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Daksha Prokta Kali Stuti (Markandeya) – दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः (कालिका पुराण)

Daksha Prokta Kali Stuti (Markandeya) – दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः (कालिका पुराण)
॥ दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः (मार्कण्डेय कथित) ॥ मार्कण्डेय उवाच - सिंहस्थां कालिकां कृष्णां पीनोत्तुङ्गपयोधराम् । चतुर्भुजां चारुवक्त्रां नीलोत्पलधरां शुभाम् ॥ ९॥ वरदाभयदां खड्गहस्तां सर्वगुणान्विताम् । आरक्तनयनां चारुमुक्तकेशीं मनोहराम् ॥ १०॥ दृष्ट्वा दक्षोऽथ तुष्टाव महामायां प्रजापतिः । प्रीत्या परमया युक्तो विनयानतकन्धरः ॥ ११॥ दक्ष उवाच - आनन्दरूपिणीं देवीं जगदानन्दकारिणीम् । सृष्टिस्थित्यन्तरूपां तां स्तौमि लक्ष्मीं हरेः शुभाम् ॥ १२॥ सत्त्वोद्रेकप्रकाशेन यज्ज्योतिस्तत्त्वमुत्तमम् । स्वप्रकाशं जगद्धाम तत्तवांशं महेश्वरि ॥ १३॥ रजोगुणातिरेकेण यत्कामस्य प्रकाशनम् । रागस्वरूपं मध्यस्थं तत्तेंऽशांशं जगन्मयि ॥ १४॥ तमोगुणातिरेकेण यद्यन्मोहप्रकाशनम् । आच्छादनं चेतनानां तत्ते चांशांशगोचरम् ॥ १५॥ परा परात्मिका शुद्धा निर्मला लोकमोहिनी । त्वं त्रिरूपा त्रयी कीर्तिर्वार्त्तास्य जगतो गतिः ॥ १६॥ बिभर्ति माधवो धात्रीं यथा मूर्त्त्या निजोत्थया । सा मूर्त्तिस्तव सर्वेषां जगतामुपकारिणी ॥ १७॥ महानुभावा त्वं विश्वशक्तिः सूक्ष्मापराजिता । यदूर्ध्वाधोनिरोधेन व्यज्यते पवनैः परम् ॥ १८॥ तज्ज्योतिस्तव मात्रार्थे सात्त्विकं भावसम्मतम् । यद्योगिनो निरालम्बं निष्फलं निर्मलं परम् ॥ १९॥ आलम्बयन्ति तत्तत्त्वं त्वदन्तर्गोचरन्तु तत् । या प्रसिद्धा च कूटस्था सुप्रसिद्धातिनिर्मला ॥ २०॥ सा ज्ञप्तिस्त्वन्निष्प्रपञ्चा प्रपञ्चापि प्रकाशिका । त्वं विद्या त्वमविद्या च त्वमालम्बा निराश्रया । प्रपञ्चरूपा जगतामादिशक्तिस्त्वमीश्वरी ॥ २१॥ ब्रह्मकण्ठालया शुद्धा वाग्वाणी या प्रगीयते । वेदप्रकाशनपरा सा त्वं विश्वप्रकाशिनी ॥ २२॥ त्वमग्निस्त्वं तथा स्वाहा त्वं स्वधा पितृभिः सह । त्वं नभस्त्वं कालरूपा त्वं काष्ठा त्वं बहिःस्थिता ॥ २३॥ त्वमचिन्त्या त्वमव्यक्ता तथानिर्देश्यरूपिणी । त्वं कालरात्रिस्त्वं शान्ता त्वमेव प्रकृतिः परा ॥ २४॥ यस्याः संसारलोकानां परित्राणाय यद्बहिः । रूपं जानन्ति धात्राद्यास्तत्त्वां ज्ञास्यन्ति के पराम् ॥ २५॥ प्रसीद भगवत्यम्ब प्रसीद योगरूपिणि । प्रसीद घोररूपे त्वं जगन्मयि नमोऽस्तु ते ॥ २६॥ ॥ इति कालिकापुराणे अष्टमाध्यायान्तर्गता दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः समाप्ता ॥

दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः: परिचय एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि (Introduction & Philosophical Background)

दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः का यह दुर्लभ संस्करण कालिका पुराण के आठवें अध्याय से लिया गया है। यह स्तुति महर्षि मार्कण्डेय द्वारा सुनाई जा रही है, जिसमें वे प्रजापति दक्ष द्वारा की गई माँ काली की वंदना का वर्णन करते हैं। यह स्तोत्र तब का है जब दक्ष ने विनम्रतापूर्वक झुककर देवी के विराट स्वरूप को देखा था। दक्ष द्वारा की गई यह स्तुति शाक्त दर्शन के सबसे गहरे सिद्धांतों—विशेषकर त्रिगुणों के रहस्य—को उजागर करती है।

देवी का दृष्ट स्वरूप: श्लोक 9-10 में मार्कण्डेय जी बताते हैं कि दक्ष ने देवी को किस रूप में देखा—'सिंहस्थां कालिकां कृष्णां' (सिंह पर विराजमान काली), चतुर्भुजा, नीले कमल को धारण किए हुए, हाथों में वर-अभय मुद्रा और खड्ग लिए हुए, लाल नेत्रों वाली और खुले केशों वाली। इस मनोहर और उग्र रूप को देखकर दक्ष ने परम भक्ति से उनकी स्तुति आरम्भ की।

त्रिगुणात्मक रहस्य: इस स्तुति की सबसे बड़ी विशेषता इसका दार्शनिक विश्लेषण है। श्लोक 13, 14 और 15 में दक्ष देवी को तीनों गुणों (Trigunas) का मूल स्रोत बताते हैं:

  • सत्त्व गुण: "हे महेश्वरी! सत्त्व गुण की अधिकता से जो उत्तम, स्व-प्रकाशित ज्योति तत्व है, वह आपका ही अंश है।"
  • रजो गुण: "हे जगन्मयी! रजोगुण की अधिकता से जो काम और राग का प्रकाशन होता है, वह आपके अंश का भी अंश है।"
  • तमो गुण: "और तमोगुण की अधिकता से जो मोह और चेतना को ढकने वाला अंधकार है, वह भी आपके अंश के अंश से ही उत्पन्न होता है।"

इस प्रकार, दक्ष यह स्थापित करते हैं कि सृष्टि का पूरा खेल—ज्ञान, कर्म और अज्ञान—देवी के ही अंशों की लीला है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance)

यह स्तोत्र केवल देवी की स्तुति नहीं है, बल्कि 'शक्ति' तत्व को समझने का एक दार्शनिक ग्रंथ है।

  • विद्या और अविद्या की एकरूपता: श्लोक 21 में एक अद्भुत सत्य प्रकट किया गया है—"त्वं विद्या त्वमविद्या च" ("आप ही विद्या (ज्ञान) हैं और आप ही अविद्या (अज्ञान/माया) हैं")। यह साधक को जीवन के द्वंद्वों (सुख-दुःख, ज्ञान-अज्ञान) से ऊपर उठने में मदद करता है, क्योंकि दोनों का स्रोत एक ही है।
  • विष्णु की धारिणी शक्ति: श्लोक 17 में कहा गया है कि भगवान विष्णु जिस मूर्ति (शक्ति) के बल पर पृथ्वी को धारण करते हैं, वह मूर्ति भी आपकी ही है (सा मूर्त्तिस्तव)। यह देवी को वैष्णवी शक्ति का भी मूल स्रोत बताता है।
  • योगियों का परम लक्ष्य: श्लोक 19-20 के अनुसार, योगी जिस निरालम्ब, निष्कलंक और निर्मल परम तत्व का ध्यान करते हैं, वह आपके ही भीतर स्थित है। यह देवी को 'निर्गुण ब्रह्म' के रूप में स्थापित करता है।
  • सर्वदेवमयी स्वरूप: दक्ष कहते हैं कि आप ही अग्नि, स्वाहा, स्वधा, आकाश और कालरात्रि हैं (श्लोक 23-24)। यह देवी की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

इस स्तोत्र में ही इसके पाठ के अमोघ फल वर्णित हैं, जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करते हैं:

