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Daksha Prokta Kali Stuti (Kalika Purana) – दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः

Daksha Prokta Kali Stuti (Kalika Purana) – दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः
॥ दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः ॥ दक्ष उवाच - शिवा शान्ता महामाया योगनिद्रा जगन्मयी । या प्रोच्यते विष्णुमाया तां नमामि सनातनीम् ॥ ४९॥ यया धाता जगत्सृष्टौ नियुक्तस्तां पुराकरोत् । स्थितिञ्च विष्णुरकरोद्यन्नियोगाज्जगत्पतिः ॥ ५०॥ शम्भुरन्तं ततो देवीं त्वां नमाभि महीयसीम् । विकाररहितां शुद्धामप्रमेयां प्रभावतीम् । प्रमाणमानमेयाख्यां प्रणमामि सुखात्मिकाम् ॥ ५१॥ यस्त्वां विचिन्तयेद्देवीं विद्याविद्यात्मिकां पराम् । तस्य भोग्यञ्च मुक्तिश्च सदा करतले स्थिता ॥ ५२॥ यस्त्वां प्रत्यक्षतो देवीं सकृत् पश्यति पावनीम् । तस्यावश्यं भवेन्मुक्तिर्विद्याविद्याप्रकाशिकाम् ॥ ५३॥ योगनिद्रे महामाये विष्णुमाये जगन्मयि । या प्रमाणार्थसम्पन्ना चेतना सा तवात्मिका ॥ ५४॥ ये स्तुवन्ति जगन्मातर्भवतीमम्बिकेति च । जगन्मयीति मायेति सर्वं तेषां भविष्यति ॥ ५५॥ ॥ इति कालिकापुराणे अष्टमाध्यायान्तर्गता दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः समाप्ता ॥

दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः: परिचय एवं पृष्ठभूमि (Introduction & Background)

दक्षप्रोक्ता कालीस्तुतिः का यह दुर्लभ स्तोत्र शाक्त उप-पुराणों में प्रमुख 'कालिका पुराण' के आठवें अध्याय से लिया गया है। इस स्तुति के रचयिता स्वयं प्रजापति दक्ष हैं, जो पौराणिक कथाओं में भगवान शिव के श्वसुर और माता सती के पिता के रूप में जाने जाते हैं। यह स्तोत्र इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दक्ष के उस अहंकार-पूर्ण चरित्र से सर्वथा विपरीत है, जिसे हम दक्ष-यज्ञ की कथा में देखते हैं। यहाँ दक्ष एक परम भक्त के रूप में, देवी को ही त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की भी परम संचालिका और मूल कारण शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए उनकी स्तुति कर रहे हैं।

स्तुति का दार्शनिक सार: यह केवल 7 श्लोकों का एक लघु स्तोत्र है, लेकिन यह शाक्त अद्वैत दर्शन के उच्चतम शिखर को छूता है। दक्ष यहाँ देवी को 'महामाया', 'योगनिद्रा', 'विष्णुमाया' और 'जगन्मयी' कहकर संबोधित करते हैं। वे कहते हैं कि देवी ही वह सनातनी शक्ति हैं जिनके निर्देश (नियोग) से ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं (यया धाता... यन्नियोगाज्जगत्पतिः)।

विद्या और अविद्या का स्वरूप: स्तोत्र का सबसे गूढ़ रहस्य श्लोक 52 में है, जहाँ देवी को 'विद्याविद्यात्मिकां पराम्' कहा गया है। इसका अर्थ है, "आप ही परम 'विद्या' (ज्ञान, जो मुक्ति देता है) और 'अविद्या' (अज्ञान, जो संसार में बांधता है) का स्वरूप हैं।" यही महामाया का रहस्य है। वे ही बंधन का कारण हैं और वे ही अपनी कृपा से बंधन काटती भी हैं।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance)

यह स्तोत्र देवी के परब्रह्म स्वरूप का बोध कराता है और साधक को द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है।

  • त्रिदेवों की परम कारण शक्ति: श्लोक 50-51 में दक्ष स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि वे देवी के ही निर्देश पर कार्य करते हैं। यह देवी को 'परमेश्वरों की भी परमेश्वरी' के रूप में स्थापित करता है।
  • अचिन्त्य स्वरूप: देवी को 'विकाररहितां' (जिसमें कोई विकार न हो), 'शुद्धाम्' (परम शुद्ध), और 'अप्रमेयां' (जिसे मापा न जा सके) कहा गया है। यह उनके निर्गुण, निराकार और अचिन्त्य स्वरूप का वर्णन है।
  • चेतना का मूल: श्लोक 54 में कहा गया है — 'या प्रमाणार्थसम्पन्ना चेतना सा तवात्मिका'। अर्थात्, इस संसार में जो भी चेतना है और जो भी ज्ञान का आधार (प्रमाण) है, वह सब आपका ही स्वरूप है।
  • शरणागति का महत्व: दक्ष की यह स्तुति ज्ञान के बाद की शरणागति है। जब साधक को यह बोध हो जाता है कि सब कुछ देवी ही हैं, तब वह उनके चरणों में पूर्ण समर्पण कर देता है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

