Jaganmangala Kali Kavacham – श्री काली कवचम् जगन्मङ्गलम् (अर्थ सहित)
॥ श्री काली जगन्मङ्गल कवचम् ॥भैरव्युवाच (देवी पार्वती बोलीं):
कालीपूजा श्रुता नाथ भावाश्च विविधाः प्रभो ।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि कवचं पूर्वसूचितम् ॥ १ ॥
(हे नाथ! काली पूजा और उसके विविध भावों को मैंने सुना। अब मैं उस कवच को सुनना चाहती हूँ जिसका आपने पहले संकेत किया था।)
त्वमेव शरणं नाथ त्राहि मां दुःखसङ्कटात् ।
सर्वदुःखप्रशमनं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २ ॥
(आप ही मेरे शरण हैं, मुझे दुःख और संकट से बचाइए। जो सभी दुःखों को शांत करने वाला और सभी पापों को नष्ट करने वाला है।)
सर्वसिद्धिप्रदं पुण्यं कवचं परमाद्भुतम् ।
अतो वै श्रोतुमिच्छामि वद मे करुणानिधे ॥ ३ ॥
(जो सर्वसिद्धि देने वाला, पुण्यकारी और परम अद्भुत कवच है—हे करुणानिधि! मुझे बताइए।)श्री भैरव उवाच (भगवान शिव बोले):
रहस्यं शृणु वक्ष्यामि भैरवि प्राणवल्लभे ।
श्रीजगन्मङ्गलं नाम कवचं मन्त्रविग्रहम् ॥ ४ ॥
(हे प्राणवल्लभे भैरवि! रहस्य सुनो, मैं बताता हूँ। यह 'श्री जगन्मङ्गल' नामक कवच मंत्रों का साक्षात् स्वरूप है।)
पठित्वा धारयित्वा च त्रैलोक्यं मोहयेत् क्षणात् ।
नारायणोऽपि यद्धृत्वा नारी भूत्वा महेश्वरम् ॥ ५ ॥
(इसे पढ़कर और धारण करके क्षण भर में तीनों लोकों को मोहित किया जा सकता है। इसी को धारण करके विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया था।)
योगिनं क्षोभमनयद्यद्धृत्वा च रघूद्वहः ।
वरदीप्तां जघानैव रावणादिनिशाचरान् ॥ ६ ॥
(इसी को धारण करके श्रीराम ने रावण आदि राक्षसों का वध किया था।)
यस्य प्रसादादीशोऽपि त्रैलोक्यविजयी प्रभुः ।
धनाधिपः कुबेरोऽपि सुरेशोऽभूच्छचीपतिः ॥ ७ ॥
(इसी कृपा से शिव त्रिलोकविजयी बने, कुबेर धनाधिपति बने, और इंद्र देवराज बने।)
एवं च सकला देवाः सर्वसिद्धीश्वराः प्रिये ।
श्रीजगन्मङ्गलस्यास्य कवचस्य ऋषिः शिवः ॥ ८ ॥
(इस प्रकार सभी देवता इसी से सर्वसिद्धि के स्वामी बने। इस कवच के ऋषि भगवान शिव हैं।)
छन्दोऽनुष्टुप् देवता च कालिका दक्षिणेरिता ।
जगतां मोहने दुष्टविजये भुक्तिमुक्तिषु ।
योविदाकर्षणे चैव विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ९ ॥
(छंद अनुष्टुप् है, देवता दक्षिण कालिका हैं। जगत को मोहित करने, दुष्टों पर विजय, भोग-मोक्ष, और आकर्षण में इसका विनियोग है।)॥ अथ कवचम् ॥
शिरो मे कालिका पातु क्रीङ्कारैकाक्षरी परा ।
क्रीं क्रीं क्रीं मे ललाटं च कालिका खड्गधारिणी ॥ १० ॥
(क्रीं एकाक्षरी माँ कालिका मेरे शिर की रक्षा करें। क्रीं क्रीं क्रीं—खड्गधारिणी कालिका मेरे ललाट की रक्षा करें।)
हूं हूं पातु नेत्रयुग्मं ह्रीं ह्रीं पातु श्रुतिद्वयम् ।
दक्षिणे कालिके पातु घ्राणयुग्मं महेश्वरी ॥ ११ ॥
