Sri Vishnu Ashtottara Shatanamavali – श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ जिष्णवे नमः ।
ॐ वषट्काराय नमः ।
ॐ देवदेवाय नमः ।
ॐ वृषाकपये नमः ।
ॐ दामोदराय नमः ।
ॐ दीनबन्धवे नमः ।
ॐ आदिदेवाय नमः ।
ॐ अदितेस्तुताय नमः । ९
ॐ पुण्डरीकाय नमः ।
ॐ परानन्दाय नमः ।
ॐ परमात्मने नमः ।
ॐ परात्पराय नमः ।
ॐ परशुधारिणे नमः ।
ॐ विश्वात्मने नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ कलिमलापहारिणे नमः ।
ॐ कौस्तुभोद्भासितोरस्काय नमः । १८
ॐ नराय नमः ।
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ हराय नमः ।
ॐ हरप्रियाय नमः ।
ॐ स्वामिने नमः ।
ॐ वैकुण्ठाय नमः ।
ॐ विश्वतोमुखाय नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः । २७
ॐ अप्रमेयात्मने नमः ।
ॐ वराहाय नमः ।
ॐ धरणीधराय नमः ।
ॐ वामनाय नमः ।
ॐ वेदवक्ताय नमः ।
ॐ वासुदेवाय नमः ।
ॐ सनातनाय नमः ।
ॐ रामाय नमः ।
ॐ विरामाय नमः । ३६
ॐ विरजाय नमः ।
ॐ रावणारये नमः ।
ॐ रमापतये नमः ।
ॐ वैकुण्ठवासिने नमः ।
ॐ वसुमते नमः ।
ॐ धनदाय नमः ।
ॐ धरणीधराय नमः ।
ॐ धर्मेशाय नमः ।
ॐ धरणीनाथाय नमः । ४५
ॐ ध्येयाय नमः ।
ॐ धर्मभृतांवराय नमः ।
ॐ सहस्रशीर्षाय नमः ।
ॐ पुरुषाय नमः ।
ॐ सहस्राक्षाय नमः ।
ॐ सहस्रपादे नमः ।
ॐ सर्वगाय नमः ।
ॐ सर्वविदे नमः ।
ॐ सर्वाय नमः । ५४
ॐ शरण्याय नमः ।
ॐ साधुवल्लभाय नमः ।
ॐ कौसल्यानन्दनाय नमः ।
ॐ श्रीमते नमः ।
ॐ रक्षसःकुलनाशकाय नमः ।
ॐ जगत्कर्ताय नमः ।
ॐ जगद्धर्ताय नमः ।
ॐ जगज्जेताय नमः ।
ॐ जनार्तिहराय नमः । ६३
ॐ जानकीवल्लभाय नमः ।
ॐ देवाय नमः ।
ॐ जयरूपाय नमः ।
ॐ जलेश्वराय नमः ।
ॐ क्षीराब्धिवासिने नमः ।
ॐ क्षीराब्धितनयावल्लभाय नमः ।
ॐ शेषशायिने नमः ।
ॐ पन्नगारिवाहनाय नमः ।
ॐ विष्टरश्रवसे नमः । ७२
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ मथुरानाथाय नमः ।
ॐ मुकुन्दाय नमः ।
ॐ मोहनाशनाय नमः ।
ॐ दैत्यारिणे नमः ।
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ।
ॐ मधुसूदनाय नमः ।
ॐ सोमसूर्याग्निनयनाय नमः । ८१
ॐ नृसिंहाय नमः ।
ॐ भक्तवत्सलाय नमः ।
ॐ नित्याय नमः ।
ॐ निरामयाय नमः ।
ॐ शुद्धाय नमः ।
ॐ नरदेवाय नमः ।
ॐ जगत्प्रभवे नमः ।
ॐ हयग्रीवाय नमः ।
ॐ जितरिपवे नमः । ९०
ॐ उपेन्द्राय नमः ।
ॐ रुक्मिणीपतये नमः ।
ॐ सर्वदेवमयाय नमः ।
ॐ श्रीशाय नमः ।
ॐ सर्वाधाराय नमः ।
ॐ सनातनाय नमः ।
ॐ सौम्याय नमः ।
ॐ सौम्यप्रदाय नमः ।
ॐ स्रष्टे नमः । ९९
ॐ विष्वक्सेनाय नमः ।
ॐ जनार्दनाय नमः ।
ॐ यशोदातनयाय नमः ।
ॐ योगिने नमः ।
ॐ योगशास्त्रपरायणाय नमः ।
ॐ रुद्रात्मकाय नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये नमः ।
ॐ राघवाय नमः ।
ॐ मधुसूदनाय नमः । १०८
॥ इति श्रीविष्णु अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥
श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावली: परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि (Introduction)
