Sri Surya Stuti (Manu Kruta) – श्री सूर्य स्तुतिः (मनु कृतम्) | Saura Purana

॥ श्री सूर्य स्तुतिः (मनु कृत): परिचय ॥
श्री सूर्य स्तुतिः (Sri Surya Stuti) हिन्दू धर्म के पवित्र गर्थों में से एक सौर पुराण (Saura Purana) के प्रथम अध्याय से ली गई है। इसकी रचना स्वयं आदि पुरुष स्वायम्भुव मनु (Svayambhuva Manu) ने की है। यह केवल 7 श्लोकों की एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है।
इस स्तुति में मनु महाराज ने सूर्य देव को केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि साक्षात् परमात्मा (Supreme Being) और जगत का कारण (Cause of Creation) माना है। उन्होंने सूर्य को ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिमूर्ति) बताया है और ओंकार (Om) तथा वषट्कार (Vashatkar) रूप में उनकी वंदना की है।
सूर्य के विशेषण - 7 श्लोकों में (Epithets of Surya)
॥ श्लोक और भावार्थ (Verse Meanings) ॥
1. नमो नमो वरेण्याय...
वरण करने योग्य (श्रेष्ठ), वरदान देने वाले, किरणों की माला धारण करने वाले (अंशुमाली), और ज्योतिर्मय स्वरूप आपको बारम्बार नमस्कार है। हे अनन्त और अजेय (जिसे कोई जीत न सके) देव! आपको नमस्कार है।
2. त्रिलोकचक्षुषे तुभ्यं...
आप तीनों लोकों (भू, भुवः, स्वः) की आँख (साक्षी) हैं। आप त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) होकर भी अमृत स्वरूप हैं। आप धर्म स्वरूप हैं, हंस (शुद्ध आत्मा) हैं और जगत की उत्पत्ति के मूल कारण हैं। आपको नमस्कार है।
3. नरनारीशररीराय...
आपका शरीर नर और नारी दोनों है (अर्धनारीश्वर स्वरूप)। आप 'मीढुष्टम' (अत्यंत उदार/वर्षा करने वाले) हैं। आप प्रज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) स्वरूप, सबके ईश्वर (अखिलेश), सात घोड़ों वाले (सप्ताश्व) और त्रिमूर्ति रूप हैं। आपको नमस्कार है।
4. नमो व्याहृतिरूपाय...
आप व्याहृति (भूः, भुवः, स्वः) रूप हैं। आप तीन लक्षणों से युक्त और शीघ्र गमन करने वाले (आशुगामी) हैं। हे हरे घोड़ों वाले (हर्यश्व/हरितवाहव)! आपको बारम्बार नमस्कार है।
5. एकलक्षाविलक्षाय...
आप एक लाख (किरणों/रूपों) वाले, विशिष्ट लक्षणों वाले और बहुत से लक्षणों (रूपों) वाले हैं। आप दण्डी (यम/न्यायकर्ता) हैं। आप एक, दो और अनेक संस्थाओं (स्थानों) में स्थित हैं। आपको नमस्कार है।
6. शक्तित्रयाय शुक्लाय...
आप तीन शक्तियों (इच्छा, ज्ञान, क्रिया) से युक्त हैं। आप शुक्ल (शुद्ध/श्वेत) वर्ण के, रवि और परमेष्ठी (सर्वोच्च पद पर स्थित) हैं। हे देव! आप ही शिव हैं, आप ही हरि (विष्णु) हैं, आप ही ब्रह्मा हैं और आप ही दिवस्पति (इन्द्र/स्वर्ग के स्वामी) हैं।
7. त्वमोङ्कारो वषट्कारः...
आप ही ओंकार (ॐ) हैं, आप ही वषट्कार (यज्ञ आहुति) हैं। स्वधा (पितृ तर्पण) और स्वाहा (देव अर्पण) भी आप ही हैं। आपके बिना मैं किसी अन्य परमात्मा या देवता को नहीं देखता हूँ।
पाठ विधि (Recitation Method)
- श्रेष्ठ समय: इस स्तुति का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय करना सर्वोत्तम माना गया है।
- शुभ दिन: रविवार और सप्तमी तिथि को इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
- जप संख्या: सामान्यतः 1, 3, 7, या 11 बार पाठ करना चाहिए।
- दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके और तांबे के लोटे से सूर्य को जल अर्पण करते हुए पाठ करें।
- लाभ: यह स्तुति सूर्य ग्रह दोष की शांति, नेत्र रोगों से मुक्ति, और अज्ञान के नाश के लिए अमोघ है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)