(हूं हूं दोनों नेत्रों की, ह्रीं ह्रीं दोनों कानों की, दक्षिण कालिका महेश्वरी दोनों नासिकाओं की रक्षा करें।)
क्रीं क्रीं क्रीं रसनां पातु हूं हूं पातु कपोलकम् ।
वदनं सकलं पातु ह्रीं ह्रीं स्वाहा स्वरूपिणी ॥ १२ ॥
(क्रीं क्रीं क्रीं जिह्वा की, हूं हूं गालों की, ह्रीं ह्रीं स्वाहा स्वरूपिणी सम्पूर्ण मुख की रक्षा करें।)
द्वाविंशत्यक्षरी स्कन्धौ महाविद्याखिलप्रदा ।
खड्गमुण्डधरा काली सर्वाङ्गमभितोऽवतु ॥ १३ ॥
(बाईस अक्षरी महाविद्या दोनों कंधों की रक्षा करे। खड्ग और मुण्ड धारण करने वाली काली सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करें।)
क्रीं हूं ह्रीं त्र्यक्षरी पातु चामुण्डा हृदयं मम ।
ऐं हूं ओं ऐं स्तनद्वन्द्वं ह्रीं फट् स्वाहा ककुत्स्थलम् ॥ १४ ॥
(क्रीं हूं ह्रीं—तीन अक्षरी चामुण्डा मेरे हृदय की रक्षा करें। अन्य मंत्र वक्ष और कक्ष स्थल की रक्षा करें।)
अष्टाक्षरी महाविद्या भुजौ पातु सकर्तृका ।
क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं पातु करौ षडक्षरी मम ॥ १५ ॥
(आठ अक्षरी महाविद्या दोनों भुजाओं की, छह अक्षरी मंत्र दोनों हाथों की रक्षा करें।)
क्रीं नाभिं मध्यदेशं च दक्षिणे कालिकेऽवतु ।
क्रीं स्वाहा पातु पृष्ठं च कालिका सा दशाक्षरी ॥ १६ ॥
(क्रीं नाभि और मध्य भाग की, दशाक्षरी कालिका पीठ की रक्षा करें।)
क्रीं मे गुह्यं सदा पातु कालिकायै नमस्ततः ।
सप्ताक्षरी महाविद्या सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ १७ ॥
(क्रीं गुप्त अंगों की रक्षा करे। सात अक्षरी महाविद्या जो सभी तंत्रों में गोपनीय है।)
ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके हूं हूं पातु कटिद्वयम् ।
काली दशाक्षरी विद्या स्वाहान्ता चोरुयुग्मकम् ॥ १८ ॥
(ह्रीं ह्रीं हूं हूं—दक्षिण कालिका दोनों कटि की, दशाक्षरी विद्या दोनों जंघाओं की रक्षा करें।)
ओं ह्रीं क्रीं मे स्वाहा पातु जानुनी कालिका सदा ।
काली हृन्नामविधेयं चतुर्वर्गफलप्रदा ॥ १९ ॥
(ॐ ह्रीं क्रीं स्वाहा—कालिका सदा मेरे घुटनों की रक्षा करें। यह चारों पुरुषार्थ प्रदान करने वाली है।)
क्रीं हूं ह्रीं पातु सा गुल्फं दक्षिणे कालिकेऽवतु ।
क्रीं हूं ह्रीं स्वाहा पदं पातु चतुर्दशाक्षरी मम ॥ २० ॥
(क्रीं हूं ह्रीं—दक्षिण कालिका टखनों की, चौदह अक्षरी मंत्र पैरों की रक्षा करें।)
खड्गमुण्डधरा काली वरदाभयधारिणी ।
विद्याभिः सकलाभिः सा सर्वाङ्गमभितोऽवतु ॥ २१ ॥
(खड्ग-मुण्ड और वर-अभय धारण करने वाली काली अपनी समस्त विद्याओं से मेरे सम्पूर्ण अंगों की रक्षा करें।)॥ दिग्रक्षा ॥
काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी ।
विप्रचित्ता तथोग्रोग्रप्रभा दीप्ता घनत्विषः ॥ २२ ॥
नीला घना बलाका च मात्रा मुद्रा मिता च माम् ।
एताः सर्वाः खड्गधरा मुण्डमालाविभूषणाः ॥ २३ ॥
रक्षन्तु मां दिग्विदिक्षु ब्राह्मी नारायणी तथा ।
