Sri Tripurasundari Shatanamavali (Kalivilasa Tantra) – श्रीत्रिपुरसुन्दर्याः शतनामावलिः

॥ श्रीत्रिपुरसुन्दर्याः शतनामावलिः ॥
(कालीविलासतन्त्रम्)
श्रीदेव्युवाच -
महात्रिपुरसुन्दर्याः शतनामानि साम्प्रतम् ।
कथ्यन्तां मे दयानाथ यद्यप्यस्ति तदा मयि ॥ १॥
श्रीतामस उवाच -
शृणु चार्वङ्गि वक्ष्यामि सावधानावधारय ।
यन्नोक्तं सर्वतन्त्रेषु अधुना निगदामि ते ॥ २॥
अस्य श्रीत्रिपुरसुन्दरीशतनामस्तोत्रस्य
परम्ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि ।
गायत्री छन्दसे नमः मुखे ।
श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी देवतायै नमः हृदये ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगाय नमः सर्वाङ्गेषु ।
ॐ महामायायै नमः ।
ॐ महादेव्यै नमः ।
ॐ मेनकायै नमः ।
ॐ मेघगर्जिन्यै नमः ।
ॐ मोहिन्यै नमः ।
ॐ हरिणाक्ष्यै नमः ।
ॐ हारिण्यै नमः ।
ॐ हरवलभायै नमः ।
ॐ हरिपूज्यायै नमः ।
ॐ हराराध्यायै नमः । १०
ॐ हेरायै नमः ।
ॐ हेमवत्यै नमः ।
ॐ हरायै नमः ।
ॐ हेमरूपायै नमः ।
ॐ हेमायै नमः ।
ॐ हेमाभरणभूषितायै नमः ।
ॐ रङ्गिण्यै नमः ।
ॐ रङ्गरूपायै नमः ।
ॐ राधायै नमः ।
ॐ वृन्दावनेश्वर्यै नमः । २०
ॐ वलायै नमः ।
ॐ वलवत्यै नमः ।
ॐ बालायै नमः ।
ॐ बालिकायै नमः ।
ॐ वेशधारिण्यै नमः ।
ॐ वयस्थायै नमः ।
ॐ वेशधायै नमः ।
ॐ विद्यायै नमः ।
ॐ श्रीविष्णुपूजितायै नमः ।
ॐ वियद्गङ्गायै नमः । ३०
ॐ व्योमगङ्गायै नमः ।
ॐ विशालायै नमः ।
ॐ विश्वमोहिन्यै नमः ।
ॐ रङ्गिण्यै नमः ।
ॐ रङ्गणीयायै नमः ।
ॐ रणभूमिकृतालयायै नमः ।
ॐ पूतायै नमः ।
ॐ पवित्रायै नमः ।
ॐ परमायै नमः ।
ॐ परायै नमः । ४०
ॐ पुण्यायै नमः ।
ॐ विभूषणायै नमः ।
ॐ पुण्यनाम्न्यै नमः ।
ॐ पापहन्त्र्यै नमः ।
ॐ पापारये नमः ।
ॐ पापनाशिन्यै नमः ।
ॐ पुण्यदायै नमः ।
ॐ पुण्यकीर्तये नमः ।
ॐ पुण्यश्लोकायै नमः ।
ॐ पावन्यै नमः । ५०
ॐ रूपमालायै नमः ।
ॐ रुपवत्यै नमः ।
ॐ रसायै नमः ।
ॐ वेशपरिच्छ्दायै नमः ।
ॐ रक्षण्यै नमः ।
ॐ रक्षणीयायै नमः ।
ॐ रुक्ममाला-विभूषणायै नमः ।
ॐ रसरूपायै नमः ।
ॐ रसोल्लासायै नमः ।
ॐ रसायै नमः । ६०
ॐ अनघपरिच्छदायै नमः ।
ॐ रम्भायै नमः ।
ॐ रामायै नमः ।
ॐ रम्यायै नमः ।
ॐ रमण्यै नमः ।
ॐ रामपूजितायै नमः ।
ॐ सौभाग्यायै नमः ।
ॐ सुवेशायै नमः ।
ॐ साध्वयै नमः ।
ॐ सत्यायै नमः । ७०
ॐ सत्यस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ त्रिगुणायै नमः ।
ॐ त्रिगुणाराध्यायै नमः ।
ॐ त्रिवेद्यै नमः ।
ॐ त्रिगुणेश्वर्यै नमः ।
ॐ त्रिमूर्तये नमः ।
ॐ त्रिदशाराध्यायै नमः ।
ॐ त्रय्यै नमः ।
ॐ त्रिदिवसुन्दर्यै नमः ।
ॐ सुखदायै नमः । ८०
ॐ सुमुख्यै नमः ।
ॐ सुभ्रुवे नमः ।
ॐ सुवेशायै नमः ।
ॐ वेशधारिण्यै नमः ।
ॐ आनन्दायै नमः ।
ॐ नन्दिन्यै नमः ।
ॐ नन्दायै नमः ।
ॐ परमानन्दरूपिण्यै नमः ।
ॐ ईश्वर्यै नमः ।
ॐ ईश्वराराध्यायै नमः । ९०
ॐ रक्तपद्मसमप्रभायै नमः ।
ॐ राकायै नमः ।
ॐ रम्यायै नमः ।
ॐ रक्तदेहायै नमः ।
ॐ रमण्यै नमः ।
ॐ ब्रह्मणे नमः ।
ॐ मोहिन्यै नमः ।
ॐ योगिनीनां स्वरूपायै नमः ।
ॐ ब्रह्माण्डजनन्यै नमः ।
ॐ परायै नमः । १००
॥ इति श्रीकालीविलासतन्त्रे एकादश पटले श्रीत्रिपुरसुन्दरी शतनामस्तोत्रोधृता शतनामावलिः समाप्ता ॥
संलिखित ग्रंथ
श्रीत्रिपुरसुन्दर्याः शतनामावलिः का परिचय (Introduction)
