Logoपवित्र ग्रंथ

Kalika Upanishad – श्री कालिकोपनिषत्

Kalika Upanishad – श्री कालिकोपनिषत्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री कालिकोपनिषत् ॥ ॥ अथर्ववेदीय सौभाग्यकाण्डान्तर्गता ॥ अथ हैनं ब्रह्मरन्ध्रे ब्रह्मस्वरूपिणीमाप्नोति । सुभगां त्रिगुणितां मुक्तासुभगां कामरेफेन्दिरां समस्तरूपिणीमेतानि त्रिगुणितानि तदनु कूर्चबीजं व्योमषष्ठस्वरां बिन्दुमेलनरूपां तद्द्वयं मायाद्वयं दक्षिणे कालिके चेत्यभिमुखगतां तदनु बीजसप्तकमुच्चार्य बृहद्भानुजायामुच्चरेत् । स तु शिवमयो भवेत् । सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । गतिस्तस्यास्तीति । नान्यस्य गतिरस्ताति । स तु वागीश्वरः । स तु नारीश्वरः । स तु देवेश्वरः । स तु सर्वेश्वरः । ॥ ध्यानम् ॥ अभिनवजलदसङ्काशा घनस्तनी कुटिलदंष्ट्रा शवासना कालिका ध्येया । त्रिकोणं पञ्चकोणं नवकोणं पद्मम् । ॥ सर्वाङ्ग पूजा ॥ तस्मिन् देवी सर्वाङ्गेऽभ्यर्च्य तदिदं सर्वाङ्गं— ॐ काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी विप्रचित्ता उग्रा उग्रप्रभा दीप्ता नीला घना बलाका मात्रा मुद्राऽमिता चैव पञ्चदशकोणगाः । ब्राह्मी नारायणी माहेश्वरी कौमारी अपराजिता वाराही नारसिंहिका चेत्यष्टपत्रगाः । षोडशस्वरभेदेन प्रथमेन मन्त्रविभागः । तन्मूलेनावाहनं तेनैव पूजनम् । ॥ मन्त्रराज जप फल ॥ य एवं मन्त्रराजं नियमेन वा लक्षमावर्तयति स पाप्मानं हन्ति । स ब्रह्मत्वं भजति । सः अमृतत्वं भजति । स आयुरारोग्यमैश्वर्यं भजति । सदा पञ्चमकारेण पूजयेत् । सदा गुरुभक्तो भवेत् । सदा देवभक्तो भवेत् । धर्मिष्ठतां पुष्टिमहतवाचं विप्रा लभन्ते । मन्त्रजापिनो ह्यात्मा विद्याप्रपूरितो भवति । स जीवन्मुक्तो भवति । स सर्वशास्त्रं जानाति । स सर्वपुण्यकारी भवति । स सर्वयज्ञयाजी भवति । राजानो दासतां यान्ति । जप्त्वा स सर्वमेतं मन्त्रराजं स्वयं शिव एवाहमित्यणिमादिविभूतीनामीश्वरः कालिकां लभेत् ॥ आवयोः पात्रभूतः सन् सुकृती त्यक्तकल्मषः । जीवन्मुक्तः स विज्ञेयो यस्मै लब्धा हि दक्षिणा ॥ ॥ होम-तर्पण विधि ॥ दशांशं होमयेत्तदनु तर्पयेत् । अथ हैके यज्ञान् कामानद्वैतज्ञानादीननिरुद्धसरस्वतीति । अथ हैषः कालिकामनुजापी यः सदा शुद्धात्मा ज्ञानवैराग्ययुक्तः शाम्भवीदीक्षासु रक्तः शाक्तासु । यदि वा ब्रह्मचारी रात्रौ नग्नः सर्वदा मधुनाऽशक्तो मनसा जपपूजादिनियमवान् । ॥ साधक लक्षण ॥ योषित्प्रियकरो भगोदकेन तर्पणं तेनैव पूजनं कुर्यात् । सर्वदा कालिकारूपमात्मानं विभावयेत् । स सर्वदा योषिदासक्तो भवेत् । स सर्वहत्यां तरति तेन मधुदानेन । अथ पञ्चमकारेण सर्वमायादिविद्यां पशुधनधान्यं सर्वेशत्वं च कवित्वं च । नान्यः परमः पन्था विद्यते मोक्षाय ज्ञानाय धर्माधर्माय । तत्सर्वं भूतं भव्यं यत्किञ्चिद्दृश्यमानं स्थावरजङ्गमं तत्सर्वं कालिकातन्त्रे ओतं प्रोतं वेद । ॥ जप फल ॥ य एवं मनुजापी स पाप्मानं तरति । स भ्रूणहत्यां तरति । सोऽगम्यागमनं तरति । स सर्वसुखमाप्नोति । स सर्वं जानाति । स सर्वसंन्यासी भवति । स विरक्तो भवति । स सर्ववेदाध्यायी भवति । स सर्वमन्त्रजापी भवति । स सर्वशास्रवेत्ता भवति । स सर्वज्ञानकारी भवति । स आवयोर्मित्रभूतो भवति । इत्याह भगवान् शिवः । निर्विकल्पेन मनसा स वन्द्यो भवति ॥ ॥ कुण्डलिनी ध्यानम् ॥ अथ हैनाम् । मूलाधारे स्मरेद्दिव्यं त्रिकोणं तेजसां निधिम् । शिखा आनीय तस्याग्नेरथ तूर्ध्वं व्यवस्थिता ॥ नीलतोयदमध्यस्था विद्युल्लेखेव भास्वरा । नीवारशूकवत्तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा ॥ तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः । स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥ स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः । इति कुण्डलिनीं ध्यात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ॥ विनियोग ॥ महापातकेभ्यः पूतो भूत्वा सर्वमन्त्रसिद्धिं कृत्वा भैरवो भवेत् । महाकालभैरवोऽस्य ऋषिःउष्णिक् छन्दः कालिका देवताह्रीं बीजं ह्रूं शक्तिः क्रीं कीलकं अनिरुद्धसरस्वती देवता । कवित्वे पाण्डित्यार्थे जपे विनियोगः । इत्येवमृषिच्छन्दोदैवतं ज्ञात्वा मन्त्र साफल्यमश्नुते । अथर्वविद्यां प्रथममेकं द्वयं त्रयं वा नामद्वयसम्पुटितं कृत्वा योजयेत् । गतिस्तस्यास्तीति । नान्यस्य गतिरस्तीति । ॐ सत्यम् । ॐ तत्सत् ॥ ॥ गुरु-शिष्य परम्परा ॥ अथ हैनं गुरुं परितोष्यैनं मन्त्रराजं गृह्णीयात् । मन्त्रराजं गुरुस्तमपि शिष्याय सत्कुलीनाय विद्याभक्ताय सुवेषां स्त्रियं स्पृष्ट्वा स्वयं निशायां निरुपद्रवः परिपूज्य एकाकी शिवगेहे लक्षं तदर्धं वा जपित्वा दद्यात् । ॐ ॐ ॐ सत्यं सत्यं सत्यम् । नान्यप्रकारेण सिद्धिर्भवति । अथाह वै कालिकामनोस्तारामनोस्त्रिपुरामनोः सर्वदुर्गामनोर्वा स्वरूपसिद्धिरेवमिति शिवम् ॥ ॥ इत्याथर्वणे सौभाग्यकाण्डे कालिकोपनिषत् समाप्ता ॥ ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

