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Sri Subrahmanya Shadakshara Ashtottara Shatanamavali - श्री सुब्रह्मण्य षडक्षराष्टोत्तरशतनामावली

Sri Subrahmanya Shadakshara Ashtottara Shatanamavali - श्री सुब्रह्मण्य षडक्षराष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री सुब्रह्मण्य षडक्षराष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॥ श-कार नामावलिः ॥ ॐ शरण्याय नमः । ॐ शर्वतनयाय नमः । ॐ शर्वाणीप्रियनन्दनाय नमः । ॐ शरकाननसम्भूताय नमः । ॐ शर्वरीशमुखाय नमः । ॐ शमाय नमः । ॐ शङ्कराय नमः । ॐ शरणत्रात्रे नमः । ॐ शशाङ्कमुकुटोज्ज्वलाय नमः । ॐ शर्मदाय नमः । ॐ शङ्खकण्ठाय नमः । ॐ शरकार्मुकहेतिभृते नमः । ॐ शक्तिधारिणे नमः । ॐ शक्तिकराय नमः । ॐ शतकोट्यर्कपाटलाय नमः । ॐ शमदाय नमः । ॐ शतरुद्रस्थाय नमः । ॐ शतमन्मथविग्रहाय नमः । ॥ र-कार नामावलिः ॥ ॐ रणाग्रण्ये नमः । ॐ रक्षणकृते नमः । ॐ रक्षोबलविमर्दनाय नमः । ॐ रहस्यज्ञाय नमः । ॐ रतिकराय नमः । ॐ रक्तचन्दनलेपनाय नमः । ॐ रत्नधारिणे नमः । ॐ रत्नभूषाय नमः । ॐ रत्नकुण्डलमण्डिताय नमः । ॐ रक्ताम्बराय नमः । ॐ रम्यमुखाय नमः । ॐ रविचन्द्राग्निलोचनाय नमः । ॐ रमाकलत्रजामात्रे नमः । ॐ रहस्याय नमः । ॐ रघुपूजिताय नमः । ॐ रसकोणान्तरालस्थाय नमः । ॐ रजोमूर्तये नमः । ॐ रतिप्रदाय नमः । ॥ व-कार नामावलिः ॥ ॐ वटुरूपाय नमः । ॐ वसन्तऋतुपूजिताय नमः । ॐ वलवैरिसुतानाथाय नमः । ॐ वनजाक्षाय नमः । ॐ वराकृतये नमः । ॐ वक्रतुण्डानुजाय नमः । ॐ वत्साय नमः । ॐ वरदाभयहस्तकाय नमः । ॐ वत्सलाय नमः । ॐ वर्षकाराय नमः । ॐ वसिष्ठादिप्रपूजिताय नमः । ॐ वणिग्रूपाय नमः । ॐ वरेण्याय नमः । ॐ वर्णाश्रमविधायकाय नमः । ॐ वरदाय नमः । ॐ वज्रभृद्वन्द्याय नमः । ॐ वन्दारुजनवत्सलाय नमः । ॐ वसुदाय नमः । ॥ ण-कार नामावलिः ॥ ॐ नकाररूपाय नमः । ॐ नलिनाय नमः । ॐ नकारयुतमन्त्रकाय नमः । ॐ नकारवर्णनिलयाय नमः । ॐ नन्दनाय नमः । ॐ नन्दिवन्दिताय नमः । ॐ नटेशपुत्राय नमः । ॐ नम्रभ्रुवे नमः । ॐ नक्षत्रग्रहनायकाय नमः । ॐ नगाग्रनिलयाय नमः । ॐ नम्याय नमः । ॐ नमद्भक्तफलप्रदाय नमः । ॐ नवनागाय नमः । ॐ नगहराय नमः । ॐ नवग्रहसुवन्दिताय नमः । ॐ नववीराग्रजाय नमः । ॐ नव्याय नमः । ॐ नमस्कारस्तुतिप्रियाय नमः । ॥ भ-कार नामावलिः ॥ ॐ भद्रप्रदाय नमः । ॐ भगवते नमः । ॐ भवारण्यदवानलाय नमः । ॐ भवोद्भवाय नमः । ॐ भद्रमूर्तये नमः । ॐ भर्त्सितासुरमण्डलाय नमः । ॐ भयापहाय नमः । ॐ भर्गरूपाय नमः । ॐ भक्ताभीष्टफलप्रदाय नमः । ॐ भक्तिगम्याय नमः । ॐ भक्तनिधये नमः । ॐ भयक्लेशविमोचनाय नमः । ॐ भरतागमसुप्रीताय नमः । ॐ भक्ताय नमः । ॐ भक्तार्तिभञ्जनाय नमः । ॐ भयकृते नमः । ॐ भरताराध्याय नमः । ॐ भरद्वाजऋषिस्तुताय नमः । ॥ व-कार नामावलिः ॥ ॐ वरुणाय नमः । ॐ वरुणाराध्याय नमः । ॐ वलारातिमुखस्तुताय नमः । ॐ वज्रशक्त्यायुधोपेताय नमः । ॐ वराय नमः । ॐ वक्षःस्थलोज्ज्वलाय नमः । ॐ वस्तुरूपाय नमः । ॐ वशिध्येयाय नमः । ॐ वलित्रयविराजिताय नमः । ॐ वक्रालकाय नमः । ॐ वलयधृते नमः । ॐ वलत्पीताम्बरोज्ज्वलाय नमः । ॐ वचोरूपाय नमः । ॐ वचनदाय नमः । ॐ वचोऽतीतचरित्रकाय नमः । ॐ वरदाय नमः । ॐ वश्यफलदाय नमः । ॐ वल्लीदेवीमनोहराय नमः । ॥ इति श्री सुब्रह्मण्य षडक्षराष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥

परिचय: श्री सुब्रह्मण्य षडक्षराष्टोत्तरशतनामावली (Detailed Introduction)

भगवान सुब्रह्मण्य, जिन्हें कार्तिकेय, मुरुगन और स्कन्द जैसे तेजस्वी नामों से जाना जाता है, शिव और शक्ति के सम्मिलित तेज का साक्षात् अवतार हैं। श्री सुब्रह्मण्य षडक्षराष्टोत्तरशतनामावली सुब्रह्मण्य उपासना की एक अत्यंत दुर्लभ और मंत्रमयी रचना है। इस नामावली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें १०८ नामों का संकलन भगवान सुब्रह्मण्य के अमोघ षडक्षर मंत्र 'श-र-व-ण-भ-व' (Sa-Ra-Va-Na-Bha-Va) के प्रत्येक बीज-अक्षर पर आधारित है। मंत्र के प्रत्येक अक्षर से १८ नामों का आरम्भ होता है, जो सुब्रह्मण्य के छह मुखों (षण्मुख) की ऊर्जा और उनकी दिव्य लीलाओं का बोध कराते हैं।
ऐतिहासिक एवं तांत्रिक आधार: स्कन्द पुराण और कुमार तंत्र के अनुसार, तारकासुर के संहार हेतु भगवान शिव के तृतीय नेत्र से छह ज्योतिपुंज प्रकट हुए थे। गंगा ने इन्हें 'शरवण' (सरकंडों के वन) में पहुँचाया, जहाँ ये बालक कार्तिकेय के रूप में एकीकृत हुए। इसीलिए उन्हें 'शरवणभव' कहा जाता है। यह नामावली उन छह बीजाक्षरों की शक्ति को साधक के शरीर में प्रवाहित करती है। 'श' कार से १८ नाम, फिर 'र' कार से १८, और इसी क्रम में 'व-ण-भ-व' के नामों का समूह मिलकर १०८ नामों का एक ऐसा ऊर्जा मंडल (Energy Grid) बनाता है जो साधक के षड्चक्रों को संतुलित करने की क्षमता रखता है।
दार्शनिक गहराई: षडक्षर मंत्र का प्रत्येक अक्षर एक विशिष्ट अर्थ और शक्ति को धारण करता है। 'श' मंगल का सूचक है, 'र' तेज और प्रकाश का, 'व' अमृतत्व का, 'ण' पूर्णता का, 'भ' ऐश्वर्य का और 'व' पुनः परम कल्याण का। इस नामावली का पाठ करना वास्तव में सुब्रह्मण्य के इन छह दिव्य गुणों—ज्ञान, वैराग्य, यश, श्री, ऐश्वर्य और वीर्य—को अपने अंतर्मन में स्थापित करना है। दक्षिण भारत की मुरुगन परंपरा में मंत्र जप के साथ इन १०८ नामों का अर्चन 'महा-अभिषेक' के समान प्रभावशाली माना गया है।
भगवान सुब्रह्मण्य 'ज्ञान' के अधिष्ठाता देव हैं। उन्होंने स्वयं अपने पिता महादेव को 'ॐ' (प्रणव) का गुप्त अर्थ समझाया था, इसलिए उन्हें 'शिवगुरु' भी कहा जाता है। यह षडक्षर नामावली उसी गुरु-शक्ति का आह्वान है। जो साधक अपने जीवन में अज्ञान के अंधकार से जूझ रहे हैं या जिन्हें उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है, उनके लिए कार्तिकेय का यह 'ज्ञान-स्वरूप' मार्गदर्शन करता है। 'शक्तिधारिणे' और 'रणाग्रण्ये' जैसे नाम यह स्पष्ट करते हैं कि सुब्रह्मण्य केवल शांत गुरु ही नहीं, बल्कि अधर्म का नाश करने वाले पराक्रमी योद्धा भी हैं। इस नामावली के माध्यम से हम उस शक्ति की वन्दना करते हैं जो ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखने के लिए भाला (वेल) धारण करती है।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में, यह नामावली मानसिक दृढ़ता, साहस और इच्छाशक्ति (Will Power) जाग्रत करने का एक अचूक माध्यम है। जब हम प्रत्येक नाम के आरम्भ में का उच्चारण करते हैं, तो वह नाम सीधे हमारी चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँचता है। यह पाठ न केवल धार्मिक श्रद्धा का विषय है, बल्कि यह शब्द-ब्रह्म और नाद-योग का एक सूक्ष्म विज्ञान है, जो मानव मन की जड़ता को काटकर उसे प्रज्ञा (Intellectual Clarity) प्रदान करता है।