श्रीत्रिपुरसुन्दर्याः शतनामावलिः (Sri Tripurasundari Shatanamavali) शाक्त तंत्र का एक अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमयी पाठ है। सामान्यतः देवी-देवताओं के 108 नाम (अष्टोत्तर शतनाम) या 1000 नाम (सहस्रनाम) अधिक प्रचलित होते हैं, परंतु तंत्र शास्त्रों में 100 नामों की 'शतनामावली' का अपना एक विशेष, गुह्य और अचूक प्रभाव माना गया है। यह विशिष्ट नामावली प्रसिद्ध तांत्रिक ग्रंथ 'कालीविलास तन्त्रम्' (Kalivilasa Tantra) के एकादश (11वें) पटल से उद्धृत है।
इस नामावली का आरंभ एक दिव्य संवाद से होता है। देवी पार्वती (श्रीदेव्युवाच) भगवान शिव (जिन्हें यहाँ 'श्रीतामस' अर्थात् तमोगुण के अधिष्ठाता और तंत्र के प्रणेता के रूप में संबोधित किया गया है) से प्रार्थना करती हैं— "हे दयानाथ! यदि मुझ पर आपकी कृपा है, तो मुझे महात्रिपुरसुन्दरी के सौ नामों का उपदेश दें।" इसके उत्तर में भगवान शिव कहते हैं कि "हे चार्वङ्गि! सावधान होकर सुनो, जो रहस्य मैंने सभी तंत्रों में गुप्त रखा है (यन्नोक्तं सर्वतन्त्रेषु), वह मैं अब तुम्हें बताता हूँ।" यह संवाद इस नामावली की गोपनीयता और अपार शक्ति को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है।
इस नामावली की सबसे आश्चर्यजनक और अद्वितीय बात इसका स्वरूप है। कालीविलास तंत्र एक ऐसा ग्रंथ है जो शाक्त परम्परा (विशेषकर काली और त्रिपुरसुन्दरी) और वैष्णव परम्परा (कृष्ण और राधा) के बीच एक गहरा अद्वैत रहस्य स्थापित करता है। यही कारण है कि इस नामावली में माँ त्रिपुरसुन्दरी को 'राधायै नमः' (राधा स्वरूपा) और 'वृन्दावनेश्वर्यै नमः' (वृंदावन की ईश्वरी) कहकर पूजा गया है। जो साधक देवी के नामों का गहराई से अध्ययन करते हैं, उनके लिए यह नामावली एक आध्यात्मिक खजाने के समान है, जहाँ 'हरिपूज्यायै' (भगवान विष्णु द्वारा पूजित) और 'रामपूजितायै' (भगवान राम द्वारा पूजित) जैसे नाम यह सिद्ध करते हैं कि देवी त्रिपुरसुन्दरी ही संपूर्ण ब्रह्मांड की परम सत्ता हैं।
विनियोग में स्पष्ट किया गया है कि इस स्तोत्र के ऋषि स्वयं 'परम्ब्रह्म' हैं, इसका छन्द 'गायत्री' है, और इसका मुख्य उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (चतुर्वर्ग) की प्राप्ति है। इन 100 नामों का प्रत्येक 'ॐ' और 'नमः' के साथ उच्चारण साधक के भीतर सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करता है और उसे परमानंद की अनुभूति कराता है।
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance)
कालीविलास तंत्र से ली गई इस शतनामावली का तांत्रिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है। इसमें देवी के सगुण और निर्गुण, दोनों स्वरूपों का अत्यंत मधुर वर्णन है। यह नामावली इस बात का प्रमाण है कि परम सत्ता एक ही है, जिसे विभिन्न रूपों में पूजा जाता है।
वैष्णव और शाक्त एकीकरण: इस नामावली में नाम क्रमांक 19 'राधायै नमः' और क्रमांक 20 'वृन्दावनेश्वर्यै नमः' आते हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार, राधा और त्रिपुरसुन्दरी में कोई भेद नहीं है; दोनों ही परम आह्लादिनी और प्रेम स्वरूपा शक्तियां हैं। इसी प्रकार 'हरिपूज्यायै' (विष्णु द्वारा पूजित) और 'रामपूजितायै' नाम यह स्पष्ट करते हैं कि वैष्णव अवतार भी देवी की शक्ति से ही अपने महान कार्यों को संपन्न करते हैं।
