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Sri Padmavathi Ashtottara Shatanamavali – श्री पद्मावती अष्टोत्तरशतनामावली

Sri Padmavathi Ashtottara Shatanamavali – श्री पद्मावती अष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री पद्मावती अष्टोत्तरशतनामावली ॥ १-९ ओं पद्मावत्यै नमः । ओं देव्यै नमः । ओं पद्मोद्भवायै नमः । ओं करुणप्रदायिन्यै नमः । ओं सहृदयायै नमः । ओं तेजस्वरूपिण्यै नमः । ओं कमलमुखै नमः । ओं पद्मधरायै नमः । ओं श्रियै नमः । १०-१८ ओं पद्मनेत्रे नमः । ओं पद्मकरायै नमः । ओं सुगुणायै नमः । ओं कुङ्कुमप्रियायै नमः । ओं हेमवर्णायै नमः । ओं चन्द्रवन्दितायै नमः । ओं धगधगप्रकाश शरीरधारिण्यै नमः । ओं विष्णुप्रियायै नमः । ओं नित्यकल्याण्यै नमः । १९-२७ ओं कोटिसूर्यप्रकाशिन्यै नमः । ओं महासौन्दर्यरूपिण्यै नमः । ओं भक्तवत्सलायै नमः । ओं ब्रह्माण्डवासिन्यै नमः । ओं सर्ववाञ्छाफलदायिन्यै नमः । ओं धर्मसङ्कल्पायै नमः । ओं दाक्षिण्यकटाक्षिण्यै नमः । ओं भक्तिप्रदायिन्यै नमः । ओं गुणत्रयविवर्जितायै नमः । २८-३६ ओं कलाषोडशसम्युतायै नमः । ओं सर्वलोकानां जनन्यै नमः । ओं मुक्तिदायिन्यै नमः । ओं दयामृतायै नमः । ओं प्राज्ञायै नमः । ओं महाधर्मायै नमः । ओं धर्मरूपिण्यै नमः । ओं अलङ्कार प्रियायै नमः । ओं सर्वदारिद्र्यध्वंसिन्यै नमः । ३७-४५ ओं श्री वेङ्कटेशवक्षस्थलस्थितायै नमः । ओं लोकशोकविनाशिन्यै नमः । ओं वैष्णव्यै नमः । ओं तिरुचानूरुपुरवासिन्यै नमः । ओं वेदविद्याविशारदायै नमः । ओं विष्णुपादसेवितायै नमः । ओं रत्नप्रकाशकिरीटधारिण्यै नमः । ओं जगन्मोहिन्यै नमः । ओं शक्तिस्वरूपिण्यै नमः । ४६-५४ ओं प्रसन्नोदयायै नमः । ओं इन्द्रादिदैवत यक्षकिन्नेरकिम्पुरुषपूजितायै नमः । ओं सर्वलोकनिवासिन्यै नमः । ओं भूजयायै नमः । ओं ऐश्वर्यप्रदायिन्यै नमः । ओं शान्तायै नमः । ओं उन्नतस्थानस्थितायै नमः । ओं मन्दारकामिन्यै नमः । ओं कमलाकरायै नमः । ५५-६३ ओं वेदान्तज्ञानरूपिण्यै नमः । ओं सर्वसम्पत्तिरूपिण्यै नमः । ओं कोटिसूर्यसमप्रभायै नमः । ओं पूजफलदायिन्यै नमः । ओं कमलासनादि सर्वदेवतायै नमः । ओं वैकुण्ठवासिन्यै नमः । ओं अभयदायिन्यै नमः । ओं द्राक्षाफलपायसप्रियायै नमः । ओं नृत्यगीतप्रियायै नमः । ६४-७२ ओं क्षीरसागरोद्भवायै नमः । ओं आकाशराजपुत्रिकायै नमः । ओं सुवर्णहस्तधारिण्यै नमः । ओं कामरूपिण्यै नमः । ओं करुणाकटाक्षधारिण्यै नमः । ओं अमृतासुजायै नमः । ओं भूलोकस्वर्गसुखदायिन्यै नमः । ओं अष्टदिक्पालकाधिपत्यै नमः । ओं मन्मधदर्पसंहार्यै नमः । ७३-८१ ओं कमलार्धभागायै नमः । ओं स्वल्पापराध महापराध क्षमायै नमः । ओं षट्कोटितीर्थवासितायै नमः । ओं नारदादिमुनिश्रेष्ठपूजितायै नमः । ओं आदिशङ्करपूजितायै नमः । ओं प्रीतिदायिन्यै नमः । ओं सौभाग्यप्रदायिन्यै नमः । ओं महाकीर्तिप्रदायिन्यै नमः । ओं कृष्णातिप्रियायै नमः । ८२-९० ओं गन्धर्वशापविमोचकायै नमः । ओं कृष्णपत्न्यै नमः । ओं त्रिलोकपूजितायै नमः । ओं जगन्मोहिन्यै नमः । ओं सुलभायै नमः । ओं सुशीलायै नमः । ओं अञ्जनासुतानुग्रहप्रदायिन्यै नमः । ओं भक्त्यात्मनिवासिन्यै नमः । ओं सन्ध्यावन्दिन्यै नमः । ९१-९९ ओं सर्वलोकमात्रे नमः । ओं अभिमतदायिन्यै नमः । ओं ललितावधूत्यै नमः । ओं समस्तशास्त्रविशारदायै नमः । ओं सुवर्णाभरणधारिण्यै नमः । ओं इहपरलोकसुखप्रदायिन्यै नमः । ओं करवीरनिवासिन्यै नमः । ओं नागलोकमणिसहा आकाशसिन्धुकमलेश्वरपूरित रथगमनायै नमः । ओं श्री श्रीनिवासप्रियायै नमः । १००-१०८ ओं चन्द्रमण्डलस्थितायै नमः । ओं अलिवेलुमङ्गायै नमः । ओं दिव्यमङ्गलधारिण्यै नमः । ओं सुकल्याणपीठस्थायै नमः । ओं कामकवनपुष्पप्रियायै नमः । ओं कोटिमन्मधरूपिण्यै नमः । ओं भानुमण्डलरूपिण्यै नमः । ओं पद्मपादायै नमः । ओं रमायै नमः । १०९-१२० ओं सर्वलोकसभान्तरधारिण्यै नमः । ओं सर्वमानसवासिन्यै नमः । ओं सर्वायै नमः । ओं विश्वरूपायै नमः । ओं दिव्यज्ञानायै नमः । ओं सर्वमङ्गलरूपिण्यै नमः । ओं सर्वानुग्रहप्रदायिन्यै नमः । ओं ओङ्कारस्वरूपिण्यै नमः । ओं ब्रह्मज्ञानसम्भूतायै नमः । ओं पद्मावत्यै नमः । ओं सद्योवेदवत्यै नमः । ओं श्री महालक्ष्म्यै नमः । ॥ इति श्री पद्मावती अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥

