श्री सूर्य स्तुतिः (ब्रह्म कृतम्) – Brahma Kruta Surya Stuti

॥ श्री सूर्य स्तुतिः (ब्रह्म कृतम्) ॥
॥ श्री ब्रह्म पुराणे एकत्रिंशोऽध्याये ॥
ब्रह्मोवाच ।
आदिदेवोऽसि देवानामैश्वर्याच्च त्वमीश्वरः ।
आदिकर्ताऽसि भूतानां देवदेवो दिवाकरः ॥ १ ॥
जीवनः सर्वभूतानां देवगन्धर्वरक्षसाम् ।
मुनिकिन्नरसिद्धानां तथैवोरगपक्षिणाम् ॥ २ ॥
॥ त्रिमूर्ति स्वरूप ॥
त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः ।
वायुरिन्द्रश्च सोमश्च विवस्वान् वरुणस्तथा ॥ ३ ॥
त्वं कालः सृष्टिकर्ता च हर्ता भर्ता तथा प्रभुः ।
सरितः सागराः शैला विद्युदिन्द्रधनूंषि च ॥ ४ ॥
॥ परमात्म स्वरूप ॥
प्रलयः प्रभवश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ।
ईश्वरात्परतो विद्या विद्यायाः परतः शिवः ॥ ५ ॥
शिवात्परतरो देवस्त्वमेव परमेश्वरः ।
सर्वतः पाणिपादान्तः सर्वतोक्षिशिरोमुखः ॥ ६ ॥
॥ सहस्रांशु स्वरूप ॥
सहस्रांशुः सहस्रास्यः सहस्रचरणेक्षणः ।
भूतादिर्भूर्भुवः स्वश्च महः सत्यं तपो जनः ॥ ७ ॥
॥ दुर्निरीक्ष्य रूप ॥
प्रदीप्तं दीपनं दिव्यं सर्वलोकप्रकाशकम् ।
दुर्निरीक्ष्यं सुरेन्द्राणां यद्रूपं तस्य ते नमः ॥ ८ ॥
सुरसिद्धगणैर्जुष्टं भृग्वत्रिपुलहादिभिः ।
स्तुतस्य परमव्यक्तं यद्रूपं तस्य ते नमः ॥ ९ ॥
वेद्यं वेदविदां नित्यं सर्वज्ञानसमन्वितम् ।
सर्वदेवाधिदेवस्य यद्रूपं तस्य ते नमः ॥ १० ॥
विश्वकृद्विश्वभूतं च वैश्वानरसुरार्चितम् ।
विश्वस्थितमवेद्यं च यद्रूपं तस्य ते नमः ॥ ११ ॥
॥ परमात्मा ॥
परं यज्ञात्परं वेदात्परं लोकात्परं दिवः ।
परमात्मेत्यभिख्यातं यद्रूपं तस्य ते नमः ॥ १२ ॥
अविज्ञेयमनालक्ष्यमध्यानगतमव्ययम् ।
अनादिनिधनं चैव यद्रूपं तस्य ते नमः ॥ १३ ॥
॥ अष्ट नमस्कार ॥
नमो नमः कारणकारणाय
नमो नमः पापविमोचनाय ।
नमो नमस्तेऽदितिवन्दिताय
नमो नमो रोगविनाशनाय ॥ १४ ॥
नमो नमः सर्ववरप्रदाय
नमो नमः सर्वसुखप्रदाय ।
नमो नमः सर्वधनप्रदाय
नमो नमः सर्वमतिप्रदाय ॥ १५ ॥
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे एकत्रिंशोऽध्याये ब्रह्मकृत सूर्य स्तुतिः सम्पूर्णम् ॥
सूर्य स्तोत्र संग्रह
सूर्य के अष्ट विशेषण - अंतिम 2 श्लोकों में (8 Epithets)
कारणकारण
कारणों के भी कारण
पापविमोचन
पापों से मुक्ति देने वाले
अदितिवन्दित
अदिति माता द्वारा वंदित
रोगविनाशन
सभी रोगों का नाश
सर्ववरप्रद
सभी वर देने वाले
सर्वसुखप्रद
सभी सुख देने वाले
सर्वधनप्रद
सभी धन देने वाले
सर्वमतिप्रद
सद्बुद्धि देने वाले
त्रिमूर्ति और सर्वदेव स्वरूप (Trimurthi & All-God Form)
| श्लोक सं. | सूर्य का स्वरूप | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | आदिदेव, देवदेव | देवताओं के आदि और देवों के देव |
