श्री वाराही देवी स्तवम्
Sri Varahi Devi Stavam — 16 श्लोकों में वाराही के 15 स्वरूपों की स्तुति

श्री वाराही देवी स्तवम् — परिचय
श्री वाराही देवी स्तवम् (Sri Varahi Devi Stavam) माँ वाराही के 15 विभिन्न स्वरूपों की एक अद्भुत स्तुति है। इस 16 श्लोकों वाले स्तव में देवी को 'दण्डनायिका' (सेनापति), 'स्वप्नेशी' (स्वप्नों की अधिष्ठात्री), 'वार्ताली' (वाणी नियंत्रिका), 'स्तम्भिनी' (स्तम्भन शक्ति) और 'तिरस्करिणी' (अदृश्य करने वाली) जैसे अनेक रूपों में नमन किया गया है।
यह स्तव न केवल शत्रुओं का शमन करता है, बल्कि साधक को स्वप्न सिद्धि (भविष्य ज्ञान), वाक् सिद्धि (वाणी की शक्ति), और जगत् स्तम्भन (सम्पूर्ण जगत को अनुकूल बनाना) की शक्ति भी प्रदान करता है। इसमें धूम्रवाराही (धुएं जैसी उग्र), किरातवाराही (आदिवासी रूप) और सिद्धवाराही (यंत्र-सिद्ध) जैसे दुर्लभ स्वरूपों का भी वर्णन है।
विशेष तथ्य: यह एकमात्र स्तव है जिसमें वाराही के 15 अलग-अलग स्वरूपों की एक साथ स्तुति है। प्रत्येक श्लोक एक भिन्न स्वरूप, उनके मन्त्र-वर्ण, वाहन, आयुध और विशेष शक्ति का वर्णन करता है। यह वाराही उपासना का सम्पूर्ण सार है।
15 स्वरूपों का विश्लेषण
ध्यानम् — वार्ताली: ऐंकार बीज वाली, दुष्ट शत्रुओं की आँखें-वाणी-हाथ-पैर स्तम्भित करने वाली, महा दंष्ट्राकरालाकृति, रथ पर विराजमान घोणी (वराह मुखी)।
श्लोक 1 — दंडनायिका: किरि रथ (सूअर के रथ) में विराजमान, हल-मुसल धारिणी, चिद्घन (चैतन्य) स्वरूपा, देवताओं की प्रधान सेनापति।
श्लोक 2 — शुद्धवाराही: वाग्भव, भू और वागीशी तीन बीजों से युक्त, कवच-अस्त्र-अनल शक्ति सम्पन्न।
श्लोक 3 — स्वप्नेशी: "स्वप्नफलबोधयित्री" — स्वप्न का फल बताने वाली, सर्वदुःखविनिहन्त्री, सच्चिदानन्द स्वरूपा।
श्लोक 4 — पंचमी अम्बा: 15 वर्णों वाली, चिन्तित फल देने वाली, मणिमय भूषण धारिणी, सदा कृपालु माता।
श्लोक 5 — स्तम्भिनी: विघ्न-आपत्ति नाश निपुण, सकलजगत् संस्तम्भन में चतुर — सम्पूर्ण जगत को रोक देने वाली।
श्लोक 7 — भैरवी: जलनिधि (समुद्र) में डूबी पृथ्वी को दंष्ट्राग्र (दाँत के नोक) पर उठाने वाली, उन्मत्त भैरवी स्वरूपा।
श्लोक 9 — तिरस्करिणी: नीले घोड़े पर सवार, नीले वस्त्र-आभूषण, सर्वतिरस्करिणी — सबको अदृश्य कर देने वाली महामाया।
श्लोक 11 — किरातवाराही: शत्रुओं द्वारा की गई सभी कृत्या (Black Magic) को नष्ट करने वाली, करालास्या (भयंकर मुख), शत्रु गण के लिए भीम रूपा।
श्लोक 13 — धूम्रवाराही: धुएं जैसा आकार, सदा मत्त (उन्मत्त), शत्रु समूह (परिपन्थि यूथ) की हन्त्री। सबसे उग्र स्वरूप।
श्लोक 15 — सिद्धवाराही: बिन्दु, त्रिकोण, गजदल और तीन सदनों से सुशोभित चक्र (यंत्र) में विराजमान। यंत्र-सिद्ध स्वरूप।
श्लोक 16 — फलश्रुति: "सर्वसौख्यास्पदं पदम्" — भक्तिपूर्वक पाठ से सम्पूर्ण सुखों का स्थान प्राप्त होता है।
पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
समय: मध्यरात्रि या ब्रह्म मुहूर्त सर्वोत्तम। स्वप्न सिद्धि हेतु सोने से ठीक पहले पाठ करें।
दिशा: शत्रु शमन हेतु दक्षिण मुख, स्वप्न-सिद्धि/ज्ञान हेतु पूर्व मुख।
वस्त्र: नीले/काले वस्त्र (शत्रु नाश), लाल वस्त्र (सामान्य पूजा)।
भोग: उड़द दाल के लड्डू, खट्टा अनार, गुड़। ताम्रपात्र में शहद का प्रतीक भोग।
विशेष: स्वप्नेशी साधना — सोने से पहले पाठ करें, मन में प्रश्न रखें, देवी स्वप्न में उत्तर देंगी।