Logoपवित्र ग्रंथ

उच्छिष्ट चाण्डालिनी उपासना | Uchchishta Chandalini Upasana

उच्छिष्ट चाण्डालिनी उपासना | Uchchishta Chandalini Upasana

उच्छिष्टचाण्डालिन्युपासना

मातंगी और उच्छिष्ट गणपति की सम्मिलित गुप्त साधना

उच्छिष्ट चाण्डालिनी उपासना उच्छिष्ट गणपति पञ्चाङ्ग का एक अत्यंत गुप्त और विशिष्ट भाग है। इसमें दश महाविद्याओं में से एक मातंगी देवी की साधना उच्छिष्ट गणपति के साथ सम्मिलित रूप में की जाती है।

यह उच्छिष्ट अवस्था (भोजन के पश्चात बिना कुल्ला किए) में की जाने वाली विशेष वाममार्गी साधना है। यह साधना शीघ्र फलदायी और शक्तिशाली मानी जाती है।

विशेष सूचना: यह 'उच्छिष्ट चेटक' और 'चाण्डालिनी' साधना अत्यंत उग्र है। बिना गुरु आज्ञा और मार्गदर्शन के इसका प्रयोग सर्वथा वर्जित है।

१. उच्छिष्टचाण्डाली मन्त्र उद्धार

श्रीमदुच्छिष्टचाण्डालिन्युपासना । अथ श्रीबृहज्ज्योतिषार्णवान्तर्गतधर्मस्कन्धान्तःपात्युपासनास्तबके श्रीमदुच्छिष्टचाण्डालिन्युपासनाप्रारम्भः ॥

उच्चार्योच्छिष्टशब्दं तु तथा चाण्डालिनीति च । सुमुखीति ततो देवीं कीर्त्तयेत्तदन्तरम् ॥ १॥ महापिशाचिनीं पश्चाल्लज्जाबीजं ततः परम् । नादबिन्दुसमायुक्तं ठकारत्रितयं पुनः ॥ २॥ सविसर्गं महादेवि सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥

मन्त्रान्तरम् (अन्य मन्त्र):

अथोच्छिष्टचाण्डालिमातङ्गीपदमीरयेत् ॥ ३॥ ततः सर्ववशं चान्ते करिहृद्वह्निवल्लभा । एकोनविंशता वर्णैः सर्वाभीष्टकरा भवेति ॥ ४॥

मन्त्रदेवप्रकाशिका के अनुसार मन्त्र:

उच्छिष्ट चाण्डालिनी मन्त्र

वाग्भवं ऐं माया ह्रीं कामः क्लीं सौः ऐं ज्येष्ठमातङ्गि नमामि उच्छिष्टचाण्डालिनि त्रैलोक्यवशङ्करि स्वाहा ॥

२. साधना महात्म्य और विधि

इमां विद्यां जपेद्देवि चापरा हुंसमाश्रिता । इयं विद्या महाविद्या सर्वपापापहारिणी ॥ ५॥ स्वर्गदा मोक्षदा चैव राजसौभाग्यदायिका । यां यां प्रार्थयते सिद्धिं हठात्तां तामवाप्नुयात् ॥ ६॥

जप विधि (उच्छिष्ट अवस्था):

विधानं च प्रवक्ष्यामि शृणु देवि वरानने । भोजनानन्तरं देवि विनैवाचमने कृते ॥ ७॥ बलिं दद्यात्प्रथमतो मूलमन्त्रेण साधकः । ततो मन्त्रं जपेद्ध्यात्वा देवीं तामिस्ष्टसिद्धये ॥ ८॥ बलिमप्युच्छिष्टेन ॥

(भोजन के अनन्तर बिना आचमन किए, पहले मूल मन्त्र से बलि प्रदान करें और फिर देवी का ध्यान करके मन्त्र जप करें। बलि भी उच्छिष्ट ही दें।)

नियम (अद्भुत तन्त्र विधान):

न तिथिर्न च नक्षत्रं न चाङ्गन्यासमेव च । नारिदोषो न वा विघ्नं नाशौचं नियमो न च ॥ ९॥ यस्य तिष्ठति मन्त्रोऽयं न च विघ्नैः स बाध्यते ।

(इस साधना में तिथि, नक्षत्र, न्यास, अशुद्धि या अन्य कोई नियम बाधक नहीं होता।)

