Logoपवित्र ग्रंथ

श्री वाराही अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Varahi Ashtottara Shatanamavali) - II

श्री वाराही अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Varahi Ashtottara Shatanamavali) - II
॥ श्री वाराही अष्टोत्तरशतनामावली २ ॥ ॐ किरिचक्ररथारूढायै नमः । ॐ शत्रुसंहारकारिण्यै नमः । ॐ क्रियाशक्तिस्वरूपायै नमः । ॐ दण्डनाथायै नमः । ॐ महोज्ज्वलायै नमः । ॐ हलायुधायै नमः । ॐ हर्षदात्र्यै नमः । ॐ हलनिर्भिन्नशात्रवायै नमः । ॐ भक्तार्तितापशमन्यै नमः । ९ ॐ मुसलायुधशोभिन्यै नमः । ॐ कुर्वन्त्यै नमः । ॐ कारयन्त्यै नमः । ॐ कर्ममालातरङ्गिण्यै नमः । ॐ कामप्रदायै नमः । ॐ भगवत्यै नमः । ॐ भक्तशत्रुविनाशिन्यै नमः । ॐ उग्ररूपायै नमः । ॐ महादेव्यै नमः । १८ ॐ स्वप्नानुग्रहदायिन्यै नमः । ॐ कोलास्यायै नमः । ॐ चन्द्रचूडायै नमः । ॐ त्रिनेत्रायै नमः । ॐ हयवाहनायै नमः । ॐ पाशहस्तायै नमः । ॐ शक्तिपाण्यै नमः । ॐ मुद्गरायुधधारिण्यै नमः । ॐ हस्ताङ्कुशायै नमः । २७ ॐ ज्वलन्नेत्रायै नमः । ॐ चतुर्बाहुसमन्वितायै नमः । ॐ विद्युद्वर्णायै नमः । ॐ वह्निनेत्रायै नमः । ॐ शत्रुवर्गविनाशिन्यै नमः । ॐ करवीरप्रिया मात्रे नमः । ॐ बिल्वार्चनवरप्रदायै नमः । ॐ वार्ताल्यै नमः । ॐ वाराह्यै नमः । ३६ ॐ वराहास्यायै नमः । ॐ वरप्रदायै नमः । ॐ अन्धिन्यै नमः । ॐ रुन्धिन्यै नमः । ॐ जम्भिन्यै नमः । ॐ मोहिन्यै नमः । ॐ स्तम्भिन्यै नमः । ॐ इतिविख्यातायै नमः । ॐ देव्यष्टकविराजितायै नमः । ४५ ॐ उग्ररूपायै नमः । ॐ महादेव्यै नमः । ॐ महावीरायै नमः । ॐ महाद्युतये नमः । ॐ किरातरूपायै नमः । ॐ सर्वेश्यै नमः । ॐ अन्तःशत्रुविनाशिन्यै नमः । ॐ परिणामक्रमा वीरायै नमः । ॐ परिपाकस्वरूपिण्यै नमः । ५४ ॐ नीलोत्पलतिलैः प्रीतायै नमः । ॐ शक्तिषोडशसेवितायै नमः । ॐ नारिकेलोदकप्रीतायै नमः । ॐ शुद्धोदकसमादरायै