माहेश्वरी च चामुण्डा कौमारी चाऽपराजिता ॥ २४ ॥
वाराही नारसिंही च सर्वाश्रयातिभूषणाः ।
रक्षन्तु स्वायुधेर्दिक्षुः दशकं मां यथा तथा ॥ २५ ॥
(काली, कपालिनी, कुल्ला, कुरुकुल्ला, विरोधिनी आदि देवियाँ; ब्राह्मी, नारायणी, माहेश्वरी, चामुण्डा, कौमारी, अपराजिता, वाराही, नारसिंही—ये सभी अष्टमातृकाएँ दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें।)॥ फलश्रुति ॥
इति ते कथितं दिव्यं कवचं परमाद्भुतम् ।
श्रीजगन्मङ्गलं नाम महामन्त्रौघविग्रहम् ॥ २६ ॥
(यह दिव्य, परम अद्भुत, जगन्मङ्गल नामक कवच मैंने तुम्हें बताया जो महामंत्रों का साक्षात् स्वरूप है।)
त्रैलोक्याकर्षणं ब्रह्मकवचं मन्मुखोदितम् ।
गुरुपूजां विधायाथ विधिवत् प्रपठेत्ततः ॥ २७ ॥
(यह त्रैलोक्य को आकर्षित करने वाला ब्रह्मकवच मेरे मुख से निकला है। गुरु पूजा करके विधिवत् पाठ करें।)
कवचं त्रिःसकृद्वापि यावज्ज्ञानं च वा पुनः ।
एतच्छतार्धमावृत्य त्रैलोक्यविजयी भवेत् ॥ २८ ॥
(तीन बार या जितना ज्ञान हो उतनी बार पाठ करें। 50 बार पाठ करने से त्रैलोक्य विजय होती है।)
त्रैलोक्यं क्षोभयत्येव कवचस्य प्रसादतः ।
महाकविर्भवेन्मासात् सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥ २९ ॥
(इस कवच की कृपा से त्रीनों लोक क्षुब्ध होते हैं। एक मास में महाकवि बनता है और सर्वसिद्धि का स्वामी होता है।)
पुष्पाञ्जलीन् कालिकायै मूलेनैव पठेत् सकृत् ।
शतवर्षसहस्राणां पूजायाः फलमाप्नुयात् ॥ ३० ॥
(मूल मंत्र से एक बार पुष्पांजलि देने से सौ हजार वर्ष की पूजा का फल मिलता है।)
भूर्जे विलिखितं चैतत् स्वर्णस्थं धारयेद्यदि ।
शिखायां दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा धारणाद्बुधः ॥ ३१ ॥
(भोजपत्र पर लिखकर स्वर्ण में मढ़वाकर शिखा, दाहिनी भुजा या गले में धारण करें।)
त्रैलोक्यं मोहयेत् क्रोधात् त्रैलोक्यं चूर्णयेत् क्षणात् ।
पुत्रवान् धनवान् श्रीमान् नानाविद्यानिधिर्भवेत् ॥ ३२ ॥
(त्रैलोक्य को मोहित कर सकता है, क्षण में चूर्ण कर सकता है। पुत्रवान, धनवान, श्रीमान और विद्या का भंडार बनता है।)
ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि तद्गात्रस्पर्शनात्ततः ।
नाशमायान्ति सर्वत्र कवचस्यास्य कीर्तनात् ॥ ३३ ॥
(ब्रह्मास्त्र जैसे शस्त्र भी इसके प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं।)
मृतवत्सा च या नारी वन्ध्या वा मृतपुत्रिणी ।
बह्वपत्या जीववत्सा भवत्येव न संशयः ॥ ३४ ॥
(जिस स्त्री के पुत्र मर जाते हों, जो बाँझ हो या मृत संतान हो—वह बहु संतान वाली और जीवित संतान वाली होती है, इसमें संशय नहीं।)
न देयं परशिष्येभ्यो ह्यभक्तेभ्यो विशेषतः ।
शिष्येभ्यो भक्तियुक्तेभ्यो ह्यन्यथा मृत्युमाप्नुयात् ॥ ३५ ॥
(इसे अन्य के शिष्यों को या अभक्तों को न दें। केवल भक्तियुक्त शिष्यों को ही दें, अन्यथा मृत्यु होती है।)
