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Shri Chamunda Stuti (Padma Purana) – श्रीचामुण्डा स्तुतिः

Shri Chamunda Stuti (Padma Purana) – श्रीचामुण्डा स्तुतिः
॥ श्रीचामुण्डा स्तुतिः (पद्मपुराणान्तर्गता) ॥ जयस्व देवि चामुण्डे जय भूताऽपहारिणि । जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥ विश्वमूर्तियुते शुद्धे विरूपाक्षी त्रिलोचने । भीमरूपे शिवे विद्ये महामाये महोदरे ॥ २॥ मनोजये मनोदुर्गे भीमाक्षि क्षुभितक्षये । महामारि विचित्राङ्गि गीतनृत्यप्रिये शुभे ॥ ३॥ विकरालि महाकालि कालिके पापहारिणि । पाशहस्ते दण्डहस्ते भीमहस्ते भयानके ॥ ४॥ चामुण्डे ज्वलमानास्ये तीक्ष्णदंष्ट्रे महाबले । शिवयानप्रिये देवि प्रेतासनगते शिवे ॥ ५॥ भीमाक्षि भीषणे देवि सर्वभूतभयङ्करि । करालि विकरालि च महाकालि करालिनि ॥ ६॥ कालि करालविक्रान्ते कालरात्रि नमोऽस्तु ते । सर्वशस्त्रभृते देवि नमो देवनमस्कृते ॥ ७॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ एवं स्तुता शिवदूती रुद्रेण परमेष्ठिना । तुतोष परमा देवी वाक्यं चैवमुवाच ह ॥ ८॥ वरं वृणीष्व देवेश यत्ते मनसि वर्तते । श्रीरुद्र उवाच स्तोत्रेणाऽनेन ये देवि स्तोष्यन्ति त्वां वरानने ॥ ९॥ तेषां त्वं वरदा देवि भव सर्वगता सती । इमं पर्वतमारुह्य यः पूजयति भक्तितः ॥ १०॥ स पुत्रपौत्रपशुमान् समृद्धिमुपगच्छतु । यश्चैवं श‍ृणुयाद्भक्त्या स्तवं देवि समुद्भवम् ॥ ११॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छतु । भ्रष्टराज्यो यदा राजा नवम्यां नियतः शुचिः ॥ १२॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां सोपवासो नरोत्तम । संवत्सरेण लभतां राज्यं निष्कण्टकं पुनः ॥ १३॥ एषा ज्ञानान्विता शक्तिः शिवदूतीति चोच्यते । य एवं श‍ृणुयान्नित्यं भक्त्या परमया नृप ॥ १४॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमाप्नुयात् । यश्चैनं पठते भक्त्या स्नात्वा वै पुष्करे जले ॥ १५॥ सर्वमेतत्फलं प्राप्य ब्रह्मलोके महीयते । यत्रैतल्लिखितं गेहे सदा तिष्ठति पार्थिव ॥ १६॥ न तत्राऽग्निभयं घोरं सर्वचोरादि सम्भवम् । यश्चेदं पूजयेद्भक्त्या पुस्तकेऽपि स्थितं बुधाः ॥ १७॥ तेन चेष्टं भवेत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । जायन्ते बहवः पुत्राः धनं धान्यं वरा स्त्रियः ॥ १८॥ रत्नान्यश्वा गजा भृत्यास्तेषामाशु भवन्ति च । यत्रेदं लिख्यते गेहे तत्राप्येवं ध्रुवं भवेत् ॥ १९॥ ॥ इति पाद्मे पुराणे सृष्टिखण्डे श्रीचामुण्डा स्तुतिः समाप्ता ॥

श्रीचामुण्डा स्तुतिः (पद्मपुराण): परिचय एवं महात्म्य (Introduction & Significance)

श्रीचामुण्डा स्तुतिः हिंदू धर्म के अठारह महापुराणों में से एक पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड) के 31वें अध्याय में वर्णित है। इस अध्याय को 'शिवदूती चरित' के नाम से भी जाना जाता है। जब देवताओं पर संकट आया, तब भगवान रुद्र (शिव) ने स्वयं देवी चामुण्डा की स्तुति की, जिनसे प्रसन्न होकर देवी ने वरदान दिया। यह स्तुति देवी के अत्यंत उग्र और रक्षक स्वरूप को समर्पित है, जो दुष्टों का नाश करती हैं और भक्तों को अभय प्रदान करती हैं।

