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मंत्रिणी न्यास

Mantrini Nyasa — वाराही/दण्डिनी तांत्रिक शरीर-शुद्धि न्यास

मंत्रिणी न्यास
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ मंत्रिणी न्यास ॥

विशेष टिप्पणी: मंत्रिणी (वाराही) देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी की सेनापति हैं। श्री विद्या उपासना में स्तोत्र-पाठ या मंत्र-जप से पूर्व यह न्यास किया जाता है।

॥ ऋष्यादि न्यासः ॥ ॐ अस्य श्री मंत्रिणी न्यासस्य। भैरव ऋषिः (शिरसि स्पृशेत्)। अनुष्टुप् छन्दः (मुखे)। श्री मंत्रिणी देवता (हृदि)। ॐ बीजम् (गुह्ये)। ह्रीं शक्तिः (पादयोः)। स्वाहा कीलकम् (नाभौ)। मम सर्वसिद्ध्यर्थे न्यासे विनियोगः (सर्वाङ्गे)॥ ॥ कर न्यासः ॥ ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। (तर्जनी से अंगूठे को स्पर्श करें) ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। (अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करें) ॐ श्रीं मध्यमाभ्यां नमः। (अंगूठे से मध्यमा को स्पर्श करें) ॐ ऐं क्लीं सौः अनामिकाभ्यां नमः। (अंगूठे से अनामिका को स्पर्श करें) ॐ मंत्रिण्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (अंगूठे से कनिष्ठिका को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः। (हथेलियों के अग्र और पृष्ठ भाग को स्पर्श करें) ॥ हृदयादि न्यासः ॥ ॐ ऐं हृदयाय नमः। (हृदय को स्पर्श करें) ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा। (सिर को स्पर्श करें) ॐ श्रीं शिखायै वषट्। (शिखा/चोटी को स्पर्श करें) ॐ ऐं क्लीं सौः कवचाय हुम्। (दाएं हाथ से बाएं कंधे और बाएं से दाएं कंधे को स्पर्श करें) ॐ मंत्रिण्यै नेत्रत्रयाय वौषट्। (तर्जनी, मध्यमा, अनामिका से दोनों नेत्रों व भ्रूमध्य को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा अस्त्राय फट्। (दाएं हाथ से बाएं हाथ पर ताली बजाएं) ॥ अङ्ग न्यासः ॥ ॐ वां वाराह्यै शिरसि नमः। (सिर पर) ॐ रां राज्ञ्यै ललाटे नमः। (माथे पर) ॐ हीं ह्रीं दंष्ट्रायै भ्रूमध्ये नमः। (भृकुटी के मध्य) ॐ मं मंत्रिण्यै नेत्रयोः नमः। (दोनों नेत्रों पर) ॐ त्रीं त्रिनेत्रायै कर्णयोः नमः। (दोनों कानों पर) ॐ णीं दण्डिन्यै नासिकायां नमः। (नासिका/नाक पर) ॐ यं यज्ञवाराह्यै मुखे नमः। (मुख पर) ॐ नं नीलाम्बरायै कण्ठे नमः। (कण्ठ/गले पर) ॐ मः महावाराह्यै हृदये नमः। (हृदय पर) ॐ स्तं स्तनयोः नमः। (दोनों स्तनों पर) ॐ घुं घुर्घुरायै नाभौ नमः। (नाभि पर) ॐ णां संहारिण्यै कट्यां नमः। (कमर पर) ॐ पां पातालवासिन्यै जानुनोः नमः। (दोनों घुटनों पर) ॐ दां दण्डनाथायै जङ्घयोः नमः। (दोनों जंघाओं पर) ॐ यां जगदम्बायै पादयोः नमः। (दोनों पैरों पर) ॐ ह्रीं वाराह्यै सर्वाङ्गे नमः। (संपूर्ण शरीर पर) ॥ दिग्बन्धः ॥ ॐ ह्रीं वाराहि, पूर्वे रक्ष रक्ष। (पूर्व दिशा में चुटकी बजाएं) ॐ ह्रीं मंत्रिणि, दक्षिणे रक्ष रक्ष। (दक्षिण दिशा में चुटकी बजाएं) ॐ ह्रीं दण्डिनि, पश्चिमे रक्ष रक्ष। (पश्चिम दिशा में चुटकी बजाएं) ॐ ह्रीं संहारिणि, उत्तरे रक्ष रक्ष। (उत्तर दिशा में चुटकी बजाएं) ॐ ह्रीं महावाराहि, ऊर्ध्वे रक्ष रक्ष। (ऊपर की ओर चुटकी बजाएं) ॐ ह्रीं पातालवासिनि, अधः रक्ष रक्ष। (नीचे की ओर चुटकी बजाएं) ॥ ध्यानम् ॥ नीलोत्पलदलश्यामां पद्मपत्रायतेक्षणाम्। वाराहवदनां देवीं मंत्रिणीं प्रणमाम्यहम्॥ दंष्ट्राकरालवदनां मुद्गरं मुसलं तथा। पाशाङ्कुशधरां देवीं दण्डिनीं परमेश्वरीम्॥ ॥ इति मंत्रिणी न्यासः सम्पूर्णः ॥

