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Dvadasa Aditya Dhyana Slokas – द्वादशादित्य ध्यान श्लोक | 12 सूर्य स्वरूप

Dvadasa Aditya Dhyana Slokas – द्वादशादित्य ध्यान श्लोक | 12 सूर्य स्वरूप
॥ द्वादशादित्य ध्यान श्लोकाः ॥ ॥ सूर्य के 12 दिव्य स्वरूप ॥ ॥ १. धाता (चैत्र मास - मधु) ॥ धाता कृतस्थली हेतिर्वासुकी रथकृन्मुने । पुलस्त्यस्तुम्बुरुरिति मधुमासं नयन्त्यमी ॥ धाता शुभस्य मे दाता भूयो भूयोऽपि भूयसः । रश्मिजालसमाश्लिष्टः तमस्तोमविनाशनः ॥ ॥ २. अर्यमा (वैशाख मास - माधव) ॥ अर्यमा पुलहोऽथौजाः प्रहेति पुञ्जिकस्थली । नारदः कच्छनीरश्च नयन्त्येते स्म माधवम् ॥ मेरुशृङ्गान्तरचरः कमलाकरबान्धवः । अर्यमा तु सदा भूत्यै भूयस्यै प्रणतस्य मे ॥ ॥ ३. मित्र (ज्येष्ठ मास - शुक्र) ॥ मित्रोऽत्रिः पौरुषेयोऽथ तक्षको मेनका हहः । रथस्वन इति ह्येते शुक्रमासं नयन्त्यमी ॥ निशानिवारणपटुः उदयाद्रिकृताश्रयः । मित्रोऽस्तु मम मोदाय तमस्तोमविनाशनः ॥ ॥ ४. वरुण (आषाढ़ मास - शुचि) ॥ वसिष्ठो ह्यरुणो रम्भा सहजन्यस्तथा हुहुः । शुक्रश्चित्रस्वनश्चैव शुचिमासं नयन्त्यमी ॥ सूर्यस्यन्दनमारूढ अर्चिर्माली प्रतापवान् । कालभूतः कामरूपो ह्यरुणः सेव्यते मया ॥ ॥ ५. इन्द्र (श्रावण मास - नभ) ॥ इन्द्रो विश्वावसुः श्रोता एलापत्रस्तथाऽङ्गिराः । प्रम्लोचा राक्षसोवर्यो नभोमासं नयन्त्यमी ॥ सहस्ररश्मिसंवीतं इन्द्रं वरदमाश्रये । शिरसा प्रणमाम्यद्य श्रेयो वृद्धिप्रदायकम् ॥ ॥ ६. विवस्वान् (भाद्रपद मास - नभस्य) ॥ विवस्वानुग्रसेनश्च व्याघ्र आसारणो भृगुः । अनुम्लोचाः शङ्खपालो नभस्याख्यं नयन्त्यमी ॥ जगन्निर्माणकर्तारं सर्वदिग्व्याप्ततेजसम् । नभोग्रहमहादीपं विवस्वन्तं नमाम्यहम् ॥ ॥ ७. त्वष्टा (आश्विन मास - इष) ॥ त्वष्टा ऋचीकतनयः कम्बलाख्यस्तिलोत्तमा । ब्रह्मापेतोऽथ शतजित् धृतराष्ट्र इषम्भरा ॥ त्वष्टा शुभाय मे भूयात् शिष्टावलिनिषेवितः । नानाशिल्पकरो नानाधातुरूपः प्रभाकरः ॥ ॥ ८. विष्णु (कार्तिक मास - ऊर्ज) ॥ विष्णुरश्वतरो रम्भा सूर्यवर्चाश्च सत्यजित् । विश्वामित्रो मखापेत ऊर्जमासं नयन्त्यमी ॥ भानुमण्डलमध्यस्थं वेदत्रयनिषेवितम् । गायत्रीप्रतिपाद्यं तं विष्णुं भक्त्या नमाम्यहम् ॥ ॥ ९. अंशुमान् (मार्गशीर्ष मास - सह) ॥ अथाम्शुः कश्यपस्तार्‍क्ष्य ऋतसेनस्तथोर्वशी । विद्युच्छत्रुर्महाशङ्खः सहोमासं नयन्त्यमी ॥ सदा विद्रावणरतो जगन्मङ्गलदीपकः । मुनीन्द्रनिवहस्तुत्यो भूतिदोऽम्शुर्भवेन्मम ॥ ॥ १०. भग (पौष मास) ॥ भगः स्फूर्जोऽरिष्टनेमिः ऊर्ण आयुश्च पञ्चमः । कर्कोटकः पूर्वचित्तिः पौषमासं नयन्त्यमी ॥ तिथि मास ऋतूनां च वत्सराऽयनयोरपि । घटिकानां च यः कर्ता भगो भाग्यप्रदोऽस्तु मे ॥ ॥ ११. पूषा (माघ मास - तप) ॥ पूषा धनञ्जयो वातः सुषेणः सुरुचिस्तथा । घृताची गौतमश्चेति तपोमासं नयन्त्यमी ॥ पूषा तोषाय मे भूयात् सर्वपापाऽपनोदनात् । सहस्रकरसंवीतः समस्ताशान्तरान्तरः ॥ ॥ १२. पर्जन्य (फाल्गुन मास - तपस्य) ॥ क्रतुर्वार्चा भरद्वाजः पर्जन्यः सेनजित् तथा । विश्वश्चैरावतश्चैव तपस्याख्यं नयन्त्यमी ॥ प्रपञ्चं प्रतपन् भूयो वृष्टिभिर्मादयन् पुनः । जगदानन्दजनकः पर्जन्यः पूज्यते मया ॥ ॥ सविता नारायण ध्यानम् ॥ ध्यायेस्सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणस्सरसिजासन सन्निविष्टः । केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुः धृतशङ्खचक्रः ॥ ॥ इति द्वादशादित्य ध्यान श्लोकाः सम्पूर्णम् ॥