स्पर्धामुद्धूय कमला वाग्देवी मन्दिरे मुखे ।
पौत्रान्तं स्थैर्यमास्थाय निवसत्येव निश्चितम् ॥ ३६ ॥
(लक्ष्मी और सरस्वती की स्पर्धा समाप्त होकर दोनों घर और मुख में पौत्र पर्यंत स्थिर रहती हैं।)
इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद्दक्षकालिकाम् ।
शतलक्षं प्रजप्त्वापि तस्य विद्या न सिद्ध्यति ॥ ३७ ॥
(इस कवच को जाने बिना जो दक्षिण कालिका का जप करता है, सौ लाख जप करने पर भी उसकी विद्या सिद्ध नहीं होती।)
सहस्रघातमाप्नोति सोऽचिरान्मृत्युमाप्नुयात् ।
जपेदादौ जपेदन्ते सप्तवाराण्यनुक्रमात् ॥ ३८ ॥
(और वह हजारों कष्ट पाता है, शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होता है। अतः जप के आरंभ और अंत में सात-सात बार इस कवच का पाठ करें।)
नोधृत्य यत्र कुत्रापि गोपनीयं प्रयत्नतः ।
लिखित्वा स्वर्णपात्रे वै पूजाकाले तु साधकः ।
मूर्ध्निं धार्य प्रयत्नेन विद्यारत्नं प्रपूजयेत् ॥ ३९ ॥
(इसे कहीं भी प्रकट न करें, गोपनीय रखें। स्वर्णपात्र में लिखकर पूजाकाल में मस्तक पर धारण करके विद्यारत्न की पूजा करें।)॥ इति श्री काली जगन्मङ्गल कवचम् सम्पूर्णम् ॥
श्री काली जगन्मङ्गल कवचम् (Jaganmangala Kali Kavacham) भगवान शिव (भैरव) द्वारा देवी पार्वती (भैरवी) को बताया गया अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली तांत्रिक कवच है। संस्कृत में 'जगत्' का अर्थ है संपूर्ण संसार और 'मङ्गल' का अर्थ है कल्याण। अतः इस कवच का नाम 'जगन्मङ्गल' है क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत का मंगल करता है।
यह कवच भैरव-भैरवी संवाद के रूप में है—जहाँ देवी भैरवी (पार्वती) शिव से इस कवच की याचना करती हैं और भगवान भैरव (शिव) इसे प्रकट करते हैं। तंत्र शास्त्र में ऐसे संवाद अत्यंत पवित्र और प्रामाणिक माने जाते हैं।
इस कवच में दक्षिण कालिका के विभिन्न बीज मंत्रों—क्रीं, हूं, ह्रीं—द्वारा शरीर के प्रत्येक अंग (शिर से पैर तक) की रक्षा का विधान है। साथ ही अष्टमातृकाओं (ब्राह्मी, नारायणी, माहेश्वरी, चामुण्डा, कौमारी, अपराजिता, वाराही, नारसिंही) द्वारा दसों दिशाओं में रक्षा का प्रावधान है।
इस कवच का विशिष्ट महत्व
शिव स्वयं इस कवच के बारे में कहते हैं कि यह 'मंत्रविग्रह' है—अर्थात् मंत्रों का साक्षात् शरीर। इसके महत्व को समझने के लिए शिव ने कुछ ऐतिहासिक उदाहरण दिए:
भगवान विष्णु: इसी कवच को धारण करके विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और समुद्र मंथन के समय असुरों को मोहित कर दिया।
श्रीराम: इसी कवच की शक्ति से रघुकुल के वंशज श्रीराम ने रावण और अन्य राक्षसों का वध किया।
भगवान शिव: इसी कृपा से शिव त्रिलोकविजयी बने।
कुबेर: इसी प्रसाद से धन के स्वामी बने।
इंद्र: इसी से देवराज का पद प्राप्त किया।
