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Saranagati Gadyam – शरणागति गद्यम् (Sri Ramanujacharya's Prayer of Surrender)

Saranagati Gadyam – शरणागति गद्यम् (Sri Ramanujacharya's Prayer of Surrender)
॥ शरणागति गद्यम् ॥ ॥ गुरु वन्दना ॥ यो नित्यमच्युतपदाम्बुजयुग्मरुक्म व्यामोहतस्तदितराणि तृणाय मेने । अस्मद्गुरोर्भगवतोऽस्य दयैकसिन्धोः रामानुजस्य चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ वन्दे वेदान्तकर्पूरचामीकर करण्डकम् । रामानुजार्यमार्याणां चूडामणिमहर्निशम् ॥ ॥ लक्ष्मी शरणागति ॥ ओम् ॥ भगवन्नारायणाभिमतानुरूप स्वरूपरूप गुणविभवैश्वर्य शीलाद्यनवधिकातिशय असङ्ख्येय कल्याणगुणगणां पद्मवनालयां भगवतीं श्रियं देवीं नित्यानपायिनीं निरवद्यां देवदेवदिव्यमहिषीं अखिलजगन्मातरं अस्मन्मातरं अशरण्यशरण्यां अनन्यशरणः शरणमहं प्रपद्ये ॥ पारमार्थिक भगवच्चरणारविन्द युगलैकान्तिकात्यन्तिक परभक्ति परज्ञान परमभक्तिकृत परिपूर्णानवरत नित्यविशदतमानन्य प्रयोजनानवधिकातिशय प्रिय भगवदनुभवजनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचित अशेषशेषतैकरतिरूप नित्यकैङ्कर्यप्राप्त्यपेक्षया पारमार्थिकी भगवच्चरणारविन्द शरणागतिः यथावस्थिता अविरताऽस्तु मे ॥ अस्तु ते । तयैव सर्वं सम्पत्स्यते ॥ ॥ नारायण शरणागति ॥ अखिलहेयप्रत्यनीक कल्याणैकतान, स्वेतर समस्तवस्तुविलक्षणानन्त ज्ञानानन्दैकस्वरूप, स्वाभिमतानुरूपैकरूपाचिन्त्य दिव्याद्भुत नित्यनिरवद्य निरतिशयौज्ज्वल्य सौन्दर्य सौगन्ध्य सौकुमार्य लावण्य यौवनाद्यनन्तगुणनिधि दिव्यरूप, स्वाभाविकानवधिकातिशय ज्ञान बलैश्वर्य वीर्य शक्ति तेजस्सौशील्य वात्सल्य मार्दवार्जव सौहार्द साम्य कारुण्य माधुर्य गाम्भीर्यौदार्य चातुर्य स्थैर्य धैर्य शौर्य पराक्रम सत्यकाम सत्यसङ्कल्प कृतित्व कृतज्ञताद्यसङ्ख्येय कल्याणगुणगणौघ महार्णव, स्वोचित विविध विचित्रानन्ताश्चर्य नित्य निरवद्य निरतिशय सुगन्ध निरतिशय सुखस्पर्श निरतिशयौज्ज्वल्य किरीट मकुट चूडावतंस मकरकुण्डल ग्रैवेयक हार केयूर कटक श्रीवत्स कौस्तुभ मुक्तादामोदरबन्धन पीताम्बर काञ्चीगुण नूपुराद्यपरिमित दिव्यभूषण, स्वानुरूपाचिन्त्यशक्ति शङ्खचक्रगदाऽसि शार्ङ्गाद्यसङ्ख्येय नित्यनिरवद्य निरतिशय कल्याणदिव्यायुध, स्वाभिमत नित्यनिरवद्यानुरूप स्वरूपरूपगुण विभवैश्वर्य शीलाद्यनवधिकातिशयासङ्ख्येय कल्याणगुणगणश्रीवल्लभ, एवम्भूत भूमिनीलानायक, स्वच्छन्दानुवर्ति स्वरूपस्थिति प्रवृत्तिभेदाशेष शेषतैकरतिरूप नित्यनिरवद्यनिरतिशय ज्ञान क्रियैश्वर्याद्यनन्त कल्याणगुणगण शेष शेषाशन गरुडप्रमुख नानाविधानन्त परिजन परिचारिका परिचरित चरणयुगल, परमयोगि वाङ्मनसाऽपरिच्छेद्य स्वरूप स्वभाव