  • भोग और मोक्ष की प्राप्ति: श्लोक 52 में स्पष्ट कहा गया है—"तस्य भोग्यञ्च मुक्तिश्च सदा करतले स्थिता"। जो साधक देवी के विद्या-अविद्या स्वरूप का चिंतन करता है, उसके हाथ में भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष दोनों सदैव स्थित रहते हैं।
  • निश्चित मुक्ति: श्लोक 53 के अनुसार, जो व्यक्ति एक बार भी देवी के पवित्र स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है, उसे निश्चित रूप से मुक्ति प्राप्त होती है (तस्यावश्यं भवेन्मुक्तिः)।
  • सर्वस्व की प्राप्ति: अंतिम श्लोक (55) सबसे बड़ा आश्वासन है—"ये स्तुवन्ति जगन्मातर्... सर्वं तेषां भविष्यति"। जो भक्त आपको जगन्माता, अम्बिका, जगन्मयी और माया कहकर पुकारते हैं, उनका 'सब कुछ' (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सिद्ध हो जाता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method & Guidelines)

यह एक अत्यंत सात्विक और ज्ञान-प्रधान स्तोत्र है, जिसे कोई भी शुद्ध मन से पढ़ सकता है।

दैनिक प्रार्थना: इसे अपनी नित्य संध्या-वंदन या पूजा के बाद पढ़ें। पाठ करते समय माँ काली या माँ पार्वती का ध्यान करें और इसके दार्शनिक अर्थ पर चिंतन करें कि कैसे संसार के सभी गुण और क्रियाएं देवी से ही उत्पन्न हो रही हैं।

विद्यार्थियों और ज्ञान साधकों के लिए: विद्यार्थी और ज्ञान के साधक यदि इस स्तोत्र का नित्य पाठ करें, तो उनकी बुद्धि तीव्र होती है और उन्हें शास्त्रों के रहस्य समझने में सहायता मिलती है। यह 'विद्या' और 'बुद्धि' दोनों का स्तोत्र है।

विशेष अवसर: नवरात्रि, अष्टमी, चतुर्दशी और किसी भी शुक्रवार को इसका पाठ करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तुति किसने और क्यों की?
यह स्तुति प्रजापति दक्ष ने देवी के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान होने के बाद, शरणागत होकर की थी।
2. यह स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?
यह कालिका पुराण के आठवें अध्याय से लिया गया है, और इसका वर्णन महर्षि मार्कण्डेय कर रहे हैं।
3. 'विद्याविद्यात्मिकां' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'विद्या (ज्ञान/मुक्ति) और अविद्या (अज्ञान/बंधन) दोनों का स्वरूप धारण करने वाली'।
4. इस स्तोत्र का मुख्य दर्शन क्या है?
इसका मुख्य दर्शन त्रिगुणात्मक है। यह बताता है कि संसार के सत्त्व, रज और तम गुण, तीनों ही देवी के अंश मात्र हैं।
5. क्या यह एक उग्र स्तोत्र है?
नहीं। यद्यपि यह काली को संबोधित है, लेकिन इसका भाव पूरी तरह से दार्शनिक और शांत है। यह एक ज्ञान-प्रधान स्तुति है।
6. क्या कोई भी व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है?
हाँ, यह एक सात्विक स्तोत्र है। कोई भी व्यक्ति, जो ज्ञान और भक्ति मार्ग पर है, इसका पाठ कर सकता है।
7. इस स्तोत्र का मुख्य लाभ क्या है?
इसका मुख्य लाभ है भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति। साधक को संसार में सभी सुख मिलते हैं और अंत में वह मुक्त हो जाता है।
8. 'जगन्मयी' का क्या अर्थ है?
जगन्मयी का अर्थ है 'जो संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं' या 'जो स्वयं ही जगत का स्वरूप हैं'।
9. क्या यह स्तोत्र नवरात्रि में पढ़ना चाहिए?
हाँ, नवरात्रि देवी उपासना का सर्वश्रेष्ठ समय है। इन दिनों में इसका पाठ करने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
10. 'सर्वं तेषां भविष्यति' का क्या आश्वासन है?
यह एक पूर्ण आश्वासन है कि जो भक्त देवी को भजते हैं, उनकी सभी कामनाएं (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) निश्चित रूप से सिद्ध होती हैं।