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नवग्रह ध्यान मन्त्राः (साधुसङ्कुलि तन्त्रान्तर्गतम्)

Navagraha Dhyana Mantras - Sadhusankuli Tantra

नवग्रह ध्यान मन्त्राः (साधुसङ्कुलि तन्त्रान्तर्गतम्)
॥ नवग्रह ध्यान मन्त्राः ॥ ॥ साधुसङ्कुलि तन्त्रान्तर्गतम् ॥ ॥ ग्रहपुरश्चरण प्रयोगः ॥ ॥ १. श्री सूर्य ध्यानम् ॥ ॐ रक्तपद्मासनं देवं चतुर्बाहुसमन्वितम् । क्षत्रियं रक्तवर्णञ्च गोत्रं काश्यपसम्भवम् ॥ सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं सर्वसिद्धिदम् । द्विभुजं रक्तपद्मैश्च संयुक्तं परमाद्भुतम् ॥ कलिङ्गदेशजं देवं मौलिमाणिक्यभूषणम् । त्रिनेत्रं तेजसा पूर्णमुदयाचलसंस्थितम् ॥ द्वादशाङ्गुल-विस्तीर्णं प्रवरं घृतकौशिकम् । शिवाधिदैवं पूर्वास्यं ब्रह्मप्रत्यधिदैवतम् ॥ बीज मन्त्रः — क्लीं ऐं श्रीं ह्रीं सूर्याय नमः । ॥ २. श्री चन्द्र ध्यानम् ॥ ॐ शुक्लं शुक्लाम्बरधरं श्वेताब्जस्थं चतुर्भुजम् । हारकेयूरनूपुरैर्मण्डितं तमसापहम् ॥ सुखदृश्यं सुधायुक्त-मात्रेयं वैश्यजातिजम् । कलङ्काङ्कितसर्वाङ्गं केशपाशातिसुन्दरम् ॥ मुकुटेर्मणिमाणिक्यैः शोभनीयं तु लोचनम् । योषित्प्रियं महानन्दं यमुनाजलसम्भवम् ॥ उमाधिदैवतं देवमापप्रत्यधिदैवतम् ॥ बीज मन्त्रः — ह्रीं ह्रीं हुं सोमाय स्वाहा । ॥ ३. श्री मंगल (कुज) ध्यानम् ॥ ॐ मेषाधिरूढं द्विभुजं शक्तिचापधरं मुदा । रक्तवर्णं महातेजं तेजस्वीनां समाकुलम् ॥ रक्तवस्त्रपरिधानं नानालङ्कारसंयुतम् । रक्ताङ्गं धरणीपुत्रं रक्तमाल्यानुलेपनम् ॥ हस्ते वाराहदशनं पृष्ठे तूणसमन्वितम् । कटाक्षाद् भीतिजनकं महामोहप्रदं महत् ॥ महाचापधरं देवं महोग्रमुग्रविग्रहम् । स्कन्दादिदैवं सूर्यास्यं क्षितिप्रत्यधिदैवतम् ॥ बीज मन्त्रः — ह्रीं ॐ ऐं कुजाय स्वाहा । ॥ ४. श्री बुध ध्यानम् ॥ ॐ सुतप्तस्वर्णाभतनुं रोमराजिविराजितम् । द्विभुजं स्वर्णदण्डेव शरच्चन्द्रनिभाननम् ॥ चरणे रत्नमञ्जीरं कुमारं शुभलक्षणम् । स्वर्णयज्ञोपवीतञ्च पीतवस्त्रयुगावृतम् ॥ अत्रिगोत्रसमुत्पन्नं वैश्यजातिं महाबलम् । मागधं महिमापूर्णं द्विनेत्रं द्विभुजं शुभम् ॥ नारायणाधिदैवञ्च विष्णुप्रत्यधिदैवतम् । चिन्तयेत् सोमतनयं सर्वाभिष्टफलप्रदम् ॥ बीज मन्त्रः — ॐ क्लीं ॐ बुधाय स्वाहा । ॥ ५. श्री गुरु (बृहस्पति) ध्यानम् ॥ ॐ कनकरुचिरगौरं चारुमूर्तिं प्रसन्नं द्विभुजमपि सरजौ संदधानं सुरेज्यम् । वसनयुगदधानं पीतवस्त्रं सुभद्रं सुरवरनरपूज्यमङ्गिरोगोत्रयुक्तम् ॥ द्विजवरकुलजातं सिन्धुदेशप्रसिद्धं त्रिजगति गणश्रेष्ठश्चाधिदैवं तदीयम् । सकलगिरिनिहन्ता इन्द्रः प्रत्याधिदैवं ग्रहगणगुरुनाथं तं भजेऽभीष्टसिद्धौ ॥ बीज मन्त्रः — रं यं ह्रीं ऐं गुरवे नमः । ॥ ६. श्री शुक्र ध्यानम् ॥ ॐ शुक्लाम्बरं शुक्लरुचिं सुदीप्तं तुषारकुन्देन्दुद्युतिं चतुर्भुजम् । इन्द्राधिदैवं शचीप्रत्याधिदैवं वेदार्थविज्ञं च कविं कवीनाम् ॥ भृगुगोत्रयुक्तं द्विजजातिमात्रं दितीन्द्रपूज्यं खलु शुद्धिशान्तम् । सर्वार्थसिद्धिप्रदमेव काव्यं भजेऽप्यहं भोजकतोद्भवं भृगुम् ॥ बीज मन्त्रः — हुं हुं श्रीं श्रीं नं रं शुक्राय स्वाहा । ॥ ७. श्री शनि ध्यानम् ॥ ॐ सौरिं गृध्रगतातिकृष्णवपुषं कालाग्निवत् सङ्कुलं संयुक्तं भुजपल्लवैरुपलसत्स्तम्भैश्चतुर्भिः समैः । भीमं चोग्रमहाबलातिवपुषं बाधागणैः संयुतं गोत्रं काश्यपजं सुराष्ट्रविभवं कालाग्निदैवं शनिम् ॥ वस्त्रैः कृष्णमयैर्युतं तनुवरं तं सूर्यसूनुं भजे ॥ बीज मन्त्रः — ह्रीं क्लीं शनैश्चराय नमः । ॥ ८. श्री राहु (तमस्) ध्यानम् ॥ ॐ महिषस्थं कृष्णं वदनमयविभुं कर्णनासाक्षिमात्रम् कारालास्यं भीमं गदविभवयुतं श्यामवर्णं महोग्रम् । पैठीनं गोत्रयुक्तं रविशशीदमनं चाधिदैवं यमोऽपि सर्पप्रत्यधिदैवतं मलयगीर्भावं तं तमसं नमामि ॥ बीज मन्त्रः — वं ऐं वं वं क्लीं वं तमसे स्वाहा । ॥ ९. श्री केतु ध्यानम् ॥ ॐ महोग्रं धूमाभं करचरणयुतं छिन्नशीर्षं सुदीप्तम् हस्ते वाणं कृपाणं त्रिशिखशशिधृतं वेदहस्तं प्रसन्नम् । ब्रह्मा तस्याधिदैवं सकलगदयुतं सर्पप्रत्यधिदैवं ध्यायेत् केतुं विशालं सकलसुरनरे शान्तिदं पुष्टिदञ्च ॥ बीज मन्त्रः — श्रीं श्रीं आं वं रं लं केतवे स्वाहा । ॥ इति साधुसङ्कुलि तन्त्रान्तर्गतं नवग्रहध्यानमन्त्राः सम्पूर्णाः ॥