स्वाभिमत विविधविचित्रानन्तभोग्य भोगोपकरण भोगस्थान समृद्धानन्ताश्चर्यानन्त महाविभवानन्त परिमाण नित्य निरवद्य निरतिशय श्रीवैकुण्ठनाथ, स्वसङ्कल्पानुविधायि स्वरूपस्थिति प्रवृत्ति स्वशेषतैकस्वभाव प्रकृति पुरुष कालात्मक विविध विचित्रानन्त भोग्य भोक्तृवर्ग भोगोपकरण भोगस्थानरूप निखिलजगदुदय विभव लयलील, सत्यकाम, सत्यसङ्कल्प, परब्रह्मभूत, पुरुषोत्तम,महाविभूते, श्रीमन् नारायण, वैकुण्ठनाथ, अपार कारुण्य सौशील्य वात्सल्यौदार्यैश्वर्य सौन्दर्य महोदधे, अनालोचितविशेषाशेषलोक शरण्य, प्रणतार्तिहर, आश्रित वात्सल्यैकजलधे, अनवरतविदित निखिलभूतजातयाथात्म्य, अशेषचराचरभूत निखिलनियमन निरत, अशेषचिदचिद्वस्तु शेषिभूत, निखिलजगदाधार, अखिलजगत्स्वामिन्, अस्मत्स्वामिन्, सत्यकाम, सत्यसङ्कल्प, सकलेतरविलक्षण, अर्थिकल्पक, आपत्सख, श्रीमन्, नारायण, अशरण्यशरण्य, अनन्यशरणस्त्वत्पादारविन्द युगलं शरणमहं प्रपद्ये ॥ अत्र द्वयम् । ॥ श्लोकाः ॥ पितरं मातरं दारान् पुत्रान् बन्धून् सखीन् गुरून् । रत्नानि धनधान्यानि क्षेत्राणि च गृहाणि च ॥ १ ॥ सर्वधर्मांश्च सन्त्यज्य सर्वकामांश्च साक्षरान् । लोकविक्रान्तचरणौ शरणं तेऽव्रजं विभो ॥ २ ॥ त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च गुरुस्त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ ३ ॥ पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४ ॥ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ५ ॥ ॥ क्षमा याचना ॥ मनोवाक्कायैरनादिकाल प्रवृत्तानन्ताकृत्यकरण कृत्याकरण भगवदपचार भागवतापचारासह्यापचाररूप नानाविधानन्तापचारान् आरब्धकार्यान् अनारब्धकार्यान् कृतान् क्रियमाणान् करिष्यमाणांश्च सर्वानशेषतः क्षमस्व । अनादिकालप्रवृत्तविपरीत ज्ञानमात्मविषयं कृत्स्न जगद्विषयं च विपरीतवृत्तं चाशेषविषयमद्यापि वर्तमानं वर्तिष्यमाणं च सर्वं क्षमस्व । मदीयानादिकर्म प्रवाहप्रवृत्तां भगवत्स्वरूप तिरोधानकरीं विपरीतज्ञानजननीं स्वविषयायाश्च भोग्यबुद्धेर्जननीं देहेन्द्रियत्वेन भोग्यत्वेन सूक्ष्मरूपेण चावस्थितां दैवीं गुणमयीं मायां दासभूतं शरणागतोऽस्मि तवास्मि दासः इति वक्तारं मां तारय । तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ इति श्लोकत्रयोदितज्ञानिनं मां कुरुष्व । पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । भक्त्या त्वनन्यया शक्यः मद्भक्तिं लभते पराम् । इति स्थानत्रयोदित परभक्तियुक्तं मां कुरुष्व । परभक्ति परज्ञान परमभक्त्येकस्वभावं मां कुरुष्व । परभक्ति परज्ञान परमभक्तिकृत परिपूर्णानवरत नित्यविशदतमानन्य प्रयोजनानवधिकातिशय प्रिय भगवदनुभवोऽहं तथाविध भगवदनुभव जनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचिताशेष शेषतैकरतिरूप नित्यकैङ्कर्यप्राप्त्यपेक्षया पारमार्थिकी भगवच्चरणारविन्द शरणागतिः यथावस्थिता अविरताऽस्तु मे ॥ एवम्भूत मत्कैङ्कर्यप्राप्त्युपायतयाऽवक्लुप्तसमस्त वस्तुविहीनोऽपि, अनन्त तद्विरोधिपापाक्रान्तोऽपि, अनन्त मदपचारयुक्तोऽपि, अनन्त मदीयापचारयुक्तोऽपि, अनन्तासह्यापचार युक्तोऽपि, एतत्कार्यकारण भूतानादि विपरीताहङ्कार विमूढात्म स्वभावोऽपि, एतदुभयकार्यकारणभूतानादि विपरीतवासना सम्बद्धोऽपि, एतदनुगुण प्रकृति विशेषसम्बद्धोऽपि, एतन्मूलाध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविक सुखदुःख तद्धेतु तदितरोपेक्षणीय विषयानुभव ज्ञानसङ्कोचरूप मच्चरणारविन्दयुगलैकान्तिकात्यन्तिक परभक्ति परज्ञान परमभक्ति विघ्नप्रतिहतोऽपि, येन केनापि प्रकारेण द्वयवक्ता त्वं केवलं मदीययैव दयया निश्शेषविनष्ट सहेतुक मच्चरणारविन्दयुगलैकान्तिकात्यन्तिक परभक्ति परज्ञान परमभक्तिविघ्नः मत्प्रसादलब्ध मच्चरणारविन्दयुगलैकान्तिकात्यन्तिक परभक्ति परज्ञान परमभक्तिः मत्प्रसादादेव साक्षात्कृत यथावस्थित मत्स्वरूपरूपगुणविभूति लीलोपकरणविस्तारः अपरोक्षसिद्ध मन्नियाम्यता मद्दास्यैक स्वभावात्म स्वरूपः मदेकानुभवः मद्दास्यैकप्रियः परिपूर्णानवरत नित्यविशदतमानन्य प्रयोजनानवधिकातिशयप्रिय मदनुभवस्त्वं तथाविध मदनुभव जनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचिताशेष शेषतैकरतिरूप नित्यकिङ्करो भव । एवम्भूतोऽसि । आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविक दुःखविघ्नगन्धरहितस्त्वं द्वयमर्थानुसन्धानेन सह सदैवं वक्ता यावच्छरीरपातमत्रैव श्रीरङ्गे सुखमास्व ॥ ॥ आश्वासनम् ॥ शरीरपातसमये तु केवलं मदीययैव दययाऽतिप्रबुद्धः मामेवावलोकयन् अप्रच्युत पूर्वसंस्कारमनोरथः जीर्णमिव वस्त्रं सुखेनेमां प्रकृतिं स्थूलसूक्ष्मरूपां विसृज्य तदानीमेव मत्प्रसादलब्ध मच्चरणारविन्द युगलैकान्तिकात्यन्तिक परभक्ति परज्ञान परमभक्तिकृत परिपूर्णानवरत नित्यविशदतमानन्य प्रयोजनानवधिकातिशय प्रिय मदनुभवस्त्वं तथाविध मदनुभवजनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचिताशेषशेषतैक रतिरूप नित्यकिङ्करो भविष्यसि । मातेऽभूदत्र संशयः । अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन । रामो द्विर्नाभिभाषते । सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥ सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ इति मयैव ह्युक्तम् । अतस्त्वं तव तत्त्वतो मत् ज्ञानदर्शन प्राप्तिषु निस्संशयः सुखमास्व ॥ अन्त्यकाले स्मृतिर्यातु तव कैङ्कर्यकारिता । तामेनां भगवन्नद्य क्रियमाणां कुरुष्व मे ॥ ॥ इति श्रीभगवद्रामानुज विरचितं शरणागति गद्यम् सम्पूर्णम् ॥

