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श्री वाराही देवी स्तवम्

Sri Varahi Devi Stavam — 16 श्लोकों में वाराही के 15 स्वरूपों की स्तुति

श्री वाराही देवी स्तवम्
॥ श्री वाराही देवी स्तवम् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ ऐङ्कारद्वयमध्यसंस्थित लसद्भूबीजवर्णात्मिकां दुष्टारातिजनाक्षि वक्त्रकरपदस्तम्भिनीं जृम्भिणीम् । लोकान् मोहयन्तीं दृशा च महासादंष्ट्राकरालाकृतिं वार्तालीं प्रणतोऽस्मि सन्ततमहं घोणिं रथोपस्थिताम् ॥ ॥ स्तवम् ॥ श्रीकिरिरथमध्यस्थां पोत्रिमुखीं चिद्घनैकसद्रूपाम् । हलमुसलायुधहस्तां नौमि श्रीदण्डनायिकामम्बाम् ॥ १ ॥ वाग्भवभूवागीशी बीजत्रयठार्णवैश्च सम्युक्ताम् । कवचास्त्रानलजायायतरूपां नौमि शुद्धवाराहीम् ॥ २ ॥ स्वप्नफलबोधयित्रीं स्वप्नेशीं सर्वदुःखविनिहन्त्रीम् । नतजन शुभकारिणीं श्रीकिरिवदनां नौमि सच्चिदानन्दाम् ॥ ३ ॥ पञ्चदशवर्णविहितां पञ्चम्यम्बां सदा कृपालम्बाम् । अञ्चितमणिमयभूषां चिन्तितफलदां नमामि वाराहीम् ॥ ४ ॥ विघ्नापन्निर्मूलन विद्येशीं सर्वदुःखविनिहन्त्रीम् । सकलजगत्संस्तम्भनचतुरां श्रीस्तम्भिनीं कलये ॥ ५ ॥ दशवर्णरूपमनुवर विशदां तुरगाधिराजसंरूढाम् । शुभदां दिव्यजगत्त्रयवासिनीं सुखदायिनीं सदा कलये ॥ ६ ॥ उद्धत्रीक्ष्मां जलनिधि मग्नां दंष्ट्राग्रलग्नभूगोलाम् । भक्तनदिमोदमानां उन्मत्ताकार भैरवीं वन्दे ॥ ७ ॥ सप्तदशाक्षररूपां सप्तोदधिपीठमध्यगां दिव्याम् । भक्तार्तिनाशनिपुणां भवभयविध्वंसिनीं परां वन्दे ॥ ८ ॥ नीलतुरगाधिरूढां नीलाञ्चित वस्त्रभूषणोपेताम् । नीलाभां सर्वतिरस्करिणीं सम्भावये महामायाम् ॥ ९ ॥ सलसङ्ख्यमन्त्ररूपां विलसद्भूषां विचित्रवस्त्राढ्याम् । सुललिततन्वीं नीलां कलये पशुवर्ग मोहिनीं देवीम् ॥ १० ॥ वैरिकृतसकलभीकर कृत्याविध्वंसिनीं करालास्याम् । शत्रुगणभीमरूपां ध्याये त्वां श्रीकिरातवाराहीम् ॥ ११ ॥ चत्वारिंशद्वर्णकमनुरूपां सूर्यकोटिसङ्काशाम् । देवीं सिंहतुरङ्गां विविधायुधधारिणीं कीटीं नौमि ॥ १२ ॥ धूमाकारविकारां धूमानलसन्निभां सदा मत्ताम् । परिपन्थियूथहन्त्रीं वन्दे नित्यं च धूम्रवाराहीम् ॥ १३ ॥ वर्णचतुर्विंशतिकां मन्त्रेशीं समदमहिषपृष्ठस्थाम् । उग्रां विनीलदेहां ध्याये किरिवक्त्र देवतां नित्यम् ॥ १४ ॥ बिन्दुगणतात्मकोणां गजदलावृत्तत्रयात्मिकां दिव्याम् । सदनत्रयसंशोभित चक्रस्थां नौमि सिद्धवाराहीम् ॥ १५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ वाराही स्तोत्रमेतद्यः प्रपठेद्भक्तिसम्युतः । स वै प्राप्नोति सततं सर्वसौख्यास्पदं पदम् ॥ १६ ॥ ॥ इति श्री वाराही देवी स्तवम् सम्पूर्णम् ॥

