Sri Vishwaksena Ashtottara Shatanamavali - श्री विष्वक्सेनाष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री विष्वक्सेनाष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ श्रीमत्सूत्रवतीनाथाय नमः । १
ॐ श्रीविष्वक्सेनाय नमः । २
ॐ चतुर्भुजाय नमः । ३
ॐ श्रीवासुदेवसेनान्याय नमः । ४
ॐ श्रीशहस्तावलम्बदाय नमः । ५
ॐ सर्वारम्भेषुसम्पूज्याय नमः । ६
ॐ गजास्यादिपरीवृताय नमः । ७
ॐ सर्वदासर्वकार्येषु सर्वविघ्ननिवर्तकाय नमः । ८
ॐ धीरोदात्ताय नमः । ९
ॐ शुचये नमः । १०
ॐ दक्षाय नमः । ११
ॐ माधवाज्ञा प्रवर्तकाय नमः । १२
ॐ हरिसङ्कल्पतो विश्वसृष्टिस्थितिलयादिकृते नमः । १३
ॐ तर्जनीमुद्रया विश्वनियन्त्रे नमः । १४
ॐ नियतात्मवते नमः । १५
ॐ विष्णुप्रतिनिधये नमः । १६
ॐ श्रीमते नमः । १७
ॐ विष्णुमार्गानुगाय नमः । १८
ॐ सुधिये नमः । १९
ॐ शङ्खिने नमः । २०
ॐ चक्रिणे नमः । २१
ॐ गदिने नमः । २२
ॐ शार्ङ्गिणे नमः । २३
ॐ नानाप्रहरणायुधाय नमः । २४
ॐ सुरसेनानन्दकारिणे नमः । २५
ॐ दैत्यसेनभयङ्कराय नमः । २६
ॐ अभियात्रे नमः । २७
ॐ प्रहर्त्रे नमः । २८
ॐ सेनानयविशारदाय नमः । २९
ॐ भूतप्रेतपिशाचादि सर्वशत्रुनिवारकाय नमः । ३०
ॐ शौरिवीरकथालापिने नमः । ३१
ॐ यज्ञविघ्नकरान्तकाय नमः । ३२
ॐ कटाक्षमात्रविज्ञातविष्णुचित्ताय नमः । ३३
ॐ चतुर्गतये नमः । ३४
ॐ सर्वलोकहितकाङ्क्षिणे नमः । ३५
ॐ सर्वलोकाभयप्रदाय नमः । ३६
ॐ आजानुबाहवे नमः । ३७
ॐ सुशिरसे नमः । ३८
ॐ सुललाटाय नमः । ३९
ॐ सुनासिकाय नमः । ४०
ॐ पीनवक्षसे नमः । ४१
ॐ विशालाक्षाय नमः । ४२
ॐ मेघगम्भीरनिस्वनाय नमः । ४३
ॐ सिंहमध्याय नमः । ४४
ॐ सिंहगतये नमः । ४५
ॐ सिंहाक्षाय नमः । ४६
ॐ सिंहविक्रमाय नमः । ४७
ॐ किरीटकर्णिकामुक्ताहार केयूरभूषिताय नमः । ४८
ॐ अङ्गुलीमुद्रिकाभ्राजदङ्गुलये नमः । ४९
ॐ स्मरसुन्दराय नमः । ५०
ॐ यज्ञोपवीतिने नमः । ५१
ॐ सर्वोत्तरोत्तरीयाय नमः । ५२
ॐ सुशोभनाय नमः । ५३
ॐ पीताम्बरधराय नमः । ५४
ॐ स्रग्विणे नमः । ५५
ॐ दिव्यगन्धानुलेपनाय नमः । ५६
ॐ रम्योर्ध्वपुण्ड्रतिलकाय नमः । ५७
ॐ दयाञ्चितदृगञ्चलाय नमः । ५८
ॐ अस्त्रविद्यास्फुरन्मूर्तये नमः । ५९
ॐ रशनाशोभिमध्यमाय नमः । ६०
ॐ कटिबन्धत्सरुन्यस्तखड्गाय नमः । ६१
ॐ हरिनिषेविताय नमः । ६२
ॐ रत्नमञ्जुलमञ्जीरशिञ्जानपदपङ्कजाय नमः । ६३
ॐ मन्त्रगोप्त्रे नमः । ६४
ॐ अतिगम्भीराय नमः । ६५
ॐ दीर्घदर्शिने नमः । ६६
ॐ प्रतापवते नमः । ६७
ॐ सर्वज्ञाय नमः । ६८
ॐ सर्वशक्तये नमः । ६९
ॐ निखिलोपायकोविदाय नमः । ७०
ॐ अतीन्द्राय नमः । ७१
ॐ अप्रमत्ताय नमः । ७२
ॐ वेत्रदण्डधराय नमः । ७३
ॐ प्रभवे नमः । ७४
ॐ समयज्ञाय नमः । ७५
ॐ समयज्ञाय नमः । ७६
ॐ शुभाचाराय नमः । ७७
ॐ सुमनसे नमः । ७८
ॐ सुमनसः प्रियाय नमः । ७९
ॐ मन्दस्मिताञ्चितमुखाय नमः । ८०
ॐ श्रीभूनीलाप्रियङ्कराय नमः । ८१
ॐ अनन्तगरुडादीनां प्रियकृते नमः । ८२
ॐ प्रियभूषणाय नमः । ८३
ॐ विष्णुकिङ्करवर्गस्य तत्तत् कार्योपदेशकाय नमः । ८४
ॐ लक्ष्मीनाथपदाम्भोजषट्पदाय नमः । ८५
ॐ षट्पदप्रियाय नमः । ८६
ॐ श्रीदेव्युनुग्रहप्राप्त द्वयमन्त्राय नमः । ८७
