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Yudhisthira Kruta Durga Stotram – श्री दुर्गा स्तोत्रम् (युधिष्ठिर कृतम्) | Mahabharata

Yudhisthira Kruta Durga Stotram – श्री दुर्गा स्तोत्रम् (युधिष्ठिर कृतम्) | Mahabharata
॥ श्री दुर्गा स्तोत्रम् (युधिष्ठिर कृतम्) ॥ विराटनगरं रम्यं गच्छमानो युधिष्ठिरः । अस्तुवन्मनसा देवीं दुर्गां त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ १ ॥ यशोदागर्भसम्भूतां नारायणवरप्रियाम् । नन्दगोपकुले जातां मङ्गल्यां कुलवर्धिनीम् ॥ २ ॥ कंसविद्रावणकरीमसुराणां क्षयङ्करीम् । शिलातटविनिक्षिप्तामाकाशं प्रति गामिनीम् ॥ ३ ॥ वासुदेवस्य भगिनीं दिव्यमाल्यविभूषिताम् । दिव्याम्बरधरां देवीं खड्गखेटकधारिणीम् ॥ ४ ॥ भारावतरणे पुण्ये ये स्मरन्ति सदाशिवाम् । तान् वै तारयते पापात् पङ्के गामिव दुर्बलाम् ॥ ५ ॥ स्तोतुं प्रचक्रमे भूयो विविधैः स्तोत्रसम्भवैः । आमन्त्र्य दर्शनाकाङ्क्षी राजा देवीं सहानुजः ॥ ६ ॥ नमोऽस्तु वरदे कृष्णे कुमारि ब्रह्मचारिणि । बालार्कसदृशाकारे पूर्णचन्द्रनिभानने ॥ ७ ॥ चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रे पीनश्रोणिपयोधरे । मयूरपिच्छवलये केयूराङ्गदधारिणि ॥ ८ ॥ भासि देवि यथा पद्मा नारायणपरिग्रहः । स्वरूपं ब्रह्मचर्यं च विशदं तव खेचरि ॥ ९ ॥ कृष्णच्छविसमा कृष्णा सङ्कर्षणसमानना । बिभ्रती विपुलौ बाहू शक्रध्वजसमुच्छ्रयौ ॥ १० ॥ पात्री च पङ्कजी घण्टी स्त्रीविशुद्धा च या भुवि । पाशं धनुर्महाचक्रं विविधान्यायुधानि च ॥ ११ ॥ कुण्डलाभ्यां सुपूर्णाभ्यां कर्णाभ्यां च विभूषिता । चन्द्रविस्पर्धिना देवि मुखेन त्वं विराजसे ॥ १२ ॥ मुकुटेन विचित्रेण केशबन्धेन शोभिना । भुजङ्गाभोगवासेन श्रोणिसूत्रेण राजता ॥ १३ ॥ विभ्राजसे चाबद्धेन भोगेनेवेह मन्दरः । ध्वजेन शिखिपिच्छानामुच्छ्रितेन विराजसे ॥ १४ ॥ कौमारं व्रतमास्थाय त्रिदिवं पावितं त्वया । तेन त्वं स्तूयसे देवि त्रिदशैः पूज्यसेऽपि च ॥ १५ ॥ त्रैलोक्यरक्षणार्थाय महिषासुरनाशिनि । प्रसन्ना मे सुरश्रेष्ठे दयां कुरु शिवा भव ॥ १६ ॥ जया त्वं विजया चैव सङ्ग्रामे च जयप्रदा । ममापि विजयं देहि वरदा त्वं च साम्प्रतम् ॥ १७ ॥ विन्ध्ये चैव नगश्रेष्ठे तव स्थानं हि शाश्वतम् । कालि कालि महाकालि शीधुमांसपशुप्रिये ॥ १८ ॥ कृतानुयात्रा भूतैस्त्वं वरदा कामचारिणी । भारावतारे ये च त्वां संस्मरिष्यन्ति मानवाः ॥ १९ ॥ प्रणमन्ति च ये त्वां हि प्रभाते तु नरा भुवि । न तेषां दुर्लभं किञ्चित् पुत्रतो धनतोऽपि वा ॥ २० ॥ दुर्गात् तारयसे दुर्गे तत् त्वं दुर्गा स्मृता जनैः । कान्तारेष्ववसन्नानां मग्नानां च महार्णवे । दस्युभिर्वा निरुद्धानां त्वं गतिः परमा नृणाम् ॥ २१ ॥ जलप्रतरणे चैव कान्तारेष्वटवीषु च । ये स्मरन्ति महादेवि न च सीदन्ति ते नराः ॥ २२ ॥ त्वं कीर्तिः श्रीर्धृतिः सिद्धिर्ह्रीर्विद्या सन्ततिर्मतिः । सन्ध्या रात्रिः प्रभा निद्रा ज्योत्स्ना कान्तिः क्षमा दया ॥ २३ ॥ नृणां च बन्धनं मोहं पुत्रनाशं धनक्षयम् । व्याधिं मृत्युं भयं चैव पूजिता नाशयिष्यसि ॥ २४ ॥ सोऽहं राज्यात्परिभ्रष्टः शरणं त्वां प्रपन्नवान् । प्रणतश्च यथा मूर्ध्ना तव देवि सुरेश्वरि ॥ २५ ॥ त्राहि मां पद्मपत्राक्षि सत्ये सत्या भवस्व नः । शरणं भव मे दुर्गे शरण्ये भक्तवत्सले ॥ २६ ॥ एवं स्तुता हि सा देवी दर्शयामास पाण्डवम् । उपगम्य तु राजानामिदं वचनमब्रवीत् ॥ २७ ॥ ॥ देव्युवाच ॥ शृणु राजन् महाबाहो मदीयं वचनं प्रभो । भविष्यत्यचिरादेव सङ्ग्रामे विजयस्तव ॥ २८ ॥ मम प्रसादान्निर्जित्य हत्वा कौरववाहिनीम् । राज्यं निष्कण्टकं कृत्वा भोक्ष्यसे मेदिनीं पुनः ॥ २९ ॥ भात्रृभिः सहितो राजन् प्रीतिं प्राप्स्यसि पुष्कलाम् । मत्प्रसादाच्च ते सौख्यमारोग्यं च भविष्यति ॥ ३० ॥ ये च सङ्कीर्तयिष्यन्ति लोके विगतकल्मषाः । तेषां तुष्टा प्रदास्यामि राज्यमायुर्वपुः सुतम् ॥ ३१ ॥ प्रवासे नगरे चापि सङ्ग्रामे शत्रुसङ्कटे । अटव्यां दुर्गकान्तारे सागरे गहने गिरौ ॥ ३२ ॥ ये स्मरिष्यन्ति मां राजन् यथाऽहं भवता स्मृता । न तेषां दुर्लभं किञ्चिदस्मिल्लोके भविष्यति ॥ ३३ ॥ इदं स्तोत्रवरं भक्त्या शृणुयाद्वा पठेत वा । तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धिं यास्यन्ति पाण्डवाः ॥ ३४ ॥ मत्प्रसादाच्च वः सर्वान्विराटनगरे स्थितान् । न प्रज्ञास्यन्ति कुरवो नरा वा तन्निवासिनः ॥ ३५ ॥ इत्युक्त्वा वरदा देवी युधिष्ठिरमरिन्दमम् । रक्षां कृत्वा च पाण्डूनां तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३६ ॥ ॥ इति श्रीमन्महाभारते विराटपर्वणि अष्टमोऽध्याये युधिष्ठिर कृत श्री दुर्गा स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का ऐतिहासिक संदर्भ (Historical Context)

