नवग्रह करावलम्ब स्तोत्रम्
Navagraha Karavalamba Stotram

श्री नवग्रह करावलम्ब स्तोत्रम् का परिचय
श्री नवग्रह करावलम्ब स्तोत्रम् नवग्रहों की स्तुति कर उनसे रक्षा, सहारा और जीवनोत्कर्ष की प्रार्थना करने हेतु एक अत्यन्त सुन्दर और प्रभावशाली स्तोत्र है। संस्कृत साहित्य में 'करावलम्ब' स्तोत्रों की एक विशेष परम्परा है (जैसे श्री लक्ष्मी नृसिंह करावलम्ब स्तोत्रम्)। 'कर' का अर्थ है हाथ और 'अवलम्ब' का अर्थ है सहारा।
जब मनुष्य जीवन की कठिनाइयों, रोगों, दुःखों और ग्रह जनित बाधाओं के भवसागर में डूबने लगता है, तो वह भगवान से प्रार्थना करता है कि "मम देहि करावलम्बम्" — हे देव! मुझे अपने हाथों का सहारा देकर इस विपत्ति से बाहर निकाल लें। इस स्तोत्र में नौ ग्रहों में से प्रत्येक को एक श्लोक समर्पित कर यह करुण पुकार की गई है।
स्तोत्र की संरचना अत्यन्त सुव्यवस्थित है। प्रथम श्लोक सूर्यदेव को समर्पित है, द्वितीय चन्द्रदेव को, तृतीय मंगल को, और इसी क्रम में नवें श्लोक तक केतु की स्तुति है। दसवें श्लोक में फलश्रुति है, जो इस स्तोत्र के पाठ का माहात्म्य बताती है।
श्लोकों में निहित नवग्रहों का मर्म
इस स्तोत्र में ग्रहों के स्वरूप, प्रकृति और उनके दान (वर) का अत्यन्त सटीक काव्यमय वर्णन है:
१. सूर्य (आदित्य): सूर्य को 'भुवनत्रय मूलशक्ते' (तीनों लोकों की मूल शक्ति) और मनुष्यों को वीर्य (सामर्थ्य) एवं वरदान देने वाला आदिदेव कहा गया है। २. चन्द्र (शशांक): चन्द्रमा को नक्षत्राधिपति, क्षीर-सागर से उत्पन्न (क्षीराब्धिजात) और देवी लक्ष्मी (भार्गवी) का सहोदर भाई मानकर स्तुति की गई है। ३. मंगल (भूमिजात): शिव के अंश से उत्पन्न (रुद्रात्मजात), पृथ्वी-पुत्र मंगल को रोगों का हर्ता (रोगार्तिहार) और ऋणों से मुक्ति दिलाने वाला (ऋणमोचक) कहा गया है। ४. बुध (सौम्यदेव): चन्द्रमा के पुत्र बुध को नारायण का प्रिय, सुपण्डित और मधुरभाषी (चारुभाषिन्) बताकर उनसे बुद्धि की प्रखरता (धीपाटवपरद) माँगी गई है।
५. गुरु (वागीश): देवगुरु बृहस्पति को वेदान्त ज्ञान का भण्डार, योगीश और वागीश (वाणी के स्वामी) कहा गया है, जिनके चरणों की वन्दना ब्रह्मादि देवता भी करते हैं। ६. शुक्र: दैत्यगुरु शुक्र को उल्लास देने वाले, लक्ष्मी के भाई और कलात्मक भाग्य देने वाले के रूप में स्मरण किया गया है। ७. शनि (मार्तण्डजात): सूर्य-छाया पुत्र और यमराज के बड़े भाई शनि को शुद्ध आत्मज्ञानी, कालरूप, मन्दगामी और कष्ट-अनिष्ट करने वाला बताकर उनसे शरणागति माँगी गई है।
८. राहु: सर्पों के स्वामी और सूर्य-चन्द्रमा का मर्दन (ग्रहण) करने वाले राहु को 'गोमेद' रत्न धारण करने वाला बताकर उनसे सहारा माँगा गया है। ९. केतु: सूर्य-चन्द्र को पीड़ित करने वाले राहु (सिंहिकातनय) के परम मित्र केतु को मुक्तिदायी (मोक्षकारक) बताकर स्तुति की गई है।
स्तोत्र पाठ की विधि एवं लाभ
फलश्रुति (श्लोक 10) स्पष्ट करती है कि जो व्यक्ति इस 'करावलम्ब स्तोत्र' का नियमित पाठ करता है, वह सभी मनोरथों (सकलांश्च मनोरथारान्) को प्राप्त कर लेता है।
पाठ विधि: इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से तब करना चाहिए जब गोचर में ग्रह विपरीत हों, जन्म कुण्डली में शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही हो, अथवा राहु-केतु की महादशा-अन्तर्दशा में संघर्ष बढ़ गया हो।
प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके, नवग्रह यन्त्र अथवा नवग्रहों का ध्यान करते हुए इस स्तोत्र का 1, 3 या 11 बार पाठ करना अत्यन्त शान्तिदायक और संकटमोचक सिद्ध होता है। यह स्तोत्र नवग्रहों के क्रोध को शान्त कर उनकी करुणा को जाग्रत करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)