इस स्तोत्र में ही इसके पाठ के अमोघ फल वर्णित हैं, जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करते हैं:

  • भोग और मोक्ष की प्राप्ति: श्लोक 52 में कहा गया है — "तस्य भोग्यञ्च मुक्तिश्च सदा करतले स्थिता"। जो साधक देवी के विद्या-अविद्या स्वरूप का चिंतन करता है, उसके हाथ में भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष दोनों सदैव स्थित रहते हैं।
  • निश्चित मुक्ति: श्लोक 53 के अनुसार, जो व्यक्ति एक बार भी देवी के पवित्र स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है, उसे निश्चित रूप से मुक्ति प्राप्त होती है (तस्यावश्यं भवेन्मुक्तिः)।
  • सर्वस्व की प्राप्ति: अंतिम श्लोक (55) सबसे बड़ा आश्वासन है — "ये स्तुवन्ति जगन्मातर्... सर्वं तेषां भविष्यति"। जो भक्त आपको जगन्माता, अम्बिका, जगन्मयी और माया कहकर पुकारते हैं, उनका 'सब कुछ' (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सिद्ध हो जाता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method & Guidelines)

यह एक अत्यंत सात्विक और ज्ञान-प्रधान स्तोत्र है, जिसे कोई भी शुद्ध मन से पढ़ सकता है।

दैनिक पाठ विधि: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नानादि के बाद देवी के चित्र के समक्ष दीपक जलाएं और इस स्तुति का 3, 5, या 11 बार पाठ करें। पाठ करते समय इसके दार्शनिक अर्थ पर चिंतन करना विशेष लाभकारी है।

विद्यार्थियों के लिए: विद्यार्थी और ज्ञान के साधक यदि इस स्तोत्र का नित्य पाठ करें, तो उनकी बुद्धि तीव्र होती है और उन्हें शास्त्रों के रहस्य समझने में सहायता मिलती है।

विशेष अवसर: नवरात्रि, अष्टमी, चतुर्दशी और किसी भी शुक्रवार को इसका पाठ करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तुति किसने और क्यों की?
यह स्तुति प्रजापति दक्ष ने की है। अपने अहंकार के नाश और देवी के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान होने के बाद, उन्होंने शरणागत होकर यह प्रार्थना की।
2. यह स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?
यह शाक्त उप-पुराणों में से एक, कालिका पुराण के आठवें अध्याय से लिया गया है।
3. 'विद्याविद्यात्मिकां' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'विद्या (ज्ञान/मुक्ति) और अविद्या (अज्ञान/बंधन) दोनों का स्वरूप धारण करने वाली'। देवी ही हमें माया में बांधती हैं और वे ही कृपा करके मुक्त करती हैं।
4. क्या यह स्तोत्र शिव पुराण का हिस्सा है?
नहीं, यह कालिका पुराण का हिस्सा है, जैसा कि अंत में दिया गया है। शिव पुराण में भी दक्ष द्वारा की गई स्तुतियाँ हैं, लेकिन यह स्तोत्र विशिष्ट रूप से कालिका पुराण का है।
5. 'योगनिद्रा' का क्या अर्थ है?
'योगनिद्रा' भगवान विष्णु की वह योगमयी निद्रा है जिसमें वे प्रलयकाल में लीन रहते हैं। देवी ही उस निद्रा का स्वरूप हैं और वे ही विष्णु को जगाकर सृष्टि का कार्य करवाती हैं।
6. क्या कोई भी व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है?
हाँ, यह एक सात्विक और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी वर्ण या आश्रम का हो, भक्ति भाव से इसका पाठ कर सकता है।
7. इस स्तोत्र का मुख्य लाभ क्या है?
इसका मुख्य लाभ है भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति। साधक को संसार में सभी सुख मिलते हैं और अंत में वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
8. 'जगन्मयी' का क्या अर्थ है?
जगन्मयी का अर्थ है 'जो संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं' या 'जो स्वयं ही जगत का स्वरूप हैं'। यह देवी के सर्वव्यापी होने का द्योतक है।
9. क्या यह स्तोत्र नवरात्रि में पढ़ना चाहिए?
हाँ, नवरात्रि देवी उपासना का सर्वश्रेष्ठ समय है। इन नौ दिनों में इसका पाठ करने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
10. 'सर्वं तेषां भविष्यति' का क्या आश्वासन है?
यह एक पूर्ण आश्वासन है। इसका अर्थ है कि जो भक्त देवी को जगन्माता, अम्बिका और माया के रूप में भजते हैं, उनकी सभी कामनाएं (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) निश्चित रूप से सिद्ध होती हैं।