नमः । ॐ उच्चाटन्यै नमः । ॐ उच्चाटनेश्यै नमः । ॐ शोषण्यै नमः । ॐ शोषणेश्वर्यै नमः । ॐ मारण्यै नमः । ६३ ॐ मारणेश्यै नमः । ॐ भीषण्यै नमः । ॐ भीषणेश्वर्यै नमः । ॐ त्रासन्यै नमः । ॐ त्रासनेश्यै नमः । ॐ कम्पन्यै नमः । ॐ कम्पनीश्वर्यै नमः । ॐ आज्ञाविवर्तिन्यै नमः । ॐ आज्ञाविवर्तिनीश्वर्यै नमः । ७२ ॐ वस्तुजातेश्वर्यै नमः । ॐ सर्वसम्पादनीश्वर्यै नमः । ॐ निग्रहानुग्रहदक्षायै नमः । ॐ भक्तवात्सल्यशोभिन्यै नमः । ॐ किरातस्वप्नरूपायै नमः । ॐ बहुधाभक्तरक्षिण्यै नमः । ॐ वशङ्करीमन्त्ररूपायै नमः । ॐ हुम्बीजेनसमन्वितायै नमः । ॐ रंशक्त्यै नमः । ८१ ॐ क्लीं कीलकायै नमः । ॐ सर्वशत्रुविनाशिन्यै नमः । ॐ जपध्यानसमाराध्यायै नमः । ॐ होमतर्पणतर्पितायै नमः । ॐ दंष्ट्राकरालवदनायै नमः । ॐ विकृतास्यायै नमः । ॐ महारवायै नमः । ॐ ऊर्ध्वकेश्यै नमः । ॐ उग्रधरायै नमः । ९० ॐ सोमसूर्याग्निलोचनायै नमः । ॐ रौद्रीशक्त्यै नमः । ॐ परायै अव्यक्तायै नमः । ॐ ईश्वर्यै नमः । ॐ परदेवतायै नमः । ॐ विधिविष्णुशिवाद्यर्च्यायै नमः । ॐ मृत्युभीत्यपनोदिन्यै नमः । ॐ जितरम्भोरुयुगलायै नमः । ॐ रिपुसंहारताण्डवायै नमः । ९९ ॐ भक्तरक्षणसंलग्नायै नमः । ॐ शत्रुकर्मविनाशिन्यै नमः । ॐ तार्क्ष्यारूढायै नमः । ॐ सुवर्णाभायै नमः । ॐ शत्रुमारणकारिण्यै नमः । ॐ अश्वारूढायै नमः । ॐ रक्तवर्णायै नमः । ॐ रक्तवस्त्राद्यलङ्कृतायै नमः । ॐ जनवश्यकरी मात्रे नमः । १०८ ॥ अधिक नामानि ॥ ॐ भक्तानुग्रहदायिन्यै नमः । ॐ दंष्ट्राधृतधरायै देव्यै नमः । ॐ सदा प्राणवायुप्रदायै नमः । ॐ दूर्वास्यायै नमः । ॐ भूप्रदायै नमः । ॐ सर्वाभीष्टफलप्रदायै नमः । ॐ त्रिलोचनऋषिप्रीतायै नमः । ॐ पञ्चम्यै नमः । ॐ परमेश्वर्यै नमः । ॐ सेनाधिकारिण्यै नमः । ॐ उग्रायै नमः । ॐ वाराह्यै नमः । ॐ शुभप्रदायै नमः । ॥ इति श्री वाराही अष्टोत्तरशतनामावली २ सम्पूर्णा ॥

