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Sri Raktambara Lohita Lakshmi Ashtottara Shatanamavali – रक्ताम्बरालोहितालक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावलिः

Sri Raktambara Lohita Lakshmi Ashtottara Shatanamavali – रक्ताम्बरालोहितालक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावलिः
॥ श्री रक्ताम्बरा लोहिता लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावलिः ॥ ॥ रक्ताम्बरा लोहितालक्ष्मी ध्यानम् ॥ सिन्दूररागवपुषीं रक्ताम्बरविभूषिताम् । त्रिनेत्रां रक्तवदनां रक्तजिह्वां भयानकाम् ॥ अष्टभुजां चतुर्वक्त्रां रक्तचक्रगदाधराम् । खड्गं कपालं पद्मं च रक्तशङ्खं वहन्तिनीम् ॥ सिंहगर्वविहारस्थां गरुडोलूकसंयुताम् । लोहितां रक्तलक्ष्मीं तां ध्यानयेत्तन्त्रनायिकाम् ॥ ॥ अथ १०८ नामावलिः ॥ ॐ रक्तलक्ष्म्यै नमः । ॐ रक्ताम्बरायै नमः । ॐ लोहितायै नमः । ॐ चण्डिकारूपिण्यै नमः । ॐ त्रिनेत्रायै नमः । ॐ रक्तज्वालायै नमः । ॐ रक्तदंष्ट्रायै नमः । ॐ रक्तचन्द्रशेखरायै नमः । ॐ रक्तमालिनीवेशायै नमः । ॐ रक्तवज्रायुधायै नमः । ॐ रक्तसिंहासिन्यै नमः । ॐ रक्तपीठनिवासिन्यै नमः । ॐ रक्तचक्रप्रवर्तिन्यै नमः । ॐ रक्तत्रिशूलधारिण्यै नमः । ॐ रक्तसिद्धिप्रदायिन्यै नमः । ॐ रक्तयोगिन्युपास्यायै नमः । ॐ रक्तरक्ताभूषणायै नमः । ॐ रक्तगन्धार्चितायै नमः । ॐ रक्तमण्डलशोभायै नमः । ॐ रक्तदेहायै नमः । ॐ रक्तप्रभायै नमः । ॐ रक्तार्चनसन्तुष्टायै नमः । ॐ रक्तार्घ्यप्रियायै नमः । ॐ रक्तकपालमालिनीं नमः । ॐ रक्ततत्त्वस्वरूपिण्यै नमः । ॐ रक्तचामुण्डिकायै नमः । ॐ रक्तभैरवसङ्गिन्यै नमः । ॐ रक्तरक्तनेत्रायै नमः । ॐ रक्तलोलविलासिन्यै नमः । ॐ रक्तयोगफलप्रदायै नमः । ॐ रक्तमहाशक्तये नमः । ॐ रक्तस्मेराननायै नमः । ॐ रक्तनूपुरविभूषितायै नमः । ॐ रक्तरत्नमालिन्यै नमः । ॐ रक्तवेदगम्यायै नमः । ॐ रक्तक्रीडापरायायै नमः । ॐ रक्तवाणीसमन्वितायै नमः । ॐ रक्तत्रैलोक्यमोहिन्यै नमः । ॐ रक्तविघ्ननाशिन्यै नमः । ॐ रक्तशक्तिप्रदायिन्यै नमः । ॐ रक्तकल्पप्रसूत्यै नमः । ॐ रक्तबीजविनाशिन्यै नमः । ॐ रक्तयन्त्राधिष्ठात्री नमः । ॐ रक्तभोगविभाविन्यै नमः । ॐ रक्तमन्त्रस्वरूपिण्यै नमः । ॐ रक्तध्यानप्रियायै नमः । ॐ रक्तरसप्रदायिन्यै