द्वादशादित्य और उनके मास (12 Adityas & Their Months)

आदित्यहिन्दू मासवैदिक नामऋषिअप्सरानाग
धाताचैत्रमधुपुलस्त्यकृतस्थलीवासुकि
अर्यमावैशाखमाधवपुलहपुञ्जिकस्थलीकच्छनीर
मित्रज्येष्ठशुक्रअत्रिमेनकातक्षक
वरुणआषाढ़शुचिवसिष्ठरम्भाशुक्र
इन्द्रश्रावणनभअङ्गिराप्रम्लोचाएलापत्र
विवस्वान्भाद्रपदनभस्यभृगुअनुम्लोचाशङ्खपाल
त्वष्टाआश्विनइषऋचीकतिलोत्तमाकम्बल
विष्णुकार्तिकऊर्जविश्वामित्ररम्भाअश्वतर
अंशुमान्मार्गशीर्षसहकश्यपउर्वशीमहाशङ्ख
भगपौष-आयुपूर्वचित्तिकर्कोटक
पूषामाघतपगौतमघृताचीधनञ्जय
पर्जन्यफाल्गुनतपस्यभरद्वाजविश्वऐरावत

प्रत्येक आदित्य का विशेष फल (Special Blessings)

धाता
शुभ देने वाले, तम नाशक
अर्यमा
ऐश्वर्य प्रदाता
मित्र
मोद (आनंद) देने वाले
इन्द्र
श्रेय वृद्धि प्रदायक
विष्णु
गायत्री प्रतिपाद्य
भग
भाग्य प्रदाता, काल कर्ता

उपासना विधि और ज्योतिषीय महत्व (Worship & Astrological Significance)

मासिक उपासना: प्रत्येक हिन्दू मास में संबंधित आदित्य की उपासना करें। जैसे कार्तिक में विष्णु, माघ में पूषा।

संक्रांति पूजा: जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में जाते हैं (संक्रांति), उस आदित्य की विशेष पूजा करें।