महाभारत में पाण्डवों के वनवास का बहुत बड़ा हिस्सा है। 12 वर्ष वनवास पूरा करने के बाद, उन्हें 1 वर्ष 'अज्ञातवास' में बिताना था, शर्त यह थी कि यदि उन्हें किसी ने पहचान लिया, तो उन्हें फिर से 12 वर्ष के वनवास में जाना पड़ेगा। यह कठिन समय था।

विराट नगर में प्रवेश करने से ठीक पहले, धर्मराज युधिष्ठिर 'भयभीत' नहीं थे, लेकिन वे जानते थे कि दैवीय कृपा के बिना यह असम्भव कार्य सिद्ध नहीं होगा। इसलिए उन्होंने मन ही मन (अस्तुवन्मनसा) और फिर वाणी से त्रिभुवनेश्वरी दुर्गा की स्तुति की।

इसे 'आपदुद्धारक' (विपत्ति से रक्षा करने वाला) स्तोत्र भी कहा जा सकता है, क्योंकि इसने पाण्डवों को सबसे बड़े संकट से उबारा था।

श्लोकों का भावार्थ (Meaning of Verses)

1. कृष्ण की बहन और यशोदा की पुत्री (Verses 2-4)

युधिष्ठिर माँ को 'यशोदागर्भसम्भूतां' और 'वासुदेवस्य भगिनीं' (विष्णु की बहन) कहकर स्मरण करते हैं। यह वही शक्ति है जिसे कंस ने पत्थर पर पटका था, लेकिन वह 'आकाशं प्रति गामिनीम्' (आकाश में चली गई) और अष्टभुजा रूप में प्रकट हो गई। वे असुरों का नाश करने वाली (कंसविद्रावणकरी) हैं।

2. दुर्गा नाम का रहस्य (Verse 21)

