Parashurama Kruta Kali Stotram – श्री महाकाली स्तोत्रम् (परशुराम कृतम्) अर्थ सहित

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री परशुराम कृत महाकाली स्तोत्रम् ॥
॥ ब्रह्मवैवर्त पुराण - गणेश खण्ड - अध्याय ३६ ॥
परशुराम उवाच ।
नमः शङ्करकान्तायै सारायै ते नमो नमः ।
नमो दुर्गतिनाशिन्यै मायायै ते नमो नमः ॥ १ ॥
(शंकर की प्रिया (पार्वती/काली) को नमस्कार! सारभूता (सर्वश्रेष्ठ) को बारम्बार नमस्कार! दुर्गति (बुरी स्थिति) को नष्ट करने वाली माया देवी को नमस्कार!)
नमो नमो जगद्धात्र्यै जगत्कर्त्र्यै नमो नमः ।
नमोऽस्तु ते जगन्मात्रे कारणायै नमो नमः ॥ २ ॥
(जगत् को धारण करने वाली को नमस्कार! जगत् की रचयिता को नमस्कार! जगत् की माता को नमस्कार! सबके कारण स्वरूपा को नमस्कार!)
प्रसीद जगतां मातः सृष्टिसंहारकारिणि ।
त्वत्पादौ शरणं यामि प्रतिज्ञां सार्थिकां कुरु ॥ ३ ॥
(हे जगत् की माता! सृष्टि और संहार करने वाली! प्रसन्न हों। मैं आपके चरणों की शरण में आया हूँ। अपनी प्रतिज्ञा को सार्थक (सफल) करें।)
त्वयि मे विमुखायां च को मां रक्षितुमीश्वरः ।
त्वं प्रसन्ना भव शुभे मां भक्तं भक्तवत्सले ॥ ४ ॥
(यदि आप मुझसे विमुख हो जाएँ तो मेरी रक्षा कौन ईश्वर कर सकता है? हे शुभकारिणी! हे भक्तवत्सला! मुझ भक्त पर प्रसन्न हों।)
युष्माभिः शिवलोके च मह्यं दत्तो वरः पुरा ।
तं वरं सफलं कर्तुं त्वमर्हसि वरानने ॥ ५ ॥
(आपने पूर्व में शिवलोक में मुझे वर दिया था। हे सुन्दर मुख वाली! उस वर को सफल करने की कृपा करें।)
रेणुकेयस्तवं श्रुत्वा प्रसन्नाऽभवदम्बिका ।
मा भैरित्येवमुक्त्वा तु तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६ ॥
(रेणुका-पुत्र (परशुराम) की यह स्तुति सुनकर माँ अम्बिका प्रसन्न हुईं और 'मत डरो' ऐसा कहकर वहीं अन्तर्धान हो गईं।)
॥ फलश्रुति ॥
एतद् भृगुकृतं स्तोत्रं भक्तियुक्तश्च यः पठेत् ।
महाभयात्समुत्तीर्णः स भवेदेव लीलया ॥ ७ ॥
(जो भक्तिपूर्वक इस भृगुकुल (परशुराम) द्वारा रचित स्तोत्र का पाठ करता है, वह महाभय से सहज ही पार हो जाता है।)
स पूजितश्च त्रैलोक्ये तत्रैव विजयी भवेत् ।
ज्ञानिश्रेष्ठो भवेच्चैव वैरिपक्षविमर्दकः ॥ ८ ॥
(वह तीनों लोकों में पूजित होता है, सर्वत्र विजयी होता है, ज्ञानियों में श्रेष्ठ होता है और शत्रु पक्ष का मर्दन करने वाला होता है।)
॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे गणेशखण्डे षट्त्रिंशोऽध्याये श्रीपरशुरामकृत महामाया स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
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परिचय: परशुराम कृत महाकाली स्तोत्र
परशुराम कृत महाकाली स्तोत्रम् (Parashurama Kruta Kali Stotram) ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणेश खण्ड के 36वें अध्याय में वर्णित एक अत्यंत प्रभावशाली और संक्षिप्त स्तोत्र है।
भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार और महर्षि जमदग्नि तथा माता रेणुका के पुत्र थे। इसीलिए उन्हें 'रेणुकेय' और 'भार्गव' (भृगुकुल से) भी कहा जाता है। जब वे किसी संकट में थे, तब उन्होंने माँ महामाया काली की यह स्तुति की।
