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Sri Padmavathi Stotram – श्री पद्मावती स्तोत्रम् (Tiruchanur Devi Stuti)

Sri Padmavathi Stotram – श्री पद्मावती स्तोत्रम् (Tiruchanur Devi Stuti)
॥ श्री पद्मावती स्तोत्रम् ॥ विष्णुपत्नि जगन्मातः विष्णुवक्षःस्थलस्थिते । पद्मासने पद्महस्ते पद्मावति नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥ वेङ्कटेशप्रिये पूज्ये क्षीराब्धितनये शुभे । पद्मे रमे लोकमातः पद्मावति नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥ कल्याणी कमले कान्ते कल्याणपुरनायिके । कारुण्यकल्पलतिके पद्मावति नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥ सहस्रदलपद्मस्थे कोटिचन्द्रनिभानने । पद्मपत्रविशालाक्षि पद्मावति नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥ सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वमङ्गलदायिनि । सर्वसम्मानिते देवि पद्मावति नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥ सर्वहृद्दहरावासे सर्वपापभयापहे । अष्टैश्वर्यप्रदे लक्ष्मि पद्मावति नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥ देहि मे मोक्षसाम्राज्यं देहि त्वत्पाददर्शनम् । अष्टैश्वर्यं च मे देहि पद्मावति नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥ नक्रश्रवणनक्षत्रे कृतोद्वाहमहोत्सवे । कृपया पाहि नः पद्मे त्वद्भक्तिभरितान् रमे ॥ ८ ॥ इन्दिरे हेमवर्णाभे त्वां वन्दे परमात्मिकाम् । भवसागरमग्नं मां रक्ष रक्ष महेश्वरी ॥ ९ ॥ कल्याणपुरवासिन्यै नारायण्यै श्रियै नमः । शृतिस्तुतिप्रगीतायै देवदेव्यै च मङ्गलम् ॥ १० ॥ ॥ इति श्री पद्मावती स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री पद्मावती स्तोत्रम् — परिचय और पौराणिक महत्व (Introduction & Mythology)

श्री पद्मावती देवी (Sri Padmavathi Devi), जिन्हें दक्षिण भारत में प्रेम से 'अलमेलु मंगा' (Alamelu Manga) कहा जाता है, भगवान वेंकटेश्वर (श्रीनिवास) की दिव्य अर्धांगिनी हैं। उनका मुख्य मंदिर तिरुपति के पास तिरुचानूर (Tiruchanur) में स्थित है। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, तिरुमला के दर्शन का फल तभी पूर्ण होता है जब भक्त पहले नीचे तिरुचानूर में माँ पद्मावती का आशीर्वाद प्राप्त करें।

प्राकट्य कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर लात मारी, तो वहां निवास करने वाली माँ लक्ष्मी रुष्ट होकर पृथ्वी पर आ गईं (कोल्हापुर)। उनके विरह में भगवान विष्णु भी 'श्रीनिवास' बनकर पृथ्वी पर आए। बाद में, माँ लक्ष्मी ने आकाश राजा (Akasha Raja) के यहाँ पुत्री के रूप में जन्म लिया।

वे एक स्वर्ण कमल (Golden Lotus) में, 'पद्म सरोवर' नामक तालाब में राजा को मिलीं। कमल (पद्म) में मिलने के कारण उनका नाम 'पद्मावती' रखा गया। यह स्तोत्र उसी दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है जो कमल में वास करती हैं (पद्मासने) और जिनके हाथ में कमल है (पद्महस्ते)।

नक्र-श्रवण नक्षत्र: स्तोत्र के 8वें श्लोक में एक विशेष संदर्भ है — "नक्रश्रवणनक्षत्रे कृतोद्वाहमहोत्सवे"। इसका अर्थ है कि देवी का विवाह भगवान श्रीनिवास के साथ 'उत्तराषाढ़ा' (नक्र) और 'श्रवण' नक्षत्र के संयोग में अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ था। यह विवाह सृष्टि का सबसे भव्य आयोजन माना जाता है, जिसके लिए कुबेर ने भगवान को ऋण दिया था।

स्तोत्र के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

माँ पद्मावती को 'दया' (Mercy) की देवी माना जाता है। भगवान वेंकटेश्वर न्याय करते हैं, लेकिन माँ पद्मावती क्षमा करती हैं। इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • विवाह बाधा निवारण: माँ पद्मावती का विवाह स्वयं भगवान से हुआ था। इसलिए, कुंवारी कन्याएं या युवक यदि इस स्तोत्र का पाठ करें, तो शीघ्र और सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है (श्लोक 3 - कल्याणपुरनायिके)।
  • अष्ट-ऐश्वर्य प्राप्ति: "अष्टैश्वर्यप्रदे लक्ष्मि" (श्लोक 6) — माँ भक्तों को आठ प्रकार के ऐश्वर्य (धन, धान्य, धैर्य, संतान, विजय, विद्या आदि) प्रदान करती हैं।
  • ऋण मुक्ति: चूँकि भगवान वेंकटेश्वर पर कुबेर का ऋण है, इसलिए माँ पद्मावती की आराधना से भक्तों का कर्ज उतरता है और धन के नए स्रोत खुलते हैं।
  • पाप नाश: "सर्वपापभयापहे" (श्लोक 6) — यह स्तोत्र समस्त पापों और अज्ञात भय (Anxiety) को नष्ट करके मन को शांति प्रदान करता है।
  • मोक्ष और भक्ति: "देहि मे मोक्षसाम्राज्यं" (श्लोक 7) — माँ केवल भौतिक सुख ही नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के चरणों की भक्ति और अंत में मोक्ष भी देती हैं।