श्री वाराही देवी स्तवम् — परिचय

श्री वाराही देवी स्तवम् (Sri Varahi Devi Stavam) माँ वाराही के 15 विभिन्न स्वरूपों की एक अद्भुत स्तुति है। इस 16 श्लोकों वाले स्तव में देवी को 'दण्डनायिका' (सेनापति), 'स्वप्नेशी' (स्वप्नों की अधिष्ठात्री), 'वार्ताली' (वाणी नियंत्रिका), 'स्तम्भिनी' (स्तम्भन शक्ति) और 'तिरस्करिणी' (अदृश्य करने वाली) जैसे अनेक रूपों में नमन किया गया है।

यह स्तव न केवल शत्रुओं का शमन करता है, बल्कि साधक को स्वप्न सिद्धि (भविष्य ज्ञान), वाक् सिद्धि (वाणी की शक्ति), और जगत् स्तम्भन (सम्पूर्ण जगत को अनुकूल बनाना) की शक्ति भी प्रदान करता है। इसमें धूम्रवाराही (धुएं जैसी उग्र), किरातवाराही (आदिवासी रूप) और सिद्धवाराही (यंत्र-सिद्ध) जैसे दुर्लभ स्वरूपों का भी वर्णन है।

विशेष तथ्य: यह एकमात्र स्तव है जिसमें वाराही के 15 अलग-अलग स्वरूपों की एक साथ स्तुति है। प्रत्येक श्लोक एक भिन्न स्वरूप, उनके मन्त्र-वर्ण, वाहन, आयुध और विशेष शक्ति का वर्णन करता है। यह वाराही उपासना का सम्पूर्ण सार है।

15 स्वरूपों का विश्लेषण

ध्यानम् — वार्ताली: ऐंकार बीज वाली, दुष्ट शत्रुओं की आँखें-वाणी-हाथ-पैर स्तम्भित करने वाली, महा दंष्ट्राकरालाकृति, रथ पर विराजमान घोणी (वराह मुखी)।

श्लोक 1 — दंडनायिका: किरि रथ (सूअर के रथ) में विराजमान, हल-मुसल धारिणी, चिद्घन (चैतन्य) स्वरूपा, देवताओं की प्रधान सेनापति

श्लोक 2 — शुद्धवाराही: वाग्भव, भू और वागीशी तीन बीजों से युक्त, कवच-अस्त्र-अनल शक्ति सम्पन्न।

श्लोक 3 — स्वप्नेशी: "स्वप्नफलबोधयित्री" — स्वप्न का फल बताने वाली, सर्वदुःखविनिहन्त्री, सच्चिदानन्द स्वरूपा।

श्लोक 4 — पंचमी अम्बा: 15 वर्णों वाली, चिन्तित फल देने वाली, मणिमय भूषण धारिणी, सदा कृपालु माता।

श्लोक 5 — स्तम्भिनी: विघ्न-आपत्ति नाश निपुण, सकलजगत् संस्तम्भन में चतुर — सम्पूर्ण जगत को रोक देने वाली।

श्लोक 7 — भैरवी: जलनिधि (समुद्र) में डूबी पृथ्वी को दंष्ट्राग्र (दाँत के नोक) पर उठाने वाली, उन्मत्त भैरवी स्वरूपा।

श्लोक 9 — तिरस्करिणी: नीले घोड़े पर सवार, नीले वस्त्र-आभूषण, सर्वतिरस्करिणी — सबको अदृश्य कर देने वाली महामाया

श्लोक 11 — किरातवाराही: शत्रुओं द्वारा की गई सभी कृत्या (Black Magic) को नष्ट करने वाली, करालास्या (भयंकर मुख), शत्रु गण के लिए भीम रूपा।

श्लोक 13 — धूम्रवाराही: धुएं जैसा आकार, सदा मत्त (उन्मत्त), शत्रु समूह (परिपन्थि यूथ) की हन्त्री। सबसे उग्र स्वरूप।

श्लोक 15 — सिद्धवाराही: बिन्दु, त्रिकोण, गजदल और तीन सदनों से सुशोभित चक्र (यंत्र) में विराजमान। यंत्र-सिद्ध स्वरूप।

श्लोक 16 — फलश्रुति: "सर्वसौख्यास्पदं पदम्" — भक्तिपूर्वक पाठ से सम्पूर्ण सुखों का स्थान प्राप्त होता है।

पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

समय: मध्यरात्रि या ब्रह्म मुहूर्त सर्वोत्तम। स्वप्न सिद्धि हेतु सोने से ठीक पहले पाठ करें।

दिशा: शत्रु शमन हेतु दक्षिण मुख, स्वप्न-सिद्धि/ज्ञान हेतु पूर्व मुख।

वस्त्र: नीले/काले वस्त्र (शत्रु नाश), लाल वस्त्र (सामान्य पूजा)।

भोग: उड़द दाल के लड्डू, खट्टा अनार, गुड़। ताम्रपात्र में शहद का प्रतीक भोग।

विशेष: स्वप्नेशी साधना — सोने से पहले पाठ करें, मन में प्रश्न रखें, देवी स्वप्न में उत्तर देंगी।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री वाराही देवी स्तवम् क्या है?