मंत्रिणी न्यास — विस्तृत परिचय

मंत्रिणी न्यास (Mantrini Nyasa) श्री विद्या परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गोपनीय अंग है। 'न्यास' शब्द संस्कृत के 'न्यस्' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'स्थापन करना' या 'रखना'। तंत्रशास्त्र में न्यास वह विधि है जिसमें विशिष्ट मंत्रों का उच्चारण करते हुए शरीर के विभिन्न अंगों को स्पर्श किया जाता है, जिससे उन अंगों में देवता की दिव्य शक्ति स्थापित हो जाती है। न्यास के बाद साधक का भौतिक शरीर दिव्य शरीर में रूपांतरित हो जाता है — वह अब सामान्य मनुष्य नहीं, बल्कि देवी-मय हो जाता है।

मंत्रिणी, दण्डिनी, पोत्रिणी और वाराही — ये सभी एक ही देवी के विभिन्न नाम हैं। श्री विद्या परंपरा में देवी ललिता महात्रिपुरसुन्दरी की दिव्य राज्य-व्यवस्था में दो प्रमुख अधिकारी हैं — (1) श्यामला (राज-मातंगी) जो मंत्रिणी (Prime Minister) हैं, और (2) वाराही जो दण्डनाथा (सेनापति/Commander-in-Chief) हैं। कुछ ग्रंथों में वाराही को भी 'मंत्रिणी' कहा जाता है क्योंकि वह ललिता की गुप्त मंत्रणा (Secret Counsel) करती हैं। यह न्यास वाराही/दण्डिनी का है — ललिता की सेना की सर्वोच्च सेनापति का।

इस न्यास की संरचना अत्यंत व्यवस्थित है — 5 भागों में विभक्त: (1) ऋष्यादि न्यास — मंत्र का ऋषि (भैरव), छन्द (अनुष्टुप्), देवता (मंत्रिणी), बीज (ॐ), शक्ति (ह्रीं), कीलक (स्वाहा) स्थापित करना; (2) कर न्यास — दोनों हाथों की 5 अंगुलियों + करतल/करपृष्ठ पर बीज-मंत्र (ऐं, ह्रीं, श्रीं, ऐं-क्लीं-सौः) स्थापित करना; (3) हृदयादि न्यास — हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र पर षडङ्ग न्यास; (4) अङ्ग न्यास — शिर से पाद तक 16 शरीर-अंगों पर देवी के 16 भिन्न नाम (वाराही, राज्ञी, दंष्ट्रा, मंत्रिणी, त्रिनेत्रा, दण्डिनी, यज्ञवाराही, नीलाम्बरा, महावाराही, घुर्घुरा, संहारिणी, पातालवासिनी, दण्डनाथा, जगदम्बा) स्थापित करना; (5) दिग्बन्ध — छह दिशाओं (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, ऊर्ध्व, अधः) में देवी के भिन्न रूपों से सुरक्षा कवच।