पूजा विधि और विशेष साधना (Ritual Method)

माँ पद्मावती की साधना के लिए शुक्रवार (Friday) का दिन सर्वोत्तम माना गया है, क्योंकि तिरुचानूर में शुक्रवार को ही देवी का विशेष अभिषेक होता है।

दैनिक और शुक्रवार की विधि

  • स्नान और वस्त्र: प्रातः स्नान करके पीले या गुलाबी वस्त्र धारण करें।
  • दीपक: पूजा स्थान पर गाय के घी का दीपक जलाएं।
  • पुष्प: माँ को कमल का फूल (Lotus) अति प्रिय है। यदि कमल न मिले तो सुगंधित पीले फूल अर्पित करें।
  • नैवेद्य (भोग): माँ को पोंगल (गुड़ और चावल की खीर) या दही-भात का भोग लगाएं। तिरुचानूर में 'दद्धोजनम' (Curd Rice) प्रिय प्रसाद है।
  • कुमकुम अर्चना: विवाहित स्त्रियाँ माँ के चित्र या विग्रह पर 'कुमकुम' से अर्चना करें। इससे सौभाग्य (सुहाग) की वृद्धि होती है।

विवाह प्राप्ति प्रयोग

जिनके विवाह में देरी हो रही हो, वे लगातार 11 शुक्रवार तक माँ पद्मावती को 2 कमल के फूल अर्पित करें और इस स्तोत्र का 11 बार पाठ करें। अंतिम शुक्रवार को कन्याओं को भोजन कराएं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. पद्मावती और लक्ष्मी में क्या अंतर है?

तात्विक रूप से कोई अंतर नहीं है। पद्मावती माँ लक्ष्मी का ही अवतार हैं जो कलियुग में आकाश राजा की पुत्री के रूप में जन्मीं। जैसे राम के साथ सीता, वैसे ही वेंकटेश्वर के साथ पद्मावती हैं।

2. तिरुमाला जाने से पहले तिरुचानूर जाना क्यों जरूरी है?

मान्यता है कि माँ पद्मावती भगवान की 'दया शक्ति' हैं। वे ही भगवान से भक्तों की सिफारिश (पुरुषकार) करती हैं। इसलिए पहले माँ का आशीर्वाद लेने से भगवान वेंकटेश्वर शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

3. 'विष्णुवक्षःस्थलस्थिते' का क्या अर्थ है?

श्लोक 1 में इसका उल्लेख है। इसका अर्थ है "भगवान विष्णु के छाती (हृदय) पर निवास करने वाली"। भगवान वेंकटेश्वर के वक्षस्थल पर माँ लक्ष्मी सदैव विराजमान रहती हैं, जो यह दर्शाता है कि ईश्वर का हृदय करुणा से भरा है।

4. क्या पुरुष इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, बिल्कुल। धन, कर्ज मुक्ति और गृहस्थ सुख के लिए पुरुष भी इस स्तोत्र का पाठ श्रद्धापूर्वक कर सकते हैं।

5. 'अलमेलु मंगा' का क्या अर्थ है?

यह तमिल/तेलुगु शब्द है। 'अलमेलु' का अर्थ है 'कमल पर विराजमान' और 'मंगा' का अर्थ है 'शुभ देवी'। अर्थात, कमल पर विराजमान शुभता की देवी (पद्मावती)।

6. क्या इस पाठ से राहु-केतु दोष दूर होता है?

भगवान वेंकटेश्वर और पद्मावती की आराधना कलियुग में सभी ग्रह दोषों, विशेषकर राहु-केतु और शनि के कुप्रभाव को कम करने में सक्षम मानी जाती है।

7. कार्तिक मास में पद्मावती पूजा का क्या महत्व है?

कार्तिक मास (नवंबर-दिसंबर) में तिरुचानूर में 'ब्रह्मोत्सव' मनाया जाता है। कार्तिक शुक्ल पंचमी को माँ का जन्म हुआ था (पंचमी तीर्थम)। इन दिनों में पाठ करने का फल अनंत गुना होता है।

8. पाठ के लिए कौन सी दिशा शुभ है?

माँ लक्ष्मी का वास उत्तर दिशा में माना जाता है, या पूर्व दिशा में मुख करके पाठ करना सदैव शुभ होता है।

9. क्या शाम को यह पाठ किया जा सकता है?

हाँ, गोधूलि बेला (शाम के समय) जब घर में दीपक जलाया जाता है, तब पद्मावती स्तोत्र का पाठ करने से घर में लक्ष्मी का प्रवेश होता है।

10. 'कल्याणपुरनायिके' का क्या अर्थ है?

श्लोक 3 में यह नाम है। 'कल्याणपुर' (नारायणवनम) वह स्थान है जहाँ देवी का विवाह संपन्न हुआ था। वह उस नगर की नायिका (स्वामिनी) हैं। यह नाम विवाह सुख का प्रतीक है।