Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Ganesha Mahimna Stotram – श्री गणेश महिम्नः स्तोत्रम्

Sri Ganesha Mahimna Stotram – श्री गणेश महिम्नः स्तोत्रम्
॥ श्री गणेश महिम्नः स्तोत्रम् ॥ ॥ श्री पुष्पदन्त विरचितम् ॥ अनिर्वाच्यं रूपं स्तवननिकरो यत्र गलित- स्तथा वक्ष्ये स्तोत्रं प्रथमपुरुषस्यात्र महतः । यतो जातं विश्वं स्थितमपि सदा यत्र विलयः स कीदृग्गीर्वाणः सुनिगमनुतः श्रीगणपतिः ॥ १ ॥ गणेशं गाणेशाः शिवमिति च शैवाश्च विबुधाः रविं सौरा विष्णुं प्रथमपुरुषं विष्णुभजकाः । वदन्त्येकं शाक्ताः जगदुदयमूलां परिशिवां न जाने किं तस्मै नम इति परं ब्रह्म सकलम् ॥ २ ॥ तथेशं योगज्ञा गणपतिमिमं कर्म निखिलं समीमांसा वेदान्तिन इति परं ब्रह्म सकलम् । अजां साङ्ख्यो ब्रूते सकलगुणरूपां च सततं प्रकर्तारं न्यायस्त्वथ जगति बौद्धा धियमिति ॥ ३ ॥ कथं ज्ञेयो बुद्धेः परतर इयं बाह्यसरणि- र्यथा धीर्यस्य स्यात्स च तदनुरूपो गणपतिः । महत्कृत्यं तस्य स्वयमपि महान्सूक्ष्ममणुव- द्ध्वनिर्ज्योतिर्बिन्दुर्गगनसदृशः किं च सदसत् ॥ ४ ॥ अनेकास्योऽपाराक्षिकरचरणोऽनन्तहृदय- स्तथा नानारूपो विविधवदनः श्रीगणपतिः । अनन्ताह्वः शक्त्या विविधगुणकर्मैकसमये त्वसङ्ख्यातानन्ताभिमतफलदोऽनेकविषये ॥ ५ ॥ न यस्यान्तो मध्यो न च भवति चादिः सुमहता- मलिप्तः कृत्वेत्थं सकलमपि खंवत्स च पृथक् । स्मृतः संस्मर्तॄणां सकलहृदयस्थः प्रियकरो नमस्तस्मै देवाय सकलसुवन्द्याय महते ॥ ६ ॥ ॥ मंत्र रहस्य ॥ गणेशाद्यं बीजं दहनवनितापल्लवयुतं मनुश्चैकार्णोऽयं प्रणवसहितोऽभीष्टफलदः । सबिन्दुश्चाङ्गाद्यां गणकऋषिछन्दोऽस्य च निचृ- त्स देवः प्राग्बीजं विपदपि च शक्तिर्जपकृताम् ॥ ७ ॥ गकारो हेरम्बः सगुण इति पुंनिर्गुणमयो द्विधाप्येको जातः प्रकृतिपुरुषो ब्रह्म हि गणः । स चेशश्चोत्पत्तिस्थितिलयकरोऽयं प्रथमको यतो भूतं भव्यं भवति पतिरीशो गणपतिः ॥ ८ ॥ गकारः कण्ठोर्ध्वं गजमुखसमो मर्त्यसदृशो णकारः कण्ठाधो जठरसदृशाकार इति च । अधोभावः कट्यां चरण इति हीशोऽस्य च तनु- र्विभातीत्थं नाम त्रिभुवनसमं भूर्भुवः सुवः ॥ ९ ॥ गणेशेति त्र्यर्णात्मकमपि वरं नाम सुखदं सकृत्प्रोच्चैरुच्चारितमिति नृभिः पावनकरम् । गणेशस्यैकस्य प्रतिजपकरस्यास्य सुकृतं न विज्ञातो नाम्नः सकलमहिमा कीदृशविधः ॥ १० ॥ गणेशेत्याह्वां यः प्रवदति मुहुस्तस्य पुरतः प्रपश्यंस्तद्वक्त्रं स्वयमपि गणस्तिष्ठति तदा । स्वरूपस्य ज्ञानं त्वमुक इति नाम्नास्य भवति प्रबोधः सुप्तस्य त्वखिलमिह सामर्थ्यममुना ॥ ११ ॥ गणेशो विश्वेऽस्मिन् स्थित इह च विश्वं गणपतौ गणेशो यत्रास्ते धृतिमतिरमैश्वर्यमखिलम् । समुक्तं नामैकं गणपतिपदं मङ्गलमयं तदेकास्ये दृष्टे सकलविबुधास्येक्षणसमम् ॥ १२ ॥ बहुक्लेशैर्व्याप्तः स्मृत उत गणेशे च हृदये क्षणात् क्लेशान्मुक्तोभवति सहसा त्वभ्रचयवत् । वने विद्यारम्भे युधि रिपुभये कुत्र गमने प्रवेशे प्राणान्ते गणपतिपदं चाशु विशति ॥ १४ ॥ गणाध्यक्षो ज्येष्ठः कपिल अपरो मङ्गलनिधि- र्दयालुर्हेरम्बो वरद इति चिन्तामणिरजः । वरानीशो ढुण्ढिर्गजवदननामा शिवसुतो मयूरेशो गौरीतनय इति नामानि पठति ॥ १५ ॥ महेशोऽयं विष्णुः सकविरविरिन्दुः कमलजः क्षितिस्तोयं वह्निः श्वसन इति खं त्वद्रिरुदधिः । कुजस्तारः शुक्रो पुरुरुडुबुधोऽगुश्च धनदो यमः पाशी काव्यः शनिरखिलरूपो गणपतिः ॥ १६ ॥ मुखं वह्निः पादौ हरिरपि विधाता प्रजननं रविर्नेत्रे चन्द्रो हृदयमपि कामोऽस्य मदनः । करौ शक्रः कट्यामवनिरुदरं भाति दशनं गणेशस्यासन्वै क्रतुमयवपुश्चैव सकलम् ॥ १७ ॥ अनर्घ्यालङ्कारैररुणवसनैर्भूषिततनुः करीन्द्रास्यः सिंहासनमुपगतो भाति बुधराट् । स्मितास्यात्तन्मध्येऽप्युदितरविबिम्बोपमरुचिः स्थिता सिद्धिर्वामे मतिरितरगा चामरकरा ॥ १८ ॥ समन्तात्तस्यासन् प्रवरमुनिसिद्धाः सुरगणाः प्रशंसन्तीत्यग्रे विविधनुतिभिः साञ्जलिपुटाः । बिडौजाद्यैर्ब्रह्मादिभिरनुवृतो भक्तनिकरै- र्गणक्रीडामोदप्रमुदविकटाद्यैः सहचरैः ॥ १९ ॥ वशित्वाद्यष्टाष्टादशदिगखिलाल्लोलमनुवा- ग्धृतिः पादूः खड्गोञजनरसबलाः सिद्धय इमाः । सदा पृष्ठे तिष्ठन्त्यनिमिषदृशस्तन्मुखलयाः गणेशं सेवन्तेऽप्यतिनिकटसूपायनकराः ॥ २० ॥ मृगाङ्कास्या रम्भाप्रभृतिगणिका यस्य पुरतः सुसङ्गीतं कुर्वन्त्यपि कुतुकगन्धर्वसहिताः । मुदः पारो नात्रेत्यनुपमपदे दौर्विगलिता स्थिरं जातं चित्तं चरणमवलोक्यास्य विमलम् ॥ २१ ॥ हरेणायं ध्यातस्त्रिपुरमथने चासुरवधे गणेशः पार्वत्या बलिविजयकालेऽपि हरिणा । विधात्रा संसृष्टावुरगपतिना क्षोणिधरणे नरैः सिद्धौ मुक्तौ त्रिभुवनजये पुष्पधनुषा ॥ २२ ॥ अयं सुप्रासादे सुर इव निजानन्दभुवने महान् श्रीमानाद्यो लघुतरगृहे रङ्कसदृशः । शिवद्वारे द्वाःस्थो नृप इव सदा भूपतिगृहे स्थितो भूत्वोमाङ्के शिशुगणपतिर्लालनपरः ॥ २३ ॥ अमुष्मिन् सन्तुष्टे गजवदन एवापि विबुधे ततस्ते सन्तुष्टास्त्रिभुवनगताः स्युर्बुधगणाः । दयालुर्हेरम्बो न च भवति यस्मिंश्च पुरुषे वृथा सर्वं तस्य प्रजननमतः सान्द्रतमसि ॥ २४ ॥ वरेण्यो भूशुण्डिर्भृगुगुरुकुजा मुद्गलमुखा ह्यपारास्तद्भक्ता जपहवनपूजास्तुतिपराः । गणेशोऽयं भक्तप्रिय इति च सर्वत्र गदितं विभक्तिर्यत्रास्ते स्वयमपि सदा तिष्ठति गणः ॥ २५ ॥ मृदः काश्चिद्धातोश्छदविलिखिता वापि दृषदः स्मृता व्याजान्मूर्तिः पथि यदि बहिर्येन सहसा । अशुद्धोऽद्धा द्रष्टा प्रवदति तदाह्वां गणपतेः श्रुता शुद्धो मर्त्यो भवति दुरिताद्विस्मय इति ॥ २६ ॥ बहिर्द्वारस्योर्ध्वं गजवदनवर्ष्मेन्धनमयं प्रशस्तं वा कृत्वा विविधकुशलैस्तत्र निहतम् । प्रभावात्तन्मूर्त्या भवति सदनं मङ्गलमयं विलोक्यानन्दस्तां भवति जगतो विस्मय इति ॥ २७ ॥ सिते भाद्रे मासे प्रतिशरदि मध्याह्नसमये मृदो मूर्तिं कृत्वा गणपतितिथौ ढुण्ढिसदृशीम् । समर्चत्युत्साहः प्रभवति महान् सर्वसदने विलोक्यानन्दस्तां प्रभवति नृणां विस्मय इति ॥ २८ ॥ तथा ह्येकः श्लोको वरयति महिम्नो गणपतेः कथं स श्लोकेऽस्मिन् स्तुत इति भवेत्सम्प्रपतिते । स्मृतं नामास्यैकं सकृदिदमनन्ताह्वयसमं यतो यस्यैकस्य स्तवनसदृशं नान्यदपरम् ॥ २९ ॥ गजवदन विभो यद्वर्णितं वैभवं ते त्विह जनुषि ममेत्थं चारु तद्दर्शयाशु । त्वमसि च करुणायाः सागरः कृत्स्नदाता- प्यति तव भृतकोऽहं सर्वदा चिन्तकोऽस्मि ॥ ३० ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ सुस्तोत्रं प्रपठतु नित्यमेतदेव स्वानन्दं प्रति गमनेऽप्ययं सुमार्गः । सञ्चिन्त्यं स्वमनसि तत्पदारविन्दं स्थाप्याग्रे स्तवनफलं नतीः करिष्ये ॥ ३१ ॥ गणेशदेवस्य माहात्म्यमेत- द्यः श्रावयेद्वापि पठेच्च तस्य । क्लेशा लयं यान्ति लभेच्च शीघ्रं स्त्रीपुत्रविद्यार्थगृहं च मुक्तिम् ॥ ३२ ॥ ॥ इति श्रीपुष्पदन्तविरचितं श्रीगणेशमहिम्नः स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गणेश महिम्नः स्तोत्रम्: परिचय एवं गहरा आध्यात्मिक आधार (Introduction)