| 2 | जीवन | सभी प्राणियों का जीवन |
| 3 | ब्रह्मा, विष्णु, महादेव | त्रिमूर्ति स्वरूप |
| 4 | काल, सृष्टिकर्ता, हर्ता, भर्ता | समय, सृजन, संहार, पालन |
| 5-6 | परमेश्वर | शिव से भी परे |
| 7 | सप्तलोक | भू, भुवः, स्व, मह, जन, तप, सत्य |
| 12 | परमात्मा | यज्ञ, वेद, लोक, दिव से परे |
| 13 | अनादि-अनन्त | आदि-अंत रहित, अव्यय |
पाठ विधि (Recitation Method)
- श्रेष्ठ समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय
- शुभ दिन: रविवार, सप्तमी तिथि, संक्रांति
- जप संख्या: 1, 3, 7, या 11 बार
- दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके
- विशेष अवसर: सूर्य ग्रह दोष शांति, नेत्र रोग, आरोग्य प्राप्ति
- पुराण स्रोत: ब्रह्म पुराण अध्याय 31
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. यह स्तुति किस पुराण से है?
ब्रह्म पुराण के एकत्रिंशोऽध्याय (31वें अध्याय) से। ब्रह्म पुराण 18 महापुराणों में से एक है।
2. 'ब्रह्म कृत' का क्या अर्थ है?
ब्रह्म (ब्रह्मा जी) + कृत (द्वारा रचित) = ब्रह्मा जी द्वारा रची गई स्तुति।
3. सूर्य को त्रिमूर्ति कैसे बताया गया है?
श्लोक 3 में - "त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः" - तुम ब्रह्मा हो, महादेव हो, विष्णु हो और प्रजापति हो। सूर्य में त्रिमूर्ति की शक्ति है।
4. 'सर्वतः पाणिपादान्तः' का क्या अर्थ है?
सर्वतः (सब ओर) + पाणि (हाथ) + पाद (पैर) = जिनके हाथ-पैर सब ओर हैं। यह विश्वरूप का वर्णन है, गीता के विश्वरूप दर्शन जैसा।
5. 'कारणकारण' का क्या अर्थ है?
कारण + कारण = कारणों के भी कारण। सूर्य सृष्टि के मूल कारण हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव भी सूर्य से प्रकाशित हैं।
6. 'भूर्भुवः स्वः' क्या हैं?
ये 3 व्याहृतियाँ हैं। भू (पृथ्वी लोक), भुव (अन्तरिक्ष), स्व (स्वर्ग)। श्लोक 7 में सातों लोक बताए - भू, भुव, स्व, मह, जन, तप, सत्य।
7. 'दुर्निरीक्ष्यं सुरेन्द्राणां' का क्या अर्थ है?
दुः (कठिन) + निरीक्ष्य (देखना) = देवराजों के लिए भी जिसे देखना कठिन है। सूर्य का तेज इतना प्रचंड है कि इंद्र भी सीधे नहीं देख सकते।
8. 'परमात्मेत्यभिख्यातम्' का क्या अर्थ है?
परमात्मा + इति + अभिख्यातम् = जो परमात्मा के नाम से विख्यात है। सूर्य यज्ञ, वेद, लोक और स्वर्ग से भी परे हैं।
9. 'सर्वमतिप्रद' का क्या अर्थ है?
सर्व + मति (बुद्धि) + प्रद = सभी प्रकार की सद्बुद्धि देने वाले। सूर्य उपासना से बुद्धि तीक्ष्ण होती है।
10. इस स्तुति से क्या फल मिलता है?
ब्रह्मा जी द्वारा रचित होने से अत्यंत शक्तिशाली। पापविमोचन, रोगविनाशन, सर्ववरप्रद, सर्वसुखप्रद, सर्वधनप्रद, सर्वमतिप्रद - ये सभी फल मिलते हैं।