श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Vishnu Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के सबसे पवित्र और प्रभावशाली अर्चना पाठों में से एक है। हिंदू त्रिमूर्ति में भगवान विष्णु को सृष्टि का 'पालनहार' (Sustainer) माना गया है। वे संपूर्ण जगत के संरक्षक हैं, जो धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए समय-समय पर विभिन्न अवतारों में अवतरित होते हैं। यह नामावली भगवान विष्णु के १०८ दिव्य नामों का संकलन है, जो उनके अनन्त गुणों, स्वरूपों और उनकी ब्रह्मांडीय शक्तियों का दर्शन कराती है।
ऐतिहासिक एवं दार्शनिक आधार: 'अष्टोत्तर शत' का अर्थ है १०८। हिंदू दर्शन में १०८ की संख्या अत्यंत रहस्यमयी और महत्वपूर्ण मानी गई है। ब्रह्मांडीय गणनाॐ से लेकर मानव शरीर की नाड़ियों तक, यह संख्या पूर्णता का प्रतीक है। भगवान विष्णु के ये १०८ नाम केवल संबोधन नहीं हैं, बल्कि ये मंत्रों की शक्ति से युक्त हैं। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत में नाम-स्मरण की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। विशेषकर कलियुग में, जहाँ कठिन तपस्या और यज्ञ करना दुष्कर है, वहाँ केवल भगवान के नामों का संकीर्तन ही मोक्ष का सबसे सुलभ मार्ग बताया गया है।
नामावली का सार: इस नामावली में भगवान विष्णु को 'विष्णु' (सर्वव्यापी), 'जिष्णु' (विजयी), 'अच्युत' (अविनाशी), और 'दामोदर' (उदर में ब्रह्मांड समाहित करने वाले) जैसे गूढ़ अर्थों वाले नामों से संबोधित किया गया है। यह पाठ साधक को केवल भौतिक लाभ ही नहीं देता, बल्कि उसे अद्वैत चेतना की ओर ले जाता है। ५०० से अधिक शब्दों के इस विवेचन में यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक नाम एक दिव्य कंपन उत्पन्न करता है, जो भक्त के अंतःकरण की शुद्धि करता है और उसे माया के बंधनों से मुक्त करता है।
भगवान विष्णु का 'सत्व' गुण संपूर्ण सृष्टि को स्थिरता प्रदान करता है। उनकी यह नामावली उनके विभिन्न अवतारों—मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम और कृष्ण—के साथ-साथ उनके ब्रह्मांडीय रूप का भी स्मरण कराती है। 'कलिमलापहारिणे' जैसे नाम इस बात की पुष्टि करते हैं कि कलयुग के दोषों और पापों को हरने के लिए श्री हरि का नाम ही एकमात्र औषधि है।
विशिष्ट महत्व और दार्शनिक प्रतीकवाद (Significance)
श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावली के १०८ नामों का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक भी है। इन नामों के पीछे छिपा प्रतीकवाद भक्त की श्रद्धा को और गहरा करता है:
- विष्णु और जिष्णु: यह भगवान की सर्वव्यापकता और अजेयता को दर्शाता है। वे हर कण में व्याप्त हैं और उन पर कोई भी नकारात्मक शक्ति विजय प्राप्त नहीं कर सकती।
- पद्मनाभ और शेषशायी: यह सृष्टि के सृजन और विश्राम की अवस्था को प्रकट करता है। क्षीर सागर में शयन करना संसार की उथल-पुथल के बीच भी परम शांति में रहने की कला सिखाता है।
- जनार्तिहराय: प्रभु भक्तों के दुखों और संकटों को हर लेने वाले हैं। 'जन-अर्ति-हर' का अर्थ ही है लोगों की पीड़ा को समाप्त करने वाला।
- सत्य और सनातनाय: वे ही एकमात्र शाश्वत सत्य हैं। काल के परिवर्तनशील प्रवाह में भी जो स्थिर रहता है, वह विष्णु तत्व है।
- राघव और कृष्ण: ये नाम भगवान की मानवीय लीलाॐ और उनके द्वारा स्थापित मर्यादा व प्रेम के आदर्शों का स्मरण कराते हैं।
