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Sri Subrahmanya Ashtottara Shatanamavali – श्री सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशतनामावली

Sri Subrahmanya Ashtottara Shatanamavali – श्री सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॥ अर्चना ॥ ॐ स्कन्दाय नमः । १ ॐ गुहाय नमः । २ ॐ षण्मुखाय नमः । ३ ॐ फालनेत्रसुताय नमः । ४ ॐ प्रभवे नमः । ५ ॐ पिङ्गलाय नमः । ६ ॐ कृत्तिकासूनवे नमः । ७ ॐ शिखिवाहाय नमः । ८ ॐ द्विषड्भुजाय नमः । ९ ॐ द्विषण्णेत्राय नमः । १० ॐ शक्तिधराय नमः । ११ ॐ पिशिताशप्रभञ्जनाय नमः । १२ ॐ तारकासुरसंहारिणे नमः । १३ ॐ रक्षोबलविमर्दनाय नमः । १४ ॐ मत्ताय नमः । १५ ॐ प्रमत्ताय नमः । १६ ॐ उन्मत्ताय नमः । १७ ॐ सुरसैन्यसुरक्षकाय नमः । १८ ॐ देवसेनापतये नमः । १९ ॐ प्राज्ञाय नमः । २० ॐ कृपालवे नमः । २१ ॐ भक्तवत्सलाय नमः । २२ ॐ उमासुताय नमः । २३ ॐ शक्तिधराय नमः । २४ ॐ कुमाराय नमः । २५ ॐ क्रौञ्चदारणाय नमः । २६ ॐ सेनान्ये नमः । २७ ॐ अग्निजन्मने नमः । २८ ॐ विशाखाय नमः । २९ ॐ शङ्करात्मजाय नमः । ३० ॐ शिवस्वामिने नमः । ३१ ॐ गणस्वामिने नमः । ३२ ॐ सर्वस्वामिने नमः । ३३ ॐ सनातनाय नमः । ३४ ॐ अनन्तशक्तये नमः । ३५ ॐ अक्षोभ्याय नमः । ३६ ॐ पार्वतीप्रियनन्दनाय नमः । ३७ ॐ गङ्गासुताय नमः । ३८ ॐ शरोद्भूताय नमः । ३९ ॐ आहूताय नमः । ४० ॐ पावकात्मजाय नमः । ४१ ॐ जृम्भाय नमः । ४२ ॐ प्रजृम्भाय नमः । ४३ ॐ उज्जृम्भाय नमः । ४४ ॐ कमलासनसंस्तुताय नमः । ४५ ॐ एकवर्णाय नमः । ४६ ॐ द्विवर्णाय नमः । ४७ ॐ त्रिवर्णाय नमः । ४८ ॐ सुमनोहराय नमः । ४९ ॐ चतुर्वर्णाय नमः । ५० ॐ पञ्चवर्णाय नमः । ५१ ॐ प्रजापतये नमः । ५२ ॐ अहर्पतये नमः । ५३ ॐ अग्निगर्भाय नमः । ५४ ॐ शमीगर्भाय नमः । ५५ ॐ विश्वरेतसे नमः । ५६ ॐ सुरारिघ्ने नमः । ५७ ॐ हरिद्वर्णाय नमः । ५८ ॐ शुभकराय नमः । ५९ ॐ वटवे नमः । ६० ॐ वटुवेषभृते नमः । ६१ ॐ पूष्णे नमः । ६२ ॐ गभस्तये नमः । ६३ ॐ गहनाय नमः । ६४ ॐ चन्द्रवर्णाय नमः । ६५ ॐ कलाधराय नमः । ६६ ॐ मायाधराय नमः । ६७ ॐ महामायिने नमः । ६८ ॐ कैवल्याय नमः । ६९ ॐ शङ्करात्मजाय नमः । ७० ॐ विश्वयोनये नमः । ७१ ॐ अमेयात्मने नमः । ७२ ॐ तेजोनिधये नमः । ७३ ॐ अनामयाय नमः । ७४ ॐ परमेष्ठिने नमः । ७५ ॐ परब्रह्मणे नमः । ७६ ॐ वेदगर्भाय नमः । ७७ ॐ विराट्सुताय नमः । ७८ ॐ पुलिन्दकन्याभर्त्रे नमः । ७९ ॐ महासारस्वतावृताय नमः । ८० ॐ आश्रिताखिलदात्रे नमः । ८१ ॐ चोरघ्नाय नमः । ८२ ॐ रोगनाशनाय नमः । ८३ ॐ अनन्तमूर्तये नमः । ८४ ॐ आनन्दाय नमः । ८५ ॐ शिखण्डिकृतकेतनाय नमः । ८६ ॐ डम्भाय नमः । ८७ ॐ परमडम्भाय नमः । ८८ ॐ महाडम्भाय नमः । ८९ ॐ वृषाकपये नमः । ९० ॐ कारणोपात्तदेहाय नमः । ९१ ॐ कारणातीतविग्रहाय नमः । ९२ ॐ अनीश्वराय नमः । ९३ ॐ अमृताय नमः । ९४ ॐ प्राणाय नमः । ९५ ॐ प्राणायामपरायणाय नमः । ९६ ॐ विरुद्धहन्त्रे नमः । ९७ ॐ वीरघ्नाय नमः । ९८ ॐ रक्तास्याय नमः । ९९ ॐ श्यामकन्धराय नमः । १०० ॐ सुब्रह्मण्याय नमः । १०१ ॐ गुहाय नमः । १०२ ॐ प्रीताय नमः । १०३ ॐ ब्रह्मण्याय नमः । १०४ ॐ ब्राह्मणप्रियाय नमः । १०५ ॐ वंशवृद्धिकराय नमः । १०६ ॐ वेदवेद्याय नमः । १०७ ॐ अक्षयफलप्रदाय नमः । १०८ ॥ इति श्री सुब्रह्मण्याष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥

श्री सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशतनामावली: शक्ति और ज्ञान का संगम (Introduction)

श्री सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Subrahmanya Ashtottara Shatanamavali) भगवान कार्तिकेय के १०८ पावन मन्त्रों का वह सिद्ध संग्रह है, जो साधक को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय शक्ति प्रदान करता है। भगवान सुब्रह्मण्य, जिन्हें दक्षिण भारत में 'मुरुगन' और उत्तर भारत में 'स्कन्द' या 'कार्तिकेय' के नाम से पूजा जाता है, देवों के सेनापति हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, उनका प्राकट्य महादेव के तीसरे नेत्र (फालनेत्र) के तेज से हुआ था, ताकि वे तारकासुर जैसे भीषण असुर का संहार कर धर्म की स्थापना कर सकें। यह नामावली उनके विभिन्न स्वरूपों, वीरतापूर्ण कार्यों और उनके गहन दार्शनिक अर्थों की व्याख्या करती है।
भगवान सुब्रह्मण्य का व्यक्तित्व "ज्ञान" और "शक्ति" का अद्भुत संतुलन है। उनके हाथ में सुशोभित 'वेल' (शूल) केवल एक अस्त्र नहीं, बल्कि सूक्ष्म बुद्धि (Sharp Intellect) का प्रतीक है। नामावली में उन्हें "ॐ षण्मुखाय नमः" कहा गया है, जो उनके छह मुखों को दर्शाता है। ये छह मुख ब्रह्मांड के पांच तत्वों और एक मन, या षडरिपुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य) पर नियंत्रण के प्रतीक हैं। मुरुगन की उपासना न केवल दक्षिण भारत के तमिल क्षेत्र में 'अरोहरा' के जयघोष के साथ की जाती है, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में स्कन्द भक्त उन्हें अपनी आत्मा का संरक्षक मानते हैं।
जन्म और स्वरूप का रहस्य: स्कन्द के जन्म की कथा शरवण (सरकंडों के वन) से जुड़ी है, जहाँ शिव के तेज को छह शिशुओं के रूप में कार्तिकेय नक्षत्रों (कृत्तिकाओं) ने पाला। इसीलिए उन्हें "ॐ कृत्तिकासूनवे नमः" कहा जाता है। बाद में माता पार्वती ने उन्हें एक किया, जिससे वे 'स्कन्द' कहलाए। कार्तिकेय का वाहन 'मयूर' (मोर) है, जो अहंकार के दमन और चंचलता पर विजय का सूचक है। उनके चरणों के नीचे दबा हुआ सर्प समय और कुण्डलिनी शक्ति का प्रतीक है। यह नामावली हमें बोध कराती है कि कार्तिकेय केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि "ॐ शिवस्वामिने नमः" भी हैं, जिन्होंने स्वयं अपने पिता महादेव को 'ॐ'कार का रहस्य समझाया था।
आधुनिक ज्योतिषीय और आध्यात्मिक शोधों के अनुसार, भगवान सुब्रह्मण्य मंगल ग्रह (Mars) के अधिपति देवता हैं। कुंडली में मंगल का दोष, ऋण बाधा, या भूमि संबंधी विवाद होने पर कार्तिकेय की अष्टोत्तरशतनामावली का अर्चन करना अचूक उपाय माना गया है। १०८ नामों का यह पाठ मष्तिष्क की 'अल्फा' तरंगों को सक्रिय करता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होता है और नेतृत्व के गुण जाग्रत होते हैं। स्कन्द षष्ठी (Skanda Sashti) के पावन अवसर पर इन नामों का जाप साधक को वही अभय प्रदान करता है, जो कार्तिकेय ने सुरों (देवताओं) को असुरों के भय से दिया था।

