Sri Lakshmi Ashtottara Satanama Stotram – श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र: एक परिचय
श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र (Sri Lakshmi Ashtottara Satanama Stotram) माँ महालक्ष्मी की स्तुति में भगवान शिव द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली और तांत्रिक महत्व वाला स्तोत्र है। हिंदू धर्म में लक्ष्मी जी के अनेक स्तोत्र प्रचलित हैं, जैसे कनकधारा या श्री सूक्तम्, लेकिन यह स्तोत्र अपनी बीज-मंत्र शक्ति के कारण अद्वितीय है।
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह माँ लक्ष्मी को केवल धन की देवी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें 'भुवनेश्वरी' (संपूर्ण ब्रह्मांड की स्वामिनी) और 'नवदुर्गा' (शक्ति स्वरूप) के रूप में प्रतिष्ठित करता है। जो साधक कर्ज, दरिद्रता या दुर्भाग्य से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह स्तोत्र "रामबाण" औषधि के समान कार्य करता है।
इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और तांत्रिक रहस्य
सामान्यतः लक्ष्मी पाठ सौम्य होते हैं, लेकिन इस स्तोत्र में तांत्रिक बीजों का गुप्त समावेश है जो इसे त्वरित फलदाई बनाता है। श्लोक 7 और 14 में इसके रहस्य छिपे हैं:
| तत्व | विवरण और प्रभाव |
|---|---|
| बीज मंत्र (Beeja) | 'क्लीं' (Kleem) - यह कामराज बीज है। यह देवी का आकर्षण मंत्र है जो धन, अवसर और लोगों को आपकी ओर आकर्षित करता है। |
| शक्ति स्वरूप | भुवनेश्वरी शक्ति - दस महाविद्याओं में से एक। यह साधक को भूमि, भवन और प्रभुत्व (Authority) प्रदान करती हैं। |
| उग्र रूप (Fierce Form) | इसे 'नवदुर्गा' और 'महाकाली' भी कहा गया है। इसका अर्थ है कि यह लक्ष्मी पाठ आपके शत्रुओं और बाधकों का भी नाश करता है। |
स्तोत्र पाठ के लाभ (फलश्रुति)
- ➤दरिद्रता नाश (Poverty Removal): श्लोक 4 में इसे स्पष्ट रूप से 'दारिद्र्यमोचनं' कहा गया है। यह कोटि जन्मों की दरिद्रता को नष्ट कर सकता है।
- ➤कुबेर समान ऐश्वर्य: जो साधक एक वर्ष तक नियमपूर्वक पाठ करता है, उसे कुबेर के समान अतुलनीय धन की प्राप्ति होती है।
- ➤अष्टसिद्धि की प्राप्ति: यह केवल धन (Cash) नहीं, बल्कि अष्टसिद्धियाँ (अणिमा, गरिमा आदि) और राज-सम्मान (Royal favor) भी प्रदान करता है।
- ➤सर्वपाप प्रणाशन: धन के साथ-साथ यह आत्मिक शुद्धि भी करता है और पापों का नाश कर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
पाठ करने की विधि और नियम
- सही समय: प्रातःकाल (Sunrise time) या संध्याकाल (Sunset time)। शुक्रवार (Bhriguvasara) का दिन इसके लिए सर्वश्रेष्ठ है।
- आसन और दिशा: उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करके लाल या गुलाबी आसन पर बैठें।
- संकल्प: पाठ शुरू करने से पहले हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना (जैसे - ऋण मुक्ति, व्यापार वृद्धि) का संकल्प लें।
- ध्यान: श्लोकों में वर्णित माँ के स्वरूप का ध्यान करें - जो कमल के आसन पर विराजमान हैं और जिनके हाथों में वरद और अभय मुद्रा है।
- समर्पण: पाठ के अंत में माँ को मिसरी या खीर का भोग लगाएं।
श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र: प्रश्नोत्तरी (FAQ)
- लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र और नामावली में क्या अंतर है?