दार्शनिक रूप से, 'नमः' शब्द का अर्थ है 'न-मम' (यह मेरा नहीं है)। जब हम प्रत्येक नाम के अंत में 'नमः' कहते हैं, तो हम अपने अहंकार को प्रभु के चरणों में समर्पित करते हैं, जो आध्यात्मिक उन्नति की पहली सीढ़ी है।
पाठ के लाभ और फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)
शास्त्रीय प्रमाणों और संतों के वचनों के अनुसार, श्री विष्णु नामावली के पाठ से साधक को अतुलनीय लाभ प्राप्त होते हैं। यह नामावली न केवल पापों का नाश करती है, बल्कि साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच का निर्माण करती है।
- समस्त पापों का क्षालन: 'कलिमलापहारिणे' होने के नाते, भगवान का नाम करोड़ों जन्मों के संचित पापों को जलाकर भस्म कर देता है और आत्मा को निर्मल बनाता है।
- मानसिक शांति और क्लेश मुक्ति: यह नामावली मन को स्थिरता प्रदान करती है। तनाव, चिंता और डिप्रेशन जैसी समस्याॐ में भगवान के नाम का स्मरण एक संजीवनी की तरह कार्य करता है।
- सुख-समृद्धि और आरोग्य: चूँकि भगवान विष्णु 'रमापति' (लक्ष्मी के स्वामी) हैं, उनकी पूजा से घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। साथ ही 'निरामयाय' प्रभु उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।
- भय और शत्रुॐ पर विजय: 'जितरिपवे' और 'चक्रपाणये' प्रभु अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें शत्रुॐ तथा अज्ञात भयों से मुक्ति दिलाते हैं।
- मोक्ष और वैकुंठ प्राप्ति: जीवन के अंत में भगवान के नामों का स्मरण जीव को आवागमन के चक्र से मुक्त कर श्री विष्णु के शाश्वत धाम वैकुंठ में स्थान दिलाता है।
पाठ विधि एवं साधना विधान (Ritual Method)
श्री विष्णु नामावली का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे विधिपूर्वक और पूर्ण श्रद्धा के साथ करना चाहिए:
दैनिक पूजा नियम
- समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (४ से ६ बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। संध्या काल (गोधूलि वेला) में भी इसका गान अत्यंत सुखद होता है।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। पीला रंग भगवान विष्णु को विशेष प्रिय है।
- आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
- तुलसी अर्पण: भगवान विष्णु की पूजा तुलसी के बिना अपूर्ण मानी जाती है। प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ प्रभु को एक तुलसी दल अर्पित करना 'अर्चन' कहलाता है, जो अत्यंत फलदायी है।
- दीप और नैवेद्य: शुद्ध घी का दीपक जलाएं और भगवान को पीले फल या मिश्री-माखन का भोग लगाएं।
विशेष अवसर
- एकादशी: यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन १०८ नामों का पाठ और अर्चन करने से जन्मों के कष्ट मिट जाते हैं।
- पूर्णिमा: सत्यनारायण पूजन के साथ इन नामों का पाठ घर में सुख-शांति लाता है।
- गुरुवार: विष्णु और बृहस्पति के दिन गुरुवार को पाठ करने से गुरु ग्रह के दोष दूर होते हैं।
विष्णु नामावली संबंधी अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावली का पाठ करने का सबसे अच्छा समय क्या है?
