार्थे सगुणा त्वञ्च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम् । परब्रह्मस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी ॥ ८॥ तेजस्स्वरूपा परमा भक्तानुग्रविग्रहा । सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा ॥ ९॥ सर्वबीजस्वरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया । सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमङ्गलमङ्गला ॥ १०॥ सर्वबुद्धिस्वरूपा च सर्वशक्तिस्वरूपिणी । सर्वज्ञानप्रदा देवी सर्वज्ञा सर्वभाविनी ॥ ११॥ त्वं स्वाहा देवदाने च पितृदाने स्वधा स्वयम् । दक्षिणा सर्वदाने च सर्वशक्तिस्वरूपिणी ॥ १२॥ निद्रा त्वं च दया त्वं च तृष्णा त्वं चात्मनः प्रिया । क्षुत्क्षान्तिः शान्तिरीशा च कान्तिः सृष्टिश्च शाश्वती ॥ १३॥ श्रद्धा पुष्टिश्च तन्द्रा च लज्जा शोभा दया तथा । सतां सम्पत्स्वरूपा श्रीर्विपत्तिरसतामिह ॥ १४॥ प्रीतिरूपा पुण्यवतां पापिनां कलहाङ्कुरा । शश्वत्कर्ममयी शक्तिः सर्वदा सर्वजीविनाम् ॥ १५॥ देवेभ्यः स्वपदोदात्री धातुर्धात्री कृपामयी । हिताय सर्वदेवानां सर्वासुरविनाशिनी ॥ १६॥ योगिनिद्रा योगरूपा योगदात्री च योगिनाम् । सिद्धिस्वरूपा सिद्धानां सिद्धिदा सिद्धयोगिनी ॥ १७॥ ब्रह्माणी माहेश्वरी च विष्णुमाया च वैष्णवी । भद्रदा भद्रकाली च सर्वलोकभयङ्करी ॥ १८॥ ग्रामे ग्रामे ग्रामदेवी गृहदेवी गृहे गृहे । सतां कीर्त्तिः प्रतिष्ठा च निन्दा त्वमसतां सदा ॥ १९॥ महायुद्धे महामारी दुष्टसंहाररूपिणी । रक्षास्वरूपा शिष्टानां मातेव हितकारिणी ॥ २०॥ वन्द्या पूज्या स्तुता त्वं च ब्रह्मादीनां च सर्वदा । ब्राह्मण्यरूपा विप्राणां तपस्या च तपस्विनाम् ॥ २१॥ विद्या विद्यावतां त्वं च बुद्धिर्बुद्धिमतां सताम् । मेधा स्मृतिस्वरूपा च प्रतिभा प्रतिभावताम् ॥ २२॥ राज्ञां प्रतापरूपा च विशां वाणिज्यरूपिणी । सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा त्वं रक्षारूपा च पालने ॥ २३॥ तथाऽन्ते त्वं महामारी विश्वे विश्वैश्च पूजिते । कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च मोहिनी ॥ २४॥ दुरत्यया मे माया त्वं यया सम्मोहितं जगत् । यया मुग्धो हि विद्वांश्च मोक्षमार्गं न पश्यति ॥ २५॥ इत्यात्मना कृतं स्तोत्रं दुर्गाया दुर्गनाशनम् । पूजाकाले पठेद्यो हि सिद्धिर्भवति वाञ्छिता ॥ २६॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ वन्ध्या च काकवन्ध्या च मृतवत्सा च दुर्भगा । श्रुत्वा स्तोत्रं वर्षमेकं सुपुत्रं लभते धुवम् ॥ २७॥ कारागारे महाघोरे यो बद्धो दृढबन्धने । श्रुत्वा स्तोत्रं मासमेकं बन्धनान्मुच्यते धुवम् ॥ २८॥ यक्ष्मग्रस्तो गलत्कुष्ठी महाशूली महाज्वरी । श्रुत्वा स्तोत्रं वर्षमेकं सद्यो रोगात्प्रमुच्यते ॥ २९॥ पुत्रभेदे प्रजाभेदे पत्नीभेदे च दुर्गतः । श्रुत्वा स्तोत्रं मासमेकं लभते नात्र संशयः ॥ ३०॥ राजद्वारे श्मशाने च महारण्ये रणस्थले । हिंस्रजन्तुसमीपे च श्रुत्वा स्तोत्रं प्रमुच्यते ॥ ३१॥ गृहदाहे च दावाग्नौ दस्युसैन्यसमन्विते । स्तोत्रश्रवणमात्रेण लभते नात्र संशयः ॥ ३२॥ महादरिद्रो मूर्खश्च वर्षं स्तोत्रं पठेत्तु यः । विद्यावान्धनवांश्चैव स भवेन्नात्र संशयः ॥ ३३॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे द्वितीये प्रकृतिखण्डे नारदनारायणसंवादे दुर्गोपाख्याने दुर्गास्तोत्रं नाम षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥

श्रीदुर्गास्तोत्रम्: पौराणिक पृष्ठभूमि एवं महत्व (Mythological Background & Significance)

श्रीदुर्गास्तोत्रम् 18 महापुराणों में से एक, श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण के द्वितीय (प्रकृति) खण्ड के 66वें अध्याय से लिया गया है। यह स्तोत्र नारद और नारायण ऋषि के बीच हुए संवाद का एक अंश है, जिसमें नारायण ऋषि देवर्षि नारद को देवी दुर्गा की महिमा बताते हैं।

स्तोत्र की उत्पत्ति: श्लोक 1 से 5 में नारायण ऋषि बताते हैं कि इस स्तुति का प्रयोग किसने और कब-कब किया। सर्वप्रथम गोलोक में रासमण्डल के भीतर परमात्मा श्रीकृष्ण ने मधुमास (चैत्र) में देवी की स्तुति की। तत्पश्चात् मधु-कैटभ के भय से ब्रह्मा जी ने, त्रिपुरासुर के साथ युद्ध में भगवान शिव (त्रिपुरारि) ने, और वृत्रासुर वध के समय इन्द्र ने इसी स्तुति का आश्रय लिया था। यह दर्शाता है कि यह स्तोत्र स्वयं त्रिदेवों द्वारा प्रमाणित और परीक्षित है।

मूल प्रकृति की वंदना: श्लोक 7 से भगवान कृष्ण द्वारा की गई मूल स्तुति आरम्भ होती है। इसमें देवी को 'सर्वजननी', 'मूलप्रकृतिरीश्वरी' और 'परब्रह्मस्वरूपा' कहा गया है। यह शाक्त दर्शन का मूल सिद्धांत है, जहाँ देवी को ही इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आदि कारण माना जाता है। वे ही अपनी इच्छा से त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) होकर सृष्टि की रचना, पालन और संहार करती हैं।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance)

यह स्तोत्र देवी के सर्वव्यापी और सर्व-स्वरूपा होने के सिद्धांत को अत्यंत सरल शब्दों में स्थापित करता है।

  • दैवीय एवं मानवीय गुणों का स्रोत: देवी ही देवताओं के लिए 'स्वाहा' और पितरों के लिए 'स्वधा' हैं। वे ही निद्रा, दया, तृष्णा, क्षुधा, शांति और कान्ति हैं। श्लोक 14 में कहा गया है—"सतां सम्पत्स्वरूपा श्रीर्विपत्तिरसतामिह" — वे सत्पुरुषों के लिए संपत्ति (श्री) हैं और दुष्टों के लिए विपत्ति का कारण हैं।
  • संरक्षक और संहारक स्वरूप: देवी 'दुष्टसंहाररूपिणी' हैं, लेकिन साथ ही वे 'रक्षास्वरूपा शिष्टानां मातेव हितकारिणी' भी हैं। वे शिष्ट (सज्जन) लोगों की रक्षा करने वाली और माता के समान हित करने वाली हैं।
  • सर्वत्र उपस्थिति: श्लोक 19 के अनुसार, वे 'ग्रामे ग्रामे ग्रामदेवी गृहदेवी गृहे गृहे' हैं। हर गाँव की ग्रामदेवी और हर घर की कुलदेवी/गृहदेवी के रूप में वे ही पूजित होती हैं।
  • कृष्ण की योगमाया: अंतिम श्लोक (25) में स्वयं भगवान कृष्ण कहते हैं—"दुरत्यया मे माया त्वं" — "आप मेरी ही वह माया हैं, जिससे पार पाना कठिन है और जिससे मोहित होकर विद्वान भी मोक्ष मार्ग नहीं देख पाते।" यह स्तोत्र विष्णुमाया के बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले अचूक लाभ (Guaranteed Benefits)

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 27-33) अत्यंत विशिष्ट और गृहस्थ जीवन की समस्याओं के निवारण पर केंद्रित है, जिसके कारण यह बहुत लोकप्रिय है:

  • संतान प्राप्ति का वरदान: श्लोक 27 में स्पष्ट कहा गया है कि यदि वन्ध्या (बाँझ), काकवन्ध्या (एक ही संतान वाली) या मृतवत्सा (जिसकी संतानें जीवित न रहती हों) स्त्री एक वर्ष तक इस स्तोत्र का श्रवण करे, तो उसे निश्चित रूप से पुत्र की प्राप्ति होती है।
  • बंधन से मुक्ति (Release from Prison): श्लोक 28 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जेल (कारागार) में दृढ बंधन में बंधा हो, तो एक माह तक इस स्तोत्र का पाठ सुनने से वह बंधन से मुक्त हो जाता है।
  • असाध्य रोगों का नाश: 'यक्ष्मग्रस्तो गलत्कुष्ठी महाशूली महाज्वरी' (श्लोक 29) — अर्थात् टी.बी., गलने वाला कोढ़, पेट के असहनीय दर्द या पुराने बुखार से पीड़ित व्यक्ति एक वर्ष तक पाठ सुने, तो वह रोग से मुक्त हो जाता है।
  • पारिवारिक क्लेश की समाप्ति: यदि किसी के घर में पुत्र, प्रजा (कर्मचारी) या पत्नी से अलगाव (भेद) हो गया हो, तो एक माह पाठ सुनने से वह क्लेश समाप्त हो जाता है (श्लोक 30)।
  • दरिद्रता और मूर्खता का नाश: जो महादरिद्र या मूर्ख व्यक्ति एक वर्ष तक इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह निश्चित ही विद्यावान और धनवान बनता है (श्लोक 33)।
  • सर्वत्र रक्षा: राजद्वार, श्मशान, जंगल, युद्धभूमि, और हिंसक जंतुओं के भय से यह स्तोत्र सुनने मात्र से रक्षा होती है (श्लोक 31-32)।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method & Guidelines)

