Logoपवित्र ग्रंथ

Shri Bhagwati Stotra (Vyasa Kritam) – श्री भगवती स्तोत्र

Shri Bhagwati Stotra (Vyasa Kritam) – श्री भगवती स्तोत्र
॥ श्री भगवती स्तोत्र (व्यासकृतम्) ॥ जय भगवति देवि नमो वरदे, जय पापविनाशिनी बहुफलदे । जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे, प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ॥ १॥ जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे, जय पावकभूषितवक्त्रवरे । जय भैरवदेहनिलीनपरे, जय अन्धकदैत्यविशोषकरे ॥ २॥ जय महिषविमर्दिनि शूलकरे, जय लोकसमस्तकपापहरे । जय भगवति देवि नमो वरदे, जय पापविनाशिनी बहुफलदे ॥ ३॥ जय षण्मुखसायुधईशनुते, जय सागरगामिनि शम्भुनुते । जय दुःखदरिद्रविनाशकरे, जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे ॥ ४॥ जय भगवति देवि नमो वरदे, जय पापविनाशिनी बहुफलदे । जय देवि समस्तशरीरधरे, जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे ॥ ५॥ जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे, जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे । जय भगवति देवि नमो वरदे, जय पापविनाशिनी बहुफलदे ॥ ६॥ ॥ फलश्रुति ॥ एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचिः । गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ॥ ७॥ ॥ इति श्रीव्यासकृतं भगवतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री भगवती स्तोत्र: परिचय एवं महात्म्य (Introduction & Significance)

हिंदू धर्म ग्रंथों में माँ आदिशक्ति की स्तुति के लिए अनेक स्तोत्रों की रचना की गई है, जिनमें से श्री भगवती स्तोत्र का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। इस स्तोत्र की रचना महाभारत और पुराणों के रचयिता भगवान वेदव्यास जी ने की है। यह स्तोत्र अपनी सरलता, लयात्मकता और प्रभावकारिता के कारण जन-जन में अत्यंत लोकप्रिय है। विशेषकर नवरात्रि के दिनों में और देवी के मंदिरों में आरती के बाद इस स्तोत्र का सामूहिक गान एक दिव्य वातावरण का निर्माण करता है।

'भगवती' शब्द का अर्थ: 'भगवती' वह देवी हैं जो 'भग' अर्थात् छह प्रकार के ऐश्वर्यों (समग्र धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य और मोक्ष) से पूर्ण हैं। व्यास जी ने इस स्तोत्र में देवी को वरदायिनी (वर देने वाली), पापविनाशिनी (पापों को धोने वाली) और बहुफलदा (अनेक प्रकार के शुभ फल देने वाली) कहकर संबोधित किया है।

स्तोत्र की संरचना: यह स्तोत्र कुल 7 श्लोकों का है (6 मुख्य श्लोक और 1 फलश्रुति)। प्रत्येक श्लोक में देवी के विभिन्न स्वरूपों—जैसे महिषासुरमर्दिनी, शुम्भ-निशुम्भ संहारिणी, और रोग-शोक नाशिनी—का वर्णन किया गया है। इसकी भाषा अत्यंत प्रांजल और गेय (Gey - गाने योग्य) संस्कृत है, जिसे कोई भी साधारण भक्त आसानी से याद कर सकता है।

स्तोत्र का भावार्थ और विशिष्ट महत्व (Meaning & Specific Significance)

इस स्तोत्र में व्यास जी ने देवी के उग्र और सौम्य दोनों रूपों का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत किया है।

  • असुर संहारक रूप: प्रथम और द्वितीय श्लोक में देवी को 'शुम्भनिशुम्भकपालधरे' (शुम्भ और निशुम्भ के कपाल को धारण करने वाली) और 'अन्धकदैत्यविशोषकरे' (अन्धकासुर का शोषण/नाश करने वाली) कहा गया है। यह दर्शाता है कि देवी बुराई और अहंकार का नाश करने वाली सर्वोच्च शक्ति हैं।
  • ब्रह्मांडीय स्वरूप: दूसरे श्लोक में 'चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे' का उल्लेख है, जिसका अर्थ है कि सूर्य और चंद्रमा जिनके नेत्र हैं। यह देवी के विराट् स्वरूप को दर्शाता है। साथ ही वे 'पावकभूषितवक्त्रवरे' हैं, अर्थात् जिनका मुखमंडल अग्नि के समान तेजस्वी है।
  • दुःख और दरिद्रता का नाश: चौथे श्लोक में देवी को 'दुःखदरिद्रविनाशकरे' कहा गया है। यह पंक्ति इस स्तोत्र को गृहस्थों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि यह आर्थिक कष्टों और मानसिक संतापों को दूर करने का आश्वासन देती है।
  • पारिवारिक सुख: उसी श्लोक में 'पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे' का वरदान है। 'पुत्र' का अर्थ संतान और 'कलत्र' का अर्थ जीवनसाथी (पत्नी/पति) है। यह स्तोत्र वंश वृद्धि और दांपत्य सुख को बढ़ाने वाला है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ (Benefits of Recitation)