ॐ कृतान्तविदे नमः । ८८
ॐ विष्णुसेवितदिव्यस्रक् अम्बरादिनिषेवित्रे नमः । ८९
ॐ श्रीशप्रियकराय नमः । ९०
ॐ श्रीशभुक्तशेषैकभोजनाय नमः । ९१
ॐ सौम्यमूर्तये नमः । ९२
ॐ प्रसन्नात्मने नमः । ९३
ॐ करुणावरुणालयाय नमः । ९४
ॐ गुरुपङ्क्तिप्रधानाय नमः । ९५
ॐ श्रीशठकोपमुनेर्गुरवे नमः । ९६
ॐ मन्त्ररत्नानुसन्धात्रे नमः । ९७
ॐ न्यासमार्गप्रवर्तकाय नमः । ९८
ॐ वैकुण्ठसूरि परिषन्निर्वाहकाय नमः । ९९
ॐ उदारधिये नमः । १००
ॐ प्रसन्नजनसंसेव्याय नमः । १०१
ॐ प्रसन्नमुखपङ्कजाय नमः । १०२
ॐ साधुलोकपरित्राते नमः । १०३
ॐ दुष्टशिक्षणतत्पराय नमः । १०४
ॐ श्रीमन्नारायणपद शरणत्वप्रबोधकाय नमः । १०५
ॐ श्रीवैभवख्यापयित्रे नमः । १०६
ॐ स्ववशंवद माधवाय नमः । १०७
ॐ विष्णुना परमं साम्यमापन्नाय नमः । १०८
ॐ देशिकोत्तमाय नमः ।
ॐ श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः ।
॥ इति श्री विष्वक्सेनाष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥
परिचय: श्री विष्वक्सेन और उनकी महिमा (Detailed Introduction)
वैष्णव धर्म और विशेषकर श्री संप्रदाय (Ramanuja Tradition) में श्री विष्वक्सेन (Sri Vishwaksena) का स्थान अत्यंत गरिमामय और अनिवार्य है। वे वैकुण्ठ लोक में भगवान मन्नारायण (विष्णु) के प्रधान सेनापति और समस्त ब्रह्मांडीय व्यवस्था के मुख्य प्रशासक हैं। श्री विष्वक्सेनाष्टोत्तरशतनामावली उनके १०८ दिव्य नामों का वह संग्रह है जो उनके पराक्रम, उनकी प्रशासनिक कुशलता और उनके विघ्नहर्ता स्वरूप को प्रकट करता है। वैकुण्ठ में उन्हें 'नित्य-सूरि' (शाश्वत मुक्त आत्मा) माना गया है, जो सदा श्री हरि की सेवा में तत्पर रहते हैं।
नाम का तात्विक अर्थ: 'विष्वक्सेन' शब्द दो संस्कृत मूलों से बना है—'विष्वक्' (सभी दिशाओं में) और 'सेना' (जिसकी सेना व्याप्त हो)। इसका अर्थ है—वह महाशक्ति जिसकी सेना और प्रभाव चारों दिशाओं में फैला हुआ है। श्री वैष्णव परंपरा में उन्हें 'बाधाओं का निवारक' माना जाता है। जिस प्रकार अन्य हिंदू परंपराओं में किसी भी कार्य के आरम्भ में भगवान गणेश की पूजा होती है, उसी प्रकार वैष्णव मंदिरों और अनुष्ठानों में सबसे पहले श्री विष्वक्सेन का आवाहन किया जाता है। उनके आशीर्वाद के बिना कोई भी उत्सव, जैसे 'ब्रह्मोत्सव', पूर्ण नहीं माना जाता।
स्वरूप और आयुध: नामावली में उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन मिलता है। वे चतुर्भुज हैं और भगवान विष्णु के समान ही शंख, चक्र और गदा धारण करते हैं। उनका चौथा हाथ 'तर्जनी मुद्रा' (Tarjani Mudra) में होता है, जो दुष्ट शक्तियों को चेतावनी देने और भक्तों को सुरक्षा का आश्वासन देने का प्रतीक है। वे 'श्रीमत्सूत्रवतीनाथ' हैं, अर्थात् देवी सूत्रवती के स्वामी हैं। वे 'वेत्रदण्ड' (एक दिव्य छड़ी) धारण करते हैं, जो उनके सेनापति होने का राजसी चिन्ह है।
