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Sri Ramanuja Ashtottara Shatanamavali – श्री रामानुजाष्टोत्तरशतनामावली

Sri Ramanuja Ashtottara Shatanamavali – श्री रामानुजाष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री रामानुजाष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॥ नामावली ॥ ॐ रामानुजाय नमः । ॐ पुष्कराक्षाय नमः । ॐ यतीन्द्राय नमः । ॐ करुणाकराय नमः । ॐ कान्तिमत्यात्मजाय नमः । ॐ श्रीमते नमः । ॐ लीलामानुषविग्रहाय नमः । ॐ सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञाय नमः । ॐ सर्वज्ञाय नमः । ॐ सज्जनप्रियाय नमः । ॐ नारायणकृपापात्राय नमः । ॐ श्रीभूतपुरनायकाय नमः । ॐ अनघाय नमः । ॐ भक्तमन्दाराय नमः । ॐ केशवानन्दवर्धनाय नमः । ॐ काञ्चीपूर्णप्रियसखाय नमः । ॐ प्रणतार्तिविनाशकाय नमः । ॐ पुण्यसङ्कीर्तनाय नमः । ॐ पुण्याय नमः । ॐ ब्रह्मराक्षसमोचकाय नमः । ॐ यादवापादितापार्थवृक्षच्छेदकुठारकाय नमः । ॐ अमोघाय नमः । ॐ लक्ष्मणमुनये नमः । ॐ शारदाशोकनाशकाय नमः । ॐ निरन्तरजनाज्ञाननिर्मोचनविचक्षणाय नमः । ॐ वेदान्तद्वयसारज्ञाय नमः । ॐ वरदाम्बुप्रदायकाय नमः । ॐ वरदाभिप्रायतत्त्वज्ञाय नमः । ॐ यामुनाङ्गुलिमोचकाय नमः । ॐ देवराजकृपालब्धषड्वाक्यार्थमहोदधये नमः । ॐ पूर्णार्यलब्धसन्मन्त्राय नमः । ॐ शौरिपादाब्जषट्पदाय नमः । ॐ फणापृष्ठलसद्विष्णुपादाङ्कसमपुण्ड्रवते नमः । ॐ त्रिदण्डधारिणे नमः । ॐ ब्रह्मज्ञाय नमः । ॐ ब्रह्मज्ञानपरायणाय नमः । ॐ रङ्गेशकैङ्कर्यरताय नमः । ॐ विभूतिद्वयनायकाय नमः । ॐ गोष्ठीपूर्णकृपालब्धमन्त्रराजप्रकाशकाय नमः । ॐ वररङ्गानुकम्पात्तद्राविडाम्नायपारगाय नमः । ॐ मालाधरार्यसुज्ञातद्राविडाम्नायतत्त्वधिये नमः । ॐ चतुस्सप्ततिशिष्याड्याय नमः । ॐ पञ्चाचार्यपदाश्रयाय नमः । ॐ प्रपीतविषतीर्थाम्भःप्रकटीकृतवैभवाय नमः । ॐ प्रपन्नजनकूटस्थाय नमः । ॐ गोविन्दार्यद्विजानुजाय नमः । ॐ प्रणतार्तिहराचार्यदत्तभिक्षैकभोजनाय नमः । ॐ पवित्रीकृतकूरेशाय नमः । ॐ भागिनेयत्रिदण्डकाय नमः । ॐ कूरेशदाशरथ्यादिचरमार्थप्रकाशकाय नमः । ॐ रङ्गेशवेङ्कटेशादिप्रकटीकृतवैभवाय नमः । ॐ देवराजार्चनरताय नमः । ॐ मूकमुक्तिप्रदायकाय नमः । ॐ यज्ञमूर्तिप्रतिष्ठात्रे नमः । ॐ मन्त्रदाय नमः । ॐ धरणीधराय नमः । ॐ वरदाचार्यसद्भक्ताय नमः । ॐ यज्ञेशार्तिविनाशकाय नमः । ॐ अनन्ताभीष्टफलदाय नमः । ॐ विठलेन्द्रप्रपूजिताय नमः । ॐ श्रीशैलपूर्णकरुणालब्धरामायणार्थकाय नमः । ॐ व्याससूत्रार्थतत्त्वज्ञाय नमः । ॐ बोधायनमतानुगाय नमः । ॐ श्रीभाष्यादिमहाग्रन्थकारकाय नमः । ॐ कलिनाशकाय नमः । ॐ अद्वैतमतविच्छेत्रे नमः । ॐ विशिष्टाद्वैतपारगाय नमः । ॐ कुरङ्गनगरीपूर्णमन्त्ररत्नोपदेशकाय नमः । ॐ विनाशितताखिलमताय नमः । ॐ शेषीकृतरमापतये नमः । ॐ पुत्रीकृतशठारातये नमः । ॐ शठजिदृणमोचकाय नमः । ॐ भाषादत्तहयग्रीवाय नमः । ॐ भाष्यकाराय नमः । ॐ महायशसे नमः । ॐ पवित्रीकृतभूभाकाय नमः । ॐ कूर्मनाथप्रकाशकाय नमः । ॐ श्रीवेङ्कटाचलाधीशशङ्खचक्रप्रदायकाय नमः । ॐ श्रीवेङ्कटेशश्वशुराय नमः । ॐ श्रीरमासखदेशिकाय नमः । ॐ कृपामात्रप्रसन्नार्याय नमः । ॐ गोपिकामोक्षदायकाय नमः । ॐ समीचीनार्यसच्छिष्यसत्कृताय नमः । ॐ वैष्णवप्रियाय नमः । ॐ कृमिकण्ठनृपध्वंसिने नमः । ॐ सर्वमन्त्रमहोदधये नमः । ॐ अङ्गीकृतान्ध्रपूर्णाय नमः । ॐ सालग्रामप्रतिष्ठिताय नमः । ॐ श्रीभक्तग्रामपूर्णेशाय नमः । ॐ विष्णुवर्धनरक्षकाय नमः । ॐ बौद्धध्वान्तसहस्रांशवे नमः । ॐ शेषरूपप्रदर्शकाय नमः । ॐ नगरीकृतवेदाद्रये नमः । ॐ डिल्लीश्वरसमर्चिताय नमः । ॐ नारायणप्रतिष्ठात्रे नमः । ॐ सम्पत्पुत्रविमोचकाय नमः । ॐ सम्पत्कुमारजनकाय नमः । ॐ साधुलोकशिखामणये नमः । ॐ सुप्रतिष्ठितगोविन्दराजाय नमः । ॐ पूर्णमनोरथाय नमः । ॐ गोदाग्रजाय नमः । ॐ दिग्विजेत्रे नमः । ॐ गोदाभीष्टप्रपूरकाय नमः । ॐ सर्वसंशयविच्छेत्रे नमः । ॐ विष्णुलोकप्रदायकाय नमः । ॐ अव्याहतमहद्वर्त्मने नमः । ॐ यतिराजाय नमः । ॐ जगद्गुरवे नमः । ॥ इति श्री रामानुजाष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥

श्री रामानुजाष्टोत्तरशतनामावली — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक आधार (Introduction)

श्री रामानुजाष्टोत्तरशतनामावली (Sri Ramanuja Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के "श्रीवैष्णव" संप्रदाय के महानतम आचार्य, भगवद् रामानुजाचार्य के १०८ दिव्य नामों का सघन संकलन है। १०१७ ईस्वी में श्रीपेरंबुदूर (तमिलनाडु) में जन्मे रामानुजाचार्य केवल एक दार्शनिक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक क्रांतिकारी और सुधारक थे। उन्होंने "विशिष्टाद्वैत" वेदांत का प्रतिपादन किया, जो ईश्वर (ब्रह्म), जीव और जगत के बीच एक प्रेमपूर्ण और तात्विक संबंध स्थापित करता है। यह नामावली उनके अलौकिक जीवन, उनके महान भाष्यों (जैसे श्री भाष्य) और उनकी असीम करुणा का वर्णन करती है। श्रीवैष्णव परंपरा में उन्हें साक्षात् भगवान शेषनाग और लक्ष्मण जी का अवतार माना जाता है।
रामानुजाचार्य का जीवन "प्रपत्ति" (शरणागति) के सिद्धांत पर आधारित था। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए केवल ज्ञान या कर्म पर्याप्त नहीं है, बल्कि भगवान नारायण के प्रति पूर्ण समर्पण ही मोक्ष का एकमात्र सुगम मार्ग है। इस नामावली के प्रत्येक नाम में उनके जीवन की एक गाथा छिपी है। उदाहरण के लिए, "श्रीभूतपुरनायकाय नमः" उनके जन्मस्थान का स्मरण कराता है, जबकि "भाष्यकाराय नमः" उन्हें ब्रह्मसूत्रों के महान व्याख्याता के रूप में प्रतिष्ठित करता है। इन नामों का अर्चन गुरु-तत्त्व के साथ एकाकार होने की एक महान आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
दार्शनिक रूप से, रामानुजाचार्य ने उस समय के शुष्क ज्ञान मार्ग को भक्ति के अमृत से सींचा। उन्होंने न केवल मंदिरों की प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारा, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए भक्ति के द्वार खोल दिए। उनके १०८ नामों में उन्हें "यतिराज" (सन्यासियों का राजा) और "जगद्गुरु" कहा गया है। नामावली का पाठ करते समय प्रत्येक नाम के साथ "नमः" (समर्पण) जोड़ना साधक के अहंकार को नष्ट करता है। वे साक्षात् करुणा के अवतार थे, जिन्होंने गोष्ठीपूर्ण जैसे आचार्यों से गुप्त मंत्र प्राप्त करने के बाद, उसे मंदिर के शिखर से जन-साधारण के लिए उद्घोषित कर दिया था ताकि सभी का उद्धार हो सके।
वर्तमान युग में, जहाँ मनुष्य मानसिक द्वंद्व और आध्यात्मिक रिक्तता का अनुभव कर रहा है, श्री रामानुज के १०८ नामों का जप एक "आध्यात्मिक मार्गदर्शक" (Compass) की तरह कार्य करता है। उनके नाम जातक के भीतर विवेक, धैर्य और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास जाग्रत करते हैं। यह नामावली गुरु-परंपरा का सार है, जो जीव को सीधे भगवान नारायण के चरणों तक ले जाने की क्षमता रखती है। इन नामों का निरंतर अर्चन साधक के अंतःकरण से अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर उसे "विशिष्ट" ज्ञान प्रदान करता है, जिससे जीवन मंगलमय और सफल होता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं गुरु-कृपा (Significance)

श्री रामानुज नामावली का महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि श्रीवैष्णव संप्रदाय में "गुरु" का स्थान भगवान से भी ऊपर माना गया है। बिना गुरु की मध्यस्थता (पुरुषकार) के नारायण की प्राप्ति कठिन मानी गई है। यह नामावली साक्षात् गुरु-तत्त्व की स्तुति है।
विशेष रूप से "श्रीभाष्य" के लेखन और "तिरुपति" व "श्रीरंगम" मंदिरों के पुनरुद्धार के उनके कार्यों का वर्णन इन नामों में मिलता है। "कलिनाशकाय नमः" नाम यह स्पष्ट करता है कि उनके नाम जप से कलयुग के दोषों और पापों का शमन होता है। यह पाठ साधक को "पंच-संस्कार" की मानसिक पवित्रता प्रदान करता है।

फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)

विद्वानों और आचार्यों के अनुसार, श्री रामानुज के १०८ नामों का सस्वर पाठ निम्नलिखित लाभ प्रदान करता है:
  • तत्व ज्ञान की प्राप्ति: "वेदान्तद्वयसारज्ञाय" — यह पाठ वेदांत के गूढ़ रहस्यों को समझने की शक्ति प्रदान करता है और बौद्धिक भ्रम को दूर करता है।
  • भगवान नारायण की भक्ति: रामानुज स्वामी की कृपा से साधक के हृदय में विष्णु के प्रति अविचल भक्ति जाग्रत होती है।
  • पाप मुक्ति और कष्ट निवारण: "प्रणतार्तिविनाशकाय" — शरण में आने वाले भक्तों के सभी दुखों और प्रारब्ध के पापों का नाश होता है।
  • गुरु कृपा और सुरक्षा: यह पाठ साधक के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाता है और गुरु परंपरा का आशीर्वाद सदैव साथ रहता है।
  • मोक्ष का मार्ग (Prapatti): नियमित पाठ से जीव में पूर्ण समर्पण का भाव आता है, जो मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल साधन है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Occasions)