विशिष्ट महत्व एवं ज्योतिषीय लाभ (Significance)

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भगवान सुब्रह्मण्य मंगल ग्रह (Planet Mars) के अधिष्ठाता देवता हैं। जन्मकुंडली में 'मंगल दोष' या 'कुज दोष' होने पर व्यक्ति को विवाह में विलम्ब, गृह-कलह और दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है। इस षडक्षर नामावली का मंगलवार को पाठ करने से मंगल ग्रह की उग्रता शांत होती है और वह साधक के लिए शुभ फलदायी बन जाता है।
इसके अतिरिक्त, यह नामावली षड्चक्र भेदन में भी सहायक है। सुब्रह्मण्य के छह मुख हमारी मूलाधार से आज्ञा चक्र तक की ऊर्जा को नियंत्रित करते हैं। प्रत्येक अक्षर का जप उस विशेष चक्र की अशुद्धियों को जलाता है। 'वेल' (भाला), जो सुब्रह्मण्य का मुख्य अस्त्र है, हमारी एकाग्रता और भेदन शक्ति का प्रतीक है। इस नामावली का पाठ साधक की एकाग्रता को बढ़ाकर उसे जीवन के कठिन से कठिन लक्ष्यों को प्राप्त करने में समर्थ बनाता है।

फलश्रुति: नामावली पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

सुब्रह्मण्य षडक्षर अष्टोत्तर का पाठ करने से साधक को निम्नलिखित दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं:
  • शत्रु और मुकदमा विजय: 'रक्षणकृते' और 'रक्षोबलविमर्दनाय' जैसे नामों का जप शत्रुओं के षड्यंत्रों को विफल करता है और कानूनी मामलों में सफलता दिलाता है।
  • कुज (मंगल) दोष निवारण: प्रत्येक मंगलवार को १०८ बार जप करने से विवाह की बाधाएं दूर होती हैं और रक्त संबंधी विकारों में लाभ मिलता है।
  • मेधा और बुद्धि विकास: विद्यार्थियों के लिए यह नामावली एकाग्रता बढ़ाने और कठिन विषयों को सरलता से समझने के लिए अमोघ मंत्र है।
  • भय और दुःस्वप्न मुक्ति: 'भयापहाय' नाम का जप मन के अज्ञात भयों को मिटाकर साधक में अपार आत्मविश्वास और साहस भरता है।
  • संतान सुख: भगवान कार्तिकेय की कृपा से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है और संतान के जीवन के समस्त कष्ट दूर होते हैं।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

