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श्री वाराही अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Varahi Ashtottara Shatanama Stotram — 108 दिव्य नामों का शक्तिशाली स्तोत्र

श्री वाराही अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ अथ श्री वाराही अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ किरिचक्ररथारूढा शत्रुसंहारकारिणी । क्रियाशक्तिस्वरूपा च दण्डनाथा महोज्ज्वला ॥ १ ॥ हलायुधा हर्षदात्री हलनिर्भिन्नशात्रवा । भक्तार्तितापशमनी मुसलायुधशोभिनी ॥ २ ॥ कुर्वन्ती कारयन्ती च कर्ममालातरङ्गिणी । कामप्रदा भगवती भक्तशत्रुविनाशिनी ॥ ३ ॥ उग्ररूपा महादेवी स्वप्नानुग्रहदायिनी । कोलास्या चन्द्रचूडा च त्रिनेत्रा हयवाहना ॥ ४ ॥ पाशहस्ता शक्तिपाणिः मुद्गरायुधधारिणि । हस्ताङ्कुशा ज्वलन्नेत्रा चतुर्बाहुसमन्विता ॥ ५ ॥ विद्युद्वर्णा वह्निनेत्रा शत्रुवर्गविनाशिनी । करवीरप्रिया माता बिल्वार्चनवरप्रदा ॥ ६ ॥ वार्ताली चैव वाराही वराहास्या वरप्रदा । अन्धिनी रुन्धिनी चैव जम्भिनी मोहिनी तथा ॥ ७ ॥ स्तम्भिनी चेतिविख्याता देव्यष्टकविराजिता । उग्ररूपा महादेवी महावीरा महाद्युतिः ॥ ८ ॥ किरातरूपा सर्वेशी अन्तःशत्रुविनाशिनी । परिणामक्रमा वीरा परिपाकस्वरूपिणी ॥ ९ ॥ नीलोत्पलतिलैः प्रीता शक्तिषोडशसेविता । नारिकेलोदक प्रीता शुद्धोदक समादरा ॥ १० ॥ उच्चाटनी तदीशी च शोषणी शोषणेश्वरी । मारणी मारणेशी च भीषणी भीषणेश्वरी ॥ ११ ॥ त्रासनी त्रासनेशी च कम्पनी कम्पनीश्वरी । आज्ञाविवर्तिनी पश्चादाज्ञाविवर्तिनीश्वरी ॥ १२ ॥ वस्तुजातेश्वरी चाथ सर्वसम्पादनीश्वरी । निग्रहानुग्रहदक्षा च भक्तवात्सल्यशोभिनी ॥ १३ ॥ किरातस्वप्नरूपा च बहुधाभक्तरक्षिणी । वशङ्करी मन्त्ररूपा हुम्बीजेनसमन्विता ॥ १४ ॥ रंशक्तिः क्लीं कीलका च सर्वशत्रुविनाशिनी । जपध्यानसमाराध्या होमतर्पणतर्पिता ॥ १५ ॥ दंष्ट्राकरालवदना विकृतास्या महारवा । ऊर्ध्वकेशी चोग्रधरा सोमसूर्याग्निलोचना ॥ १६ ॥ रौद्रीशक्तिः पराव्यक्ता चेश्वरी परदेवता । विधिविष्णुशिवाद्यर्च्या मृत्युभीत्यपनोदिनी ॥ १७ ॥ जितरम्भोरुयुगला रिपुसंहारताण्डवा । भक्तरक्षणसंलग्ना शत्रुकर्मविनाशिनी ॥ १८ ॥ तार्क्ष्यारूढा सुवर्णाभा शत्रुमारणकारिणी । अश्वारूढा रक्तवर्णा रक्तवस्त्राद्यलङ्कृता ॥ १९ ॥ जनवश्यकरी माता भक्तानुग्रहदायिनी । दंष्ट्राधृतधरा देवी प्राणवायुप्रदा सदा ॥ २० ॥ दूर्वास्या भूप्रदा चापि सर्वाभीष्टफलप्रदा । त्रिलोचनऋषिप्रीता पञ्चमी परमेश्वरी । सेनाधिकारिणी चोग्रा वाराही च शुभप्रदा ॥ २१ ॥ ॥ इति श्री वाराही अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री वाराही अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र — विस्तृत परिचय

श्री वाराही अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Varahi Ashtottara Shatanama Stotram) माँ वाराही के 108 दिव्य नामों का एक अत्यंत शक्तिशाली और व्यावहारिक स्तोत्र है। जहाँ सहस्रनाम स्तोत्र (1000 नाम, 120 श्लोक) अत्यंत लंबा है और विशेष अवसरों पर पढ़ा जाता है, वहीं यह 21 श्लोकों का संक्षिप्त किन्तु शक्तिशाली स्तोत्र नित्य पाठ के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। इसमें देवी के सबसे प्रभावशाली 108 नामों को अनुष्टुप् छन्द में गूंथा गया है — प्रत्येक नाम देवी की एक विशिष्ट शक्ति, गुण या कार्य-क्षेत्र को दर्शाता है।