नवग्रह ध्यान मन्त्राः (साधुसङ्कुलि तन्त्र) का परिचय

नवग्रह ध्यान मन्त्राः साधुसङ्कुलि तन्त्र से लिए गए हैं। यह एक दुर्लभ तान्त्रिक ग्रन्थ है जिसमें ग्रहपुरश्चरण प्रयोग के अन्तर्गत नवों ग्रहों के विस्तृत ध्यान मन्त्र दिए गए हैं। प्रत्येक ग्रह के लिए उसका रूप वर्णन (शरीर का वर्ण, भुजाओं की संख्या, वाहन, वस्त्र, आभूषण), गोत्र, जाति, देश, अधिदैवत, प्रत्यधिदैवत और बीज मन्त्र — सब कुछ विस्तार से दिया गया है।
पुरश्चरण का अर्थ है — मन्त्र को सिद्ध करने की विशेष विधि। ग्रहपुरश्चरण में प्रत्येक ग्रह के ध्यान मन्त्र का पाठ करके उसके बीज मन्त्र का निश्चित संख्या में जप किया जाता है। यह विधि ग्रहदोष निवारण, ग्रह शान्ति, दशा-अन्तर्दशा परिवर्तन के समय विशेष रूप से प्रभावी मानी जाती है।
सामान्य नवग्रह मन्त्रों में केवल बीज मन्त्र या स्तोत्र होते हैं, परन्तु इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि प्रत्येक ग्रह का सम्पूर्ण ध्यान चित्र प्रस्तुत किया गया है। उपासक जब इन श्लोकों का पाठ करता है, तो वह ग्रह के दिव्य स्वरूप का मानसिक दर्शन (विज़ुअलाइज़ेशन) कर सकता है, जो ध्यान को अत्यन्त प्रभावशाली बनाता है।