श्री गणेश महिम्नः स्तोत्रम् (Sri Ganesha Mahimna Stotram) गंधर्वराज पुष्पदन्त द्वारा रचित एक महान दार्शनिक और भक्तिपूर्ण ग्रंथ है। पुष्पदन्त वही सिद्ध कवि हैं जिन्होंने जगत प्रसिद्ध 'शिव महिम्नः स्तोत्र' की रचना की थी। इस स्तोत्र में उन्होंने अपनी अद्वितीय काव्य प्रतिभा का उपयोग करते हुए भगवान गणेश को 'परब्रह्म' के रूप में स्थापित किया है। वैदिक और तांत्रिक दोनों ही परंपराओं में इस स्तोत्र का स्थान अत्यंत ऊंचा है, क्योंकि यह केवल गणेश जी की स्तुति नहीं करता, बल्कि सृष्टि के रहस्यों को भी उजागर करता है।

इस स्तोत्र की रचना का आधार अद्वैत वेदांत है। श्लोक 1 में पुष्पदन्त स्वीकार करते हैं कि भगवान का रूप शब्दों और बुद्धि से परे (अनिर्वाच्य) है। वे कहते हैं कि जहाँ वेद और विद्वान भी मौन हो जाते हैं, वहाँ मेरी स्तुति करना केवल उनके प्रति मेरी अटूट भक्ति का परिणाम है। यह स्तोत्र हमें बताता है कि भगवान गणेश ही वह 'प्रथम पुरुष' हैं जिनसे यह सारा ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ है (यतो जातं विश्वं), जिसमें यह टिका हुआ है, और अंत में जिसमें यह विलीन हो जाता है।

