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Shri Chamunda Stotram (Skanda Purana) – श्रीचामुण्डास्तोत्रम् (गरुड़ कृत)

Shri Chamunda Stotram (Skanda Purana) – श्रीचामुण्डास्तोत्रम् (गरुड़ कृत)
॥ श्रीचामुण्डास्तोत्रम् (स्कन्दपुराणे) ॥ ॥ विनियोगः ॥ श्रीगणेशाय नमः । श्रीभैरवाय नमः । श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः । श्रीमार्कण्डेय उवाच - ततो गच्छेन्महीपाल तीर्थं कनखलोत्तमम् । गरुडेन तपस्तप्तं पूजयित्वा महेश्वरम् ॥ १॥ दिव्यं वर्षशतं यावज्जातमात्रेण भारत । तपोजपैः कृशीभूतो दृष्टो देवेन शम्भुना ॥ २॥ ततस्तुष्टो महादेवो वैनतेयं मनोजवम् । उवाच परमं वाक्यं विनतानन्दवर्धनम् ॥ ३॥ प्रसन्नस्ते महाभाग वरं वरय सुव्रत । दुर्लभं त्रिषु लोकेषु ददामि तव खेचर ॥ ४॥ गरुड उवाच - इच्छामि वाहनं विष्णोर्द्विजेन्द्रत्वं सुरेश्वर । प्रसन्ने त्वयिमेसर्वम्भवत्विति मतिर्मम ॥ ५॥ श्रीमहेश उवाच - दुर्लभः प्राणिनान्तातयोवरः प्रार्थितोऽनघ । देवदेवस्यवहनं द्विजेन्द्रत्वं सुदुर्ल्लभम् ॥ ६॥ नारायणोदरे सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । त्वया स कथमूह्यतेदेवदेवो जगद्गुरुः ॥ ७॥ तेनैव स्थापितश्चेन्द्रस्त्रैलोक्ये सचराचरे । कथमन्यस्य चेन्द्रत्वं भवतीति सुदुर्लभम् ॥ ८॥ तथापि ममवाक्येनवाहनन्त्वम्भविष्यसि । शङ्खचक्रगदापाणेर्वहतोऽपि जगत्त्रयम् ॥ ९॥ इन्द्रस्त्वं पक्षिणां मध्येभविष्यसिनसंशयः । इति दत्त्वावरन्तस्मान्तर्धानङ्गतोहरः ॥ १०॥ ततो गते महादेवेह्यरुणस्यानुजो नृप । आराधयामास तदा चामुण्डां मुण्डमण्डिताम् ॥ ११॥ श्मशानवासिनीं देवीं बहुभूतसमन्विताम् । योगिनीं योगसंसिद्धां वसामांसासवप्रियाम् ॥ १२॥ ध्यातमात्रा तु तेनैवप्रत्यक्षाह्यभवत्तदा । जालन्धरे च या सिद्धिः कौलीने उड्डिशे परे ॥ १३॥ समग्रा सा भृगुक्षेत्रे सिद्धक्षेत्रे तु संस्थिता । चामुण्डा तत्र सा देवी सिद्धक्षेत्रे व्यवस्थिता ॥ १४॥ संस्तुता ऋषिभिर्द्देवैर्योगक्षेमार्थसिद्धये । विनताऽऽनन्दजननस्तत्र तां योगिनीं नृप । भक्त्या प्रसादयामास स्तोत्रैर्वैदिकलौकिकैः ॥ १५॥ ॥ गरुड उवाच (स्तोत्रम्) ॥ या सा क्षुत्क्षामकण्ठा नवरुधिरमुखा प्रेतपद्मासनस्था भूतानां वृन्दवृन्दैः पितृवननिलया क्रीडते शूलहस्ता । शस्त्रध्वस्तप्रवीरव्रजरुधिरगलन्मुण्डमालोत्तरीया देवी श्रीवीरमाता विमलशशिनिभा पातु वश्चर्ममुण्डा ॥ १६॥ या सा क्षुत्क्षामकण्ठा विकृतभयकरी त्रासिनी दुष्कृतानां मुञ्चज्ज्वालाकलापैर्द्दशनकसमसैः खादति प्रेतमांसम् । पिङ्गोद् र्ध्वोद् बद्धजूटारविसदृशतनुर्व्याघ्रचर्मोत्तरीया दैत्येन्द्रैर्यक्षरक्षोऽरसुरनमिता पातु वश्चर्ममुण्डा ॥ १७॥ या सा दोर्द्दण्डचण्डैर्डमरुरणरणाटोपटङ्कारघण्टैः कल्पान्तोत्पातवाताहतपटुपटहैर्वल्गते भूतमाता । क्षुत्क्षामा शुष्ककुक्षिः खरतरनखरैः क्षोदति प्रेतमांसं मुञ्चन्ती चाट्टहासं घुरघुरितरवा पातु वश्चर्ममुण्डा ॥ १८॥ या सा निम्नोदराभा विकृतभवभयत्रासिनी शूलहस्ता चामुण्डा मुण्डघाता रणरुणितरणझल्लरीनादरम्या । त्रैलोक्यं त्रासयन्ति ककहकहकहैर्घोररावैरनेकैर्नृत्यन्ती मातृमध्ये पितृवननिलया पातु वश्चर्ममुण्डा ॥ १९॥ या धत्ते विश्वमखिलं निजांशेन महोज्ज्वला । कनकप्रसवे लीना पातु मां कनकेश्वरी ॥ २०॥ हिमाद्रिसम्भवा देवी दयादर्शितविग्रहा । शिवप्रिया शिवे सक्ता पातु मां कनकेश्वरी ॥ २१॥ अनादिजगदादिर्या रत्नगर्भा वसुप्रिया । रथाङ्गपाणिना पद्मा पातु मां कनकेश्वरी ॥ २२॥ सावित्री या च गायत्री मृडानी वागथेन्दिरा । स्मर्तृणां या सुखं दत्ते पातु मां कनकेश्वरी ॥ २३॥ सौम्यासौम्यैः सदा रूपैः सृजत्यवति या जगत् । परा शक्तिः परा बुद्धिः पातु मां कनकेश्वरी ॥ २४॥ ब्रह्मणः सर्गसमये सृज्यशक्तिः परा तु या । जगन्माया जगद्धात्री पातु मां कनकेश्वरी ॥ २५॥ विश्वस्य पालने विष्णोर्या शक्तिः परिपालिता । मदनोन्मादिनी मुख्या पातु मां कनकेश्वरी ॥ २६॥ विश्वसंलयने मुख्या या रुद्रेण समाश्रिता । रौद्री शक्तिः शिवाऽनन्ता पातु मां कनकेश्वरी ॥ २७॥ कैलाससानुसंरूढ कनकप्रसवेशया । भस्मकाभिहृता पूर्वं पातु मां कनकेश्वरी ॥ २८॥ पतिप्रभावमिच्छन्ती त्रस्यन्ती या विना पतिम् । अबला त्वेकभावा च पातु मां कनकेश्वरी ॥ २९॥ विश्वसंरक्षणे सक्ता रक्षिता कनकेन या । आ ब्रह्मस्तम्बजननी पातु मां कनकेश्वरी ॥ ३०॥ ब्रह्मविष्ण्वीश्वराः शक्त्या शरीरग्रहणं यया । प्रापिताः प्रथमा शक्तिः पातु मां कनकेश्वरी ॥ ३१॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ श्रुत्वा तु गरुडेनोक्तं देवीवृत्तचतुष्टयम् । प्रसन्ना सम्मुखी भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ३२॥ श्रीचामुण्डोवाच - प्रसन्ना ते महासत्त्व वरं वरय वाञ्छितम् । ददामि ते द्विजश्रेष्ठ यत्ते मनसि रोचते ॥ ३३॥ गरुड उवाच - अजरश्चामरश्चैव अधृष्यश्च सुरासुरैः । तव प्रसादाच्चैवान्यैरजेयश्च भवाम्यहम् ॥ ३४॥ त्वयाचाऽत्र सदा देवि स्थातव्यं तीर्थसन्निधौ । मार्कण्डेय उवाच - एवं भविष्यतीत्युक्त्वा देवी देवैरभिष्टुता ॥ ३५॥ जगामाकाशमाविश्य भूतसङ्घसमन्विता । यदा लक्ष्म्या नृपश्रेष्ठ स्थापितं पुरमुत्तमम् ॥ ३६॥ अनुमान्य तदा देवीं कृतं तस्यां समर्पितम् । लक्ष्मीरुवाच - रक्षणाय मया देवि योगक्षेमार्थसिद्धये ॥ ३७॥ मातृवत्प्रतिपाल्यं ते सदा देवि पुरं मम । गरुडोऽपि ततः स्नात्वा सम्पूज्य कनकेश्वरीम् ॥ ३८॥ तीर्थं तत्रैव संस्थाप्य जगामाकाशमुत्तमम् । तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्पितृदेवताः ॥ ३९॥ सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुते । गन्धपुष्पादिभिर्यस्तु पूजयेत्कनकेश्वरीम् ॥ ४०॥ तस्य योगैश्वर्यसिद्धिर्योगपीठेषु जायते । मृतो योगेश्वरं लोकं जयशब्दादिमङ्गलैः । स गच्छेन्नाऽत्र सन्देहो योगिनीगणसंयुतः ॥ ४१॥ ॥ इति श्रीस्कान्दे रेवाखण्डे कनखलेश्वरतीर्थमाहात्म्ये चामुण्डा स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्रीचामुण्डास्तोत्रम्: पौराणिक पृष्ठभूमि एवं कथा (Mythological Background)