त्रिगुणात्मक और ब्रह्म स्वरूप: नाम क्रमांक 72 से 77 तक देवी को 'त्रिगुणायै', 'त्रिवेद्यै', 'त्रिमूर्तये' कहा गया है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिगुणात्मक शक्ति का प्रतीक है। वहीं अंत में (नाम 96 और 100) उन्हें 'ब्रह्मणे नमः' (स्वयं ब्रह्म) और 'परायै नमः' (सर्वोच्च सत्ता) कहा गया है। यह सिद्ध करता है कि त्रिपुरसुन्दरी ही वह मूल शक्ति हैं जिनसे यह संपूर्ण ब्रह्मांड प्रकट होता है।
फलश्रुति और लाभ (Benefits of the Shatanamavali)
इस 100 नामों की नामावली के नियमित जप और अर्चना (फूल या कुमकुम चढ़ाने) से साधक को जीवन के हर क्षेत्र में अकल्पनीय लाभ प्राप्त होते हैं:
- चतुर्वर्ग की प्राप्ति: जैसा कि इसके विनियोग में उल्लेख है— 'धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगाय'। यह नामावली मनुष्य जीवन के चारों लक्ष्यों (धर्म, धन, इच्छापूर्ति और मोक्ष) को एक साथ प्रदान करने में सक्षम है।
- समस्त पापों का नाश: नाम 45 से 47 (पापहन्त्र्यै, पापारये, पापनाशिन्यै) के अनुसार, इसका पाठ जन्म-जन्मांतर के संचित पापों, कर्म-बंधनों और नकारात्मक ऊर्जाओं को जड़ से नष्ट कर देता है।
- सौभाग्य और आकर्षण: देवी को 'रूपमालायै', 'सौभाग्यायै', 'मोहिन्यै' और 'विश्वमोहिन्यै' कहा गया है। इसके जप से साधक का व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक हो जाता है और जीवन में अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
- परमानंद की अनुभूति: नाम 85 से 88 (आनन्दायै, नन्दिन्यै, परमानन्दरूपिण्यै) स्पष्ट करते हैं कि मानसिक अवसाद, दुःख और चिंताओं को दूर कर यह पाठ साधक को आंतरिक शांति और परमानंद से भर देता है।
- तीर्थों के समान फल: देवी को 'वियद्गङ्गायै' (आकाश गंगा) और 'पुण्यायै' कहा गया है। इन 100 नामों का पाठ सभी तीर्थों में स्नान करने और दान देने के बराबर पुण्य प्रदान करता है।
पाठ विधि और अर्चना (Ritual Method for Archana)
नामावली (Names ending with Namah) का उपयोग मुख्य रूप से 'अर्चना' (Archana) अर्थात् पूजा के समय फूल या कुमकुम अर्पित करने के लिए किया जाता है।
- स्नान और शुद्धि: प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (लाल, गुलाबी या पीले) धारण करें।
- आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल ऊनी या रेशमी आसन पर बैठें।
- सामग्री: अपने सामने एक ताम्रपात्र में कुमकुम (रोली), अक्षत (साबुत चावल), और ताजे लाल पुष्प (गुड़हल, गुलाब या कमल) रख लें।
- संकल्प और विनियोग: घी का दीपक प्रज्वलित करें। हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करते हुए विनियोग पढ़ें (अस्य श्रीत्रिपुरसुन्दरीशतनामस्तोत्रस्य...) और जल भूमि पर छोड़ दें।
- अर्चना विधि: "ॐ महामायायै नमः" से आरंभ करते हुए प्रत्येक नाम का उच्चारण करें। हर नाम के अंत में ('नमः' बोलते समय) अपनी मध्यमा और अनामिका उंगली तथा अंगूठे की सहायता से थोड़ा सा कुमकुम, अक्षत या एक पुष्प श्रीयंत्र अथवा माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी के चित्र के चरणों में अर्पित करें।
- पूर्णता: 100 नाम पूरे होने पर (ॐ परायै नमः के बाद) माता को साष्टांग प्रणाम करें और क्षमा प्रार्थना कर अपनी पूजा समर्पित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्रीत्रिपुरसुन्दर्याः शतनामावलिः किस ग्रंथ से ली गई है?