गणेश महिम्नः स्तोत्र का एक मुख्य आकर्षण इसकी समन्वयवादी दृष्टि है। यह शैव, वैष्णव, शाक्त, और सौर—सभी संप्रदायों के बीच एक सेतु का कार्य करता है। श्लोक 2 में वर्णित है कि जिसे शैव 'शिव' कहते हैं, वैष्णव 'विष्णु' कहते हैं, और शाक्त 'पराशक्ति' कहते हैं, वह मूल तत्व वास्तव में भगवान गणेश ही हैं। यह स्तोत्र हमें संकुचित धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठाकर उस अनंत सत्ता का दर्शन कराता है जो सर्वव्यापी है।

आध्यात्मिक साधकों के लिए यह स्तोत्र मूलाधार चक्र की शुद्धि और जागृति का साधन है। चूँकि गणेश जी इस चक्र के अधिष्ठाता हैं, अतः उनके महिमा गान से साधक की आध्यात्मिक यात्रा निर्विघ्न संपन्न होती है। 32 श्लोकों का यह दिव्य संग्रह मंत्रोच्चार के समान फल देता है, जो साधक के मन को एकाग्र कर उसे आत्मिक शांति की ओर ले जाता है।

विशिष्ट दार्शनिक एवं तांत्रिक महत्व (Significance)

गणेश महिम्नः स्तोत्र का तांत्रिक महत्व इसके 7वें, 8वें और 9वें श्लोक में स्पष्ट होता है। यहाँ 'गकार' (Ga-kar) और 'णकार' (Na-kar) के रहस्यों को समझाया गया है। तंत्र शास्त्र के अनुसार, 'ग' अक्षर सृष्टि के 'गमन' यानी उत्पत्ति का प्रतीक है, और 'ण' अक्षर उसके 'निर्वाण' यानी अंत का। इस प्रकार, 'गणेश' नाम का उच्चारण करने मात्र से साधक सृष्टि की संपूर्ण ऊर्जा के संपर्क में आ जाता है।

श्लोक 16 और 17 में भगवान गणेश के विराट स्वरूप का वर्णन है, जहाँ उनके शरीर के विभिन्न अंगों में समस्त ब्रह्मांड के देवताओं का वास बताया गया है। उनके मुख में अग्नि, नेत्रों में सूर्य और चंद्रमा, और हृदय में कामदेव का वास है। यह वर्णन हमें यह समझने में मदद करता है कि संपूर्ण जगत गणेशमय है। जब हम गणेश जी की पूजा करते हैं, तो हम अनजाने में ही समस्त ब्रह्मांडीय शक्तियों की पूजा कर रहे होते हैं।

फलश्रुति: पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र का पाठ करने से प्राप्त होने वाले लाभों का वर्णन स्वयं पुष्पदन्त ने फलश्रुति (श्लोक 31-32) में किया है:

  • सर्व क्लेश नाश (Removal of Sorrows): "क्लेशा लयं यान्ति" — जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके सभी शारीरिक, दैविक और भौतिक दुख तत्काल नष्ट हो जाते हैं।
  • ऋद्धि-सिद्धि प्राप्ति: इस पाठ से साधक को धन, धान्य, और भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है। श्लोक 32 स्पष्ट कहता है कि इससे 'स्त्री, पुत्र, विद्या और गृह' की प्राप्ति सुलभ होती है।
  • विघ्न निवारण (Vighnaharta): जीवन के कठिन मोड़ों पर, जैसे युद्ध (श्लोक 14), वन में मार्ग भटकने पर, या किसी कानूनी विवाद में, गणेश महिम्नः स्तोत्र का स्मरण अभय प्रदान करता है।
  • बुद्धि और मेधा का विकास: चूँकि गणेश जी बुद्धि के स्वामी हैं, अतः इस स्तोत्र का पाठ छात्रों और मानसिक कार्य करने वालों के लिए अमोघ है।
  • मोक्ष का मार्ग (Salvation): यह स्तोत्र साधक को 'स्वानन्द' (शाश्वत आनंद) की ओर ले जाता है, जो जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