श्रीचामुण्डास्तोत्रम् 18 महापुराणों में से सबसे बड़े स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड (नर्मदा पुराण) में स्थित 'कनखलेश्वर तीर्थ माहात्म्य' का एक महत्वपूर्ण अंश है। यह स्तोत्र गरुड़ (पक्षियों के राजा) और भगवान शिव के बीच हुए संवाद और उसके बाद गरुड़ द्वारा की गई देवी स्तुति का वर्णन करता है। कथा के अनुसार, गरुड़ ने 'कनखल' तीर्थ (नर्मदा तट पर स्थित, हरिद्वार वाला कनखल नहीं) में भगवान शिव की घोर तपस्या की थी।

गरुड़ की प्रतिज्ञा और शिव का वरदान: गरुड़ की इच्छा थी कि वे भगवान विष्णु के वाहन बनें और पक्षियों के राजा (द्विजेन्द्र) कहलाएं। भगवान शिव ने प्रकट होकर कहा कि यह वरदान अत्यंत दुर्लभ है क्योंकि पूरा ब्रह्मांड विष्णु के उदर में है, उन्हें उठाना आसान नहीं है। फिर भी, शिवजी ने गरुड़ को वरदान दिया कि वे विष्णु का वाहन बनेंगे। इसके बाद शिवजी अंतर्ध्यान हो गए।

चामुण्डा आराधना: शिवजी के जाने के बाद गरुड़ ने वहां स्थित सिद्ध क्षेत्र में माँ चामुण्डा की आराधना की। गरुड़ द्वारा रचित यह स्तुति दो भागों में विभक्त है। पहले भाग (श्लोक 16-19) में देवी के रौद्र 'चर्ममुण्डा' स्वरूप का वर्णन है, जो श्मशानवासिनी हैं। दूसरे भाग (श्लोक 20-31) में देवी के परम सौम्य और सृजनकारी 'कनकेश्वरी' (स्वर्णमयी) स्वरूप की स्तुति है। यह द्वैत (Duality) ही इस स्तोत्र की शक्ति है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक और तांत्रिक महत्व (Spiritual & Tantric Significance)