परिचय: भगवती वाराही और अष्टोत्तरशतनामावली संस्करण २ (Detailed Introduction)

शाक्त तंत्र और श्री विद्या साधना के रहस्यों में भगवती वाराही (Goddess Varahi) का स्थान अत्यंत विशिष्ट और शक्तिशाली माना गया है। वे भगवान विष्णु के वराह अवतार की स्त्री शक्ति (consort energy) हैं और सप्तमातृकाओं में पंचम स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी की सेना में वे 'दण्डनाथा' (Commander-in-Chief) के पद पर आसीन हैं। श्री वाराही अष्टोत्तरशतनामावली २ देवी के उन १०८ गुप्त नामों का संग्रह है जो उनके योद्धा स्वरूप, रक्षक गुणों और प्रचंड तांत्रिक सामर्थ्य को प्रकट करते हैं।
वाराही का तात्विक स्वरूप: वाराही देवी का मुख वराह (जंगली सुअर) का है और शरीर एक दिव्य नारी का। वराह प्रतीक है—गहराई में छिपे सत्य को बाहर निकालने का और जड़ता को उखाड़ फेंकने का। जिस प्रकार वराह अपने दांतों से पृथ्वी का उद्धार करते हैं, उसी प्रकार देवी वाराही साधक के जीवन से अज्ञान, दरिद्रता और शत्रुओं का जड़ से विनाश करती हैं। 'कोलास्या' और 'वराहास्या' जैसे नाम उनके इसी दिव्य मुख की महिमा गाते हैं। वे केवल संहारक नहीं हैं, बल्कि 'स्वप्नानुग्रहदायिनी' भी हैं, जो भक्तों को स्वप्न के माध्यम से मार्गदर्शन प्रदान करती हैं और आने वाले संकटों के प्रति सचेत करती हैं।
दण्डनाथा और किरिचक्र का रहस्य: इस नामावली का आरम्भ 'किरिचक्ररथारूढायै' से होता है। 'किरिचक्र' वह दिव्य रथ है जिसे हजारों वराह खींचते हैं और जिस पर सवार होकर माँ दण्डनाथा असुरों का दमन करती हैं। श्री विद्या में उन्हें ललिता अंबा की 'आज्ञा' शक्ति माना गया है। वे शासन, अनुशासन और न्याय की अधिष्ठात्री हैं। जो व्यक्ति राजनीति, कानून, प्रशासन या रक्षा के क्षेत्र में सफलता पाना चाहते हैं, उनके लिए वाराही की यह नामावली एक सिद्ध मंत्र के समान कार्य करती है।
वाराही देवी का वर्ण घनश्याम (बादलों के समान गहरा) है, वे त्रिनेत्र धारण करती हैं और उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुशोभित है। उनके हाथों में हल (Plough) और मुसल (Pestle) जैसे कृषि उपकरण आयुध के रूप में हैं, जो यह दर्शाते हैं कि वे हमारे अंतर्मन की कठोर भूमि को जोतकर उसमें भक्ति और ज्ञान के बीज बोती हैं। 'हलायुधायै' और 'मुसलायुधशोभिन्यै' नाम इसी सत्य की पुष्टि करते हैं। १०८ नामों का यह समूह केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा पुंज है जो साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच (Protection Armor) निर्मित करता है।
आधुनिक अशांत जीवन में, जहाँ व्यक्ति मानसिक द्वंद्व, शत्रुता और अज्ञात भयों से घिरा है, माँ वाराही की शरण लेना अमोघ उपाय है। यह नामावली अज्ञान के अंधकार को चीरकर सत्य का प्रकाश लाने के लिए साक्षात् सूर्य के समान तेजस्वी है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा, शुचिता और भक्ति भाव के साथ इसका पाठ करता है, माँ वाराही स्वयं उसकी रक्षक बनकर उसके जीवन के समस्त कंटकों को दूर कर देती हैं और उसे 'सायुज्य' (परमात्मा के साथ एकाकार होना) की ओर ले जाती हैं।

विशिष्ट तांत्रिक महत्व: संस्करण २ की विशेषता (Significance)

वाराही अष्टोत्तरशतनामावली का यह दूसरा संस्करण तांत्रिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 'निग्रह-अनुग्रह' (दण्ड देने और कृपा करने) की शक्ति पर विशेष बल देता है। इसमें देवी के 'मारण', 'स्तम्भन', 'उच्चाटन' और 'वशीकरण' जैसे उग्र स्वरूपों का वर्णन है, जो नकारात्मक शक्तियों को जड़ से नष्ट करने की क्षमता रखते हैं।
यह नामावली 'अन्तःशत्रु विनाश' के लिए भी अमोघ है। काम, क्रोध, लोभ और अहंकार ही हमारे वास्तविक शत्रु हैं। 'अन्तःशत्रुविनाशिन्यै' नाम का जाप करने से साधक का अंतःकरण शुद्ध होता है। भूमि संबंधी विवादों (Land disputes) और राजकीय कार्यों में विजय प्राप्ति हेतु यह नामावली तंत्र शास्त्र में सर्वोपरि मानी गई है।

फलश्रुति: पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits from Recitation)

वाराही तंत्र और आगमों के अनुसार, इस द्वितीय नामावली के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • शत्रु पराभव: ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं और विरोधियों की चालें विफल हो जाती हैं। 'शत्रुवर्गविनाशिन्यै' के प्रभाव से साधक अजेय बनता है।
  • तंत्र बाधा मुक्ति: नजर दोष, किया-कराया और काले जादू के प्रभाव को देवी तुरंत भस्म कर देती हैं।
  • भूमि और संपत्ति लाभ: 'भूप्रदायै' और 'वस्तुजातेश्वर्यै' नामों का जप भूमि विवाद सुलझाने और अचल संपत्ति की प्राप्ति में सहायक है।
  • भय और अकाल मृत्यु से रक्षा: 'मृत्युभीत्यपनोदिन्यै' के रूप में वे अकाल मृत्यु के संकट को टालकर दीर्घायु और सुरक्षा प्रदान करती हैं।
  • प्रशासकीय सफलता: राजनीति या सरकारी कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और साधक को यश की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि एवं विशेष निर्देश (Ritual Method)

वाराही देवी की आराधना उग्र और सात्विक दोनों रूपों में की जाती है। गृहस्थों के लिए सात्विक विधि निम्नलिखित है:

