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Sri Tripurasundari Chakraraja Stotram – श्रीत्रिपुरसुन्दरीचक्रराजस्तोत्रम्

Sri Tripurasundari Chakraraja Stotram – श्रीत्रिपुरसुन्दरीचक्रराजस्तोत्रम्
॥ श्रीत्रिपुरसुन्दरीचक्रराजस्तोत्रम् ॥ श्रीत्रिपुरसुन्दरी मूलमन्त्रात्मकः चक्रराजस्तवः श्रीगणेशाय नमः । ॥ क ॥ कर्तुं देवि ! जगद्-विलास-विधिना सृष्टेन ते मायया सर्वानन्द-मयेन मध्य-विलसच्छ्री-विनदुनाऽलङ्कृतम् । श्रीमद्-सद्-गुरु-पूज्य-पाद-करुणा-संवेद्य-तत्त्वात्मकं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ १॥ ॥ ए ॥ एकस्मिन्नणिमादिभिर्विलसितं भूमी-गृहे सिद्धिभिः वाह्याद्याभिरुपाश्रितं च दशभिर्मुद्राभिरुद्भासितम् । चक्रेश्या प्रकतेड्यया त्रिपुरया त्रैलोक्य-सम्मोहनं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ २॥ ॥ ई ॥ ईड्याभिर्नव-विद्रुम-च्छवि-समाभिख्याभिरङ्गी-कृतं कामाकर्षिणी कादिभिः स्वर-दले गुप्ताभिधाभिः सदा । सर्वाशा-परि-पूरके परि-लसद्-देव्या पुरेश्या युतं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ ३॥ ॥ ल ॥ लब्ध-प्रोज्ज्वल-यौवनाभिरभितोऽनङ्ग-प्रसूनादिभिः सेव्यं गुप्त-तराभिरष्ट-कमले सङ्क्षोभकाख्ये सदा । चक्रेश्या पुर-सुन्दरीति जगति प्रख्यातयासङ्गतं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ ४॥ ॥ ह्रीं ॥ ह्रीङ्काराङ्कित-मन्त्र-राज-निलयं श्रीसर्व-सङ्क्षोभिणी मुख्याभिश्चल-कुन्तलाभिरुषितं मन्वस्र-चक्रे शुभे । यत्र श्री-पुर-वासिनी विजयते श्री-सर्व-सौभाग्यदे श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ ५॥ ॥ ह ॥ हस्ते पाश-गदादि-शस्त्र-निचयं दीप्तं वहन्तीभिः उत्तीर्णाख्याभिरुपास्य पाति शुभदे सर्वार्थ-सिद्धि-प्रदे । चक्रे बाह्य-दशारके विलसितं देव्या पूर-श्र्याख्यया श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ ६॥ ॥ स ॥ सर्वज्ञादिभिरिनदु-कान्ति-धवला कालाभिरारक्षिते चक्रेऽन्तर्दश-कोणकेऽति-विमले नाम्ना च रक्षा-करे । यत्र श्रीत्रिपुर-मालिनी विजयते नित्यं निगर्भा स्तुता श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ ७॥ ॥ क ॥ कर्तुं मूकमनर्गल-स्रवदित-द्राक्षादि-वाग्-वैभवं दक्षाभिर्वशिनी-मुखाभिरभितो वाग्-देवताभिर्युताम् । अष्टारे पुर-सिद्धया विलसितं रोग-प्रणाशे शुभे श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ ८॥ ॥ ह ॥ हन्तुं दानव-सङ्घमाहव भुवि स्वेच्छा समाकल्पितैः शस्त्रैरस्त्र-चयैश्च चाप-निवहैरत्युग्र-तेजो-भरैः । आर्त-त्राण-परायणैररि-कुल-प्रध्वंसिभिः संवृतं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ ९॥ ॥ ल ॥ लक्ष्मी-वाग-गजादिभिः कर-लसत्-पाशासि-घण्टादिभिः कामेश्यादिभिरावृतं शुभ~ण्करं श्री-सर्व-सिद्धि-प्रदम् । चक्रेशी च पुराम्बिका विजयते यत्र त्रिकोणे मुदा श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ १०॥ ॥ ह्रीं ॥ ह्रीङ्कारं परमं जपद्भिरनिशं मित्रेश-नाथादिभिः दिव्यौघैर्मनुजौघ-सिद्ध-निवहैः सारूप्य-मुक्तिं गतैः । नाना-मन्त्र-रहस्य-विद्भिरखिलैरन्वासितं योगिभिः श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ ११॥ ॥ स ॥ सर्वोत्कृष्ट-वपुर्धराभिरभितो देवी समाभिर्जगत् संरक्षार्थमुपागताऽभिरसकृन्नित्याभिधाभिर्मुदा । कामेश्यादिभिराज्ञयैव ललिता-देव्याः समुद्भासितं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ १२॥ ॥ क ॥ कर्तुं श्रीललिताङ्ग-रक्षण-विधिं लावण्य-पूर्णां तनूं आस्थायास्त्र-वरोल्लसत्-कर-पयोजाताभिरध्यासितम् । देवीभिर्हृदयादिभिश्च परितो विन्दुं सदाऽऽनन्ददं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ १३॥ ॥ ल ॥ लक्ष्मीशादि-पदैर्युतेन महता मञ्चेन संशोभितं षट्-त्रिंशद्भिरनर्घ-रत्न-खचितैः सोपानकैर्भूषितम् । चिन्ता-रत्न-विनिर्मितेन महता सिंहासनेनोज्ज्वलं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ १४॥ ॥ ह्रीं ॥ ह्रीङ्कारैक-महा-मनुं प्रजपता कामेश्वरेणोषितं तस्याङ्के च निषण्णया त्रि-जगतां मात्रा चिदाकिरया । कामेश्या करुणा-रसैक-निधिना कल्याण-दात्र्या युतं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ १५॥ ॥ श्रीं ॥ श्रीमत्-पञ्च-दशाक्षरैक-निलयं श्रीषोडशी-मन्दिरं श्रीनाथादिभिरर्चितं च बहुधा देवैः समाराधितम् । श्रीकामेश-रहस्सखी-निलयनं श्रीमद्-गुहाराधितं श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम् ॥ १६॥

