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श्री एकदन्त स्तोत्रम् (Sri Ekadanta Stotram)

Sri Ekadanta Stotram

श्री एकदन्त स्तोत्रम् (Sri Ekadanta Stotram)
॥ श्री एकदन्त स्तोत्रम् ॥ गृत्समद उवाच । मदासुरं सुशान्तं वै दृष्ट्वा विष्णुमुखाः सुराः । भृग्वादयश्च योगीन्द्रा एकदन्तं समाययुः ॥ १ ॥ प्रणम्य तं प्रपूज्याऽऽदौ पुनस्ते नेमुरादरात् । तुष्टुवुर्हर्षसम्युक्ता एकदन्तं गजाननम् ॥ २ ॥ देवर्षय ऊचुः । सदात्मरूपं सकलादिभूत- -ममायिनं सोऽहमचिन्त्यबोधम् । अथादिमध्यान्तविहीनमेकं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ३ ॥ अनन्तचिद्रूपमयं गणेश- -मभेदभेदादिविहीनमाद्यम् । हृदि प्रकाशस्य धरं स्वधीस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ४ ॥ समाधिसंस्थं हृदि योगिनां तु प्रकाशरूपेण विभान्तमेवम् । सदा निरालम्बसमाधिगम्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ५ ॥ स्वबिम्बभावेन विलासयुक्तं प्रकृत्य मायां विविधस्वरूपम् । सुवीर्यकं तत्र ददाति यो वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ६ ॥ यदीय वीर्येण समर्थभूतं स्वमायया संरचितं च विश्वम् । तुरीयकं ह्यात्मकवित्तिसञ्ज्ञं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ७ ॥ त्वदीयसत्ताधरमेकदन्तं गुणेश्वरं यं गुणबोधितारम् । भजन्त आद्यं तमजं त्रिसंस्था- -स्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ८ ॥ ततस्त्वया प्रेरितनादकेन सुषुप्तिसञ्ज्ञं रचितं जगद्वै । समानरूपं च तथैकभूतं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ९ ॥ तदेव विश्वं कृपया प्रभूतं द्विभावमादौ तमसा विभातम् । अनेकरूपं च तथैकभूतं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १० ॥ ततस्त्वया प्रेरितकेन सृष्टं सुसूक्ष्मभावं जगदेकसंस्थम् । सुसात्त्विकं स्वप्नमनन्तमाद्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ११ ॥ तत् स्वप्नमेवं तपसा गणेश सुसिद्धिरूपं द्विविधं बभूव । सदैकरूपं कृपया च ते य- -त्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १२ ॥ त्वदाज्ञया तेन सदा हृदिस्थ तथा सुसृष्टं जगदंशरूपम् । विभिन्नजाग्रन्मयमप्रमेयं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १३ ॥ तदेव जाग्रद्रजसा विभातं विलोकितं त्वत्कृपया स्मृतेश्च । बभूव भिन्नं च सदैकरूपं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १४ ॥ तदेव सृष्ट्वा प्रकृतिस्वभावा- -त्तदन्तरे त्वं च विभासि नित्यम् । धियः प्रदाता गणनाथ एक- -स्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १५ ॥ सर्वे ग्रहा भानि यदाज्ञया च प्रकाशरूपाणि विभान्ति खे वै । भ्रमन्ति नित्यं स्वविहारकार्या- -त्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १६ ॥ त्वदाज्ञया सृष्टिकरो विधाता त्वदाज्ञया पालक एव विष्णुः । त्वदाज्ञया संहरको हरो वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १७ ॥ यदाज्ञया भूस्तु जले प्रसंस्था यदाज्ञयाऽऽपः प्रवहन्ति नद्यः । स्वतीरसंस्थश्च कृतः समुद्र- -स्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १८ ॥ यदाज्ञया देवगणा दिविस्था यच्छन्ति वै कर्मफलानि नित्यम् । यदाज्ञया शैलगणाः स्थिरा वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १९ ॥ यदाज्ञया शेष इलाधरो वै यदाज्ञया मोहद एव कामः । यदाज्ञया कालधरोऽर्यमा च तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २० ॥ यदाज्ञया वाति विभाति वायु- -र्यदाज्ञयाऽग्निर्जठरादिसंस्थः । यदाज्ञयेदं सचराचरं च तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २१ ॥ तदन्तरिक्षं स्थितमेकदन्तं त्वदाज्ञया सर्वमिदं विभाति । अनन्तरूपं हृदि बोधकं त्वां तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २२ ॥ सुयोगिनो योगबलेन साध्यं प्रकुर्वते कः स्तवने समर्थः । अतः प्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तु तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २३ ॥ गृत्समद उवाच । एवं स्तुत्वा गणेशानं देवाः समुनयः प्रभुम् । तूष्णीं भावं प्रपद्यैव ननृतुर्हर्षसम्युताः ॥ २४ ॥ स तानुवाच प्रीतात्मा देवर्षीणां स्तवेन वै । एकदन्तो महाभागान् देवर्षीन् भक्तवत्सलः ॥ २५ ॥ एकदन्त उवाच । स्तोत्रेणाहं प्रसन्नोऽस्मि सुराः सर्षिगणाः खलु । वृणुध्वं वरदोऽहं वो दास्यामि मनसीप्सितम् ॥ २६ ॥ भवत्कृतं मदीयं यत् स्तोत्रं प्रीतिप्रदं च तत् । भविष्यति न सन्देहः सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ २७ ॥ यद्यदिच्छति तत्तद्वै प्राप्नोति स्तोत्रपाठकः । पुत्रपौत्रादिकं सर्वं कलत्रं धनधान्यकम् ॥ २८ ॥ गजाश्वादिकमत्यन्तं राज्यभोगादिकं ध्रुवम् । भुक्तिं मुक्तिं च योगं वै लभते शान्तिदायकम् ॥ २९ ॥ मारणोच्चाटनादीनि राज्यबन्धादिकं च यत् । पठतां शृण्वतां नृणां भवेत्तद्बन्धहीनता ॥ ३० ॥ एकविंशतिवारं यः श्लोकानेवैकविंशतिम् । पठेद्वै हृदि मां स्मृत्वा दिनानि त्वेकविंशतिम् ॥ ३१ ॥ न तस्य दुर्लभं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु वै भवेत् । असाध्यं साधयेन्मर्त्यः सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ३२ ॥ नित्यं यः पठति स्तोत्रं ब्रह्मीभूतः स वै नरः । तस्य दर्शनतः सर्वे देवाः पूता भवन्ति च ॥ ३३ ॥ एवं तस्य वचः श्रुत्वा प्रहृष्टा अमरर्षयः । ऊचुः सर्वे करपुटैर्भक्त्या युक्ता गजाननम् ॥ ३४ ॥ इति श्रीमुद्गलपुराणे एकदन्तचरिते पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याये श्री एकदन्त स्तोत्रम् ।
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स्तोत्र परिचय (Introduction)