16 श्लोकों का अद्भुत स्तव जिसमें माँ वाराही के 15 विभिन्न स्वरूपों — दंडनायिका, शुद्धवाराही, स्वप्नेशी, पंचमी अम्बा, स्तम्भिनी, अश्वारूढा, भैरवी, तिरस्करिणी, किरातवाराही, धूम्रवाराही, सिद्धवाराही आदि — की स्तुति है। फलश्रुति — सर्वसौख्य प्राप्ति।

2. इसमें कितने वाराही स्वरूपों का वर्णन है?

15 स्वरूप: (1) दंडनायिका, (2) शुद्धवाराही, (3) स्वप्नेशी, (4) पंचमी अम्बा, (5) स्तम्भिनी, (6) अश्वारूढा, (7) उन्मत्त भैरवी, (8) सप्तोदधि वाराही, (9) तिरस्करिणी, (10) पशु मोहिनी, (11) किरातवाराही, (12) सिंह तुरंगा कीटी, (13) धूम्रवाराही, (14) किरिवक्त्र, (15) सिद्धवाराही।

3. वार्ताली का क्या अर्थ है?

'वार्ता' = सन्देश/वाणी। वाराही देवताओं की सेनापति होने के नाते ब्रह्मांड की सभी सूचनाएं रखती हैं। साधक को वाणी की शक्ति (वाक् सिद्धि) और गुप्त ज्ञान की प्राप्ति होती है।

4. स्वप्नेशी साधना क्या है?

श्लोक 3 में देवी को 'स्वप्नफलबोधयित्री' कहा गया है। सोने से ठीक पहले इस स्तव का पाठ करें, मन में किसी प्रश्न का उत्तर मांगते हुए सो जाएं — देवी स्वप्न में मार्गदर्शन देती हैं। इसे स्वप्न-सिद्धि कहते हैं।

5. दंडनायिका का अर्थ क्या है?

दंडनायिका = दंड (सेना) की नायिका (सेनापति)। देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी की आज्ञा से देवताओं की सेना का संचालन करती हैं। 'किरि रथ' (सूअर का रथ) पर सवार होकर शत्रुओं का विनाश करती हैं।

6. क्या बिना गुरु दीक्षा के पढ़ सकते हैं?

हाँ, यह 'स्तवम्' (स्तुति) है, मंत्र नहीं। भक्ति-भाव से कोई भी पढ़ सकता है। गुरु दीक्षा से शक्ति और दिशा निश्चित होती है, लेकिन दीक्षा अनिवार्य नहीं। पाठ के बाद मौन रहें और देवी पर विश्वास रखें।

7. फलश्रुति क्या कहती है?

श्लोक 16: "वाराही स्तोत्रमेतद्यः प्रपठेद्भक्तिसम्युतः। स वै प्राप्नोति सततं सर्वसौख्यास्पदं पदम्" — जो भक्तिपूर्वक पाठ करे, वह निरंतर सम्पूर्ण सुखों का स्थान प्राप्त करता है।

8. धूम्रवाराही कौन हैं?

श्लोक 13 — धूम्र (धुएं) जैसे आकार और अग्नि जैसे तेज वाली, सदा मदमत्त (उन्मत्त), शत्रु समूह (परिपन्थि यूथ) की हन्त्री। यह वाराही का सबसे उग्र और विनाशकारी स्वरूप है। शत्रुओं को धुएं की तरह मिटा देती हैं।

9. सिद्धवाराही क्या है?

श्लोक 15 — बिन्दु, त्रिकोण, गजदल (हाथी के कान जैसी पंखुड़ियाँ) और तीन सदनों से सुशोभित चक्र (यंत्र) में विराजमान। यह वाराही का यंत्र-सिद्ध स्वरूप है — श्रीयंत्र/वाराही यंत्र की अधिष्ठात्री।

10. क्या रात में पढ़ना सुरक्षित है?

हाँ, वाराही रात्रि-शक्ति हैं — रात का पाठ अधिक तीव्र और प्रभावी परिणाम देता है। मध्यरात्रि या ब्रह्ममुहूर्त सर्वोत्तम है। यदि मन में भय हो तो दिन में भी पाठ कर सकते हैं।