श्री पद्मावती अष्टोत्तरशतनामावली: परिचय एवं आध्यात्मिक रहस्य (Introduction)

श्री पद्मावती अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Padmavathi Ashtottara Shatanamavali) हिन्दू धर्म के महान श्रीवैष्णव संप्रदाय का एक अत्यंत तेजस्वी और श्रद्धापूर्ण पाठ है। यह नामावली तिरुमाला (तिरुपति) के अधिपति भगवान वेंकटेश्वर की दिव्य अर्धाङ्गिनी माँ पद्मावती के १२० (मुख्यतः १०८) पवित्र नामों का संकलन है। माँ पद्मावती को प्यार से 'अलमेलु मङ्गा' (Alamelu Manga) भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है — वह देवी जो पुष्प (कमल) पर निवास करती हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, माँ पद्मावती साक्षात् महालक्ष्मी का स्वरूप हैं, जिन्होंने कलियुग में भक्तों का उद्धार करने के लिए आकाश राजा की पुत्री के रूप में जन्म लिया था।
पौराणिक कथा और प्राकट्य: माँ पद्मावती का प्राकट्य एक अत्यंत दिव्य घटना है। कहा जाता है कि आकाश राजा ने यज्ञ के लिए भूमि जोतते समय एक स्वर्ण कमल (Padma) के भीतर एक अद्भुत कन्या को पाया। चूँकि उनका प्राकट्य कमल से हुआ था, इसलिए उनका नाम "पद्मावती" पड़ा। स्तोत्र के नाम ३ और ६५ में उन्हें "पद्मोद्भवा" और "आकाशराजपुत्रिका" कहकर इसी सत्य की पुष्टि की गई है। उनका विवाह भगवान श्रीनिवास (वेंकटेश्वर) से हुआ, जो भक्तों के लिए एक महान आध्यात्मिक मिलन का प्रतीक है।
दार्शनिक गहराई (Purushakara): श्रीवैष्णव दर्शन में माँ पद्मावती को "पुरुषकार" (Mediator) माना गया है। वे जीवात्मा और परमात्मा (वेंकटेश्वर स्वामी) के बीच एक सेतु का कार्य करती हैं। भगवान वेंकटेश्वर न्याय के अधिष्ठाता हैं और कर्मों का फल देते हैं, लेकिन माँ पद्मावती साक्षात् करुणा (Mercy) की प्रतिमूर्ति हैं। वे भक्त के अपराधों को क्षमा कराकर उसे प्रभु के चरणों तक पहुँचाती हैं। नाम ३८ में उन्हें "लोकशोकविनाशिन्यै" कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि वे संसार के समस्त कष्टों को हरने वाली हैं।
आध्यात्मिक विशेषज्ञों के अनुसार, तिरुचानूर (तिरुपाति के समीप) का मंदिर माँ पद्मावती का मूल निवास स्थान है। तिरुमाला की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भक्त माँ पद्मावती के दर्शन न कर ले। यह अष्टोत्तरशतनामावली न केवल उनके बाह्य सौंदर्य (जैसे रत्नप्रकाशकिरीट) का वर्णन करती है, बल्कि उनकी तात्विक स्थिति को भी प्रकट करती है कि वे "ब्रह्मज्ञानसम्भूता" और "ओङ्कारस्वरूपिणी" हैं। यह पाठ साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा जाग्रत कर उसे मानसिक स्पष्टता और आध्यात्मिक ओज प्रदान करता है।