आध्यात्मिक उत्तरदायित्व: श्री विष्वक्सेन केवल एक योद्धा नहीं हैं, बल्कि वे वैकुण्ठ के 'मैनेजर' या व्यवस्थापक भी हैं। भगवान विष्णु के पास आने वाले भक्तों और नित्य-सूरियों का मार्गदर्शन वे ही करते हैं। नामावली में उन्हें 'विष्णुप्रतिनिधि' (विष्णु के प्रतिनिधि) और 'विष्णुमार्गानुगा' कहा गया है। वे 'गुरु' परंपरा के भी महत्वपूर्ण अंग हैं। रामानुजाचार्य के दर्शन में, गुरुओं की वंशावली में श्री और भगवान विष्णु के ठीक बाद श्री विष्वक्सेन का नाम आता है। वे दिव्य ज्ञान के प्रसारक (प्रबोधक) हैं।
कलियुग में, जहाँ मनुष्य पग-पग पर बाधाओं और मानसिक द्वंद्वों का सामना करता है, वहाँ श्री विष्वक्सेन की आराधना एक सुरक्षा कवच का कार्य करती है। 'भूतप्रेतपिशाचादि सर्वशत्रुनिवारक' के रूप में वे नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश करते हैं और 'कार्यसिद्धिप्रदायक' के रूप में संकल्पों को सिद्ध करते हैं। १०८ नामों का यह तात्विक पुंज वास्तव में साधक के जीवन को अनुशासन, स्पष्टता और श्री हरि की अनन्य भक्ति से भर देता है। जो व्यक्ति निष्काम भाव से इस नामावली का पाठ करता है, उसे वैकुण्ठ के इन प्रधान सेनापति का वही सामीप्य प्राप्त होता है जो नित्य-मुक्त आत्माओं को सुलभ है।
विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)
श्री विष्वक्सेन की उपासना का महत्व 'प्रपत्ति' (शरणागति) मार्ग में बहुत अधिक है। पाञ्चरात्र आगमों के अनुसार, वे 'भगवान की आज्ञा' के साक्षात् विग्रह हैं। उनके नाम का उच्चारण करने से साधक के चित्त में भगवान विष्णु के प्रति आज्ञाकारिता और समर्पण का भाव जाग्रत होता है।
मंदिरों के उत्सवों में 'मृत्संग्रहण' (पवित्र मिट्टी एकत्र करना) और 'अंकुरार्पण' जैसी महत्वपूर्ण क्रियाएं श्री विष्वक्सेन की देखरेख में ही संपन्न होती हैं। वे 'यज्ञविघ्नकरान्तक' हैं, अर्थात् वे उन सभी शक्तियों का अंत कर देते हैं जो सात्विक यज्ञों और अनुष्ठानों में विघ्न डालती हैं। इसी कारण उन्हें 'वैष्णव गणेश' भी कहा जाता है।
फलश्रुति: नामावली पाठ के लाभ (Benefits from Phala Shruti)
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार, श्री विष्वक्सेन के नामों के जाप से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- निर्विघ्न कार्य सिद्धि: किसी भी नए व्यापार, यात्रा या अनुष्ठान के आरम्भ में पाठ करने से समस्त बाधाएं दूर होती हैं।
- शत्रु और भय मुक्ति: 'दैत्यसेनभयङ्कर' होने के कारण वे शत्रुओं के भय और अज्ञात संकटों से रक्षा करते हैं।
- नेतृत्व और अनुशासन: सेनापति होने के कारण, उनकी आराधना से साधक में निर्णय लेने की क्षमता और नेतृत्व गुणों का विकास होता है।
- विष्णु भक्ति की प्राप्ति: वे 'हरिनिषेविता' हैं, अतः उनके नामों का जप साधक के हृदय को श्री हरि के चरणों से जोड़ देता है।
- नकारात्मक शक्तियों का नाश: तंत्र-मंत्र, बुरी नजर और नकारात्मक स्पंदनों को दूर करने के लिए यह नामावली अमोघ है।
पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Guidelines)
श्री विष्वक्सेन की आराधना सरल किन्तु शुचितापूर्ण होनी चाहिए। इसके पूर्ण फल हेतु निम्न विधि अपनाएं:
साधना के नियम