दिग्बन्ध की विशेषता यह है कि प्रत्येक दिशा में देवी का भिन्न रूप रक्षा करता है — पूर्व में वाराही, दक्षिण में मंत्रिणी, पश्चिम में दण्डिनी, उत्तर में संहारिणी, ऊर्ध्व में महावाराही, अधः में पातालवासिनी। यह षड्-दिशा रक्षा कवच साधक को सभी प्रकार की बाधाओं, भय, और विघ्नों से पूर्णतः सुरक्षित करता है।

विशेष: यह न्यास किसी भी वाराही स्तोत्र (सहस्रनाम, अष्टोत्तरशतनाम, खड्गमाला, द्वादशनाम), मंत्र-जप, या तांत्रिक साधना से पूर्व किया जाना चाहिए। न्यास के बिना साधना करना — बिना नींव के भवन बनाने जैसा है। न्यास से साधक "अहं देवी" (मैं देवी हूँ) भाव में स्थित होता है — यही तांत्रिक साधना का मूल सिद्धांत है।

न्यास का महत्व और लाभ

1. शरीर शुद्धि (Body Purification): न्यास से भौतिक शरीर दिव्य शरीर में रूपांतरित होता है। तंत्र में कहा गया है — "देहो देवालयः प्रोक्तः" — शरीर ही मंदिर है। न्यास इस मंदिर को पवित्र करता है।
2. देवता स्थापना: प्रत्येक अंग में देवी की विशिष्ट शक्ति स्थापित होती है — शिर में वाराही, हृदय में महावाराही, नेत्र में मंत्रिणी। 16 अंगों में 16 शक्तियाँ।
3. षड्-दिशा रक्षा कवच: दिग्बन्ध से सभी 6 दिशाओं में अभेद्य सुरक्षा कवच बनता है। कोई भी बाधा, भूत-प्रेत, या नकारात्मक शक्ति इस कवच को भेद नहीं सकती।
4. साधना फल वृद्धि: न्यास के बाद किया गया स्तोत्र पाठ या मंत्र जप कई गुना अधिक फलदायी होता है क्योंकि साधक देवी-मय हो चुका होता है।
5. "अहं देवी" भाव: न्यास का अंतिम उद्देश्य — साधक स्वयं को देवी-स्वरूप अनुभव करे। यही तांत्रिक साधना का सर्वोच्च सिद्धांत है।

न्यास विधि — चरण-दर-चरण

  • 1. ऋष्यादि न्याससबसे पहले मंत्र के ऋषि (भैरव — शिर), छन्द (अनुष्टुप् — मुख), देवता (मंत्रिणी — हृदय), बीज (ॐ — गुह्य), शक्ति (ह्रीं — पाद), कीलक (स्वाहा — नाभि) का संबंधित अंगों पर स्पर्श करते हुए उच्चारण करें।
  • 2. कर न्यासदोनों हाथों की अंगुलियों पर बीज-मंत्र स्थापित करें। अंगूठा (ऐं), तर्जनी (ह्रीं), मध्यमा (श्रीं), अनामिका (ऐं-क्लीं-सौः), कनिष्ठिका (मंत्रिण्यै), करतल-करपृष्ठ (स्वाहा)।
  • 3. हृदयादि न्यास (षडङ्ग)हृदय (ऐं — नमः), शिर (ह्रीं — स्वाहा), शिखा (श्रीं — वषट्), कवच/कंधे (ऐं-क्लीं-सौः — हुम्), नेत्र (मंत्रिण्यै — वौषट्), अस्त्र/ताली (स्वाहा — फट्)।
  • 4. अङ्ग न्यास (16 अंग)शिर (वाराही) → ललाट (राज्ञी) → भ्रूमध्य (दंष्ट्रा) → नेत्र (मंत्रिणी) → कर्ण (त्रिनेत्रा) → नासिका (दण्डिनी) → मुख (यज्ञवाराही) → कण्ठ (नीलाम्बरा) → हृदय (महावाराही) → स्तन → नाभि (घुर्घुरा) → कटि (संहारिणी) → जानु (पातालवासिनी) → जंघा (दण्डनाथा) → पाद (जगदम्बा) → सर्वाङ्ग (वाराही)।
  • 5. दिग्बन्ध (6 दिशा)पूर्व (वाराही), दक्षिण (मंत्रिणी), पश्चिम (दण्डिनी), उत्तर (संहारिणी), ऊर्ध्व (महावाराही), अधः (पातालवासिनी) — प्रत्येक दिशा में "रक्ष रक्ष" कहते हुए ताली बजाएं।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. मंत्रिणी न्यास क्या है?