परिचय: कालिकोपनिषत्

कालिकोपनिषत् (Kalika Upanishad) अथर्ववेद के सौभाग्यकाण्ड में स्थित एक अत्यंत दुर्लभ तांत्रिक उपनिषद है। यह उपनिषद वैदिक और तांत्रिक परम्पराओं का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती है।

इस उपनिषद में माँ दक्षिण काली को ब्रह्मस्वरूपिणी बताया गया है जो ब्रह्मरन्ध्र (सहस्रार चक्र) में विराजमान हैं। यह उपनिषद मन्त्रराज की सिद्धि, कुण्डलिनी योग और मोक्ष मार्ग का विधिवत वर्णन करती है।

इसमें स्पष्ट कहा गया है—"नान्यः परमः पन्था विद्यते मोक्षाय" अर्थात् मोक्ष के लिए इससे श्रेष्ठ कोई अन्य मार्ग नहीं है।

ऋषि-छन्द-देवता

  • ऋषि: महाकालभैरव
  • छन्द: उष्णिक्
  • देवता: कालिका / अनिरुद्धसरस्वती
  • बीज: ह्रीं
  • शक्ति: ह्रूं
  • कीलक: क्रीं
  • विनियोग: कवित्व और पाण्डित्य प्राप्ति के लिए जप

कुण्डलिनी ध्यान

इस उपनिषद में कुण्डलिनी शक्ति का अत्यंत सुन्दर वर्णन है। मूलाधार चक्र में त्रिकोण के मध्य तेजोमय कुण्डलिनी को धारण करें जो:

  • नीलतोयदमध्यस्था—नीले मेघों के मध्य विद्युत रेखा जैसी
  • नीवारशूकवत्तन्वी—धान की बाली जैसी सूक्ष्म
  • पीता भास्वत्यणूपमा—पीत वर्ण, सूर्य जैसी प्रकाशमान

इस कुण्डलिनी शिखा के मध्य परमात्मा विराजमान हैं जो ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, विष्णु, प्राण, काल, अग्नि और चन्द्रमा स्वयं हैं। इस प्रकार कुण्डलिनी का ध्यान करने से सर्वपापों से मुक्ति होती है।

मन्त्रराज जप के फल

उपनिषद के अनुसार एक लाख जप से:
  • पाप नाश: सभी पापों का नाश होता है
  • ब्रह्मत्व: ब्रह्म का अनुभव होता है
  • अमृतत्व: अमरता की प्राप्ति होती है
  • आयुरारोग्य: दीर्घ आयु और निरोगता मिलती है
  • ऐश्वर्य: सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त होता है
  • जीवन्मुक्ति: जीवित रहते मोक्ष मिलता है
  • सर्वज्ञता: सभी शास्त्रों का ज्ञान होता है
  • अणिमादि सिद्धि: अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं

पञ्चदश कालिका (15 काली देवियाँ)

इस उपनिषद में पञ्चदश कोणगत 15 काली देवियों के नाम दिए गए हैं:
  1. काली
  2. कपालिनी
  3. कुल्ला
  4. कुरुकुल्ला
  5. विरोधिनी
  6. विप्रचित्ता
  7. उग्रा
  8. उग्रप्रभा
  9. दीप्ता
  10. नीला
  11. घना
  12. बलाका
  13. मात्रा
  14. मुद्रा
  15. अमिता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. कालिकोपनिषत् किस वेद से है?

यह उपनिषद अथर्ववेद के सौभाग्यकाण्ड से है। इसे शाक्त उपनिषदों में गिना जाता है।

2. क्या यह उपनिषद केवल संन्यासियों के लिए है?

नहीं, उपनिषद में ब्रह्मचारी और गृहस्थ दोनों के लिए मार्ग बताया गया है। मुख्य बात गुरु-दीक्षा और शुद्ध भाव है।

3. मन्त्रराज क्या है?

यहाँ मन्त्रराज से तात्पर्य माँ काली के मूल बीज मंत्र से है जो गुरु से प्राप्त होता है। इसकी सिद्धि से अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

4. पञ्चमकार पूजा का क्या अर्थ है?

यह तांत्रिक पूजा पद्धति है जिसमें पाँच 'म' से शुरू होने वाली वस्तुओं का उपयोग होता है। इसे केवल दीक्षित साधक ही गुरु के निर्देशन में करें।

5. इसमें कुण्डलिनी का वर्णन क्यों है?

माँ काली और कुण्डलिनी शक्ति अभिन्न हैं। कुण्डलिनी सहस्रार में पहुँचकर ब्रह्मस्वरूपिणी काली से मिलती है—यही मोक्ष है।

6. "ॐ सत्यम् ॐ तत्सत्" का क्या महत्व है?

यह वैदिक प्रमाणवाक्य है जो उपनिषद की प्रामाणिकता को सिद्ध करता है। इसे पाठ के अंत में तीन बार बोला जाता है।

7. एक लाख जप का समय कितना लगता है?

प्रतिदिन 1000 जप से लगभग 100 दिन (साढ़े तीन माह) में एक लाख जप पूर्ण होता है। यह पुरश्चरण कहलाता है।

8. अनिरुद्धसरस्वती देवता कौन हैं?

इस उपनिषद में कालिका और अनिरुद्धसरस्वती दोनों को देवता बताया गया है। अनिरुद्धसरस्वती वाक् सिद्धि की देवी हैं जो कवित्व प्रदान करती हैं।

9. क्या महिलाएं इस उपनिषद का अध्ययन कर सकती हैं?

हाँ, शाक्त परम्परा में महिलाओं को विशेष अधिकार है। माँ काली की उपासना में स्त्रियाँ स्वाभाविक अधिकारिणी हैं।

10. गुरु-शिष्य परम्परा का क्या महत्व है?

उपनिषद स्पष्ट कहती है—"नान्यप्रकारेण सिद्धिर्भवति"—गुरु के बिना सिद्धि नहीं होती। गुरु सत्कुलीन, विद्याभक्त शिष्य को ही मन्त्र प्रदान करें।