कवच में ऋषि, छंद और देवता का स्पष्ट उल्लेख है: ऋषि—भगवान शिव, छंद—अनुष्टुप्, देवता—दक्षिण कालिका। इसके विनियोग (उपयोग) भी बताए गए हैं: जगत को मोहित करना, दुष्टों पर विजय, भोग-मोक्ष प्राप्ति, और आकर्षण।
कवच के प्रमुख लाभ (फलश्रुति के अनुसार)
इस कवच की फलश्रुति अत्यंत विस्तृत है (श्लोक 26-39)। प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:
1. त्रैलोक्य विजय और आकर्षण
"त्रैलोक्यं मोहयेत् क्षणात्"—इसे पढ़ने और धारण करने से तीनों लोकों को क्षणभर में मोहित किया जा सकता है। 50 बार पाठ से त्रैलोक्य विजय होती है।
2. संतान प्राप्ति (अत्यंत महत्वपूर्ण)
"मृतवत्सा च या नारी वन्ध्या वा मृतपुत्रिणी बह्वपत्या जीववत्सा भवत्येव"—जिस स्त्री के पुत्र मर जाते हों, जो बाँझ हो, या जिसकी संतान जीवित न रहती हो—वह बहु संतान और जीवित संतान वाली होती है। यह इस कवच का सबसे महत्वपूर्ण लाभ है।
3. धन, विद्या और कीर्ति
"पुत्रवान् धनवान् श्रीमान् नानाविद्यानिधिर्भवेत्"—पाठक पुत्रवान, धनवान, श्रीमान और अनेक विद्याओं का भंडार बनता है। एक मास में महाकवि बन जाता है।
4. शस्त्र और अस्त्र से रक्षा
"ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि"—ब्रह्मास्त्र जैसे दिव्यास्त्र भी इसके प्रभाव से निष्फल हो जाते हैं। आधुनिक संदर्भ में यह सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और शत्रुओं से रक्षा का प्रतीक है।
5. लक्ष्मी और सरस्वती का स्थायी वास
"स्पर्धामुद्धूय कमला वाग्देवी"—सामान्यतः लक्ष्मी (धन) और सरस्वती (विद्या) में स्पर्धा मानी जाती है। इस कवच से दोनों की स्पर्धा समाप्त होकर दोनों स्थायी रूप से निवास करती हैं।
6. दक्षिण कालिका मंत्र सिद्धि
"इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद्दक्षकालिकाम्"—इस कवच को जाने बिना जो दक्षिण कालिका का जप करता है, सौ लाख जप करने पर भी उसकी विद्या सिद्ध नहीं होती। अतः काली उपासकों के लिए यह कवच आवश्यक है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
पाठ विधि (कवच में बताई गई)
गुरु पूजा करके विधिवत् पाठ करें (श्लोक 27)।
दक्षिण कालिका मंत्र जप के आरंभ और अंत में 7-7 बार इस कवच का पाठ अवश्य करें (श्लोक 38)।
भोजपत्र पर लिखकर स्वर्ण में मढ़वाकर शिखा, दाहिनी भुजा या गले में धारण करें (श्लोक 31)।
पूजाकाल में मस्तक पर धारण करके विद्यारत्न की पूजा करें (श्लोक 39)।
इसे गोपनीय रखें, अभक्तों या परशिष्यों को न बताएं (श्लोक 35)।
विशेष अवसर
नवरात्रि—विशेषकर अष्टमी और महानवमी।
काली पूजा (कार्तिक अमावस्या/दीपावली की रात)।
मंगलवार और शनिवार—रात्रि में विशेष प्रभावी।
अमावस्या—विशेषकर मंगलवार या शनिवार की।
ग्रहण काल—मंत्र सिद्धि के लिए सर्वोत्तम।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'जगन्मङ्गल' का क्या अर्थ है?