श्रीत्रिपुरसुन्दरीचक्रराजस्तोत्रम् का परिचय

श्रीत्रिपुरसुन्दरीचक्रराजस्तोत्रम्, जिसे 'चक्रराज स्तव' भी कहा जाता है, श्री विद्या परंपरा का एक अनमोल और रहस्यमय स्तोत्र है। यह स्तोत्र मात्र देवी की स्तुति नहीं, बल्कि स्वयं में एक गूढ़ मंत्रात्मक साधना है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी संरचना श्री विद्या के सर्वोच्च मंत्र, पञ्चदशी मंत्र (Panchadashi Mantra), के पंद्रह बीजाक्षरों पर आधारित है। स्तोत्र के प्रथम पंद्रह श्लोक पञ्चदशी मंत्र के क्रमशः एक-एक अक्षर (क, ए, ई, ल, ह्रीं...) से प्रारंभ होते हैं। सोलहवां और अंतिम श्लोक 'श्रीं' बीज से शुरू होता है, जो इसे षोडशी मंत्र (Shodashi Mantra) का स्वरूप भी प्रदान करता है। इस प्रकार, यह स्तोत्र देवी के मंत्रमय और यंत्रमय (श्रीचक्र) दोनों स्वरूपों को एकाकार कर देता है।