सुब्रह्मण्य नामावली का विशिष्ट तांत्रिक एवं ज्योतिषीय महत्व (Significance)

सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशतनामावली का महत्व उसके प्रत्येक शब्द में छिपे तात्विक और ब्रह्मांडीय रहस्यों में निहित है:
  • मंगल दोष निवारण: सुब्रह्मण्य मंगल ग्रह के नियंत्रक हैं। मंगलवार को इन १०८ नामों से अर्चन करने पर मांगलिक दोष और रक्त संबंधी विकारों में शांति मिलती है।
  • शत्रु स्तम्भन: सेनापति होने के नाते, भगवान कार्तिकेय गुप्त शत्रुओं और व्यावसायिक विरोधियों के षड्यंत्रों को विफल करने की सर्वोच्च शक्ति रखते हैं।
  • कुण्डलिनी जागरण: "ॐ शक्तिधराय नमः" का ध्यान मूलाधार चक्र से आज्ञा चक्र तक की ऊर्जा को प्रवाहित करने में सहायक होता है।
  • एकता का प्रतीक: कार्तिकेय को शिव का अंश, विष्णु का भांजा और अग्नि का पुत्र माना गया है। उनकी नामावली समस्त हिंदू दर्शन को एक सूत्र में पिरोती है।

नामावली पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

नियमित रूप से १०८ नामों का पाठ और अर्चन करने से निम्नलिखित दिव्य फल प्राप्त होते हैं:
  • अदम्य साहस और आत्मविश्वास: कार्तिकेय की कृपा से साधक का मानसिक डर समाप्त होता है और वह कठिन चुनौतियों का डटकर सामना कर पाता है।
  • कर्ज मुक्ति (Debt Relief): मंगल ग्रह के अधिपति होने के कारण, इनके नामों का जाप ऋण के भारी बोझ से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।
  • संतान सुख: "ॐ वंशवृद्धिकराय नमः" नाम के प्रभाव से सुयोग्य संतान की प्राप्ति और कुल की उन्नति होती है।
  • विद्या में विजय: विद्यार्थियों के लिए 'विशाख' स्वरूप का ध्यान एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाता है, जिससे परीक्षाओं में सफलता मिलती है।
  • आरोग्य और तेज: असाध्य रोगों, विशेषकर चर्म रोग और रक्त विकारों के नाश के लिए यह नामावली अमोघ औषधि है।

सुब्रह्मण्य अर्चन विधि एवं साधना नियम (Ritual Method)