विशिष्ट महत्व: ऐश्वर्य और सौभाग्य की देवी (Significance)

श्री पद्मावती अष्टोत्तरशतनामावली का विशिष्ट महत्व इसके "धन-प्रदायक" और "सौभाग्य-वर्धक" स्वभाव में निहित है। माँ पद्मावती साक्षात् 'श्री' का अवतार हैं। जिनके जीवन में आर्थिक तंगी, व्यापार में हानि या दरिद्रता का प्रभाव है, उनके लिए नाम ३६ — "सर्वदारिद्र्यध्वंसिन्यै" का पाठ किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है। यह नामावली केवल भौतिक धन ही नहीं, बल्कि "दिव्य ज्ञान" (नाम ११३) भी प्रदान करती है, जो मनुष्य को मोह-माया के बंधनों से मुक्त करता है।
इस पाठ का एक और महत्वपूर्ण पहलू पारिवारिक शान्ति और अखंड सौभाग्य है। माँ को "नित्यकल्याणी" और "सौभाग्यप्रदायिनी" (नाम १८ और ८०) कहा गया है। सुहागिन स्त्रियाँ अपने सुखी दांपत्य जीवन के लिए माँ की शरण लेती हैं। तिरुचानूर के 'पद्म सरोवर' में स्नान करने के पश्चात इस नामावली का पाठ करना अनंत गुना फलदायी माना गया है। यह पाठ साधक को कलियुग की नकारात्मकताओं से बचाकर भगवान श्रीनिवास के "वक्षस्थल" (हृदय) में स्थान दिलाता है।

फलश्रुति: माँ पद्मावती की आराधना के दिव्य लाभ (Benefits)

शास्त्रों और भक्तों के प्रामाणिक अनुभवों के अनुसार, इस नामावली के नियमपूर्वक पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति: चूँकि वे "सर्वसम्पत्तिरूपिणी" (नाम ५६) हैं, उनके नामों का पाठ दरिद्रता को मिटाकर आय के नए स्रोत खोलता है।
  • संतान एवं परिवार रक्षा: "सर्वलोकानां जनन्यै" होने के कारण वे अपने भक्तों की संतानों की रक्षा करती हैं और कुल में वृद्धि करती हैं।
  • दोषों और अपराधों की क्षमा: नाम ७४ — "स्वल्पापराध महापराध क्षमायै" — यह स्पष्ट करता है कि माँ भक्त के छोटे और बड़े सभी अपराधों को क्षमा कर देती हैं।
  • ग्रह पीड़ा और शत्रु शान्ति: भगवान वेंकटेश्वर की शक्ति के रूप में, माँ का पाठ शत्रुओं के दर्प को नष्ट करता है और ग्रहों की प्रतिकूलता (विशेषकर शुक्र दोष) को दूर करता है।
  • मोक्ष और वैकुण्ठ लाभ: "मुक्तिदायिन्यै" (नाम ३०) के रूप में माँ साधक को अंततः जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर परम पद प्रदान करती हैं।

पाठ विधि एवं साधना विधान (Ritual Method)