माँ ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर 'मा भैः' (मत डरो) कहकर अभयदान दिया और अन्तर्धान हो गईं। यह स्तोत्र केवल 8 श्लोकों का है, परन्तु अत्यंत प्रभावी है।
भगवान परशुराम: संक्षिप्त परिचय
- पूर्ण नाम: राम (परशु = कुल्हाड़ी धारण करने के कारण परशुराम)
- पिता: महर्षि जमदग्नि (भृगुवंशी)
- माता: रेणुका देवी
- गोत्र: भृगु (भार्गव)
- अवतार: भगवान विष्णु के दशावतारों में छठे
- विशेषता: क्षत्रियों का 21 बार संहार, चिरंजीवी (सप्त चिरंजीवियों में एक)
- गुरु: भगवान शिव (जिनसे परशु प्राप्त किया)
स्तोत्र पाठ के लाभ (फलश्रुति)
पुराण में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जो भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे:
- महाभय से मुक्ति: बड़े से बड़े भय से सहज ही पार हो जाता है
- त्रैलोक्य पूजा: तीनों लोकों में सम्मान प्राप्त होता है
- सर्वत्र विजय: हर क्षेत्र में विजय मिलती है
- ज्ञान श्रेष्ठता: ज्ञानियों में श्रेष्ठ स्थान मिलता है
- शत्रु नाश: शत्रु पक्ष का मर्दन होता है
पाठ का उत्तम समय
- परशुराम जयन्ती (अक्षय तृतीया)
- नवरात्रि में विशेषकर अष्टमी/नवमी
- मंगलवार और शनिवार को
- किसी भय या संकट के समय
- न्यायालय या प्रतियोगिता से पूर्व
- रात्रि में माँ काली की पूजा के समय
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. यह स्तोत्र किस पुराण से है?
यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणेश खण्ड के 36वें अध्याय से है।
2. परशुराम ने यह स्तोत्र कब रचा?
जब परशुराम किसी महाभय/संकट में थे और उन्होंने माँ महामाया से पूर्व में प्राप्त वर की याद दिलाते हुए यह स्तुति की।
3. 'मा भैः' का क्या अर्थ है?
'मा भैः' संस्कृत में 'मत डरो' का अर्थ है। माँ ने परशुराम को अभयदान देते हुए यह कहा।
4. इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
इस स्तोत्र में 8 श्लोक हैं—6 श्लोक स्तुति के और 2 श्लोक फलश्रुति के।
5. 'भृगुकृत' का क्या अर्थ है?
भृगु परशुराम के पूर्वज ऋषि थे। भृगुकुल में जन्म होने के कारण परशुराम को 'भार्गव' कहते हैं। अतः 'भृगुकृत' = भृगुवंशी (परशुराम) द्वारा रचित।
6. क्या यह स्तोत्र सभी पढ़ सकते हैं?
हाँ, यह पौराणिक स्तोत्र है जिसे कोई भी भक्तिपूर्वक पढ़ सकता है। किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं है।
7. शिवलोक में मिले वर का क्या सन्दर्भ है?
परशुराम ने भगवान शिव की तपस्या की थी और उनसे परशु (कुल्हाड़ी) प्राप्त किया था। तभी माँ पार्वती/काली ने भी उन्हें वर दिया था।
8. 'वैरिपक्षविमर्दक' का क्या अर्थ है?
वैरि = शत्रु, पक्ष = समूह/दल, विमर्दक = नष्ट करने वाला। अर्थात् जो शत्रुओं के दल को नष्ट कर देता है।
9. परशुराम जयन्ती कब है?
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया (अक्षय तृतीया) को परशुराम जयन्ती मनाई जाती है। इस दिन इस स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी है।
10. क्या इस स्तोत्र से शत्रु नाश होता है?
हाँ, फलश्रुति में स्पष्ट है कि पाठक 'वैरिपक्षविमर्दकः' अर्थात् शत्रु पक्ष का नाश करने वाला होता है। परन्तु यह धर्मयुद्ध/न्यायोचित संघर्ष के लिए है।