यह स्तोत्र तंत्र और योग की उच्चतम अवस्थाओं का परिचायक है। इसमें देवी को 'योगिनी' और 'योगसंसिद्धा' कहा गया है।

  • चर्ममुण्डा (The Fierce Protector): श्लोक 16 से 19 तक देवी का वह रूप वर्णित है जो 'पितृवननिलया' (श्मशान में रहने वाली) है, जिसके हाथ में शूल है, जो मुंडमाला पहनती है और डमरू बजाती है। बार-बार आने वाली पंक्ति "पातु वश्चर्ममुण्डा" (चर्ममुण्डा आपकी रक्षा करें) एक शक्तिशाली रक्षा कवच है जो अकाल मृत्यु और प्रेत बाधाओं से बचाता है।
  • कनकेश्वरी (The Golden Goddess): श्लोक 20 के बाद स्वर बदल जाता है। देवी को 'कनकेश्वरी' (स्वर्ण की ईश्वरी) कहा गया है। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्ति हैं (सृष्टि, पालन, संहार कारिणी)। वे ही सावित्री, गायत्री और लक्ष्मी हैं। यह हिस्सा धन, समृद्धि और आत्मिक शांति प्रदान करता है।
  • सिद्ध क्षेत्र का महत्त्व: श्लोक 13-14 में उल्लेख है कि जालंधर, उड्डियान और कामरूप (कौल) पीठों में जो सिद्धि मिलती है, वही सिद्धि नर्मदा तट के इस 'भृगुक्षेत्र' (सिद्धक्षेत्र) में चामुण्डा की उपासना से प्राप्त होती है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले दिव्य लाभ (Benefits of Recitation)

गरुड़ की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें जो वरदान दिए और अंत में मार्कण्डेय ऋषि ने जो फल बताए, वे इस प्रकार हैं:

  • अजेयता और अमरता: गरुड़ ने वरदान माँगा — "अजरश्चामरश्चैव... अजेयश्च भवाम्यहम्"। इस स्तोत्र के पाठ से साधक को दीर्घायु, निरोगी काया और शत्रुओं पर अजेय विजय प्राप्त होती है।
  • पितृ दोष निवारण: श्लोक 39 में कहा गया है कि जो इस तीर्थ (या इस स्तोत्र के भाव तीर्थ) में स्नान करके पितरों का तर्पण करता है, उसे 'सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुते' — अर्थात् सभी कामनाओं को पूरा करने वाले महान यज्ञ का फल मिलता है।
  • योग सिद्धि और मोक्ष: श्लोक 41 के अनुसार, कनकेश्वरी का पूजन और इस स्तोत्र का पाठ करने से 'योगैश्वर्यसिद्धि' प्राप्त होती है और मृत्यु के बाद साधक 'योगेश्वर लोक' (शिव लोक) में जाता है।
  • रक्षा और भय मुक्ति: 'चर्ममुण्डा' के मंत्र भाग का पाठ करने से भूत-प्रेत, पिशाच, और तांत्रिक अभिचारों (Black Magic) का नाश होता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method & Guidelines)

इस स्तोत्र की सिद्धि के लिए सात्विक और तांत्रिक दोनों विधियों का प्रयोग किया जा सकता है।

दैनिक पाठ विधि: स्नानादि से निवृत्त होकर लाल या पीले आसन पर बैठें। माँ चामुण्डा या दुर्गा का चित्र स्थापित करें। पहले भगवान शिव और गरुड़ का ध्यान करें। फिर संकल्प लेकर इस स्तोत्र का पाठ करें। 'चर्ममुण्डा' वाले श्लोकों (16-19) को क्रोध/वीर रस में और 'कनकेश्वरी' वाले श्लोकों (20-31) को शांत भाव से पढ़ें।