दुर्गात् तारयसे दुर्गे तत् त्वं दुर्गा स्मृता जनैः ।

यह श्लोक 'दुर्गा' नाम की परिभाषा देता है। "हे माँ! आप 'दुर्ग' (कठिनाइयों/दुखों) से तारती हैं, इसीलिए भक्त आपको 'दुर्गा' कहते हैं।" आप ही घने जंगलों (कान्तारेषु) और महान समुद्र (महार्णवे) में भटके हुए लोगों की एकमात्र गति हैं।

3. सर्वस्वरूपिणी (Verse 23)

युधिष्ठिर मानते हैं कि संसार की सभी शुभ स्थितियां माँ का ही रूप हैं: कीर्ति (Fame), श्री (Wealth), धृति (Patience/Courage), सिद्धि (Success), विद्या (Knowledge), मति (Intellect), संध्या, रात्रि, प्रभा, निद्रा, और दया सब कुछ वही हैं।

4. देवी का आश्वासन (Verses 28-36)

युधिष्ठिर की स्तुति सुनकर देवी साक्षात् प्रकट हुईं। उन्होंने कहा - "हे महाबाहु राजन! शीघ्र ही तुम कौरव सेना को जीतकर निष्कंटक राज्य भोगोगे। मेरे प्रसाद से विराट नगर में कोई भी तुम्हें पहचान नहीं पाएगा।" देवी ने उनकी रक्षा का दायित्व लिया और अंतर्ध्यान हो गईं।

स्तोत्र के लाभ (Benefits)

गुमशुदगी या अज्ञात भय

अगर कोई व्यक्ति खो गया हो, या आपको अपने ही घर/समाज में भय लग रहा हो, तो यह 'अज्ञातवास' को सुखद बनाने वाला स्तोत्र कवच की तरह काम करता है।

शत्रु से रक्षा

देवी कहती हैं - 'विजया चैव संग्रामे' (मैं संग्राम में विजय देने वाली हूँ)। यह शत्रुओं के षड्यंत्र को विफल करने में अचूक है।

राजयोग और धन

देवी ने युधिष्ठिर को खोया हुआ राज्य वापस मिलने का वरदान दिया। इसलिए जो पद-प्रतिष्ठा खो चुके हैं, उनके लिए यह स्तोत्र बहुत शुभ है।

सर्वकार्य सिद्धि

श्लोक 34 में स्पष्ट है - 'तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धिं यास्यन्ति'। भक्त के सभी रुके हुए कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. युधिष्ठिर ने यह स्तोत्र कब पढ़ा?

जब पाण्डव 12 वर्ष के वनवास के बाद 1 वर्ष के 'अज्ञातवास' (जहाँ छिपकर रहना था) के लिए विराट नगर में प्रवेश कर रहे थे, तब युधिष्ठिर ने सुरक्षा के लिए यह स्तुति की।

2. माँ दुर्गा ने पाण्डवों को क्या वरदान दिया?

माँ ने वरदान दिया कि 'विराट नगर में रहते हुए न तो कौरव तुम्हें पहचान पाएंगे और न ही वहां के निवासी। तुम अपना अज्ञातवास निर्विघ्न पूरा करोगे।'

3. क्या यह स्तोत्र संकट निवारण के लिए प्रभावी है?

अत्यंत प्रभावी। जो व्यक्ति घने जंगल, समुद्र, या चोर-डाकुओं (शत्रुओं) से घिरा हो, वह यदि इसका स्मरण करे तो 'न च सीदन्ति ते नराः' (वह कभी दुखी नहीं होता)।

4. 'महिषासुरनाशिनि' और 'कंसविद्रावणकरी' का क्या अर्थ है?

युधिष्ठिर माँ को महिषासुर का वध करने वाली और कंस के हृदय में भय उत्पन्न करने वाली (योगमाया) के रूप में याद करते हैं, जो कृष्ण की रक्षा के लिए गोकुल गई थीं।

5. श्लोक 12 में 'चन्द्रविस्पर्धिना' का क्या भाव है?

इसका अर्थ है कि माँ का मुख इतना सौम्य और शीतल है कि वह सुंदरता और शीतलता में चंद्रमा से भी स्पर्धा (Competition) करता है।

6. इस स्तोत्र में माँ के कौन से आयुध वर्णित हैं?

श्लोक 11 में पाश (Noose), धनुष (Bow), और महाचक्र का वर्णन है। माँ विभिन्न आयुधों को धारण करती हैं।

7. फलश्रुति के अनुसार क्या लाभ मिलता है?

जो इसका पाठ करता है, उसे राज्य, आयु, सुंदर शरीर और संतान सुख की प्राप्ति होती है (राज्यमायुर्वपुः सुतम्)।