पाठ की शास्त्रीय विधि और विशेष अवसर (Sadhana Method)

इस स्तोत्र की पूर्ण शक्ति का अनुभव करने के लिए इसे विधिपूर्वक पढ़ना चाहिए:

  • समय: प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त (4 से 6 बजे) पाठ के लिए सबसे प्रभावशाली माना गया है। चतुर्थी तिथि और बुधवार इसके लिए विशेष दिन हैं।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र धारण करें।
  • ध्यान मंत्र: पाठ आरंभ करने से पहले भगवान गणेश के 'चिंतामणि' या 'विनायक' रूप का 1 मिनट तक ध्यान करें।
  • समर्पण: भगवान को दूर्वा, लाल सिंदूर, और लड्डू अत्यंत प्रिय हैं। पाठ के दौरान इन्हें अर्पित करना शुभ होता है।
  • विशेष प्रयोग: किसी बड़ी बाधा को दूर करने के लिए इस स्तोत्र का 21 दिनों तक लगातार 11 बार पाठ करना सिद्ध प्रयोग माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. गणेश महिम्नः स्तोत्र और शिव महिम्नः स्तोत्र में क्या संबंध है?
दोनों स्तोत्रों के रचयिता पुष्पदन्त हैं। जहाँ शिव महिम्नः स्तोत्र भगवान शिव की सर्वोच्चता का वर्णन करता है, वहीं गणेश महिम्नः स्तोत्र भगवान गणेश को 'परब्रह्म' के रूप में महिमामंडित करता है। दोनों की काव्य शैली और दार्शनिक गहराई समान है।
2. क्या इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है?
हाँ, इसे कभी भी पढ़ा जा सकता है। हालाँकि, शास्त्रों के अनुसार प्रातःकाल और संध्याकाल पूजा के समय पाठ करना अधिक फलदायी माना गया है।
3. क्या इसके पाठ से बुद्धि तेज होती है?
जी हाँ। भगवान गणेश 'बुद्धि विधाता' हैं। इस स्तोत्र में उन्हें 'बुद्धि का आधार' माना गया है, इसलिए इसके नियमित पाठ से एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
4. 'गकार' और 'णकार' का क्या अर्थ है?
स्तोत्र के अनुसार, 'ग' का अर्थ है गमन (सृष्टि का प्रसार) और 'ण' का अर्थ है निर्वाण (मोक्ष)। गणेश इन दोनों के स्वामी हैं, जो संसार चक्र को संचालित करते हैं।
5. क्या यह स्तोत्र घर के कलह को शांत कर सकता है?
हाँ, श्लोक 14 और 32 के अनुसार, यह सभी क्लेशों को शांत करता है। घर में शांति और सुखद वातावरण के लिए बुधवार को इसका पाठ करना अत्यंत शुभ है।
6. क्या स्त्रियाँ भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?
निश्चित रूप से। भगवती उमा के पुत्र श्री गणेश की आराधना हर मनुष्य कर सकता है। स्त्रियाँ अपनी संतान की उन्नति और परिवार की सुरक्षा के लिए इसे अवश्य पढ़ें।
7. क्या चतुर्थी तिथि पर इसका पाठ अनिवार्य है?
अनिवार्य नहीं है, लेकिन चतुर्थी गणेश जी की प्रिय तिथि है। इस दिन पाठ करने से मिलने वाला फल सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना बढ़ जाता है।
8. 'अनिर्वाच्य' का क्या अर्थ है?
अनिर्वाच्य का अर्थ है—वह जिसे वाणी द्वारा पूरी तरह व्यक्त न किया जा सके। यह गणेश जी के अनंत और असीम स्वरूप की ओर संकेत करता है।
9. क्या संकट के समय इस स्तोत्र का कोई विशेष श्लोक पढ़ना चाहिए?
पूरे स्तोत्र का पाठ सर्वोत्तम है, लेकिन समय कम होने पर श्लोक 14 और 15 का पाठ करना संकटों से उबरने में अत्यंत सहायक होता है।
10. क्या पाठ के लिए पीला रंग ही अनिवार्य है?
पीला और लाल रंग भगवान गणेश को प्रिय हैं। ये रंग सकारात्मकता और भक्ति के प्रतीक हैं, इसलिए इनका उपयोग पाठ के दौरान शुभ माना जाता है।