'जगत्' का अर्थ है संसार और 'मङ्गल' का अर्थ है कल्याण। जगन्मङ्गल अर्थात् सम्पूर्ण संसार का कल्याण करने वाला। यह नाम स्वयं भगवान शिव ने दिया है।
2. यह कवच किसने किसे बताया?
यह कवच भगवान शिव (भैरव) ने देवी पार्वती (भैरवी) को बताया। यह भैरव-भैरवी संवाद के रूप में है जो तंत्र शास्त्र में सबसे प्रामाणिक माना जाता है।
3. इस कवच के ऋषि, छंद और देवता कौन हैं?
ऋषि: भगवान शिव, छंद: अनुष्टुप्, देवता: दक्षिण कालिका। विनियोग: जगत मोहन, दुष्ट विजय, भुक्ति-मुक्ति, आकर्षण।
4. 'क्रीं', 'हूं', 'ह्रीं' क्या हैं?
ये बीज मंत्र हैं। क्रीं—काली बीज, हूं—शिव बीज (कूर्च बीज), ह्रीं—माया बीज। इस कवच में विभिन्न अंगों की रक्षा के लिए इन बीज मंत्रों के विभिन्न संयोजन प्रयुक्त हुए हैं।
5. दक्षिण कालिका कौन हैं?
दक्षिण कालिका माँ काली का सबसे प्रसिद्ध और उपासित स्वरूप है। उन्हें 'दक्षिण' कहा जाता है क्योंकि वे दक्षिण (अनुकूल) हैं अर्थात् भक्तों के प्रति कृपालु हैं। कोलकाता का कालीघाट और दक्षिणेश्वर मंदिर दक्षिण काली के प्रसिद्ध तीर्थ हैं।
6. संतान प्राप्ति के लिए इसका पाठ कैसे करें?
जो दंपति संतान के लिए प्रयासरत हैं या जिनकी संतान जीवित नहीं रहती, वे शुक्ल पक्ष के मंगलवार से आरंभ करके 43 दिन तक प्रतिदिन 11 बार इस कवच का पाठ करें। साथ में "ॐ क्रीं कालिकायै नमः" का 108 जप भी करें।
7. क्या बिना दीक्षा के इसका पाठ कर सकते हैं?
यह कवच स्तोत्र श्रेणी में आता है, जिसका पाठ बिना दीक्षा के भी किया जा सकता है। हालांकि, काली मंत्र जप (जैसे दक्षिण काली मंत्र) के लिए दीक्षा लाभकारी है। कवच में स्पष्ट है कि गुरु पूजा करके पाठ करना चाहिए।
8. अष्टमातृकाएँ कौन हैं जो दिशाओं में रक्षा करती हैं?
अष्टमातृकाएँ आठ देवियाँ हैं: ब्राह्मी (ब्रह्मा की शक्ति), माहेश्वरी (शिव की), कौमारी (कार्तिकेय की), वैष्णवी/नारायणी (विष्णु की), वाराही (वराह की), इंद्राणी (इंद्र की), चामुण्डा (देवी की), नारसिंही (नरसिंह की)। ये दसों दिशाओं में रक्षा करती हैं।
9. इसे भोजपत्र पर लिखकर धारण करने की विधि क्या है?
शुभ मुहूर्त (नवरात्रि या काली पूजा) में अष्टगंध से भोजपत्र पर यह कवच लिखें। इसे स्वर्ण या चांदी के ताबीज में मढ़वाएं। शिखा (चोटी), दाहिनी भुजा, या गले में धारण करें। धारण से पहले पूजा करें और प्राण प्रतिष्ठा करवाएं।
10. "इसे गोपनीय रखें" का क्या अर्थ है?
तांत्रिक परंपरा में कुछ विद्याएं गोपनीय मानी जाती हैं। इसका अर्थ है कि इसे अभक्तों, संशयग्रस्त व्यक्तियों, या अनधिकारियों को न बताएं। जो भक्तियुक्त शिष्य हो, जिसकी श्रद्धा हो, उसे ही बताएं। यह निषेध प्रकाशन या पाठ का नहीं, बल्कि अयोग्य व्यक्तियों को मंत्र देने का है।