श्री एकादशमुखि हनुमत्कवचम् (रुद्रयामल तन्त्र)
Shri Ekadasha Mukhi Hanumat Kavacham (Rudrayamala Tantra)

इस कवच का विशिष्ट महत्व
श्री एकादशमुखि हनुमत्कवचम् (Shri Ekadasha Mukhi Hanumat Kavacham), जो रुद्रयामल तन्त्र (Rudrayamala Tantra) से उद्धृत है, भगवान शिव और देवी पार्वती के संवाद के रूप में प्रकट हुआ अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली स्तोत्र है। इसमें भगवान हनुमान के ग्यारह मुख वाले विराट स्वरूप की आराधना की गई है। यह कवच न केवल भौतिक और आध्यात्मिक सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि यह भूत-प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस आदि जैसी नकारात्मक शक्तियों और ग्रहों के दुष्प्रभावों को भी तत्काल नष्ट करने में सक्षम है। यह कवच 'सर्वदूतस्तम्भनार्थं' और 'मोहनार्थं' जैसे तांत्रिक प्रयोगों के लिए भी सिद्ध माना जाता है।
कवच के प्रमुख लाभ
फलश्रुति के अनुसार, इस कवच के पाठ से निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:
समस्त कामनाओं की पूर्ति: जो व्यक्ति पवित्र होकर इसका पाठ करता है, उसे सभी वांछित फलों की प्राप्ति होती है ("सर्वान्कामानवाप्नुयात्")।
रोग और क्षय निवारण: दिन में दो या तीन बार पाठ करने से रोगों पर विजय प्राप्त होती है। विशेष रूप से, जल में खड़े होकर चार बार पाठ करने से क्षय (TB), अपस्मार (Mirgi) और कुष्ठ जैसे गंभीर रोगों का भी निवारण होता है।
शत्रु और भय नाश: यह कवच चोर, व्याघ्र, पिशाच, और ब्रह्मराक्षसों के भय को दूर करता है और शत्रुओं के समूह को छिन्न-भिन्न कर देता है ("शत्रुसमूहोच्चाटनाय")।
वाकसिद्धि और पापनाश: इसके प्रभाव से साधक की वाणी में गद्य-पद्य रचने की शक्ति आ जाती है और वह ब्रह्महत्या जैसे महापापों से भी मुक्त हो जाता है।
पाठ विधि
प्रतिदिन प्रातः, दोपहर या संध्या काल में पवित्र होकर 1, 2, या 3 बार पाठ करें।
रोग निवारण के लिए मध्याह्न (दोपहर) में जल में खड़े होकर 4 बार पाठ करें।
पुरश्चरण: विशेष सिद्धि के लिए देवता की विधिवत पूजा करके 1100 (एकादशशतं) बार जप और उसका दशांश हवन करने का विधान है।