इस स्तोत्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह वाराही की सम्पूर्ण शक्ति-सरणी को एक ही स्तोत्र में प्रस्तुत करता है। प्रथम श्लोक में ही देवी को किरिचक्ररथारूढा (किरि-चक्र रथ पर आरूढ), शत्रुसंहारकारिणी (शत्रुओं की विनाशिनी), क्रियाशक्तिस्वरूपा (क्रिया-शक्ति का साक्षात् स्वरूप) और दण्डनाथा (सेना की सेनापति, दण्ड देने वाली) कहा गया है। "दण्डनाथा" नाम विशेष महत्वपूर्ण है — श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी की दिव्य सेना में वाराही दण्डनायिका (Commander-in-Chief) हैं। ये शत्रुओं को दण्ड देती हैं और भक्तों की रक्षा करती हैं।

श्लोक 4 में देवी को स्वप्नानुग्रहदायिनी कहा गया है — ये सच्चे भक्तों को रात्रि में स्वप्न के माध्यम से समस्याओं का समाधान, भविष्य के संकेत और जीवन का मार्गदर्शन देती हैं। इसी श्लोक में उन्हें कोलास्या (वराह-मुख), चन्द्रचूडा (चन्द्रमा मस्तक पर), त्रिनेत्रा (तीन नेत्र) और हयवाहना (अश्व-वाहिनी) भी कहा गया है — यह रूप-वर्णन साधक के ध्यान (Visualization) के लिए अत्यंत सहायक है।

श्लोक 7-8 में अष्टशक्तियाँ (आठ शक्तियाँ) वर्णित हैं — अन्धिनी (अंधा करने वाली), रुन्धिनी (रोकने वाली), जम्भिनी (जम्भाई देने वाली/मूर्च्छित करने वाली), मोहिनी (मोहित करने वाली), स्तम्भिनी (स्तम्भित करने वाली)। ये पाँचों शक्तियाँ शत्रु को अंधा → रोका → मूर्च्छित → मोहित → जड़ करने का क्रमिक प्रभाव दर्शाती हैं। श्लोक 11-12 में षट्कर्म शक्तियाँ हैं — उच्चाटनी, शोषणी, मारणी, भीषणी, त्रासनी, कम्पनी और उनकी ईश्वरी शक्तियाँ। ये तांत्रिक षट्कर्म (छह क्रियाएँ) की अधिष्ठात्री देवियाँ हैं।

श्लोक 17 में देवी को मृत्युभीत्यपनोदिनी कहा गया है — मृत्यु के भय को दूर करने वाली। इसी श्लोक में उन्हें विधिविष्णुशिवाद्यर्च्या (ब्रह्मा, विष्णु और शिव द्वारा भी पूजित) और परदेवता (सर्वोच्च देवता) कहा गया है। अंतिम श्लोक 21 में सर्वाभीष्टफलप्रदा (सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली), पञ्चमी (पंचमी तिथि की अधिष्ठात्री) और सेनाधिकारिणी (सेना की अधिकारिणी) कहकर स्तोत्र की पूर्णाहुति होती है।

विशेष: यह स्तोत्र वाराही उपासना का सर्वाधिक व्यावहारिक रूप है। 21 श्लोकों में 108 नाम — नित्य पाठ में केवल 10-15 मिनट। सहस्रनाम का समय न हो तो यही स्तोत्र नित्य पढ़ें। इसमें अष्टशक्तियाँ, षट्कर्म, भय मुक्ति, स्वप्न सिद्धि और सर्वकामना पूर्ति — सब एक ही स्तोत्र में।

स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ (Benefits)

1. शत्रु नाश और विजय: प्रथम श्लोक — "शत्रुसंहारकारिणी", श्लोक 18 — "रिपुसंहारताण्डवा"। नियमित पाठ से बाहरी शत्रु (विरोधी, प्रतिद्वंद्वी) और आंतरिक शत्रु (काम, क्रोध, भय) दोनों का नाश होता है। मुकदमों और विवादों में विजय मिलती है।

2. मृत्यु-भय मुक्ति: श्लोक 17 — "मृत्युभीत्यपनोदिनी"। मृत्यु का भय, अज्ञात संकटों का डर, रोग-भय — सब दूर होता है। जीवन में निर्भयता आती है।

3. स्वप्न में मार्गदर्शन: श्लोक 4 — "स्वप्नानुग्रहदायिनी"। रात्रि पाठ से देवी स्वप्न में प्रकट होकर समस्याओं का समाधान और भविष्य का मार्गदर्शन देती हैं।

4. सर्व कामना पूर्ति: श्लोक 21 — "सर्वाभीष्टफलप्रदा"। धन, विद्या, सन्तान, यश, पद — सभी इच्छाओं की पूर्ति। "कामप्रदा भगवती" (श्लोक 3) — सभी कामनाएं देने वाली।

5. वशीकरण और आकर्षण: श्लोक 20 — "जनवश्यकरी माता"। लोगों का स्नेह, अधिकारियों की कृपा, समाज में प्रतिष्ठा और सम्बन्धों में मधुरता प्राप्त होती है।