इस स्तोत्र की फलश्रुति में 'पाठ करने' और 'सुनने' दोनों का बराबर महत्व बताया गया है, जो इसकी एक अनूठी विशेषता है।

श्रवण विधि (Method of Listening): जो व्यक्ति स्वयं पाठ नहीं कर सकते, वे भी इसका पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते हैं। वे प्रतिदिन पवित्र होकर देवी के चित्र के सामने बैठें और किसी अन्य व्यक्ति (पंडित या परिवारजन) से इसका पाठ करवाकर सुनें। या फिर किसी प्रामाणिक रिकॉर्डिंग को श्रद्धापूर्वक सुनें।

अनुष्ठान विधि: फलश्रुति में विभिन्न कामनाओं के लिए 'एक वर्ष' या 'एक मास' का अनुष्ठान बताया गया है। साधक को अपनी कामना के अनुसार संकल्प लेकर उतने समय तक प्रतिदिन पाठ करना या सुनना चाहिए। ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार का पालन करने से फल शीघ्र मिलता है।

नित्य पूजा: श्लोक 26 में कहा गया है—'पूजाकाले पठेद्यो हि सिद्धिर्भवति वाञ्छिता'। नित्य देवी की पूजा के समय इसका पाठ करने से सभी वांछित सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह दुर्गा स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?
यह ब्रह्मवैवर्त महापुराण के द्वितीय खण्ड ('प्रकृति खण्ड') के 66वें अध्याय से लिया गया है।
2. इस स्तोत्र की रचना मूलतः किसने की?
पुराण के अनुसार, यह स्तोत्र सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण ने गोलोक में रचा था। नारायण ऋषि ने इसे नारद जी को सुनाया।
3. क्या यह स्तोत्र संतान प्राप्ति के लिए प्रभावी है?
जी हाँ। फलश्रुति में स्पष्ट रूप से 'वन्ध्या', 'काकवन्ध्या' और 'मृतवत्सा' स्त्रियों के लिए एक वर्ष तक पाठ सुनने से निश्चित पुत्र प्राप्ति का विधान बताया गया है।
4. 'काकवन्ध्या' किसे कहते हैं?
'काकवन्ध्या' उस स्त्री को कहते हैं जिसे जीवन में केवल एक ही संतान की प्राप्ति हुई हो और उसके बाद संतान न हो रही हो।
5. क्या जेल से मुक्ति के लिए इसका पाठ किया जा सकता है?
हाँ। श्लोक 28 के अनुसार, यदि कोई घोर कारागार में बंद हो, तो एक माह तक इस स्तोत्र का श्रवण करने से वह बंधन मुक्त हो जाता है।
6. क्या यह रोग नाश में सहायक है?
यह स्तोत्र यक्ष्मा (टी.बी.), कुष्ठ (कोढ़), शूल (पेट दर्द) और पुराने ज्वर (बुखार) जैसे असाध्य रोगों के नाश के लिए भी सिद्ध बताया गया है।
7. क्या केवल सुनने से भी पूरा फल मिलता है?
हाँ, इस स्तोत्र की फलश्रुति में 'पाठ करने' और 'श्रवण करने' दोनों का समान फल बताया गया है, जो इसकी एक बड़ी विशेषता है।
8. 'ग्रामदेवी' और 'गृहदेवी' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि हर गाँव की रक्षा करने वाली शक्ति (ग्रामदेवी) और हर घर की रक्षा करने वाली कुलदेवी (गृहदेवी) भी माँ दुर्गा का ही स्वरूप हैं।
9. क्या यह विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी है?
हाँ। श्लोक 33 के अनुसार, जो मूर्ख व्यक्ति भी एक वर्ष तक इसका पाठ करता है, वह 'विद्यावान' (विद्वान) बन जाता है। देवी 'विद्या', 'बुद्धि', 'मेधा' और 'प्रतिभा' का स्वरूप हैं।
10. इस स्तोत्र को कब पढ़ना चाहिए?
इसे नित्य पूजा के समय (पूजाकाले पठेत्) पढ़ना चाहिए। नवरात्रि, अष्टमी और शुक्रवार के दिन इसका पाठ विशेष शुभ होता है।