स्तोत्र लयात्मक श्लोक होता है जिसमें देवी के गुणों का वर्णन होता है, जैसे 'वन्दे पद्मकरां प्रसन्नवदनां...'। इसका पाठ स्तुति के रूप में किया जाता है। जबकि नामावली में 108 नाम (जैसे 'ॐ प्रकृत्यै नमः') होते हैं, जिनका उपयोग एक-एक नाम पर फूल या कुमकुम चढ़ाने (अर्चन) के लिए किया जाता है। पूजा के अंत में स्तोत्र पाठ करना श्रेष्ठ होता है।
- इस स्तोत्र में 'क्लीं' (Kleem) बीज का क्या महत्व है?
'क्लीं' कामराज बीज है। जब यह लक्ष्मी स्तोत्र के साथ जुड़ता है, तो यह आकर्षण शक्ति को बढ़ाता है। इसका अर्थ है कि धन और समृद्धि आपको ढूंढते हुए आपके पास आएंगे। यह बीज मंत्र लक्ष्मी की चंचलता को समाप्त कर उन्हें स्थिर बनाता है।
- क्या इस स्तोत्र का पाठ राहु-केतु की दशा में किया जा सकता है?
जी हाँ। चूँकि इस स्तोत्र में माँ लक्ष्मी को 'नवदुर्गा' और 'महाकाली' (श्लोक 14) कहा गया है, यह क्रूर ग्रहों की शांति के लिए भी अत्यंत प्रभावशाली है। राहु-केतु जनित आर्थिक कष्टों में यह विशेष लाभ देता है।
- अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र के पाठ का सबसे शुभ दिन कौन सा है?
शास्त्रों (फलश्रुति) के अनुसार, 'भृगुवारे' यानी शुक्रवार (Friday) इसके लिए सर्वोत्तम है। इसके अलावा पूर्णिमा, दीपावली और नित्य प्रदोष काल में भी इसका पाठ अक्षय पुण्य देने वाला है।
- क्या स्त्रियाँ मासिक धर्म (Periods) में यह पाठ कर सकती हैं?
मानसिक पाठ (मन ही मन) किसी भी अवस्था में किया जा सकता है, लेकिन सस्वर पाठ और पूजा अनुष्ठान मासिक धर्म के दौरान वर्जित है। शुद्धि के बाद ही पुनः पाठ आरंभ करें।
- पाठ करते समय किस दिशा में मुख रखना चाहिए?
धन प्राप्ति के अनुष्ठानों के लिए उत्तर दिशा (North) सर्वोत्तम मानी गई है क्योंकि यह कुबेर की दिशा है। सामान्य भक्ति के लिए पूर्व दिशा (East) की ओर मुख करके पाठ करना चाहिए।
- क्या पाठ के लिए दीक्षा लेना आवश्यक है?
नहीं, यह एक स्तोत्र है, मंत्र नहीं। स्तोत्र पाठ के लिए गुरु दीक्षा की अनिवार्यता नहीं होती। कोई भी श्रद्धालु शुद्ध मन से इसका पाठ कर सकता है।
- 'दारिद्र्यमोचन' के लिए कम से कम कितने दिन पाठ करना चाहिए?
ग्रंथ में 'षण्मासं' (6 महीने) का उल्लेख है। यदि आप गंभीर आर्थिक संकट में हैं, तो संकल्प लेकर लगातार 6 महीने तक नित्य एक या तीन बार पाठ करें। परिणाम अवश्य मिलेंगे।
- क्या यह स्तोत्र केवल धन देता है?
नहीं, श्लोक 11 में 'स्रैणसौम्यां' और 'शुभप्रदाम्' कहा गया है, जिसका अर्थ है यह सुंदरता, सौम्यता, अच्छा स्वास्थ्य और पारिवारिक सुख भी प्रदान करता है। यह सर्वांगीण उन्नति का स्तोत्र है।
- पाठ के अंत में कौन सी आरती करनी चाहिए?
पाठ के बाद 'ॐ जय लक्ष्मी माता' आरती करना उत्तम है। आप कपूर गौरम मंत्र के साथ भी समापन कर सकते हैं। आरती से पाठ में हुई किसी भी त्रुटि की क्षमा मिलती है।