नवग्रह — अधिदैवत एवं प्रत्यधिदैवत

प्रत्येक ग्रह का एक अधिदैवत (presiding deity) और एक प्रत्यधिदैवत (secondary deity) होता है। साधुसङ्कुलि तन्त्र में ये इस प्रकार वर्णित हैं:
सूर्य — अधिदैवत: शिव, प्रत्यधिदैवत: ब्रह्मा। सूर्य को रक्तपद्मासन पर, चतुर्भुज, क्षत्रिय, रक्तवर्ण, काश्यप गोत्र, कलिंग देश, त्रिनेत्र, सप्ताश्व रथ पर आरूढ बताया गया है। चन्द्र — अधिदैवत: उमा, प्रत्यधिदैवत: आप (जल)। शुक्लवर्ण, श्वेत कमल पर स्थित, चतुर्भुज, अत्रि गोत्र, वैश्य जाति, यमुनाजल से सम्भव। मंगल — अधिदैवत: स्कन्द, प्रत्यधिदैवत: क्षिति (पृथ्वी)। मेष वाहन, द्विभुज, शक्ति-चाप धारी, रक्तवर्ण, धरणीपुत्र। बुध — अधिदैवत: नारायण, प्रत्यधिदैवत: विष्णु। सुवर्ण शरीर, द्विभुज, अत्रि गोत्र, वैश्य, मागध, पीतवस्त्र, सोमतनय।
गुरु — अधिदैवत: गणेश, प्रत्यधिदैवत: इन्द्र। कनक (सुवर्ण) गौरवर्ण, द्विभुज, अङ्गिरा गोत्र, सिन्धु देश, ब्राह्मण। शुक्र — अधिदैवत: इन्द्र, प्रत्यधिदैवत: शची। शुक्लवर्ण, चतुर्भुज, भृगु गोत्र, ब्राह्मण, कवि कवीनाम्। शनि — अधिदैवत: कालाग्नि। गृध्र (गिद्ध) वाहन, अतिकृष्ण, चतुर्भुज, काश्यप गोत्र, सुराष्ट्र देश, सूर्यपुत्र। राहु — अधिदैवत: यम, प्रत्यधिदैवत: सर्प। महिष वाहन, कृष्ण, कराल मुख, पैठीन गोत्र, मलय देश। केतु — अधिदैवत: ब्रह्मा, प्रत्यधिदैवत: सर्प। धूम्राभ (धुएँ जैसा), छिन्नशीर्ष, वाण-कृपाण धारी, शान्तिद-पुष्टिद।

ग्रहपुरश्चरण की विधि एवं प्रयोग

ग्रहपुरश्चरण एक विशेष तान्त्रिक अनुष्ठान है। इसमें सर्वप्रथम संकल्प करें कि किस ग्रह की शान्ति या किस ग्रहदोष के निवारण हेतु पुरश्चरण कर रहे हैं। तत्पश्चात् उस ग्रह के ध्यान श्लोकों का पाठ करें — जिससे ग्रह के दिव्य स्वरूप का मानस दर्शन हो। फिर उसके बीज मन्त्र का 108 या 1008 बार जप करें। जप के दशमांश हवन, हवन के दशमांश तर्पण, और तर्पण के दशमांश मार्जन करें — यही पुरश्चरण की पूर्ण विधि है।
नवग्रह शान्ति पूजा में नवों ग्रहों के ध्यान मन्त्र क्रमशः पढ़े जाते हैं। प्रत्येक ग्रह के उचित दिशा, वर्ण के पुष्प, धूप और नैवेद्य के साथ पूजन किया जाता है। सूर्य के लिए लाल पुष्प, चन्द्र के लिए श्वेत, मंगल के लिए रक्त, बुध-गुरु के लिए पीत, शुक्र के लिए श्वेत, शनि-राहु-केतु के लिए कृष्ण वर्ण के पुष्प उचित हैं।
यह ध्यान मन्त्र ग्रह गोचर, दशा परिवर्तन, साढ़ेसाती, कालसर्प दोष, मांगलिक दोष और अन्य ग्रहजनित बाधाओं के निवारण हेतु अत्यन्त प्रभावशाली है। नियमित पाठ से ग्रहों की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में शान्ति, समृद्धि तथा स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह नवग्रह ध्यान मन्त्र किस ग्रन्थ से है?

यह साधुसङ्कुलि तन्त्र से लिया गया है। यह एक दुर्लभ तान्त्रिक ग्रन्थ है जिसमें ग्रहपुरश्चरण प्रयोग वर्णित है।

2. ग्रहपुरश्चरण प्रयोग क्या है?