यह अत्यंत विशिष्ट और गोपनीय नामावली प्रसिद्ध तांत्रिक ग्रंथ 'कालीविलास तन्त्रम्' के एकादश (11वें) पटल से उद्धृत है।
2. 'शतनामावली' और 'अष्टोत्तर शतनामावली' में क्या अंतर है?
'अष्टोत्तर शतनामावली' में देवी के 108 नाम होते हैं, जबकि 'शतनामावली' में पूरे 100 नाम होते हैं। तंत्र शास्त्रों में 100 नामों के जप का अपना एक विशेष, गुह्य और तीव्र प्रभाव माना गया है।
3. इस नामावली में देवी को 'राधा' क्यों कहा गया है?
कालीविलास तंत्र शाक्त (काली/त्रिपुरसुन्दरी) और वैष्णव (कृष्ण/राधा) परम्पराओं का अद्वैत संगम है। तंत्र के अनुसार, जो शक्ति वृंदावन में 'राधा' के रूप में प्रेम का संचार करती है, वही शक्ति ब्रह्मांड में 'त्रिपुरसुन्दरी' के रूप में व्याप्त है। इसलिए इसमें 'राधायै नमः' और 'वृन्दावनेश्वर्यै नमः' नाम आए हैं।
4. इस नामावली के आरंभ में 'श्रीतामस उवाच' का क्या अर्थ है?
यहाँ 'श्रीतामस' भगवान शिव का ही एक तांत्रिक रूप है। भगवान शिव ही तंत्र के आदि उपदेशक हैं। उन्होंने ही देवी के प्रश्न करने पर इस गुप्त 100 नामों की महिमा का वर्णन किया है।
5. नामावली का पाठ करने का सबसे सही तरीका क्या है?
नामावली का सर्वोत्तम उपयोग 'अर्चना' (पूजा) के लिए होता है। प्रत्येक नाम ('ॐ... नमः') का उच्चारण करते हुए श्रीयंत्र या देवी की प्रतिमा पर कुमकुम, अक्षत या पुष्प अर्पित करना सबसे श्रेष्ठ तरीका है।
6. क्या मैं इसका पाठ बिना कुमकुम या फूल चढ़ाए कर सकता हूँ?
जी हाँ। यदि आपके पास सामग्री या समय का अभाव है, तो आप एकांत में बैठकर मानसिक रूप से (आँखें बंद करके) केवल इन 100 नामों का जप भी कर सकते हैं। यह भी पूर्ण फलदायी है।
7. इस पाठ का मुख्य फल क्या बताया गया है?
इसके विनियोग में स्पष्ट लिखा है— "धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगाय"। इसका मुख्य फल जीवन के चारों पुरुषार्थों (धर्म, धन, सुख और मोक्ष) की एक साथ प्राप्ति है।
8. 'पापहन्त्र्यै' और 'पापनाशिन्यै' नामों का क्या महत्व है?
ये नाम दर्शाते हैं कि देवी त्रिपुरसुन्दरी केवल धन या शक्ति ही नहीं देतीं, बल्कि वे साधक के संचित पापों, दोषों और बुरे कर्मों के बंधनों को पूरी तरह से काटकर उसे पवित्र कर देती हैं।
9. क्या पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियाँ भी इसका पाठ कर सकती हैं?
बिल्कुल। माता त्रिपुरसुन्दरी की आराधना सभी के लिए है। स्त्रियाँ भी अखंड सौभाग्य, सुख-शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए इन 100 नामों का नित्य जप या अर्चना कर सकती हैं।
10. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?
यद्यपि देवी के नामों का जप प्रतिदिन किया जा सकता है, परंतु शुक्रवार का दिन, पूर्णिमा तिथि, और गुप्त नवरात्रि के दिन इन 100 नामों के पाठ और कुमकुम अर्चना के लिए सर्वाधिक उत्तम और शीघ्र फलदायी माने गए हैं।