स्वयं महर्षि व्यास ने अंतिम श्लोक में इस स्तोत्र के पाठ का फल बताया है। इसके नियमित पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • रोग और व्याधि से मुक्ति: छठे श्लोक में स्पष्ट कहा गया है—'जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे'। यह स्तोत्र गंभीर से गंभीर शारीरिक रोगों और मानसिक व्याधियों को नष्ट कर स्वास्थ्य प्रदान करता है।
  • पाप नाश और चित्त शुद्धि: स्तोत्र की टेक ही है—'जय पापविनाशिनी'। इसके पाठ से पूर्व जन्मों और इस जन्म के संचित पाप कट जाते हैं, जिससे मन पवित्र और शांत होता है।
  • दरिद्रता निवारण: जो साधक आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं, उनके लिए यह 'चिंतामणि' के समान है। यह घर से अलक्ष्मी (दरिद्रता) को दूर कर सुख-समृद्धि लाता है।
  • मनोकामना पूर्ति (Siddhi): देवी को 'वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे' कहा गया है। यह स्तोत्र धर्म सम्मत सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला और अष्टसिद्धियाँ प्रदान करने वाला है।
  • भगवती की प्रसन्नता: फलश्रुति के अनुसार, 'प्रीता भगवती सदा'—जो शुद्ध भाव से इसका पाठ करता है, उस पर माँ भगवती सदैव प्रसन्न रहती हैं और उसकी रक्षा करती हैं।

पाठ विधि और नियम (Ritual Method & Guidelines)

अंतिम श्लोक में व्यास जी ने पाठ की शर्त बताई है—'यः पठेन्नियतः शुचिः'। अर्थात्, नियमपूर्वक और पवित्र होकर ही इसका पाठ करना चाहिए।

दैनिक पाठ विधि: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थल में माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएं। कुमकुम या लाल चंदन से तिलक करें। फिर शुद्ध आसन पर बैठकर एकाग्र मन से इस स्तोत्र का पाठ करें।

नवरात्रि और विशेष अवसर: नवरात्रि के नौ दिनों में, अष्टमी या नवमी तिथि को, और प्रत्येक शुक्रवार को इस स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी होता है। यदि घर में क्लेश या बीमारी हो, तो नियमित रूप से सुबह-शाम 11 बार इस स्तोत्र का पाठ करने से चमत्कारिक लाभ मिलता है।

समर्पण भाव: फलश्रुति में 'शुद्धभावेन' शब्द आया है। इसका अर्थ है कि कपट रहित और सच्चे मन से की गई प्रार्थना ही माँ तक पहुँचती है। शब्दों के उच्चारण के साथ-साथ हृदय में भक्ति भाव होना अनिवार्य है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री भगवती स्तोत्र की रचना किसने की है?
इस प्रसिद्ध स्तोत्र की रचना महर्षि वेदव्यास जी ने की है। इसका प्रमाण अंतिम श्लोक में मिलता है जहाँ लिखा है—'एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं'
2. 'जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि माँ भगवती ने शुम्भ और निशुम्भ नामक महाशक्तिशाली असुरों का वध किया और उनके सिर (कपाल) को धारण किया। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
3. क्या इस स्तोत्र से बीमारियों में लाभ मिलता है?
जी हाँ। श्लोक 6 में स्पष्ट रूप से 'जय व्याधिविनाशिनि' कहा गया है। श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से पुरानी और गंभीर बीमारियों में भी सुधार होता है और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
4. 'पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे' का क्या तात्पर्य है?
पुत्र का अर्थ है संतान और कलत्र का अर्थ है पत्नी (या जीवनसाथी)। इस पंक्ति का अर्थ है कि देवी संतान सुख और दांपत्य जीवन में वृद्धि और खुशहाली प्रदान करती हैं।
5. इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इसे नित्य प्रतिदिन प्रातः और सायं पूजा के समय किया जा सकता है। विशेष रूप से नवरात्रि, शुक्रवार और मंगलवार को इसका पाठ करना अति उत्तम माना गया है।
6. 'नरार्तिहरे' शब्द का क्या अर्थ है?
'नर' मतलब मनुष्य और 'आरति' मतलब कष्ट या पीड़ा। 'नरार्तिहरे' का अर्थ है मनुष्यों के समस्त कष्टों और पीड़ाओं को हरने वाली देवी।
7. क्या यह दुर्गा सप्तशती का हिस्सा है?
यद्यपि यह दुर्गा सप्तशती के मूल 700 श्लोकों का हिस्सा नहीं है, लेकिन इसे अक्सर सप्तशती पाठ के साथ या आरती के रूप में परिशिष्ट के तौर पर पढ़ा जाता है। यह एक स्वतंत्र और पूर्ण स्तोत्र है।
8. 'अन्धकदैत्यविशोषकरे' का संदर्भ क्या है?
अन्धकासुर एक मायावी दैत्य था। भगवान शिव और देवी ने मिलकर उसका वध किया था। 'विशोषकरे' का अर्थ है उसका रक्त सुखा देने वाली या उसका अंत करने वाली।
9. 'बहुफलदे' का क्या अभिप्राय है?
बहुफलदे का अर्थ है 'बहुत प्रकार के फल देने वाली'। देवी केवल एक चीज नहीं देतीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ प्रदान करती हैं।
10. क्या बिना स्नान किए इसका पाठ कर सकते हैं?
नहीं। अंतिम श्लोक में 'शुचिः' (पवित्र) शब्द का प्रयोग हुआ है। मानसिक शुद्धि के साथ-साथ शारीरिक शुद्धि (स्नान) भी इस पाठ के प्रभाव के लिए आवश्यक है।