ग्रहपुरश्चरण एक तान्त्रिक अनुष्ठान है जिसमें प्रत्येक ग्रह का विस्तृत ध्यान, रूप वर्णन, अधिदैवत-प्रत्यधिदैवत का स्मरण और बीज मन्त्र का निश्चित संख्या में जप किया जाता है। जप के बाद हवन, तर्पण और मार्जन — यही पूर्ण पुरश्चरण विधि है।

3. सामान्य नवग्रह मन्त्रों से यह कैसे भिन्न है?

सामान्य नवग्रह मन्त्रों में केवल बीज या स्तोत्र होते हैं। इस ग्रन्थ में प्रत्येक ग्रह का विस्तृत रूप वर्णन (वर्ण, वाहन, भुजा, वस्त्र, गोत्र, देश, अधिदैवत) सहित ध्यान मन्त्र और बीज मन्त्र दोनों हैं — जो ध्यान को अत्यन्त प्रभावशाली बनाता है।

4. प्रत्येक ग्रह का बीज मन्त्र क्या है?

सूर्य — क्लीं ऐं श्रीं ह्रीं सूर्याय नमः। चन्द्र — ह्रीं ह्रीं हुं सोमाय स्वाहा। मंगल — ह्रीं ॐ ऐं कुजाय स्वाहा। बुध — ॐ क्लीं ॐ बुधाय स्वाहा। गुरु — रं यं ह्रीं ऐं गुरवे नमः। शुक्र — हुं हुं श्रीं श्रीं नं रं शुक्राय स्वाहा। शनि — ह्रीं क्लीं शनैश्चराय नमः। राहु — वं ऐं वं वं क्लीं वं तमसे स्वाहा। केतु — श्रीं श्रीं आं वं रं लं केतवे स्वाहा।

5. इन मन्त्रों का जप कब करना चाहिए?

नवग्रह शान्ति, ग्रहदोष निवारण, ग्रह गोचर, दशा-अन्तर्दशा परिवर्तन, साढ़ेसाती, कालसर्प दोष, या नवग्रह पूजा-हवन के समय। प्रत्येक ग्रह के दिन (रवि-रविवार, सोम-सोमवार आदि) उसके मन्त्र का जप विशेष लाभदायक है।

6. सूर्य का ध्यान कैसा है?

रक्तपद्मासन पर स्थित, चतुर्भुज, क्षत्रिय, रक्तवर्ण, काश्यप गोत्र, सप्ताश्व रथ पर आरूढ, कलिंग देश, त्रिनेत्र, तेजस्वी, मौलिमाणिक्य भूषित। शिव अधिदैवत, ब्रह्मा प्रत्यधिदैवत।

7. शनि का ध्यान कैसा है?

गृध्र (गिद्ध) वाहन, अतिकृष्ण (गहरे काले) शरीर, कालाग्नि के समान, चतुर्भुज, भीम, उग्र, काश्यप गोत्र, सुराष्ट्र देश, सूर्यपुत्र, कृष्ण वस्त्रधारी। कालाग्नि अधिदैवत।

8. राहु और केतु का ध्यान कैसा है?

राहु — महिष (भैंसा) वाहन, कृष्ण, कराल मुख, गद धारी, पैठीन गोत्र, मलय देश, यम अधिदैवत, सर्प प्रत्यधिदैवत। केतु — धूम्राभ (धुएँ जैसा), छिन्नशीर्ष, वाण-कृपाण धारी, ब्रह्मा अधिदैवत, सर्प प्रत्यधिदैवत, शान्तिद-पुष्टिद।

9. नवग्रह हवन में इन मन्त्रों का प्रयोग कैसे करें?

प्रत्येक ग्रह के ध्यान श्लोकों का पाठ करें, फिर उस ग्रह के बीज मन्त्र से 108 या 1008 आहुतियाँ दें। ग्रह के अनुरूप वर्ण की सामग्री (घी, तिल, गुग्गुल आदि) हवन में प्रयोग करें। नवों ग्रहों के लिए क्रमशः यही प्रक्रिया दोहराएँ।

10. प्रत्येक ग्रह का अधिदैवत और प्रत्यधिदैवत क्या है?

सूर्य — शिव/ब्रह्मा, चन्द्र — उमा/आप, मंगल — स्कन्द/क्षिति, बुध — नारायण/विष्णु, गुरु — गणेश/इन्द्र, शुक्र — इन्द्र/शची, शनि — कालाग्नि, राहु — यम/सर्प, केतु — ब्रह्मा/सर्प।