भगवान कार्तिकेय की पूजा में 'शुद्धि' और 'लाल रंग' का विशेष महत्व है। इस विधि का अनुसरण करें:
१.
समय और शुद्धि: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४-६ बजे) या मंगलवार की संध्या का समय सर्वोत्तम है। स्नान के पश्चात लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
२.
अर्चना सामग्री: कार्तिकेय के चित्र या षष्ठमुखी विग्रह के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाएं। अर्चन के लिए लाल कनेर, चन्दन, या सिंदूर मिश्रित अक्षत का प्रयोग करें।
३.
दिशा और आसन: पूर्व दिशा की ओर मुख करके लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठें।
४.
अष्टोत्तर अर्चन क्रिया: प्रत्येक "ॐ... नमः" के साथ भगवान के चरणों में एक पुष्प या कुमकुम अर्पित करें। यह क्रिया साक्षात् मुरुगन को प्रसन्न करने वाली है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. सुब्रह्मण्य अष्टोत्तरशतनामावली का पाठ किस दिन शुरू करना चाहिए?

इसे किसी भी शुक्ल पक्ष के मंगलवार या स्कन्द षष्ठी के दिन से शुरू करना सर्वोत्तम है। विशाखा नक्षत्र में भी इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

2. क्या कार्तिकेय और मुरुगन एक ही हैं?

हाँ, दोनों एक ही परम सत्ता के नाम हैं। उत्तर भारत में उन्हें 'कार्तिकेय' या 'स्कन्द' कहा जाता है, जबकि दक्षिण भारत (तमिलनाडु) में उन्हें 'मुरुगन' के रूप में पूजा जाता है।

3. क्या इस नामावली का पाठ मंगल ग्रह के दोषों को दूर करता है?

जी हाँ, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान सुब्रह्मण्य मंगल के अधिपति हैं। मंगलवार को १०८ नामों का अर्चन मांगलिक दोष और कुंडली के अन्य मंगल-जनित विकारों का नाश करता है।

4. 'शक्तिधराय' नाम का क्या अर्थ है?

'शक्ति' कार्तिकेय के अस्त्र (वेल) का नाम है। शक्तिधराय का अर्थ है—"वह जो ब्रह्मांड की सर्वोच्च ऊर्जा (शक्ति) को धारण करता है।"

5. क्या यह पाठ कर्ज (Loan) चुकाने में सहायक है?

हाँ, कार्तिकेय की उपासना ऋण मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है। संकल्प लेकर २१ मंगलवार तक इस नामावली का पाठ करने से आर्थिक बाधाएं दूर होती हैं।

6. अर्चना के लिए कौन से फूल सबसे प्रिय हैं?

भगवान सुब्रह्मण्य को लाल फूल जैसे कनेर (Oleander), जपाकुसुम (Hibiscus), और पलाश के फूल अत्यंत प्रिय हैं। उन्हें विभूति (भस्म) चढ़ाना भी बहुत शुभ माना जाता है।

7. 'फालनेत्रसुताय' नाम का रहस्य क्या है?

'फालनेत्र' का अर्थ है महादेव का तीसरा नेत्र। शिवजी के तीसरे नेत्र की ज्वाला से उत्पन्न होने के कारण कार्तिकेय को 'फालनेत्रसुत' कहा जाता है।

8. क्या स्त्रियाँ सुब्रह्मण्य नामावली पढ़ सकती हैं?

बिल्कुल, भगवती स्वरूपा स्त्रियाँ अपने परिवार की रक्षा, संतान सुख और साहस के लिए इस नामावली का पाठ पूर्ण श्रद्धा के साथ कर सकती हैं।

9. 'क्रौञ्चदारणाय' नाम का तात्विक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है—"क्रौञ्च पर्वत को भेदने वाला"। तांत्रिक दृष्टि से क्रौञ्च पर्वत अज्ञान और जड़ता का प्रतीक है, जिसे कार्तिकेय ने अपने 'वेल' से नष्ट किया था।

10. क्या ॐ और ओं में कोई अंतर है?

ॐ (Om) साक्षात् प्रणव और शुद्ध वैदिक मन्त्र है। नामावली में ॐ का प्रयोग ही मन्त्रों को सिद्ध करता है और सही आध्यात्मिक कम्पन पैदा करता है।