Logoपवित्र ग्रंथ

श्री गजानन स्तोत्रम् - देवर्षि कृतम् (Devarshi Kruta Gajanana Stotram)

Devarshi Kruta Gajanana Stotram

श्री गजानन स्तोत्रम् - देवर्षि कृतम् (Devarshi Kruta Gajanana Stotram)
॥ श्री गजानन स्तोत्रम् (देवर्षि कृतम्) ॥ देवर्षय ऊचुः । विदेहरूपं भवबन्धहारं सदा स्वनिष्ठं स्वसुखप्रदं तम् । अमेयसाङ्ख्येन च लभ्यमीशं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १ ॥ मुनीन्द्रवन्द्यं विधिबोधहीनं सुबुद्धिदं बुद्धिधरं प्रशान्तम् । विकालहीनं सकलान्तगं वै गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ २ ॥ अमेयरूपं हृदि संस्थितं तं ब्रह्माहमेकं भ्रमनाशकारम् । अनादिमध्यान्तमपाररूपं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ ३ ॥ जगत्प्रमाणं जगदीशमेव- -मगम्यमाद्यं जगदादिहीनम् । अनात्मनां मोहप्रदं पुराणं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ ४ ॥ न भूर्न रूपं न जलं प्रकाशं न तेजसिस्थं न समीरणस्थम् । न खे गतं पञ्चविभूतिहीनं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ ५ ॥ न विश्वगं तैजसगं न प्राज्ञं समष्टिव्यष्टिस्थमनन्तगं न । गुणैर्विहीनं परमार्थभूतं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ ६ ॥ गुणेशगं नैव च बिन्दुसंस्थं न देहिनं बोधमयं न ढुण्ढिम् । सम्योगहीनाः प्रवदन्ति तत्स्थं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ ७ ॥ अनागतं नैव गतं गणेशं कथं तदाकारमयं वदामः । तथापि सर्वं प्रभुदेहसंस्थं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ ८ ॥ यदि त्वया नाथ कृतं न किञ्चि- -त्तदा कथं सर्वमिदं विभाति । अतो महात्मानमचिन्त्यमेव गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ ९ ॥ सुसिद्धिदं भक्तजनस्य देवं स कामिकानामिह सौख्यदं तम् । अकामिकानां भवबन्धहारं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १० ॥ सुरेन्द्रसेव्यं ह्यसुरैः सुसेव्यं समानभावेन विराजयन्तम् । अनन्तवाहं मुषकध्वजं तं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ ११ ॥ सदा सुखानन्दमये जले च समुद्रजे चेक्षुरसे निवासम् । द्वन्द्वस्य पानेन च नाशरूपे गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १२ ॥ चतुःपदार्था विविधप्रकाशा- -स्त एव हस्ताः स चतुर्भुजं तम् । अनाथनाथं च महोदरं वै गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १३ ॥ महाखुमारूढमकालकालं विदेहयोगेन च लभ्यमानम् । अमायिनं मायिकमोहदं तं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १४ ॥ रविस्वरूपं रविभासहीनं हरिस्वरूपं हरिबोधहीनम् । शिवस्वरूपं शिवभासनाशं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १५ ॥ महेश्वरीस्थं च सुशक्तिहीनं प्रभुं परेशं परवन्द्यमेवम् । अचालकं चालकबीजभूतं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १६ ॥ शिवादिदेवैश्च खगैः सुवन्द्यं नरैर्लतावृक्षपशुप्रभूभिः । चराचरैर्लोकविहीनमेवं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १७ ॥ मनोवचोहीनतया सुसंस्थं निवृत्तिमात्रं ह्यजमव्ययं तम् । तथापि देवं पुर आस्थितं तं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १८ ॥ वयं सुधन्या गणपस्तवेन तथैव नत्यार्चनतस्तवैव । गणेशरूपाश्च कृतास्त्वया तं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ १९ ॥ गजाख्यबीजं प्रवदन्ति वेदा- -स्तदेव चिह्नेन च योगिनस्त्वाम् । गच्छन्ति तेनैव गजाननस्त्वं गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ २० ॥ पुराणवेदाः शिवविष्णुकाद्या- -ऽमराः शुकाद्या गणपस्तवे वै । विकुण्ठिताः किं च वयं स्तवाम गजाननं भक्तियुता भजामः ॥ २१ ॥ मुद्गल उवाच । एवं स्तुत्वा गणेशानं नेमुः सर्वे पुनः पुनः । तानुत्थाप्य वचो रम्यं गजानन उवाच ह ॥ २२ ॥ गजानन उवाच । वरं ब्रूत महाभागा देवाः सर्षिगणाः परम् । स्तोत्रेण प्रीतिसम्युक्तः परं दास्यामि वाञ्छितम् ॥ २३ ॥ गजाननवचः श्रुत्वा हर्षयुक्ताः सुरर्षयः । जगुस्तं भक्तिभावेन साश्रुनेत्राः प्रजापते ॥ २४ ॥ देवर्षय ऊचुः । गजानन यदि स्वामिन् प्रसन्नो वरदोऽसि भोः । तदा भक्तिं दृढां देहि लोभहीनां त्वदीयकाम् ॥ २५ ॥ लोभासुरस्य देवेश कृता शान्तिः सुखप्रदा । तदा जगदिदं सर्वं वरयुक्तं कृतं त्वया ॥ २६ ॥ अधुना देवदेवेश कर्मयुक्ता द्विजादयः । भविष्यन्ति धरायां वै वयं स्वस्थानगास्तथा ॥ २७ ॥ स्वस्वधर्मरताः सर्वे गजानन कृतास्त्वया । अतःपरं वरं याचामहे ढुण्ढे कमप्यहो ॥ २८ ॥ यदा ते स्मरणं नाथ करिष्यामो वयं प्रभो । तदा सङ्कटहीनान् वै कुरु त्वं नो गजानन ॥ २९ ॥ एवमुक्त्वा प्रणेमुस्तं गजाननमनामयम् । स तानुवाच प्रीतात्मा भक्त्यधीनस्वभावतः ॥ ३० ॥ गजानन उवाच । यद्यच्च प्रार्थितं देवा मुनयः सर्वमञ्जसा । भविष्यति न सन्देहो मत्स्मृत्या सर्वदा हि वः ॥ ३१ ॥ भवत्कृतमदीयं वै स्तोत्रं सर्वत्र सिद्धिदम् । भविष्यति विशेषेण मम भक्तिप्रदायकम् ॥ ३२ ॥ पुत्रपौत्रप्रदं पूर्णं धनधान्यविवर्धनम् । सर्वसम्पत्करं देवाः पठनाच्छ्रवणान्नृणाम् ॥ ३३ ॥ मारणोच्चाटनादीनि नश्यन्ति स्तोत्रपाठतः । परकृत्यं च विप्रेन्द्रा अशुभं नैव बाधते ॥ ३४ ॥ सङ्ग्रामे जयदं चैव यात्राकाले फलप्रदम् । शत्रूच्चाटनकाद्येषु प्रशस्तं तद्भविष्यति ॥ ३५ ॥ कारागृहगतस्यैव बन्धनाशकरं भवेत् । असाध्यं साधयेत् सर्वमनेनैव सुरर्षयः ॥ ३६ ॥ एकविंशतिवारं चैकविंशति दिनावधिम् । प्रयोगं यः करोत्येव स भवेत् सर्वसिद्धिभाक् ॥ ३७ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां ब्रह्मभूतस्य दायकम् । भविष्यति न सन्देहः स्तोत्रं मद्भक्तिवर्धनम् । एवमुक्त्वा गणाधीशस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३८ ॥ इति श्रीमन्मुद्गलपुराणे गजाननचरिते त्रिचत्वारिंशोऽध्याये देवमुनिकृत गजाननस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
संलिखित ग्रंथ पढ़ें

स्तोत्र परिचय (Introduction)

श्री गजानन स्तोत्रम् (Addressed by Devarshis) गणेश साहित्य के मुकुटमणि मुद्गल पुराण (Mudgala Purana, 43rd Chapter) से लिया गया है। यह स्तुति देवर्षि नारद और अन्य ऋषियों द्वारा उस समय की गई थी जब उन्होंने गणेश जी को निराकार ब्रह्म के रूप में अनुभव किया।

यह स्तोत्र 'सगुण' (Form) और 'निर्गुण' (Formless) दोनों उपासनाओं का अद्भुत संगम है। इसमें ऋषि कहते हैं - "विदेहरूपं भवबन्धहारं" (हम उस देह-रहित परमात्मा को भजते हैं जो संसार के बंधन हरने वाला है)।

दार्शनिक महत्व (Significance)

इस स्तोत्र में गणेश जी को केवल 'गजानन' (हाथी के मुख वाले) तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि उन्हें ब्रह्मांड की मूल उर्जा बताया गया है:

  • ब्रह्म स्वरूप: श्लोक 3 में ऋषि कहते हैं - "ब्रह्माहमेकं" (मैं ही ब्रह्म हूँ, यह भ्रांति मिटाने वाले आप ही हैं)।
  • तत्वों से परे: श्लोक 5 बताता है कि वे न पृथ्वी हैं, न जल, न अग्नि, न वायु और न ही आकाश (पंचतत्वों से परे) हैं।
  • विदेह योग: यह स्तोत्र 'विदेह मुनीन्द्रों' (देह-भाव से मुक्त योगियों) के लिए भी वंदनीय है।

स्तोत्र पाठ के लाभ (Phalashruti)

भगवान गजानन ने स्वयं प्रकट होकर इस स्तोत्र की महिमा (श्लोक 31-38) बताई है:

  • सर्वत्र सिद्धि और विजय

    श्लोक 32 और 35 के अनुसार, यह स्तोत्र सभी कार्यों में सिद्धि देता है और संग्राम (युद्ध/कोर्ट-कचहरी) में विजय दिलाता है।