यह स्तोत्र साधक को श्रीचक्र के माध्यम से एक आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाता है। श्रीचक्र, जो नौ आवरणों (चक्रों) से निर्मित है, स्वयं ब्रह्मांड और मानव शरीर का प्रतीक है। स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक इन आवरणों की देवियों, उनकी शक्तियों और उनके महत्व का सूक्ष्मता से वर्णन करता है। यह यात्रा बाहरी आवरण 'भूपुर' से प्रारंभ होकर अंतरतम 'बिंदु' तक पहुँचती है, जहाँ शिव और शक्ति का शाश्वत मिलन है। साधक जब इन श्लोकों का पाठ करता है, तो वह केवल शब्द नहीं पढ़ता, बल्कि श्रीचक्र के प्रत्येक स्तर की ऊर्जा को जाग्रत और अनुभव करता है।

इसकी भाषा अत्यंत काव्यात्मक और गहन है, जो देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी के अनिंद्य सौंदर्य, उनकी करुणा और उनकी ब्रह्मांडीय शक्ति का चित्रण करती है। हर श्लोक का अंत "श्री-चक्रं शरणं व्रजामि सततं सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम्" पंक्ति से होता है, जिसका अर्थ है- "मैं उस श्रीचक्र की शरण में निरंतर जाता हूँ, जो सभी इच्छित सिद्धियों को प्रदान करने वाला है।" यह पंक्ति साधक के समर्पण भाव को दर्शाती है और श्रीचक्र को ही समस्त सिद्धियों का स्रोत मानती है। यह स्तोत्र गुरु-शिष्य परंपरा में अत्यंत गोपनीय माना जाता रहा है, क्योंकि यह केवल पाठ नहीं, बल्कि श्री विद्या के मूल तत्वों का कुंजी-ग्रंथ है।

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

चक्रराज स्तव का महत्व इसकी मंत्र-यंत्र-तंत्र की एकता में निहित है। यह श्री विद्या के तीन स्तंभों को एक साथ साधने का मार्ग प्रशस्त करता है।

  • मंत्रात्मक स्वरूप: पञ्चदशी मंत्र के अक्षरों से इसकी संरचना इसे स्वतः ही एक शक्तिशाली मंत्र बना देती है। इसका पाठ करने से पञ्चदशी मंत्र के जप का फल भी प्राप्त होता है।
  • यंत्रात्मक ध्यान: यह स्तोत्र श्रीचक्र के प्रत्येक आवरण और उसकी अधिष्ठात्री देवियों का वर्णन करता है, जिससे साधक मानसिक रूप से श्रीचक्र की पूजा (मानस पूजा) कर पाता है। यह ध्यान को गहरा करने और श्रीयंत्र के साथ तादात्म्य स्थापित करने में सहायक है।
  • तंत्रात्मक साधना: स्तोत्र में वर्णित देवियाँ (जैसे कामाकर्षिणी, वशिनी वाग्देवता) और सिद्धियाँ (अणिमा आदि) श्री विद्या की तंत्र साधना के अभिन्न अंग हैं। यह स्तोत्र उन शक्तियों का आह्वान करता है और साधक को उनकी कृपा का पात्र बनाता है।

श्लोक १ में स्पष्ट कहा गया है कि यह श्रीचक्र "श्रीमद्-सद्-गुरु-पूज्य-पाद-करुणा-संवेद्य-तत्त्वात्मकं" है, अर्थात इसका वास्तविक तत्व केवल सद्गुरु की कृपा से ही जाना जा सकता है। यह गुरु के महत्व को स्थापित करता है और बताता है कि श्री विद्या का ज्ञान केवल दीक्षित और योग्य साधकों को ही प्राप्त होता है। यह स्तोत्र साधक को भौतिक जगत के भ्रम से निकालकर आध्यात्मिक सत्य की ओर ले जाता है और अंततः उसे आत्म-साक्षात्कार कराता है।

फलश्रुति और लाभ

इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति "सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम्" कहकर स्वयं ही अपनी फलश्रुति की घोषणा करती है। इसका अर्थ है कि यह स्तोत्र साधक की सभी प्रकार की (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) कामनाओं को पूर्ण करने में सक्षम है। इसके नियमित पाठ से प्राप्त होने वाले कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:

  • समस्त कामनाओं की पूर्ति: यह स्तोत्र भौतिक समृद्धि, सामाजिक सम्मान, और व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिए एक अचूक साधन है।
  • त्रैलोक्य मोहन: श्लोक २ के अनुसार, यह त्रैलोक्य को मोहित करने की क्षमता प्रदान करता है, अर्थात साधक का व्यक्तित्व आकर्षक और प्रभावशाली बनता है।
  • रोगों का नाश: श्लोक ८ में इसे "रोग-प्रणाशे शुभे" कहा गया है, जो दर्शाता है कि इसके पाठ से शारीरिक और मानसिक रोगों का शमन होता है।
  • शत्रुओं पर विजय: श्लोक ९ में वर्णित है कि श्रीचक्र शत्रुओं का नाश करने वाले अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है, अतः इसका पाठ साधक को शत्रुओं से बचाता है और मुकदमों में विजय दिलाता है।
  • वाक् सिद्धि: श्लोक ८ में वशिनी आदि वाग्देवताओं का उल्लेख है, जो साधक को अद्भुत वाणी और ज्ञान प्रदान करती हैं, जिससे वह गूंगे को भी बोलने की क्षमता दे सकता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह स्तोत्र कुंडलिनी जागरण और चक्रों के भेदन में सहायक है, जिससे साधक को आध्यात्मिक अनुभूतियाँ होती हैं और वह मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
  • गुरु कृपा की प्राप्ति: इसका पाठ करने से सद्गुरु की कृपा सहज ही प्राप्त होती है, जिससे साधना के गूढ़ रहस्य स्वयं प्रकट होने लगते हैं।

पाठ विधि और विशेष अवसर

यह एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ पूरी श्रद्धा और शुद्धि के साथ करना चाहिए।

सामान्य विधि:

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त या संध्याकाल पाठ के लिए सर्वोत्तम समय है।
  • स्वच्छता: स्नान के बाद स्वच्छ, हल्के रंग के (विशेषकर लाल, गुलाबी या पीले) वस्त्र धारण करें।
  • आसन: कुश, ऊन या रेशम के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • पूजा: अपने सामने एक चौकी पर श्रीयंत्र या देवी त्रिपुरसुन्दरी का चित्र स्थापित करें। घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएं। देवी को लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल), कुमकुम और कोई मीठा भोग अर्पित करें।
  • संकल्प: हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करते हुए पाठ का संकल्प लें।
  • पाठ: शांत और एकाग्र मन से, स्पष्ट उच्चारण के साथ स्तोत्र का पाठ करें। पाठ की संख्या अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार (१, ३, ५, ११) रखें।

विशेष अवसर:

  • नवरात्रि: विशेषकर गुप्त नवरात्रि में इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है।
  • पूर्णिमा और अष्टमी: प्रत्येक माह की पूर्णिमा और अष्टमी तिथि को इसका पाठ करने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • शुक्रवार: शुक्रवार का दिन देवी को समर्पित है, इस दिन पाठ करने से भौतिक सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्रीचक्रराजस्तोत्रम् की मुख्य विशेषता क्या है?

इसकी मुख्य विशेषता इसका 'मंत्रात्मक' होना है। इसके 16 श्लोक श्री विद्या के पञ्चदशी और षोडशी मंत्र के 16 बीजाक्षरों पर आधारित हैं, जो इसे अत्यंत शक्तिशाली और गोपनीय बनाते हैं।

2. पञ्चदशी मंत्र क्या है?

