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Kakaradi Kali Ashtottara Shatanama Stotram – ककारादि श्री काली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Kakaradi Kali Ashtottara Shatanama Stotram – ककारादि श्री काली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ ककारादि श्री काली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ भैरव उवाच ॥ शतनाम प्रवक्ष्यामि कालिकाया वरानने । यस्य प्रपठनाद्वाग्मी सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ १ ॥ काली कपालिनी कान्ता कामदा कामसुन्दरी । कालरात्रिः कालिका च कालभैरवपूजिता ॥ २ ॥ कुरुकुल्ला कामिनी च कमनीयस्वभाविनी । कुलीना कुलकर्त्री च कुलवर्त्मप्रकाशिनी ॥ ३ ॥ कस्तूरीरसनीला च काम्या कामस्वरूपिणी । ककारवर्णनिलया कामधेनुः करालिका ॥ ४ ॥ कुलकान्ता करालास्या कामार्ता च कलावती । कृशोदरी च कामाख्या कौमारी कुलपालिनी ॥ ५ ॥ कुलजा कुलकन्या च कुलहा कुलपूजिता । कामेश्वरी कामकान्ता कुञ्जरेश्वरगामिनी ॥ ६ ॥ कामदात्री कामहर्त्री कृष्णा चैव कपर्दिनी । कुमुदा कृष्णदेहा च कालिन्दी कुलपूजिता ॥ ७ ॥ काश्यपी कृष्णमाता च कुलिशाङ्गी कला तथा । क्रीं रूपा कुलगम्या च कमला कृष्णपूजिता ॥ ८ ॥ कृशाङ्गी किन्नरी कर्त्री कलकण्ठी च कार्तिकी । कम्बुकण्ठी कौलिनी च कुमुदा कामजीविनी ॥ ९ ॥ कुलस्त्री कीर्तिका कृत्या कीर्तिश्च कुलपालिका । कामदेवकला कल्पलता कामाङ्गवर्धिनी ॥ १० ॥ कुन्ता च कुमुदप्रीता कदम्बकुसुमोत्सुका । कादम्बिनी कमलिनी कृष्णानन्दप्रदायिनी ॥ ११ ॥ कुमारीपूजनरता कुमारीगणशोभिता । कुमारीरञ्जनरता कुमारीव्रतधारिणी ॥ १२ ॥ कङ्काली कमनीया च कामशास्त्रविशारदा । कपालखट्वाङ्गधरा कालभैरवरूपिणी ॥ १३ ॥ कोटरी कोटराक्षी च काशीकैलासवासिनी । कात्यायनी कार्यकरी काव्यशास्त्रप्रमोदिनी ॥ १४ ॥ कामाकर्षणरूपा च कामपीठनिवासिनी । कङ्किनी काकिनी क्रीडा कुत्सिता कलहप्रिया ॥ १५ ॥ कुण्डगोलोद्भवप्राणा कौशिकी कीर्तिवर्धिनी । कुम्भस्तनी कटाक्षा च काव्या कोकनदप्रिया ॥ १६ ॥ कान्तारवासिनी कान्तिः कठिना कृष्णवल्लभा । इति ते कथितं देवि गुह्याद्गुह्यतरं परम् ॥ १७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ प्रपठेद्य इदं नित्यं कालीनामशताष्टकम् । त्रिषु लोकेषु देवेशि तस्याऽसाध्यं न विद्यते ॥ १८ ॥ प्रातःकाले च मध्याह्ने सायाह्ने च सदा निशि । यः पठेत्परया भक्त्या कालीनामशताष्टकम् ॥ १९ ॥ कालिका तस्य गेहे च संस्थानं कुरुते सदा । शून्यागारे श्मशाने वा प्रान्तरे जलमध्यतः ॥ २० ॥ वह्निमध्ये च सङ्ग्रामे तथा प्राणस्य संशये । शताष्टकं जपन्मन्त्री लभते क्षेममुत्तमम् ॥ २१ ॥ कालीं संस्थाप्य विधिवत् स्तुत्वा नामशताष्टकैः । साधकः सिद्धिमाप्नोति कालिकायाः प्रसादतः ॥ २२ ॥ ॥ इति श्री काली ककाराष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय - ककारादि की विशेषता

ककारादि काली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् एक अद्वितीय और दुर्लभ स्तोत्र है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें माँ काली के 108 नाम हैं और सभी नाम 'क' अक्षर से प्रारंभ होते हैं।
यह स्तोत्र भैरव ने देवी को सुनाया है। "ककारादि" का अर्थ है - "क" अक्षर से आदि (प्रारंभ) होने वाला।

भैरव वचन: "शतनाम प्रवक्ष्यामि कालिकाया वरानने। यस्य प्रपठनाद्वाग्मी सर्वत्र विजयी भवेत्।"
अर्थ: हे सुन्दर वदनवाली! मैं कालिका के सौ नाम कहता हूँ। इसके पाठ से व्यक्ति वाक्पटु और सर्वत्र विजयी होता है।

"क" अक्षर का रहस्य

तांत्रिक परंपरा में "क" वर्ण का विशेष महत्व है:
  • काली बीज: "क्रीं" बीज मंत्र का प्रथम अक्षर "क" है
  • काल: "क" से काल (समय) का प्रतीक है, और काली काल की देवी हैं
  • कुण्डलिनी: "क" कुण्डलिनी शक्ति का वाचक है
  • कौल: "क" से कौल परंपरा का संकेत है
  • कामाख्या: "क" से कामाख्या पीठ का बोध है
इसलिए सभी 108 नामों का "क" से प्रारंभ होना अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है।