पितृ तर्पण और अमावस्या प्रयोग: चूँकि यह स्तोत्र पितृवन (श्मशान) और पितरों की मुक्ति से जुड़ा है, इसलिए अमावस्या या पितृ पक्ष में इसका पाठ विशेष फलदायी है। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, तिल के तेल का दीपक जलाकर पाठ करने से पितृ दोष शांत होते हैं।

फूलों का अर्पण: श्लोक 40 में 'गन्धपुष्पादिभिः' पूजन का उल्लेख है। कनकेश्वरी स्वरूप के लिए पीले पुष्प (कनेर/गेंदा) और चामुण्डा स्वरूप के लिए लाल पुष्प (गुड़हल) अर्पित करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तोत्र स्कन्द पुराण के किस खण्ड में है?
यह रेवा खण्ड (जिसे अवन्ती खण्ड भी कहते हैं) में स्थित है। इसमें नर्मदा नदी के तट पर स्थित तीर्थों का माहात्म्य वर्णित है, जिसमें कनखलेश्वर तीर्थ प्रमुख है।
2. 'चर्ममुण्डा' और 'कनकेश्वरी' में क्या अंतर है?
चर्ममुण्डा देवी का तामसी और उग्र रूप है जो श्मशान में निवास करती हैं और पापियों का नाश करती हैं। कनकेश्वरी देवी का राजसी और सात्विक रूप है जो सृष्टि का पालन करती हैं और स्वर्ण (समृद्धि) प्रदान करती हैं।
3. गरुड़ ने यह स्तुति क्यों की थी?
गरुड़ भगवान विष्णु का वाहन बनना चाहते थे, जो एक असंभव कार्य था। शिवजी की कृपा और चामुण्डा की साधना से उन्हें वह शक्ति और अमरता प्राप्त हुई जिससे वे नारायण को उठा सके।
4. क्या इस स्तोत्र का पाठ घर में किया जा सकता है?
हाँ, बिल्कुल। यद्यपि इसमें श्मशान का वर्णन है, परंतु यह एक पौराणिक स्तोत्र है जो रक्षा कवच का काम करता है। इसे घर के मंदिर में निर्भय होकर पढ़ा जा सकता है।
5. 'पितृवननिलया' का क्या अर्थ है?
'पितृवन' का अर्थ है श्मशान घाट। देवी वहाँ निवास करती हैं क्योंकि वे जीवन और मृत्यु के चक्र से परे हैं और भटकती आत्माओं को मुक्ति देती हैं।
6. क्या इससे आर्थिक लाभ होता है?
जी हाँ। देवी 'कनकेश्वरी' (कनक = सोना) और 'वसुप्रिया' (धन की प्रेमी) हैं। इनके पूजन से दरिद्रता दूर होती है और 'सर्वकामसमृद्धि' प्राप्त होती है।
7. 'जालन्धर' और 'उड्डिश' पीठों का उल्लेख क्यों है?
ये प्रसिद्ध तंत्र पीठ हैं। श्लोक 13 में कहा गया है कि इन पीठों की सिद्धि इस स्तोत्र के माध्यम से कनखल तीर्थ में ही सुलभ हो जाती है।
8. 'विनता' कौन थीं?
विनता गरुड़ की माता थीं। शिवजी ने गरुड़ को 'विनतानन्दवर्धन' (माता विनता का आनंद बढ़ाने वाला) कहा है। गरुड़ अपनी माता को दासता से मुक्त कराना चाहते थे।
9. क्या यह स्तोत्र सुरक्षा के लिए प्रभावी है?
अत्यंत प्रभावी। 'पातु वश्चर्ममुण्डा' (चर्ममुण्डा आपकी रक्षा करें) का बार-बार उच्चारण एक शक्तिशाली सुरक्षा घेरा बनाता है जो किसी भी तांत्रिक प्रयोग को काट देता है।
10. इस पाठ का उत्तम समय क्या है?
संध्या काल (प्रदोष) या मध्यरात्रि का समय चामुण्डा उपासना के लिए श्रेष्ठ है। नवरात्रि की अष्टमी और चतुर्दशी तिथियां विशेष फलदायी हैं।