- समय: प्रातः काल स्नान के पश्चात या किसी भी नए कार्य के आरम्भ से पूर्व पाठ करें।
- वस्त्र: पीले या सफेद रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना विष्णु-गणों को प्रिय है।
- अर्पण: भगवान को तुलसी के पत्र, सुगंधित पुष्प और विशेष रूप से 'प्रसाद' के रूप में मिष्ठान अर्पित करें।
- मुद्रा: पाठ के समय रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर एकाग्र चित्त से बैठें।
- दिशा: पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके पाठ करना सर्वोत्तम है।
विशेष अवसर
- गृह प्रवेश: नए घर में प्रवेश के समय विष्वक्सेन पूजा सुख-शांति सुनिश्चित करती है।
- एकादशी: विष्णु आराधना के इन दिनों में नामावली का पाठ महापुण्य प्रदायक है।
- ब्रह्मोत्सव: मंदिर दर्शन के समय सेनापति की स्तुति से भगवान के दर्शन सुलभ होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्री विष्वक्सेन कौन हैं?
श्री विष्वक्सेन भगवान विष्णु के वैकुण्ठ लोक के प्रधान सेनापति हैं। वे नित्य-सूरि हैं और श्री हरि के संकल्पों को क्रियान्वित करने वाले मुख्य अधिकारी हैं।
2. क्या विष्वक्सेन और गणेश जी एक ही हैं?
दोनों की भूमिका (विघ्नहर्ता) समान है, लेकिन वे भिन्न सत्ताएं हैं। श्री वैष्णव संप्रदाय में विघ्न निवारण हेतु गणेश जी के स्थान पर श्री विष्वक्सेन की पूजा का विधान है।
3. 'तर्जनी मुद्रा' का क्या अर्थ है जो विष्वक्सेन धारण करते हैं?
यह एक उंगली (तर्जनी) खड़ी करने की मुद्रा है, जिसका उपयोग दुष्टों को भयभीत करने और आज्ञा देने के लिए किया जाता है। यह उनके कठोर प्रशासन और सुरक्षात्मक शक्ति का प्रतीक है।
4. विष्वक्सेन की पत्नी कौन हैं?
नामावली के प्रथम नाम 'श्रीमत्सूत्रवतीनाथ' के अनुसार, उनकी पत्नी का नाम देवी सूत्रवती है।
5. क्या घर में विष्वक्सेन की पूजा की जा सकती है?
हाँ, विशेषकर वैष्णव परिवारों में किसी भी धार्मिक उत्सव या नित्य पूजा के आरम्भ में उनके १०८ नामों का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।
6. 'वेत्रदण्ड' क्या है?
वेत्रदण्ड एक प्रकार की छड़ी है जिसे श्री विष्वक्सेन अधिकार और शासन के प्रतीक के रूप में धारण करते हैं। यह ब्रह्मांडीय अनुशासन का सूचक है।
7. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?
भगवान विष्णु के सेनापति होने के कारण, तुलसी की माला या कमलगट्टे की माला का प्रयोग श्रेष्ठ है।
8. 'विष्णुप्रतिनिधि' नाम का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि वे भगवान विष्णु के प्रतिनिधि हैं। वे वही कार्य करते हैं और वही शक्तियाँ धारण करते हैं जो साक्षात् विष्णु की इच्छा होती है।
9. क्या इस पाठ से अकारण होने वाले विवाद सुलझ सकते हैं?
जी हाँ, 'सर्वशत्रुनिवारक' और 'दक्ष' होने के कारण, वे साधक को ऐसी बुद्धि और शक्ति प्रदान करते हैं जिससे जटिल विवाद सुलझ जाते हैं।
10. श्री विष्वक्सेन का प्रमुख आयुध क्या है?
नामावली के अनुसार वे शंख, चक्र, गदा और धनुष (शार्ङ्ग) धारण करते हैं। गदा उनकी सैन्य शक्ति का प्रमुख हथियार है।