प्रमुख 108 नाम

क्र.नामअर्थ
1कालीकाल की देवी, श्यामवर्णा
2कपालिनीकपाल धारण करने वाली
3कान्तासुन्दरी, प्रियतमा
4कामदाइच्छा पूर्ण करने वाली
5कालरात्रिकाल की रात्रि (नवदुर्गा)
6कुरुकुल्लावशीकरण देवी
7कामाख्याकामाख्या पीठ की देवी
8कौमारीकुमार (कार्तिकेय) की शक्ति
9क्रीं रूपाक्रीं बीज स्वरूपा
10कात्यायनीकात्यायन ऋषि की पुत्री
... और ऐसे कुल 108 नाम "क" से प्रारंभ

विशेष नामों का वर्गीकरण

कुल/तंत्र संबंधी नाम

  • कुलीना, कुलकर्त्री
  • कुलवर्त्मप्रकाशिनी
  • कौलिनी, कुलपालिनी
  • कुलगम्या, कुलपूजिता

काम/इच्छा संबंधी नाम

  • कामदा, कामसुन्दरी
  • कामिनी, कामस्वरूपिणी
  • कामेश्वरी, कामकान्ता
  • कामदात्री, कामहर्त्री

स्थान संबंधी नाम

  • कामाख्या (कामाख्या पीठ)
  • काशीकैलासवासिनी
  • कामपीठनिवासिनी
  • कान्तारवासिनी

कुमारी संबंधी नाम

  • कुमारीपूजनरता
  • कुमारीगणशोभिता
  • कुमारीरञ्जनरता
  • कुमारीव्रतधारिणी

पाठ फल (फलश्रुति)

फलश्रुति (श्लोक 18-22) के अनुसार:
  • वाग्मी: वाक्पटु और वक्ता बनता है
  • सर्वत्र विजय: हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है
  • त्रिलोक में अजेय: कुछ भी असाध्य नहीं रहता
  • गृह में कालिका वास: माँ काली घर में स्थायी निवास करती हैं
  • संकट रक्षा: शून्यागार, श्मशान, जल, अग्नि, युद्ध में रक्षा
  • प्राण रक्षा: प्राण संकट में क्षेम (सुरक्षा) मिलती है
  • सिद्धि प्राप्ति: कालिका की कृपा से सिद्धि मिलती है

पाठ विधि

उत्तम समय:
  • प्रातःकाल: ब्राह्म मुहूर्त में
  • मध्याह्न: दोपहर में
  • सायाह्न: संध्या समय
  • निशि: रात्रि में (सर्वोत्तम)
विशेष अवसर:
  • अमावस्या, काली चतुर्दशी
  • मंगलवार और शनिवार
  • नवरात्रि के दिन

विधि: "कालीं संस्थाप्य विधिवत् स्तुत्वा नामशताष्टकैः" - माँ काली की प्रतिमा स्थापित करके, विधिपूर्वक इन 108 नामों से स्तुति करें।

FAQ

1. "ककारादि" का क्या अर्थ है?

"ककारादि" = "क" + "कार" + "आदि" = जिसका आदि (प्रारंभ) "क" अक्षर से हो। इस स्तोत्र में सभी 108 नाम "क" से शुरू होते हैं।

2. यह स्तोत्र किसने कहा?

यह स्तोत्र भैरव ने देवी को सुनाया है। भैरव शिव का उग्र रूप हैं और काली के साथी देवता हैं।

3. सभी नाम "क" से क्यों शुरू होते हैं?

"क" वर्ण काली बीज "क्रीं" का प्रथम अक्षर है। यह काल, कुण्डलिनी और कौल तंत्र का प्रतीक है। इसलिए यह अत्यंत शक्तिशाली है।

4. "क्रीं रूपा" नाम का क्या महत्व है?

"क्रीं" माँ काली का मूल बीज मंत्र है। "क्रीं रूपा" का अर्थ है कि माँ का स्वरूप ही क्रीं बीज है। यह नाम मंत्र और देवी की एकता दर्शाता है।

5. "कुरुकुल्ला" कौन हैं?

कुरुकुल्ला वशीकरण और आकर्षण की देवी हैं। ये काली का ही एक स्वरूप हैं जो प्रेम और आकर्षण प्रदान करती हैं।

6. कुमारी पूजन का क्या संबंध है?

श्लोक 12 में चार नाम कुमारी से जुड़े हैं। काली उपासना में कुमारी पूजन अत्यंत महत्वपूर्ण है। नवरात्रि में कन्या पूजन इसी परंपरा का अंग है।

7. यह स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

प्रातः, मध्याह्न, सायं और रात्रि - चारों समय पढ़ सकते हैं। परंतु रात्रि में पाठ सर्वोत्तम है। अमावस्या और काली चतुर्दशी विशेष शुभ हैं।

8. अष्टोत्तर और सहस्रनाम में क्या अंतर है?

अष्टोत्तर में 108 नाम हैं, सहस्रनाम में 1000 नाम। दोनों ककारादि हैं। नियमित पाठ के लिए अष्टोत्तर सुविधाजनक है।