नमः । ॐ रक्तदृष्टिप्रहारिण्यै नमः । ॐ रक्तशिवप्रियायै नमः । ॐ रक्तनारायणवल्लभायै नमः । ॐ रक्तवेदविदुषी नमः । ॐ रक्तशक्तियुक्तायै नमः । ॐ रक्तचारिण्यै नमः । ॐ रक्तारुणलोचनायै नमः । ॐ रक्तकान्तिसमुद्रायै नमः । ॐ रक्तसारस्वत्यै नमः । ॐ रक्तकामप्रदायिन्यै नमः । ॐ रक्तविघ्नहरायै नमः । ॐ रक्तदेवतारूपिण्यै नमः । ॐ रक्तब्रह्मविद्यायै नमः । ॐ रक्तजिह्वायै नमः । ॐ रक्तवल्लभायै नमः । ॐ रक्तकेशविलासिन्यै नमः । ॐ रक्तमूर्तिधारिण्यै नमः । ॐ रक्तदर्पणविग्रहायै नमः । ॐ रक्तरत्नविभूषितायै नमः । ॐ रक्तवीर्यसमुद्भवायै नमः । ॐ रक्तभावप्रदायिन्यै नमः । ॐ रक्तसौन्दर्यमोहिन्यै नमः । ॐ रक्तभक्त्यर्पणायै नमः । ॐ रक्तचक्रस्थायै नमः । ॐ रक्तबीजरूपिण्यै नमः । ॐ रक्तत्रिपुरनाशिन्यै नमः । ॐ रक्तमहानादिनी नमः । ॐ रक्तशिवशक्त्यै नमः । ॐ रक्तहंसवाहिन्यै नमः । ॐ रक्तनारायणरूपिण्यै नमः । ॐ रक्तमहायोगिन्यै नमः । ॐ रक्तत्रिकूटवसिन्यै नमः । ॐ रक्तप्रेमप्रदायिन्यै नमः । ॐ रक्तपूर्णमहाशक्त्यै नमः । ॐ रक्तमन्त्रप्रकाशिन्यै नमः । ॐ रक्तविद्येश्वर्यै नमः । ॐ रक्तत्रैलोक्यजनन्यै नमः । ॐ रक्तभूतप्रेतनाशिन्यै नमः । ॐ रक्तानन्ददायिन्यै नमः । ॐ रक्तारुणघनायै नमः । ॐ रक्तलक्ष्मीस्वरूपिण्यै नमः । ॐ रक्तसिद्धिविनोदिन्यै नमः । ॐ रक्तदर्शितमार्गायै नमः । ॐ रक्ततत्त्वविलासिन्यै नमः । ॐ रक्तदुर्गाप्रियायै नमः । ॐ रक्तज्योतिप्रदायिन्यै नमः । ॐ रक्तशान्तिस्वरूपिण्यै नमः । ॐ रक्तदया मूर्त्यै नमः । ॐ रक्तकपालधारिण्यै नमः । ॐ रक्तकुण्डलशोभिन्यै नमः । ॐ रक्तस्नानसन्तुष्टायै नमः । ॐ रक्तपुरश्चर्याराध्यायै नमः । ॐ रक्तशक्तिसिद्धिप्रदायिन्यै नमः । ॐ रक्तयज्ञप्रिया देव्यै नमः । ॐ रक्तगुणाधिष्ठात्र्यै नमः । ॐ रक्तचेतना रूपिण्यै नमः । ॐ रक्तबन्धविनाशिन्यै नमः । ॐ रक्तोर्जस्विन्यै नमः । ॐ रक्तार्चनरूपिण्यै नमः । ॐ रक्तपीठनिलयायै नमः । ॐ रक्ताम्बरा लोहिता लक्ष्म्यै नमः । ॥ इति श्री रक्ताम्बरा लोहिता लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥ ॥ समापन मन्त्र ॥ ॐ भगवती रक्ताम्बरायै लोहिता लक्ष्म्यै नमः । ॐ रक्तवर्णायै लोहितायै नमः । ॐ श्रीं ह्रीं रक्ताम्बरायै महालक्ष्म्यै नमः । ॐ ऐं ह्रीं क्लीं रक्तबीजाङ्कुरायै नमः ।