  • बंधन मुक्ति (Jail/Bondage Release)

    श्लोक 36 में स्पष्ट वचन है - "कारागृहगतस्यैव बन्धनाशकरं भवेत्"। अर्थात, जेल या किसी भी प्रकार के बंधन में पड़ा व्यक्ति इसके पाठ से मुक्त हो जाता है।

  • असाध्य कार्य सिद्धि

    जो कार्य अन्य किसी उपाय से न हो रहा हो (असाध्यं), उसे भी यह स्तोत्र सिद्ध कर देता है (साधयेत् सर्वमनेनैव)।

21 दिनों का अनुष्ठान (The 21-Day Ritual)

इस स्तोत्र की पूर्ण शक्ति को जागृत करने के लिए भगवान ने स्वयं एक विधि (श्लोक 37) बताई है:

॥ सिद्धि प्रयोग ॥

"एकविंशतिवारं चैकविंशति दिनावधिम् ।
प्रयोगं यः करोत्येव स भवेत् सर्वसिद्धिभाक् ॥ ३७ ॥"
  • समय: लगातार 21 दिन (21 Days continuously).
  • संख्या: प्रतिदिन 21 बार पाठ (21 recitations daily).
  • परिणाम: ऐसा करने वाला 'सर्वसिद्धिभाक्' (सभी सिद्धियों का स्वामी) बन जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. इस स्तोत्र और संकटनाशन स्तोत्र में क्या अंतर है?

'संकटनाशन' मुख्य रूप से संकट काटने और नाम-स्मरण के लिए है। जबकि 'देवर्षि कृत स्तोत्र' उच्च दार्शनिक ज्ञान (ब्रह्म ज्ञान) और असम्भव कार्यों की सिद्धि (जैसे बंधन मुक्ति) के लिए विशेष प्रभावी है।

Q2. 'विदेहरूप' का क्या अर्थ है?

'विदेह' का अर्थ है - देह (Body) से रहित। गणेश जी का वास्तविक स्वरूप भौतिक शरीर वाला नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य (Pure Consciousness) है। जो साधक इस भाव से पूजा करता है, वह भी देह-अहंकार से मुक्त हो जाता है।

Q3. क्या 21 दिन का अनुष्ठान बीच में टूट जाए तो क्या करें?

यदि ब्रह्मचर्य या अनिवार्य कारण से क्रम टूट जाए, तो प्रायश्चित के रूप में 108 बार "ॐ गं गणपतये नमः" का जाप करें और अनुष्ठान फिर से (Day 1 से) शुरू करें। सिद्धि के लिए निरंतरता (Continuity) आवश्यक है।

Q4. मुद्गल पुराण में इस स्तोत्र का क्या महत्व है?

मुद्गल पुराण गणेश जी के 32 स्वरूपों और दार्शनिक तत्वों का विवेचन है। यह स्तोत्र इसके 43वें अध्याय में आता है, जहाँ देवता गणेश जी को "परब्रह्म" (Supreme Reality) मानकर स्तुति करते हैं।

Q5. इस स्तोत्र में गणेश जी को "अमेय" क्यों कहा गया है?

"अमेय" का अर्थ है जिसे मापा न जा सके (Immeasurable)। गणेश जी का स्वरूप देश, काल और दिशाओं से परे है, इसलिए वे अमेय हैं।

Q6. क्या विद्यार्थी इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, श्लोक 10 में कहा गया है कि यह "सुबुद्धिदं" (श्रेष्ठ बुद्धि देने वाला) है। विद्यार्थियों के लिए यह एकाग्रता और उच्च कोटि की मेधा शक्ति बढ़ाने में सहायक है।

Q7. क्या स्त्रियां मासिक धर्म के दौरान इसे पढ़ सकती हैं?

मासिक धर्म के दौरान 4-5 दिन का विराम देना चाहिए। आप मन ही मन भगवान का स्मरण (मानसिक जाप) कर सकती हैं, लेकिन वाचिक पाठ (बोलकर) और अनुष्ठान शुद्धि होने पर ही करें।

Q8. इस पाठ का सबसे उत्तम समय कौन सा है?

ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि तब वातावरण शांत होता है और "विदेह" (ध्यान) स्थिति में जाना सरल होता है। वैसे आप इसे संध्या वंदन के समय भी पढ़ सकते हैं।

Q9. श्लोक 36 में "कारागृहगतस्य" का क्या तात्पर्य है?

इसका सीधा अर्थ जेल (Prison) है, लेकिन आध्यात्मिक अर्थ में यह "संसार रूपी कारागार" (Bondage of Worldly Life) से मुक्ति दिलाने वाला भी है।

Q10. क्या इसे बिना माला के पढ़ सकते हैं?

स्तोत्र पाठ के लिए माला अनिवार्य नहीं है, आप संख्या गिनने के लिए उंगलियों (करमाला) का प्रयोग कर सकते हैं या एक निश्चित समय (जैसे 30 मिनट) तक पाठ कर सकते हैं।