शास्त्रों के अनुसार 'प्रभात काले' अर्थात सूर्योदय के समय पाठ करना सबसे उत्तम है। यह समय सत्व गुण की प्रधानता का होता है, जिससे एकाग्रता बनी रहती है।
2. क्या इस नामावली का पाठ बिना किसी विशेष पूजा के किया जा सकता है?
हाँ, आप अपनी दैनिक दिनचर्या में भी भगवान का स्मरण करते हुए इसे पढ़ सकते हैं। भगवान भाव के भूखे हैं, कर्मकाण्ड से अधिक आपकी श्रद्धा और निष्ठा महत्वपूर्ण है।
3. विष्णु नामावली और विष्णु सहस्रनाम में क्या अंतर है?
विष्णु सहस्रनाम में भगवान के १००० नाम हैं, जबकि इसमें १०८ नाम हैं। १०८ नामों की नामावली सहस्रनाम का एक संक्षिप्त और सार स्वरूप है, जो कम समय में अधिक प्रभाव डालती है।
4. क्या 'नाम-अर्चन' (हर नाम पर फूल चढ़ाना) घर पर किया जा सकता है?
जी हाँ, घर के मंदिर में भगवान की प्रतिमा या शालिग्राम पर १०८ तुलसी दल या पीले फूल चढ़ाकर नामावली का अर्चन करना अत्यंत शुभ और समृद्धिदायक है।
5. 'वषट्काराय नमः' का क्या अर्थ है?
'वषट्कार' एक वैदिक ध्वनि है जो यज्ञों के दौरान आहुति देते समय उपयोग की जाती है। इसका अर्थ है कि भगवान विष्णु ही समस्त यज्ञों के भोक्ता और स्वयं यज्ञ स्वरूप हैं।
6. क्या स्त्रियाँ और बच्चे भी यह पाठ कर सकते हैं?
हाँ, भगवद भक्ति में कोई भेद नहीं है। बच्चे इसका पाठ करेंगे तो उनमें एकाग्रता और अच्छे संस्कारों का विकास होगा, वहीं स्त्रियाँ परिवार के मंगल के लिए इसे पढ़ सकती हैं।
7. क्या इस नामावली से ग्रहों के दोष शांत होते हैं?
भगवान विष्णु समस्त ग्रहों के स्वामी हैं। विशेष रूप से गुरु (Jupiter) और बुध (Mercury) के दोषों के निवारण के लिए विष्णु नामावली का पाठ अमोघ माना जाता है।
8. 'अच्युताय नमः' नाम का क्या महत्व है?
'अच्युत' का अर्थ है वह जो कभी अपनी स्थिति से च्युत (गिरे) नहीं होता। इसका पाठ करने से साधक के जीवन में स्थिरता आती है और वह पतन से बचता है।
9. क्या पाठ के दौरान शालिग्राम का होना आवश्यक है?
नहीं, यदि शालिग्राम न हो तो भगवान विष्णु या कृष्ण के किसी भी चित्र या प्रतिमा के सामने बैठकर पाठ किया जा सकता है। मानसिक ध्यान सबसे श्रेष्ठ है।
10. 'रुद्रात्मकाय' नाम का नामावली में क्या स्थान है?
यह नाम दर्शाता है कि शिव और विष्णु एक ही हैं। यह भक्तों को यह शिक्षा देता है कि परमात्मा एक ही है और हमें देवों के बीच भेदभाव नहीं करना चाहिए।