शिवदूती और चामुण्डा का रहस्य: इस स्तोत्र में देवी को 'शिवदूती' (श्लोक 8, 14) कहा गया है। दुर्गा सप्तशती के अनुसार, जब देवी ने शिवजी को दूत बनाकर शुम्भ-निशुम्भ के पास भेजा था, तब उनका नाम 'शिवदूती' पड़ा। वहीं, चण्ड और मुण्ड का संहार करने के कारण वे 'चामुण्डा' कहलाईं। यह स्तोत्र इन दोनों स्वरूपों का एकीकरण है। श्लोक 5 में उन्हें 'शिवयानप्रिये' (शिव की सवारी/मार्ग प्रिय होने वाली) और 'प्रेतासनगते' (शवों के आसन पर बैठने वाली) कहा गया है, जो उनकी तांत्रिक सत्ता को दर्शाता है।

नामों की दिव्यता: इस लघु स्तोत्र में देवी के अनेक शक्तिशाली नामों का उल्लेख है — 'भूताऽपहारिणि' (भूत-प्रेत आदि नकारात्मक शक्तियों का हरण करने वाली), 'कालरात्रि' (काल का भी नाश करने वाली), 'विरूपाक्षी' (विचित्र नेत्रों वाली), और 'महामारि' (महामारी का रूप या नाश करने वाली)। ये नाम सिद्ध करते हैं कि जीवन की सबसे कठिन और भयानक परिस्थितियों में केवल चामुण्डा ही रक्षक हैं।

स्तोत्र का विशिष्ट तांत्रिक और व्यावहारिक महत्व (Applied Significance)

पद्मपुराण में वर्णित यह स्तुति केवल पूजा का मंत्र नहीं है, बल्कि यह एक सिद्ध प्रयोग है। इसके तीन मुख्य लाभ बताए गए हैं:

  • भ्रष्ट राज्य की पुनः प्राप्ति (Regaining Lost Position): श्लोक 12-13 में स्पष्ट कहा गया है — "भ्रष्टराज्यो यदा राजा... लभतां राज्यं निष्कण्टकं पुनः"। यदि किसी व्यक्ति का उच्च पद छिन गया हो, नौकरी चली गई हो, या व्यापार ठप हो गया हो (भ्रष्ट राज्य), तो अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी को उपवास पूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करने से एक वर्ष के भीतर उसे अपना पद 'निष्कण्टक' (बिना किसी बाधा के) वापस मिल जाता है।
  • गृह रक्षा कवच (Protection from Fire & Thieves): श्लोक 16-17 में एक अद्भुत प्रयोग है — "यत्रैतल्लिखितं गेहे... न तत्राऽग्निभयं घोरं सर्वचोरादि सम्भवम्"। जिस घर में यह स्तोत्र लिखकर रखा जाता है, वहां कभी भी आग लगने का भय नहीं रहता और न ही चोरों का डर होता है। यह घर का सुरक्षा कवच है।
  • भूत-प्रेत बाधा निवारण: स्तोत्र का आरंभ ही "जय भूताऽपहारिणि" से होता है। यह नकारात्मक ऊर्जा, ऊपरी हवा, और मानसिक भय को तत्काल दूर करने वाला मंत्र है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

भगवान रुद्र को देवी द्वारा दिए गए वरदान और स्वयं रुद्र द्वारा बताई गई फलश्रुति (श्लोक 9-19) के अनुसार, इस पाठ के लाभ असीमित हैं:

  • पुत्र-पौत्र और समृद्धि: 'स पुत्रपौत्रपशुमान् समृद्धिमुपगच्छतु' — जो भक्त भक्ति भाव से इसका पूजन करता है, उसे संतान सुख, पशु धन (आज के संदर्भ में वाहन आदि) और अपार समृद्धि प्राप्त होती है।
  • पाप मुक्ति और निर्वाण: श्लोक 14-15 के अनुसार, इस स्तोत्र को सुनने मात्र से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और अंत में 'परम निर्वाण' (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
  • सर्वत्र विजय और इष्ट सिद्धि: 'तेन चेष्टं भवेत्सर्वं' — इस स्तोत्र की पुस्तक का पूजन करने से तीनों लोकों में जो भी इष्ट (मनोवांछित) वस्तु है, वह प्राप्त हो जाती है।
  • रत्न और ऐश्वर्य: श्लोक 19 कहता है कि साधक को रत्न, घोड़े, हाथी (वाहनादि) और सेवक (भृत्य) शीघ्र प्राप्त होते हैं। यह राजसी सुख प्रदान करने वाला पाठ है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)

इस स्तोत्र की सिद्धि के लिए पद्मपुराण में विशिष्ट तिथियों और विधियों का उल्लेख है।