रक्ताम्बरा लोहिता लक्ष्मी — तांत्रिक रहस्य और स्वरूप

रक्ताम्बरा लोहिता लक्ष्मी (Raktambara Lohita Lakshmi) माँ महालक्ष्मी का एक अत्यंत विशिष्ट और उग्र तांत्रिक स्वरूप है। 'रक्ताम्बरा' का अर्थ है 'लाल वस्त्र धारण करने वाली' और 'लोहिता' का अर्थ है 'रक्त (लाल) वर्ण वाली'। सामान्यतः हम लक्ष्मी जी को सौम्य, कमल पर बैठी हुई और धन वर्षा करती हुई देखते हैं, लेकिन यह स्वरूप 'तंत्रनायिका' (Tantra Nayika) है।
भयानक और दिव्य समन्वय: ध्यान श्लोक में माँ को "रक्तवदनां रक्तजिह्वां भयानकाम्" (लाल मुख, लाल जीभ वाली और भयानक) कहा गया है। उनके चार मुख और आठ भुजाएं हैं। वे एक हाथ में खड्ग (तलवार) और कपाल (खोपड़ी) धारण करती हैं, जो महाकाली के लक्षण हैं। वहीं दूसरे हाथों में पद्म (कमल) और शंख हैं, जो महालक्ष्मी के लक्षण हैं। यह स्वरूप काली और लक्ष्मी का अद्भुत संगम है।
वाहन रहस्य: इस स्वरूप में माँ सिंह (शेर) पर सवार हैं, जो शक्ति और राजसी सत्ता का प्रतीक है। उनके साथ गरुड़ (विष्णु वाहन) और उल्लू (लक्ष्मी वाहन) दोनों मौजूद हैं। यह दर्शाता है कि वे वैष्णवी होते हुए भी तांत्रिक शक्तियों (रात्रि/उल्लू) और आकाशीय शक्तियों (गरुड़) पर पूर्ण नियंत्रण रखती हैं।

नामावली के सिद्ध लाभ (Benefits)

इस 108 नामावली का पाठ करने से साधक को वे लाभ मिलते हैं जो सामान्य सौम्य साधना से दुर्लभ हैं:
  • शत्रु विनाश और विजय: नाम 4 "चण्डिकारूपिण्यै" और नाम 42 "रक्तबीजविनाशिन्यै" का जप शत्रुओं, विरोधियों और कोर्ट कचहरी के मुकदमों में तत्काल विजय दिलाता है। माँ साधक के शत्रुओं का स्तंभन कर देती हैं।
  • प्रचंड वशीकरण और आकर्षण: नाम 38 "रक्तत्रैलोक्यमोहिन्यै" और नाम 57 "रक्तकामप्रदायिन्यै" वशीकरण (Attraction) के लिए अमोघ हैं। इस पाठ से साधक के व्यक्तित्व में एक तीव्र चुंबकीय आकर्षण पैदा होता है।
  • आकस्मिक धन प्राप्ति: नाम 15 "रक्तसिद्धिप्रदायिन्यै" और नाम 88 "रक्तलक्ष्मीस्वरूपिण्यै" से रुका हुआ धन, लॉटरी, सट्टा या आकस्मिक संपत्ति (Windfall Gain) के योग बनते हैं।
  • तंत्र बाधा निवारण: नाम 85 "रक्तभूतप्रेतनाशिन्यै" स्पष्ट करता है कि यह पाठ ऊपरी हवा, बुरी नज़र, काला जादू और भूत-प्रेत की बाधाओं को जलाकर भस्म कर देता है।

साधना विधि एवं तांत्रिक नियम (Ritual Method)

चूँकि यह एक उग्र साधना है, इसे पूरी सावधानी और पवित्रता के साथ करना चाहिए।
  • रंग का महत्व: इस साधना में 'लाल' (Red) रंग अनिवार्य है। साधक को लाल वस्त्र पहनने चाहिए, लाल आसन पर बैठना चाहिए, और माँ को लाल फूल (गुड़हल या लाल गुलाब) अर्पित करने चाहिए।
  • समय: इस पाठ के लिए मध्यरात्रि (Nishita Kaal), अमावस्या, या ग्रहण काल सर्वश्रेष्ठ है। मंगलवार और शुक्रवार की रात भी उपयुक्त है।
  • दीपक: मिट्टी या तांबे के दीपक में तिल का तेल भरकर उसमें लाल बाती (मौली धागे की) जलाएं। दीपक का मुख दक्षिण दिशा की ओर रखें।
  • नैवेद्य: माँ को अनार, गुड़, शहद, या लाल रंग की मिठाई का भोग लगाएं। तांत्रिक पद्धति में तांबूल (लौंग-इलायची युक्त पान) का अर्पण अनिवार्य माना गया है।
  • जप संख्या: कार्य सिद्धि के लिए रक्त-चंदन या मूंगे की माला से 108 नामों का पाठ करें। अंत में "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं रक्तबीजाङ्कुरायै नमः" मंत्र का 21 बार जप करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. रक्ताम्बरा लोहिता लक्ष्मी कौन हैं?