पञ्चदशी मंत्र देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी का 15 अक्षरों का मूल मंत्र है। यह तीन खंडों (कूट) में विभाजित है और इसे श्री विद्या साधना का हृदय माना जाता है। यह स्तोत्र इसी मंत्र का काव्यात्मक विस्तार है।

3. 'सर्वेष्ट-सिद्धि-प्रदम्' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "सभी इच्छित सिद्धियों को प्रदान करने वाला।" यह पंक्ति बार-बार दोहराकर स्तोत्र यह आश्वासन देता है कि श्रीचक्र की शरण लेने से साधक की सभी भौतिक और आध्यात्मिक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

4. क्या कोई भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?

हाँ, कोई भी व्यक्ति जो देवी में श्रद्धा रखता है, शुद्ध मन से इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। हालांकि, इसकी गूढ़ साधना और अर्थ समझने के लिए श्री विद्या में दीक्षित गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है।

5. यह स्तोत्र श्रीचक्र के नौ आवरणों का वर्णन कैसे करता है?

प्रत्येक श्लोक श्रीचक्र के एक विशेष आवरण (चक्र) और उसकी शक्तियों का सांकेतिक वर्णन करता है। उदाहरण के लिए, श्लोक 2 'भूमी-गृहे' (भूपुर), श्लोक 3 'स्वर-दले' (षोडशदल कमल), श्लोक 4 'अष्ट-कमले' (अष्टदल कमल) आदि का उल्लेख करते हैं।

6. क्या इस पाठ के लिए श्रीयंत्र आवश्यक है?

यद्यपि अनिवार्य नहीं है, लेकिन पाठ के समय प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र को सामने रखने से एकाग्रता बढ़ती है और पाठ का प्रभाव कई गुना अधिक हो जाता है, क्योंकि यह स्तोत्र स्वयं श्रीयंत्र का ही शाब्दिक स्वरूप है।

7. स्तोत्र में 'क', 'ए', 'ई', 'ल', 'ह्रीं' जैसे अक्षरों का क्या महत्व है?

ये अक्षर साधारण वर्ण नहीं, बल्कि पञ्चदशी महामंत्र के बीजाक्षर हैं। प्रत्येक बीजाक्षर में ब्रह्मांड की विशेष शक्तियाँ निहित हैं। स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक उसी बीजाक्षर की शक्ति को विस्तार देता है।

8. 'ह्रीं' बीजाक्षर कई बार क्यों आता है?

पञ्चदशी मंत्र में 'ह्रीं' बीजाक्षर तीन बार आता है। यह माया बीज या शक्ति बीज कहलाता है और देवी की सृजन, पालन और संहार की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है। स्तोत्र में भी यह तीन बार आकर मंत्र की संरचना को दर्शाता है।

9. इस स्तोत्र और ललिता सहस्रनाम में क्या अंतर है?

ललिता सहस्रनाम देवी के 1000 नामों का संग्रह है जो उनके विभिन्न रूपों और लीलाओं का वर्णन करता है। जबकि, चक्रराज स्तोत्र अधिक गूढ़ और 'मंत्रात्मक' है, जो सीधे पञ्चदशी मंत्र और श्रीचक्र की संरचना पर केंद्रित है।

10. क्या यह स्तोत्र मोक्ष प्राप्ति में सहायक है?

निश्चित रूप से। श्लोक 11 में 'सारूप्य-मुक्तिं गतैः' का उल्लेख है, जो इंगित करता है कि इसका पाठ योगियों और सिद्धों द्वारा सारूप्य मुक्ति (भगवान के समान रूप प्राप्त करना) के लिए किया जाता है। यह भौतिक सुखों के साथ-साथ परम गति भी प्रदान करता है।

11. अंतिम श्लोक में 'श्रीं' का क्या महत्व है?

'श्रीं' लक्ष्मी का बीज मंत्र है और यह षोडशी (16 अक्षरों वाले) मंत्र का अंतिम अक्षर है। इसे स्तोत्र के अंत में जोड़ना पञ्चदशी को षोडशी में परिवर्तित करता है, जो श्री विद्या का सर्वोच्च और सबसे गोपनीय मंत्र है। यह परम ऐश्वर्य और पूर्णता का प्रतीक है।