पाठ विधि (Recitation Method)

समय: वाराही साधना के लिए रात्रि काल (रात 8 बजे के बाद) सर्वोत्तम। पंचमी, अष्टमी, अमावस्या और मंगलवार/शुक्रवार की रात्रि विशेष फलदायी। ब्रह्म मुहूर्त भी उत्तम।

आसन और दिशा: लाल आसन पर बैठें। धन/शांति — पूर्व या उत्तर मुख। शत्रु नाश — दक्षिण मुख। लाल वस्त्र धारण करें।

पूजन सामग्री: देवी को रक्त-पुष्प (गुड़हल/गुलाब), कुमकुम, सिंदूर और अनार या गुड़ का नैवेद्य अर्पित करें। नारियल पानी भी प्रिय है (श्लोक 10 — "नारिकेलोदक प्रीता")।

पाठ संख्या: नित्य पाठ — 1 बार। विशेष कामना — 11 या 21 बार। 41 दिनों का अनुष्ठान सर्वोत्तम। पाठ के बाद कुछ क्षण मौन रहें।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री वाराही अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् क्या है?

माँ वाराही के 108 दिव्य नामों का स्तोत्र। 21 श्लोकों में देवी के शत्रुसंहारकारिणी, दण्डनाथा, स्वप्नानुग्रहदायिनी, मृत्युभीत्यपनोदिनी और सर्वाभीष्टफलप्रदा जैसे रूपों की स्तुति। नित्य पाठ के लिए सर्वाधिक उपयुक्त।

2. क्या यह स्तोत्र और नामावली एक ही हैं?

नहीं। नामावली में 108 नाम मंत्र रूप (ॐ...नमः) में होते हैं जो अर्चन/पूजा के लिए हैं। यह स्तोत्र है — वही नाम श्लोकों में पिरोए गए हैं, जो निरंतर पाठ (Recitation) के लिए उत्तम है।

3. फलश्रुति में क्या लाभ हैं?

शत्रु नाश (शत्रुसंहारकारिणी), भय मुक्ति (मृत्युभीत्यपनोदिनी), स्वप्न मार्गदर्शन (स्वप्नानुग्रहदायिनी), सर्व कामना पूर्ति (सर्वाभीष्टफलप्रदा), वशीकरण (जनवश्यकरी) और तांत्रिक रक्षा।

4. यह सहस्रनाम से कैसे अलग है?

सहस्रनाम में 1000 नाम हैं (120 श्लोक, उड्डामर तंत्र से)। यह अष्टोत्तरशतनाम — 108 नाम केवल 21 श्लोकों में। छोटा, सुगम और नित्य पाठ के लिए आदर्श। 10-15 मिनट में पूर्ण हो जाता है।

5. कब पाठ करें?

रात्रि काल (8 बजे के बाद) सर्वोत्तम — वाराही रात्रि की देवी हैं। पंचमी, अष्टमी, अमावस्या और मंगलवार/शुक्रवार विशेष फलदायी। ब्रह्म मुहूर्त भी उत्तम।

6. क्या बिना दीक्षा पढ़ सकते हैं?

हाँ, यह भक्ति स्तोत्र है — सामान्य श्रद्धा और शुद्धता से पढ़ा जा सकता है। विशेष काम्य प्रयोग (Specific wish fulfillment) या तांत्रिक साधना के लिए गुरु मार्गदर्शन श्रेयस्कर है।

7. 108 नामों में प्रमुख शक्तियाँ कौन-सी हैं?

अष्टशक्तियाँ (श्लोक 7-8): अन्धिनी, रुन्धिनी, जम्भिनी, मोहिनी, स्तम्भिनी — शत्रु को अंधा→रोका→मूर्च्छित→मोहित→जड़ करें। षट्कर्म शक्तियाँ (श्लोक 11-12): उच्चाटनी, शोषणी, मारणी, भीषणी, त्रासनी, कम्पनी।

8. आसन और दिशा क्या रखें?

लाल आसन, लाल वस्त्र। धन/शांति — पूर्व या उत्तर मुख। शत्रु नाश — दक्षिण मुख। रक्त-पुष्प (गुड़हल/गुलाब), कुमकुम, सिंदूर और अनार/गुड़ का भोग अर्पित करें।

9. दण्डनाथा का क्या अर्थ है?

दण्डनाथा = देवी सेना की सेनापति। श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी की दिव्य सेना में वाराही दण्डनायिका (Commander-in-Chief) हैं। ये आज्ञा देती हैं, शत्रुओं को दण्डित करती हैं और भक्तों की विशेष रक्षा करती हैं।

10. स्वप्न में मार्गदर्शन कैसे मिलता है?

श्लोक 4 — "स्वप्नानुग्रहदायिनी"। रात्रि पाठ करें और मन में प्रश्न/समस्या रखकर सोएं। देवी सच्चे भक्तों को स्वप्न में प्रकट होकर समस्याओं का समाधान, भविष्य के संकेत और जीवन का मार्गदर्शन देती हैं।