यतिराज रामानुज की साधना अत्यंत सात्विक और भक्तिपूर्ण होनी चाहिए। पूर्ण लाभ के लिए निम्न विधि अपनाएँ:

साधना के नियम:

  • समय: प्रातःकाल 'ब्रह्म मुहूर्त' सर्वश्रेष्ठ है। 'चैत्र शुक्ल तिरुवादिराई' (रामानुज जयंती) पर पाठ का फल अनंत गुना होता है।
  • शुद्धि: स्नान के बाद श्वेत या पीताम्बर वस्त्र धारण करें। मस्तक पर 'उर्ध्व पुण्ड्र' (तिलक) लगाना अत्यंत शुभ है।
  • दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • अर्चन: १०८ नामों के साथ तुलसी दल या श्वेत पुष्पों से आचार्य की प्रतिमा या चित्र पर अर्चन करें।
  • नैवेद्य: केसर युक्त दूध, गुड़ का पोंगल, या फलों का भोग लगाएँ।

विशेष प्रयोग:

  • मानसिक शांति हेतु: नित्य १०८ नामों का पाठ करते हुए "ॐ नमो नारायणाय" मंत्र का ध्यान करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री रामानुजाचार्य कौन थे?

श्री रामानुजाचार्य (१०१७-११३७ ईस्वी) सनातन धर्म के एक महान दार्शनिक और श्रीवैष्णव संप्रदाय के प्रधान आचार्य थे। उन्होंने विशिष्टाद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया।

2. क्या रामानुजाचार्य को किसी का अवतार माना जाता है?

हाँ, शास्त्रों और परंपरा के अनुसार उन्हें भगवान विष्णु के अनंत शय्या 'शेषनाग' और त्रेतायुग के 'लक्ष्मण' जी का अवतार माना जाता है।

3. इस नामावली का पाठ करने का सबसे अच्छा समय क्या है?

सूर्योदय के समय प्रातःकाल पाठ करना सर्वोत्तम है। इसके अतिरिक्त रामानुज जयंती और शनिवार को इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

4. 'यतिराज' नाम का क्या अर्थ है?

'यति' का अर्थ है सन्यासी और 'राज' का अर्थ है राजा। रामानुजाचार्य सन्यासियों के शिरोमणि थे, इसलिए उन्हें यतिराज कहा जाता है।

5. क्या यह नामावली बिना गुरु दीक्षा के पढ़ी जा सकती है?

हाँ, यह एक भक्तिमयी नामावली है। इसे कोई भी श्रद्धालु गुरु के प्रति श्रद्धा रखकर पढ़ सकता है। यह स्वयं में गुरु-कृपा प्राप्त करने का मंत्र है।

6. 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन क्या है?

यह दर्शन मानता है कि ब्रह्म (ईश्वर) एक है, लेकिन जीव और जगत उसके विशेषण के रूप में सत्य हैं। यह भक्ति और शरणागति को मोक्ष का साधन मानता है।

7. पाठ के दौरान ॐ और नमः का क्या महत्व है?

ब्रह्मांडीय नाद है जो मंत्र को शक्ति देता है, और नमः हमारे अहंकार को गुरु के चरणों में समर्पित करने का प्रतीक है।

8. रामानुजाचार्य का तिरुपति मंदिर से क्या संबंध है?

रामानुजाचार्य ने तिरुपति बालाजी मंदिर की पूजा पद्धति को व्यवस्थित किया और भगवान वेंकटेश्वर को शङ्ख और चक्र प्रदान किए थे।

9. क्या इस पाठ से बौद्धिक क्षमता बढ़ती है?

जी हाँ, रामानुज स्वामी प्रज्ञा के सागर हैं। उनके १०८ नामों के जप से एकाग्रता और तार्किक शक्ति (Reasoning) में अद्भुत वृद्धि होती है।

10. 'गोदाग्रजाय' नाम का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है "देवी गोदा (आंडाल) के बड़े भाई"। रामानुज स्वामी ने आंडाल माता की इच्छा पूर्ण की थी, इसलिए उन्हें यह आदरणीय नाम दिया गया।