साधना के नियम

  • समय: वाराही पूजा के लिए रात्रि काल (विशेषकर ९ बजे के बाद) सर्वोत्तम माना गया है। उन्हें 'रात्रि की देवी' भी कहा जाता है।
  • वस्त्र: लाल या नीले रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनकर पाठ करना फलदायी है।
  • दिशा: पाठ के समय अपना मुख दक्षिण (South) दिशा की ओर रखना तांत्रिक फल के लिए श्रेष्ठ है, अन्यथा पूर्व की ओर बैठें।
  • अर्पण: देवी को 'नारिकेलोदक' (नारियल पानी), 'गुड़' और 'अनार' का भोग अत्यंत प्रिय है। उरद की दाल के वड़े का भोग भी लगाया जाता है।
  • दीपक: सरसों के तेल या शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।

विशेष अवसर

  • वाराही नवरात्रि: आषाढ़ मास की नवरात्रि में नित्य १०८ नामों का पाठ महासिद्धि प्रदान करता है।
  • पंचमी तिथि: प्रत्येक माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि वाराही देवी को समर्पित है।
  • मंगलवार और शनिवार: इन दिनों में पाठ करने से मंगल और शनि के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वाराही नामावली के प्रथम और द्वितीय संस्करण में क्या अंतर है?

प्रथम संस्करण देवी के 'मातृका' और सामान्य रक्षक स्वरूप पर अधिक केंद्रित है, जबकि यह द्वितीय संस्करण उनके 'दण्डनाथा' योद्धा स्वरूप और तांत्रिक क्रियाओं (जैसे स्तम्भन, उच्चाटन) पर आधारित है, जो विशेष शत्रु बाधा निवारण हेतु प्रयुक्त होता है।

2. 'किरिचक्र' का क्या अर्थ है?

'किरि' का अर्थ वराह है। किरिचक्र वह दिव्य रथ है जिसे करोड़ों वराह खींचते हैं। यह देवी की असीमित सैन्य शक्ति और प्रशासनिक अधिकार का प्रतीक है।

3. क्या इस नामावली का पाठ घर में करना सुरक्षित है?

हाँ, सात्विक भाव से और श्रद्धा के साथ घर में पाठ करना पूर्णतः सुरक्षित और सुरक्षा प्रदान करने वाला है। उग्र तांत्रिक प्रयोग बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के न करें।

4. वाराही देवी को 'दण्डनाथा' क्यों कहा जाता है?

वे ललिता पराभट्टारिका की सेना की प्रमुख सेनापति हैं। वे न्याय करने वाली और अधर्मियों को दण्ड देने वाली शक्ति हैं, इसलिए उन्हें दण्डनाथा कहा जाता है।

5. पाठ के लिए सबसे अच्छा दिन कौन सा है?

रविवार और शनिवार को वाराही पूजा के लिए विशेष दिन माना गया है। शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि सर्वाधिक शुभ है।

6. क्या यह नामावली भूमि विवादों को सुलझा सकती है?

जी हाँ, भगवान वराह ने पृथ्वी का उद्धार किया था, अतः उनकी शक्ति वाराही भूमि की अधिष्ठात्री हैं। 'भूप्रदायै' नाम का जाप भूमि संबंधी कष्टों को दूर करता है।

7. क्या स्त्रियाँ माँ वाराही की नामावली पढ़ सकती हैं?

हाँ, माँ वाराही स्वयं शक्ति का स्वरूप हैं। स्त्रियाँ अपनी सुरक्षा, आत्मविश्वास और पारिवारिक उन्नति के लिए यह पाठ नि:संकोच कर सकती हैं।

8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

वाराही उपासना और नामावली जप के लिए रुद्राक्ष की माला या लाल चन्दन की माला सबसे उत्तम और प्रभावशाली मानी गई है।

9. 'स्वप्नानुग्रहदायिनी' नाम का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि देवी अपने भक्तों को स्वप्न के माध्यम से सत्य का ज्ञान कराती हैं और भविष्य में होने वाली घटनाओं के प्रति सचेत करती हैं।

10. क्या यह नामावली राहु दोष को शांत करती है?

हाँ, वाराही देवी राहु (Rahu) की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। इनके नामों का पाठ राहु जनित भ्रम, मानसिक रोग और अचानक आने वाली बाधाओं को शांत करता है।