३. उच्छिष्ट चाण्डालिनी ध्यानम्

शवोपरि समासीनां रक्तम्बर परिच्छदाम् ॥ १०॥ रक्तालङ्कारसंयुक्तां गुञ्जाहारविभूषिताम् । षोडशाब्दां च युवतीं पीनोन्नतपयोधराम् ॥ ११॥ कपालकर्त्तिकाहस्तां परज्योतिःस्वरूपिणीम् । वामदक्षिणयोगेन ध्यायेन्मन्त्रविदुत्तमः ॥ १२॥

अर्थ: जो शव (या शिव) के ऊपर आसीन हैं, लाल वस्त्र धारण की हुई हैं, रक्त (लाल) अलंकारों और गुंजा की माला से विभूषित हैं। सोलह वर्ष की युवती स्वरूप, कपाल और कैंची (कर्त्तिका) हाथों में धारण की हुई, परम ज्योति स्वरूपिणी देवी का ध्यान करें।

४. सिद्धि विधान (जप और होम प्रयोग)

स्थण्डिले च बलिं दत्त्वा जपेत्तद्गतमानसः । उच्छिष्टेन च कर्त्तव्यो जपः स्यात्सिद्धिमिच्छता ॥ १३॥ उच्छिष्टे जपमानस्य जायन्ते सर्वसिद्धियः । अपरं च प्रवक्ष्यामि शृणु देवि फलप्रदम् ॥ १४॥ होमं च तर्पणं चैव सर्वकामार्थसिद्धये । स्थण्डिले मण्डलं कृत्वा चतुरस्रं समन्ततः ॥ १५॥ पूजयेन्मण्डले देवि मूल मन्त्रेण साधकः ॥

काम्य होम प्रयोग:

ततो देवीं समाधाय वह्निरूप व्यवस्थिताम् । देवीं ध्यात्वाऽऽचरेद्धोमं दधिसिद्धान्नतन्दुलैः ॥ १६॥ सहस्रमात्रहोमेन राजानं वशमानयेत् । मार्जारस्य तु मांसेन देव्या होमं समाचरेत् ॥ १७॥ स प्राप्नोति परां विद्यां सर्व शास्त्रवशीकृताम् । कुर्याच्छागस्य मांसेन होमं मधुसमन्वितम् ॥ १८॥ सहस्रैकविधानेन भवन्ति कुलसिद्धयः । विद्याकामश्चरेद्धोमं शर्करायुतपायसैः ॥ १९॥ तस्य वै देविसिद्ध्यन्ति सद्यो विद्याश्चतुर्दश । बिल्वपत्रैस्त्रिमध्वक्तैर्मासमेकं समाहितः ॥ २०॥ वन्ध्यापि लभते पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् । कर्कन्धूकुसुमं हुत्वा छागरक्तसमन्वितम् ॥ २१॥ दुर्भगाया हठाद्देवि सौभाग्यं शुभदायकम् । रजस्वलाया वस्त्रेण मधुना पायसेन च ॥ २२॥ होमं कृत्वा महादेवि त्रैलोक्यं वशमानयेत् । इत्येषा कथिता देवि सर्वपापप्रणाशिनी ॥ २३॥

पुरश्चरण विधि:

मन्त्रस्योच्चारणादेव सर्वपापप्रणाशिनी । उच्छिष्टेदूषणं त्यक्त्वा सपवित्रो जपेन्मनुम् ॥ २४॥ अत्र यद्यपि पुरश्चरणं नोक्तं तथाप्यष्टसहस्र जपः तद्दशांशेन होमादिकं च बोध्यम् ॥ येषां जपे च होमे च सङ्ख्यानोक्ता मनीषिभिः । तेषामष्टसहस्राणि सङ्ख्या स्याज्जपहोमयोः ॥ २५॥

(यद्यपि पुरश्चरण की संख्या नहीं बताई गई है, तथापि तंत्र शास्त्र के नियम अनुसार ८००० (आठ हजार) जप को पुरश्चरण मानना चाहिए और उसका दशांश होम करना चाहिए। 'उच्छिष्ट दोष' का त्याग कर 'पवित्र' भाव से जप करें।)

५. मन्त्र कोश और न्यास विधि

मन्त्र:

लघुश्यामा मन्त्र

ऐं नम उच्छिष्टचाण्डालिमातङ्गी सर्ववशङ्करि स्वाहा

अर्थ:ऐं (वाग्भव बीज) से युक्त, सबको वश में करने वाली उच्छिष्ट चाण्डालिनी मातंगी देवी को नमस्कार और स्वाहा।

विनियोग: अस्य मन्त्रस्य मदनऋषिः । गायत्री त्रिवृच्छन्दः । देवी लघुश्यामा देवता । ऐं बीजं स्वाहा शक्ति । अभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥

न्यास विधि:

ऐं रत्यै नमो मूर्ध्नि । ह्रीं प्रीत्यै नमः पादयोः । ह्रीं द्रावण बाणाय नमः भ्रूमध्ये । द्रीं शोषणबाणाय नमः मुखे । क्लीं तापनबाणाय नमः हृदि । लूँ मोहनबाणाय नमः गुह्ये । सः तापनबाणाय नमः पादयोः ॥

मातृका न्यास (विशिष्ट):

ङेनमोंऽताः कन्याकान्ता ब्रह्म्याद्या अष्टमातरः ॥ ऐं ब्रह्मकन्यकायै नमः । ॐ क्षाँ नमः ब्रह्मकन्यकायै नमः । ॐ ऐं सिद्धकन्यकायै नमः । क्लीँ यक्षकन्यायै नमः । ॐ अणिमाकन्यायै नमः । ॐ महिमाकन्यायै नमः । क्लीँ ऊर्वशीकन्यायै नमः ।

मूल मन्त्र वर्ण न्यास:

ॐ ऐँ नमः । ॐ नँ नमः । ॐ मँ नमः । ॐ उँ नमः । ॐ छिँ नमः । ॐ ष्टँ नमः । ॐ चाँ नमः । इत्यादिन्यासानेवांविधान्कृत्वा मातङ्गीमासने स्मरेत् ॥

ध्यान (मातंगी):

माणिक्याभरणान्वितां स्मितमुखीं नीलोत्पलाभाम्बरां रम्यालक्तकलिप्तपादकमलां नेत्रत्रयोल्लासिनीम् । वीणावादनतत्परां सुरनुतां कीरच्छदश्यामलां मातङ्गीं शशिशेखरामनुभजे ताम्बूलपूर्णाननाम् ॥ २६॥

जप संकल्प: एक लक्ष जप (१,००,०००)। होम: मधूक (महुआ) के पुष्पों से होम करें।

मातंगी पीठ पूजा: "ऐँ शुकप्रियायै विद्महे क्लीँ कामेश्वरी धीमहि । तन्नः श्यामा प्रचोदयात् ॥" (श्यामा गायत्री मन्त्र)

(इस उपासना से साधक देवतुल्य हो जाता है और मनचाही सिद्धि प्राप्त होती है।)

६. उच्छिष्ट चाण्डालिनी चेटक प्रयोग

यह प्रयोग भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रसिद्ध है।

चेटक मन्त्र (शाबर/मिश्रित)

ॐ नम उच्छिष्टचाण्डालिनि वाग्वादिनि राजमोहिनि प्रजामोहिनि स्त्रीमोहिनि आन आन वे वे (ये ये, येवे) वायुवायु (वायु वायु) उच्छिष्टचाण्डालि सत्यवादिनी की शक्ति फुरै (फुरे) स्वाहा ॥

साधना विधि:

  1. भोजन करके जूठे मुख (बिना कुल्ला किए) इस मन्त्र का एक लाख जप करें।
  2. सिद्धि के पश्चात्, जहाँ कहीं एकांत में बैठकर इस मन्त्र का स्मरण करेंगे, वहीं भोजन अपने आप उपस्थित हो जाएगा।

समापन

इति श्री हरगौरीसंवादे बृहज्ज्योतिषार्णवान्तर्गतधर्मस्कन्धान्तः पात्युपासनास्तबके श्रीमदुच्छिष्टचाण्डालिन्युपासनानिरूपणं नाम षट्चत्वारिंशदधिक द्विशततमोऽध्यायः ॥ २४६॥ इति उच्छिष्टगणपत्युच्छिष्टचाण्डालिन्युपासने समाप्ते ॥ ५॥

सामान्य प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: उच्छिष्ट चाण्डालिनी कौन हैं?

यह उच्छिष्ट गणपति की शक्ति और दस महाविद्याओं में से एक मातंगी का तांत्रिक स्वरूप है। इन्हें उच्छिष्ट अवस्था में पूजा जाता है।

प्रश्न 2: चेटक सिद्धि क्या है?

चेटक सिद्धि एक प्रकार की यक्षिणी/शक्ति सिद्धि है जो साधक की भौतिक कामनाओं, विशेषकर भोजन और रसद की पूर्ति अलौकिक रूप से करती है।

प्रश्न 3: क्या आचमन करना चाहिए?

नहीं, इस विशिष्ट साधना में भोजन के बाद आचमन (कुल्ला) नहीं करना चाहिए। "विनैवाचमने कृते" - यह इसका मुख्य नियम है।

।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।।