Kalika Upanishad – श्री कालिकोपनिषत्

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परिचय: कालिकोपनिषत्
कालिकोपनिषत् (Kalika Upanishad) अथर्ववेद के सौभाग्यकाण्ड में स्थित एक अत्यंत दुर्लभ तांत्रिक उपनिषद है। यह उपनिषद वैदिक और तांत्रिक परम्पराओं का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती है।
इस उपनिषद में माँ दक्षिण काली को ब्रह्मस्वरूपिणी बताया गया है जो ब्रह्मरन्ध्र (सहस्रार चक्र) में विराजमान हैं। यह उपनिषद मन्त्रराज की सिद्धि, कुण्डलिनी योग और मोक्ष मार्ग का विधिवत वर्णन करती है।
इसमें स्पष्ट कहा गया है—"नान्यः परमः पन्था विद्यते मोक्षाय" अर्थात् मोक्ष के लिए इससे श्रेष्ठ कोई अन्य मार्ग नहीं है।
ऋषि-छन्द-देवता
- ऋषि: महाकालभैरव
- छन्द: उष्णिक्
- देवता: कालिका / अनिरुद्धसरस्वती
- बीज: ह्रीं
- शक्ति: ह्रूं
- कीलक: क्रीं
- विनियोग: कवित्व और पाण्डित्य प्राप्ति के लिए जप
कुण्डलिनी ध्यान
इस उपनिषद में कुण्डलिनी शक्ति का अत्यंत सुन्दर वर्णन है। मूलाधार चक्र में त्रिकोण के मध्य तेजोमय कुण्डलिनी को धारण करें जो:
- नीलतोयदमध्यस्था—नीले मेघों के मध्य विद्युत रेखा जैसी
- नीवारशूकवत्तन्वी—धान की बाली जैसी सूक्ष्म
- पीता भास्वत्यणूपमा—पीत वर्ण, सूर्य जैसी प्रकाशमान
इस कुण्डलिनी शिखा के मध्य परमात्मा विराजमान हैं जो ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, विष्णु, प्राण, काल, अग्नि और चन्द्रमा स्वयं हैं। इस प्रकार कुण्डलिनी का ध्यान करने से सर्वपापों से मुक्ति होती है।
मन्त्रराज जप के फल
- पाप नाश: सभी पापों का नाश होता है
- ब्रह्मत्व: ब्रह्म का अनुभव होता है
- अमृतत्व: अमरता की प्राप्ति होती है
- आयुरारोग्य: दीर्घ आयु और निरोगता मिलती है
- ऐश्वर्य: सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त होता है
- जीवन्मुक्ति: जीवित रहते मोक्ष मिलता है
- सर्वज्ञता: सभी शास्त्रों का ज्ञान होता है
- अणिमादि सिद्धि: अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं
पञ्चदश कालिका (15 काली देवियाँ)
- काली
- कपालिनी
- कुल्ला
- कुरुकुल्ला
- विरोधिनी
- विप्रचित्ता
- उग्रा
- उग्रप्रभा
- दीप्ता
- नीला
- घना
- बलाका
- मात्रा
- मुद्रा
- अमिता
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)