रक्ताम्बरा लोहिता लक्ष्मी माँ महालक्ष्मी का एक अत्यंत उग्र और तांत्रिक स्वरूप हैं। वे लाल वस्त्र पहनती हैं, उनका शरीर रक्त वर्ण का है, और वे खड्ग, कपाल, शंख आदि धारण करती हैं। यह रूप शत्रुओं के नाश और वशीकरण के लिए है।

2. इस नामावली का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इस नामावली का मुख्य उद्देश्य तांत्रिक सिद्धियों (विशेषकर वशीकरण और आकर्षण), शत्रुओं के विनाश, बुरी शक्तियों से रक्षा और आकस्मिक धन प्राप्ति के लिए माँ की उग्र शक्ति को प्रसन्न करना है।

3. ध्यान में माँ का स्वरूप कैसा बताया गया है?

ध्यान श्लोक के अनुसार, माँ का शरीर सिन्दूर जैसा लाल है, वे तीन नेत्रों वाली (त्रिनेत्रा) और भयानक हैं। उनके चार मुख और आठ भुजाएं हैं। वे सिंह पर सवार हैं और उनके साथ गरुड़ व उल्लू भी हैं।

4. क्या यह पाठ घर पर किया जा सकता है?

यह एक उग्र साधना है। इसे घर पर करते समय पूर्ण सात्विकता और गुरु मार्गदर्शन अनिवार्य है। यदि शत्रु बाधा या तंत्र दोष बहुत अधिक हो, तभी इसका प्रयोग करना चाहिए।

5. पाठ के लिए कौन सा रंग अनिवार्य है?

माँ को 'लाल' रंग अत्यंत प्रिय है। साधना में लाल वस्त्र (रक्ताम्बर), लाल आसन, लाल फूल (गुड़हल/कमल), और लाल चंदन का प्रयोग अनिवार्य है। नाम 17 में उन्हें 'रक्तरक्ताभूषणायै' (लाल आभूषण पहनने वाली) कहा गया है।

6. गरुड़ और उल्लू का क्या महत्व है?

ध्यान में बताया गया है कि माँ के साथ 'गरुड़' (विष्णु का वाहन) और 'उल्लू' (लक्ष्मी का वाहन) दोनों हैं। यह दर्शाता है कि वे वैष्णवी शक्ति होते हुए भी तांत्रिक निशामुखी (रात्रि) शक्तियों की भी स्वामिनी हैं।

7. 'रक्तबीजविनाशिन्यै' (नाम 42) का क्या अर्थ है?

यह नाम दर्शाता है कि माँ लोहिता लक्ष्मी ने ही चामुंडा रूप में रक्तबीज नामक असुर का रक्त पीकर उसका विनाश किया था। अतः यह स्वरूप महाकाली के अत्यंत निकट है।

8. इस साधना का सर्वोत्तम समय क्या है?

अमावस्या की रात्रि, ग्रहण काल, या मंगलवार और शुक्रवार की मध्यरात्रि (निशीथ काल) इस उग्र साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।

9. क्या इस पाठ से कर्ज मुक्ति मिलती है?

हाँ, उग्र लक्ष्मी की साधना से फंसा हुआ धन (Blocked Money) या कर्ज की समस्या बहुत तेजी से हल होती है, क्योंकि वे बाधाओं को बलपूर्वक हटाती हैं।

10. नैवेद्य में क्या अर्पित करें?

माँ को अनार, गुड़, लाल मिठाई या शहद का भोग लगाना चाहिए। कुछ परंपराओं में तांबूल (पान) भी अर्पित किया जाता है।