राज्य/पद प्राप्ति अनुष्ठान: जो व्यक्ति अपना खोया हुआ सम्मान या नौकरी पाना चाहता है, उसे शुक्ल पक्ष की अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथियों को उपवास (Fasting) रखना चाहिए। पवित्र होकर (नियतः शुचिः) देवी चामुण्डा के चित्र के समक्ष इस स्तोत्र का 108 बार पाठ करें। ऐसा एक वर्ष तक करने से खोया हुआ वैभव अवश्य वापस मिलता है।

लिखित यन्त्र प्रयोग (Protection Method): भोजपत्र या पीले कागज पर लाल स्याही (अष्टगंध या केसर) से इस पूरे स्तोत्र को लिखें। इसे फ्रेम करवाकर या ताबीज में भरकर घर के मुख्य द्वार या पूजा स्थान में स्थापित करें। यह घर को अग्नि, चोरी और नकारात्मकता से सुरक्षित रखता है।

दैनिक पाठ: सामान्य अभ्युदय के लिए नित्य प्रातः स्नान के बाद लाल आसन पर बैठकर इसका 11 बार पाठ करना चाहिए। देवी को लाल पुष्प (गुड़हल) और नैवेद्य अर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह चामुण्डा स्तुति किस पुराण से ली गई है?
यह स्तुति पद्मपुराण के प्रथम खण्ड (सृष्टिखण्ड) के 31वें अध्याय से ली गई है। इसे रुद्र कृत चामुण्डा स्तुति भी कहते हैं।
2. 'भ्रष्टराज्यो' का आधुनिक संदर्भ में क्या अर्थ है?
प्राचीन काल में इसका अर्थ 'खोया हुआ राज्य' था। आधुनिक संदर्भ में इसका अर्थ है—छूटी हुई नौकरी, पद-अवनति (Demotion), व्यापार में भारी घाटा या समाज में खोया हुआ मान-सम्मान। यह स्तोत्र इसे पुनः प्राप्त करने में सहायक है।
3. क्या इसे घर में लिखकर रखना शुभ है?
जी हाँ, यह बहुत शुभ है। श्लोक 16 के अनुसार, जिस घर में यह स्तोत्र लिखित रूप में रहता है, वहां आग लगने का डर और चोरी का भय कभी नहीं होता।
4. 'शिवदूती' कौन हैं?
शिवदूती माँ चामुण्डा/दुर्गा का ही एक रूप हैं। युद्ध में उन्होंने भगवान शिव को अपना दूत बनाकर भेजा था, इसलिए उनका नाम शिवदूती पड़ा। यह शक्ति ज्ञान (ज्ञानान्विता शक्ति) का प्रतीक है।
5. 'भूताऽपहारिणि' का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है 'भूतों का अपहरण/नाश करने वाली'। यह नाम दर्शाता है कि देवी चामुण्डा भूत-प्रेत, पिशाच और नकारात्मक ऊर्जाओं को साधक के जीवन से दूर कर देती हैं।
6. इस पाठ के लिए कौन सी तिथियां महत्वपूर्ण हैं?
श्लोक 12-13 के अनुसार, नवमी, अष्टमी और चतुर्दशी (विशेषकर शुक्ल पक्ष की) तिथियां इस स्तोत्र की सिद्धि के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं।
7. क्या केवल सुनने से भी लाभ मिलता है?
हाँ। श्लोक 14 में कहा गया है—'य एवं श‍ृणुयान्नित्यं'—जो नित्य इसे भक्ति पूर्वक सुनता है, वह भी पापों से मुक्त होकर मोक्ष का अधिकारी बनता है।
8. 'निष्कण्टक राज्य' का क्या अर्थ है?
निष्कण्टक का अर्थ है 'कांटों (बाधाओं) से रहित'। इसका तात्पर्य है कि देवी न केवल खोया हुआ पद वापस देती हैं, बल्कि भविष्य में आने वाली बाधाओं और शत्रुओं को भी हटा देती हैं।
9. क्या इस स्तोत्र का पाठ नवरात्रि में कर सकते हैं?
अवश्य। नवरात्रि शक्ति उपासना का सर्वश्रेष्ठ समय है। विशेषकर महाष्टमी और महानवमी (नवमी) के दिन इसका पाठ अनंत गुना फलदायी होता है।
10. 'पुष्कर जल' का उल्लेख क्यों है?
श्लोक 15 में पुष्कर तीर्थ (ब्रह्मा जी का स्थान) में स्नान करके पाठ करने का विशेष महत्व बताया गया है। यदि वहां जाना संभव न हो, तो नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर मानसिक रूप से तीर्थ स्नान का भाव करके पाठ करें।