भगवान सुब्रह्मण्य की साधना में शुचिता और अनुशासन का विशेष महत्व है। इसे निम्नलिखित विधि से पूर्ण करें:

साधना के नियम

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। 'स्कन्द षष्ठी' के दिन इसका पाठ महाफलदायी होता है।
  • वस्त्र: पीले या लाल रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना सुब्रह्मण्य को प्रिय है।
  • दिशा: पाठ के समय अपना मुख पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर रखें।
  • पूजन: भगवान को चमेली के फूल, सुगन्धित चन्दन और नैवेद्य में फल या दूध से बनी मिठाई अर्पित करें।
  • जप मंत्र: पाठ से पूर्व 'ॐ शरवणभवाय नमः' मंत्र का ११ बार जप करना पाठ को अधिक ऊर्जावान बनाता है।

विशेष अवसर

  • स्कन्द षष्ठी: यह कार्तिकेय का सबसे बड़ा पर्व है, इस दिन पाठ से असंभव कार्य भी सिद्ध होते हैं।
  • मंगलवार: प्रत्येक मंगलवार को पाठ करना मंगल ग्रह की शांति के लिए अनिवार्य माना गया है।
  • कृत्तिका नक्षत्र: यह सुब्रह्मण्य का जन्म नक्षत्र है, इस दिन पाठ करना अनंत पुण्य प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'षडक्षर' नामावली और सामान्य अष्टोत्तर में क्या अंतर है?

सामान्य अष्टोत्तर में नाम किसी भी क्रम में हो सकते हैं, लेकिन षडक्षर नामावली 'श-र-व-ण-भ-व' मंत्र के अक्षरों पर आधारित है, जो मंत्र और नाम की संयुक्त शक्ति प्रदान करती है।

2. क्या इस नामावली से मांगलिक दोष (Kuja Dosha) दूर होता है?

जी हाँ, सुब्रह्मण्य मंगल ग्रह के स्वामी हैं। श्रद्धापूर्वक इस नामावली का पाठ करने से मंगल जनित दोष और उग्रता शांत होती है और विवाह बाधाएं मिटती हैं।

3. सुब्रह्मण्य और कार्तिकेय में क्या अंतर है?

दोनों एक ही ईश्वर के नाम हैं। उत्तर भारत में उन्हें मुख्यतः कार्तिकेय और दक्षिण भारत में सुब्रह्मण्य या मुरुगन के नाम से पूजा जाता है।

4. 'श-कार' नामावली से क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि इस नामावली के पहले १८ नाम 'श' अक्षर से शुरू होते हैं, जो 'श' बीज की विशिष्ट शक्ति को जाग्रत करते हैं।

5. पाठ के लिए कौन सा दिन सबसे शुभ है?

मंगलवार और षष्ठी तिथि (विशेषकर शुक्ल पक्ष की छठी) इस नामावली के पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।

6. क्या विद्यार्थी इसे याददाश्त बढ़ाने के लिए पढ़ सकते हैं?

निश्चित रूप से। भगवान सुब्रह्मण्य प्रज्ञा और मेधा के स्वामी हैं। विद्यार्थियों के लिए यह एकाग्रता और शैक्षणिक सफलता का श्रेष्ठ मार्ग है।

7. 'शक्तिधारिणे' नाम का क्या रहस्य है?

सुब्रह्मण्य का मुख्य अस्त्र 'वेल' (भाला) है, जिसे 'शक्ति' कहा जाता है। 'शक्तिधारिणे' का अर्थ है वह जो ब्रह्मांड की समस्त क्रिया-शक्ति को धारण करता है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

यदि संभव हो तो 'रुद्राक्ष की माला' या 'लाल चन्दन की माला' का प्रयोग सुब्रह्मण्य पूजा में सबसे फलदायी माना जाता है।

9. क्या इस पाठ से भय दूर होता है?

हाँ, सुब्रह्मण्य साहस और शौर्य के देवता हैं। 'भयापहाय' नाम का जप किसी भी प्रकार के अज्ञात डर और मानसिक कमजोरी को समाप्त कर देता है।

10. 'शरवणभव' मंत्र का वास्तविक अर्थ क्या है?

'शरवण' का अर्थ है सरकंडों का वन और 'भव' का अर्थ है उत्पन्न होना। वह दिव्य पुत्र जो सरकंडों के वन में महादेव के तेज से उत्पन्न हुआ।