माँ पद्मावती (अलमेलु मङ्गा) की पूजा में "पवित्रता" और "कोमलता" का विशेष स्थान है। फलदायी परिणामों के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:
  • समय: माँ पद्मावती की आराधना के लिए शुक्रवार का दिन सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा पूर्णिमा और कार्तिक मास के 'ब्रह्मोत्सव' के दौरान पाठ करना अत्यंत शुभ है।
  • शुद्धि: पाठ के समय लाल, गुलाबी या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • पूजन सामग्री: माँ पद्मावती या महालक्ष्मी की प्रतिमा के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाएं। उन्हें लाल कमल (Lotus) या गुलाब के पुष्प अर्पित करना अत्यंत प्रिय है।
  • नैवेद्य: माँ को "द्राक्षाफल पायस" (किशमिश वाली खीर) या मिश्री का भोग लगाएं (नाम ६२)।
  • आसन: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके रेशमी या ऊनी आसन पर बैठकर पाठ करें।
  • विशेष निर्देश: पाठ के अंत में "ॐ नमो वेंकटेशाय" और "ॐ श्री पद्मावत्यै नमः" का ११ बार जाप अवश्य करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. माँ पद्मावती और अलमेलु मङ्गा में क्या संबंध है?
ये दोनों एक ही देवी के नाम हैं। तेलुगु में उन्हें 'अलमेलु मङ्गा' कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'पुष्प पर निवास करने वाली देवी'। संस्कृत में उन्हें 'पद्मावती' कहा जाता है।
2. माँ पद्मावती का मंदिर कहाँ स्थित है?
उनका मुख्य और ऐतिहासिक मंदिर तिरुपति के निकट तिरुचानूर (तिरुचुकानूर) में स्थित है। इसे 'अलरमेलु मङ्गापुरम' भी कहा जाता है।
3. क्या इस नामावली के पाठ से आर्थिक संकट दूर हो सकते हैं?
जी हाँ, माँ पद्मावती साक्षात् महालक्ष्मी हैं। "सर्वदारिद्र्यध्वंसिन्यै" होने के कारण उनका पाठ कर्ज मुक्ति और धन प्राप्ति में अत्यंत सहायक है।
4. पाठ के लिए शुक्रवार का दिन ही क्यों विशेष है?
हिन्दू धर्म में शुक्रवार महालक्ष्मी और शक्ति की उपासना का दिन है। माँ पद्मावती लक्ष्मी स्वरूपा हैं, इसलिए शुक्रवार को उनकी पूजा का विशेष फल मिलता है।
5. माँ पद्मावती को किसका अवतार माना जाता है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार वे भूदेवी (धरती माता) और महालक्ष्मी का संयुक्त अवतार मानी जाती हैं, जिनका जन्म कमल से हुआ था।
6. "अञ्जनासुतानुग्रहप्रदायिनी" नाम का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है— "अञ्जना के पुत्र (हनुमान जी) पर अनुग्रह करने वाली"। यह देवी की उन शक्तियों को दर्शाता है जो चिरंजीवी भक्तों पर भी कृपा करती हैं।
7. क्या इस पाठ से वैवाहिक समस्याओं का समाधान होता है?
निश्चित रूप से। माँ पद्मावती अखंड सौभाग्य की स्वामिनी हैं। उनके पाठ से विवाह बाधाएं दूर होती हैं और सुखी दांपत्य जीवन प्राप्त होता है।
8. "द्राक्षाफल पायस" का भोग माँ को क्यों लगाया जाता है?
नामावली के श्लोक ६२ में इसका उल्लेख है। द्राक्षा (अंगूर/किशमिश) और पायस (खीर) माँ को अत्यंत प्रिय हैं, जो समृद्धि और मधुरता का प्रतीक हैं।
9. क्या इस नामावली में १२० नाम हैं?
हाँ, यद्यपि इसे 'अष्टोत्तरशत' (१०८) कहा जाता है, लेकिन संपूर्ण स्तुति और फलश्रुति को मिलाकर कुल १२० नामों का विधान है जो माँ की पूर्ण महिमा को दर्शाते हैं।
10. माँ के दर्शन के बिना तिरुपति की यात्रा अधूरी क्यों है?
मान्यता है कि प्रभु वेंकटेश्वर ने माँ के साथ तिरुचानूर में समय व्यतीत किया था। माँ 'श्री' (लक्ष्मी) हैं और प्रभु 'निवास' हैं। बिना 'श्री' के 'निवास' की यात्रा पूर्ण नहीं होती।