श्री विद्या परंपरा में माँ वाराही (मंत्रिणी/दण्डिनी) का शरीर-शुद्धि न्यास। मंत्रों द्वारा शरीर के 16 अंगों पर देवी की शक्तियों को स्थापित किया जाता है। 5 भागों में विभक्त — ऋष्यादि, कर, हृदयादि, अङ्ग और दिग्बन्ध।

2. मंत्रिणी और वाराही में क्या अंतर है?

कोई अंतर नहीं। मंत्रिणी, दण्डिनी, पोत्रिणी और वाराही — सभी एक ही देवी के विभिन्न नाम। श्री विद्या में 'मंत्रिणी' = ललिता की मंत्री। 'दण्डनाथा' = सेनापति।

3. क्या न्यास के बिना स्तोत्र पाठ कर सकते हैं?

सामान्य भक्ति-पाठ बिना न्यास के किया जा सकता है। लेकिन तांत्रिक साधना, जप-अनुष्ठान या काम्य कर्म में न्यास अनिवार्य। न्यास से साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है।

4. न्यास कितने प्रकार के हैं?

इस न्यास में 5 भाग: ऋष्यादि (ऋषि/छन्द/देवता), कर (6 अंगुलियाँ), हृदयादि (षडङ्ग), अङ्ग (16 शरीर-अंग), दिग्बन्ध (6 दिशाएँ)। कुल 40+ मंत्र-स्थापन।

5. दिग्बन्ध क्या है?

दिग्बन्ध = दिशा + बन्ध। 6 दिशाओं में देवी के भिन्न रूपों से सुरक्षा कवच। पूर्व-वाराही, दक्षिण-मंत्रिणी, पश्चिम-दण्डिनी, उत्तर-संहारिणी, ऊर्ध्व-महावाराही, अधः-पातालवासिनी।

6. अङ्ग न्यास में कितने अंग हैं?

16 अंग: शिर, ललाट, भ्रूमध्य, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, कण्ठ, हृदय, स्तन, नाभि, कटि, जानु, जंघा, पाद, सर्वाङ्ग। प्रत्येक पर देवी का भिन्न नाम — वाराही, राज्ञी, दंष्ट्रा, मंत्रिणी, त्रिनेत्रा, दण्डिनी आदि।

7. विनियोग क्या है?

ऋषि — भैरव, छन्द — अनुष्टुप्, देवता — श्री मंत्रिणी, बीज — ॐ, शक्ति — ह्रीं, कीलक — स्वाहा। उद्देश्य — "मम सर्वसिद्ध्यर्थे" — सम्पूर्ण सिद्धि हेतु न्यास।

8. ध्यान कैसे करें?

नीलोत्पलदलश्यामा (नीलकमल जैसी श्यामवर्णी), पद्मपत्रायतेक्षणा (कमलदल नेत्र), वराहवदना (वराह-मुख)। हाथों में मुद्गर (गदा), मुसल, पाश, अंकुश। दण्डिनी, परमेश्वरी।

9. क्या गुरु दीक्षा आवश्यक है?

न्यास तांत्रिक विधि है — गुरु दीक्षा सर्वोत्तम। लेकिन स्तोत्र पाठ की पूर्व-तैयारी के रूप में श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है। विशेष काम्य अनुष्ठान के लिए गुरु मार्गदर्शन अनिवार्य।

10. कब करें?

किसी भी वाराही स्तोत्र (सहस्रनाम, अष्टोत्तरशतनाम, खड्गमाला, द्वादशनाम), मंत्र-जप या साधना से पूर्व। प्रातःकाल स्नान के बाद या संध्याकाल। नवरात्रि, पंचमी, गुप्त नवरात्रि में विशेष फलदायी।