जन्म मास: अपने जन्म मास के आदित्य की विशेष उपासना करें - यह सूर्य दोष शांति के लिए उत्तम है।

सूर्य ग्रह शांति: कुंडली में सूर्य कमजोर हो तो सभी 12 आदित्यों की एक साथ पूजा करें।

रविवार व्रत: प्रत्येक रविवार को वर्तमान मास के आदित्य का ध्यान करें।

पाठ विधि (Recitation Method)

  • श्रेष्ठ समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय
  • शुभ दिन: रविवार, संक्रांति, पूर्णिमा
  • पूर्ण पाठ: सभी 12 आदित्यों का एक साथ पाठ
  • मासिक पाठ: केवल वर्तमान मास के आदित्य का पाठ
  • दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके
  • समापन: अंत में नारायण ध्यान श्लोक अवश्य पढ़ें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. द्वादशादित्य कौन हैं और ये कहाँ से आए?

ये सूर्य के 12 रूप हैं - धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, त्वष्टा, विष्णु, अंशुमान्, भग, पूषा, पर्जन्य। ये सभी अदिति के पुत्र हैं इसलिए आदित्य कहलाते हैं। विष्णु पुराण, भागवत पुराण में इनका वर्णन है।

2. प्रत्येक आदित्य के साथ कौन-कौन होते हैं?

सूर्य के रथ में 7 परिचारक होते हैं: एक ऋषि (मंत्र पाठ), एक अप्सरा (नृत्य), एक नाग (सारथी), एक गन्धर्व (गायन), एक यक्ष, एक राक्षस और स्वयं आदित्य।

3. विष्णु आदित्य का क्या विशेष महत्व है?

विष्णु आदित्य कार्तिक मास में पूजे जाते हैं। इसीलिए कार्तिक मास में तुलसी विवाह, देव उठनी एकादशी और विष्णु पूजा का विशेष महत्व है। गायत्री मंत्र इन्हीं का वर्णन करता है।

4. 'भग' आदित्य को भाग्यप्रद क्यों कहा गया?

भग शब्द से ही 'भाग्य' बना है। ये तिथि, मास, ऋतु, वर्ष, अयन और घटिका के कर्ता हैं। समय का निर्माण करने के कारण भाग्य के स्वामी हैं।

5. 'त्वष्टा' का क्या अर्थ है?

त्वष्टा = निर्माता, शिल्पकार। देवताओं के वास्तुकार। विश्वकर्मा के समान। नाना शिल्प और धातुओं के स्वामी।

6. 'पर्जन्य' आदित्य का क्या कार्य है?

पर्जन्य = मेघ/वर्षा। ये फाल्गुन में पूजे जाते हैं। पृथ्वी को ताप देकर फिर वर्षा से तृप्त करते हैं। कृषि और जल के देवता।

7. वैदिक मास के नाम क्या हैं?

मधु (चैत्र), माधव (वैशाख), शुक्र (ज्येष्ठ), शुचि (आषाढ़), नभ (श्रावण), नभस्य (भाद्रपद), इष (आश्विन), ऊर्ज (कार्तिक), सह (मार्गशीर्ष), तप (माघ), तपस्य (फाल्गुन)।

8. 'सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायण' का क्या अर्थ है?

सविता (सूर्य) + मण्डल + मध्य + वर्ती = सूर्य मंडल के मध्य में विराजमान। सूर्य के भीतर नारायण निवास करते हैं - यह वेदान्त का सिद्धांत है।

9. कुंडली में सूर्य कमजोर हो तो कौन सा आदित्य पूजें?

अपने जन्म मास के आदित्य की विशेष पूजा करें। या सभी 12 आदित्यों का एक साथ पाठ करें। रविवार व्रत के साथ उपासना अधिक फलदायी है।

10. 'धाता' आदित्य का क्या विशेष गुण है?

धाता = धारण करने वाले, देने वाले। चैत्र मास में नव वर्ष का प्रारंभ इन्हीं से होता है। ये शुभ के दाता और अंधकार के नाशक हैं।