श्री एकदन्त स्तोत्रम् (Sri Ekadanta Stotram) गणेश पुराण साहित्य के मुकुटमणि मुद्गल पुराण (Mudgala Purana) से लिया गया है। यह स्तोत्र इसके 55वें अध्याय में वर्णित 'एकदन्त चरित्र' का भाग है।

इस स्तुति की विशेषता यह है कि यह केवल भक्तिभाव से ही नहीं, बल्कि गहन वेदान्त और अद्वैत दर्शन से ओतप्रोत है। इसमें देवर्षि (नारद आदि) भगवान गणेश के 'एकदन्त' स्वरूप की स्तुति करते हुए उन्हें परब्रह्म परमात्मा के रूप में नमन करते हैं - "तमेकदन्तं शरणं व्रजामः"

इस स्तोत्र का दार्शनिक महत्व (Significance)

साधारण पौरानिक कथाओं में एकदन्त का अर्थ 'एक दांत वाला' है, जो युद्ध में परशुराम या गजासुर से सम्बंधित है। किन्तु इस स्तोत्र में 'एकदन्त' का अर्थ 'एक अद्वितीय सत्ता' (One Non-Dual Reality) बताया गया है।

  • यह स्तोत्र बताता है कि गणेश ही ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन) और महेश (संहार) की शक्तियों के मूल स्रोत हैं।
  • ग्रह, नक्षत्र, वायु, अग्नि और स्वयं कामदेव भी उन्हीं की आज्ञा (भय) से अपना कार्य करते हैं।
  • यह 'माया' (Illusion) से परे उस परम सत्य की ओर ले जाता है जो 'जाग्रत', 'स्वप्न' और 'सुषुप्ति' तीनों अवस्थाओं का साक्षी है।

स्तोत्र पाठ के लाभ (Phalashruti)

भगवान एकदन्त ने स्वयं इस स्तोत्र की महिमा बताते हुए कहा है कि यह 'सर्वसिद्धिप्रदायक' है। इसके मुख्य लाभ हैं:

  • मनोकामना पूर्ति

    श्लोक सं. 28 के अनुसार, साधक जो कुछ भी इच्छा करता है (यद्यदिच्छति तत्तद्वै), वह उसे प्राप्त होता है।

  • वंश और धन वृद्धि

    यह पुत्र-पौत्र (Lineage), उत्तम जीवनसाथी (कलत्र), और अपार धन-धान्य प्रदान करने वाला है।

  • भोग और मोक्ष

    यह स्तोत्र एक दुर्लभ संयोग प्रदान करता है - 'भुक्तिं मुक्तिं च'। अर्थात यह सांसारिक सुख (राज्य भोगादि) भी देता है और अंत में मोक्ष (शांति) भी।

  • शत्रु भय मुक्ति

    मारण, उच्चाटन या राज्य (सरकार/कोर्ट) की ओर से आने वाली बाधाएं इसके पाठ से स्वयं नष्ट हो जाती हैं।

सिद्धि की गुप्त विधि (Secret Method of Siddhi)

इस स्तोत्र के अंत में (श्लोक 31 में) इसकी सिद्धि का एक अत्यंत विशिष्ट और गोपनीय विधान बताया गया है, जो '21' के अंक पर आधारित है।

॥ 21 दिनों का अनुष्ठान ॥

"एकविंशतिवारं यः श्लोकानेवैकविंशतिम् ।
पठेद्वै हृदि मां स्मृत्वा दिनानि त्वेकविंशतिम् ॥ ३१ ॥"
  • 21 श्लोक: मुख्य स्तोत्र (श्लोक 3 से 23 तक) ठीक 21 पदों का है।
  • 21 बार: इन 21 श्लोकों का प्रतिदिन 21 बार पाठ करना है।
  • 21 दिन: यह क्रम लगातार 21 दिनों तक बिना नागा किये चलाना है।

ऐसा करने वाले साधक के लिए तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता (श्लोक 32)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. क्या 21 बार पाठ करना अनिवार्य है?

21 बार पाठ करना 'सिद्धि' (विशेष कार्य सिद्धि) के लिए बताया गया है। सामान्य भक्ति और नित्य पूजा के लिए आप इसे 1, 3 या 11 बार भी पढ़ सकते हैं। प्रभु भाव के भूखे हैं।

Q2. 'एकदन्त' का वास्तविक अर्थ क्या है?

मुद्गल पुराण के अनुसार 'एक' का अर्थ है 'माया' (Illusion) और 'दन्त' का अर्थ है 'चालक' या 'आधार'। अर्थात जो माया का भी स्वामी है और माया को धारण करता है, वही 'एकदन्त' परब्रह्म है।

Q3. इस पाठ को शुरू करने का शुभ समय क्या है?

चूंकि इसमें 21 दिन का विधान है, आप किसी भी शुक्ल पक्ष की चतुर्थी (विनायक चतुर्थी) या बुधवार से इसे आरम्भ कर सकते हैं। ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) इसके लिए सर्वश्रेष्ठ है।