शरणागति गद्यम्: श्री रामानुजाचार्य की दिव्य शरणागति और परिचय (Introduction)

शरणागति गद्यम् (Saranagati Gadyam) विशिष्टाद्वैत वेदांत के सर्वोच्च आचार्य, श्री रामानुजाचार्य (Sri Ramanujacharya) की सबसे मार्मिक और दार्शनिक रूप से समृद्ध रचना है। यह "गद्यत्रयम्" नामक तीन गद्य कृतियों में से प्रथम और सर्वाधिक पूजनीय ग्रंथ है। श्री वैष्णव संप्रदाय में इस ग्रंथ का स्थान वेदों के समान पवित्र माना गया है। यह ग्रंथ उस अलौकिक आध्यात्मिक संवाद का प्रतिरूप है जो आचार्य रामानुज और साक्षात् भगवान श्री रङ्गनाथ (विष्णु) के बीच श्रीरङ्गम के विशाल मंदिर में "पङ्गुनी उतिरम" उत्सव के दौरान हुआ था।

ऐतिहासिक एवं तात्विक संदर्भ: १०वीं शताब्दी के अंत और ११वीं शताब्दी के प्रारंभ में, आचार्य रामानुज ने अनुभव किया कि कलियुग में एक सामान्य मनुष्य के लिए कठोर अष्टांग योग, वर्षों की तपस्या या जटिल यज्ञ करना अत्यंत कठिन है। संसार के बंधनों से त्रस्त जीवात्मा के उद्धार के लिए उन्होंने "प्रपत्ति" (Prapatti) या "शरणागति" के मार्ग को शास्त्र सम्मत आधार प्रदान किया। शरणागति गद्यम् इसी 'प्रपत्ति' का प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसमें आचार्य पहले जगन्माता महालक्ष्मी (श्री) से प्रार्थना करते हैं कि वे मध्यस्थता (Purushakara) करें और भगवान नारायण से उनके अनंत अपराधों को क्षमा कराएं। माँ लक्ष्मी का उत्तर "अस्तु ते" (ऐसा ही हो) भक्त के लिए मोक्ष का प्रथम और महान आश्वासन है।

गद्य की संरचना और गहन दर्शन: यह पाठ केवल भक्ति काव्य नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक घोषणापत्र है। इसमें भगवान के "अनन्त कल्याण गुणों" का अद्भुत वर्णन है। आचार्य ने भगवान को "अशरण्यशरण्य" (जिनका कोई सहारा नहीं, उनके एकमात्र सहारा) और "आपत्सख" (विपत्ति में साथ देने वाले मित्र) के रूप में पुकारा है। यह गद्य भगवान के उस रूप का वर्णन करता है जो वैकुण्ठ में शेषनाग पर विराजमान है, लेकिन अपने भक्तों के लिए "तिरुमाला" की पहाड़ियों पर भी सुलभ है। इसमें जीवात्मा की विवशता और परमात्मा की असीम करुणा का संगम है।

आध्यात्मिक और शैक्षणिक शोध यह सिद्ध करते हैं कि शरणागति गद्यम् का पाठ साधक के "अहंकार" (Ego) को समूल नष्ट कर देता है। जब हम कहते हैं "त्वमेव माता च पिता त्वमेव", तो हम इस संसार के मिथ्या बंधनों को छोड़कर भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को पुनर्स्थापित करते हैं। तिरुमाला तिरुपति के मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर की सेवा और वहां के दर्शन विधान में भी इसी 'शरणागति' के भाव को केंद्र में रखा गया है। यह पाठ उन सभी के लिए संजीवनी के समान है जो मानसिक अशांति, पुराने पापों के बोझ और जीवन के निरंतर संघर्षों से मुक्ति चाहते हैं।

विशिष्ट महत्व: प्रपत्ति मार्ग और वैकुण्ठ का द्वार (Significance)

शरणागति गद्य का विशिष्ट महत्व इसके "अनन्यता" भाव में निहित है। श्री रामानुजाचार्य सिखाते हैं कि भगवान को पाने के लिए किसी विशेष योग्यता या कुल की नहीं, बल्कि केवल इस अटूट विश्वास की आवश्यकता है कि "हे प्रभु! मैं केवल आपका हूँ और आप ही मेरे एकमात्र रक्षक हैं।" श्लोक १ में आचार्य अपने माता-पिता, मित्र, गुरु और संपूर्ण धन-सम्पत्ति का मानसिक त्याग कर केवल प्रभु के चरणों को ही अपना एकमात्र आश्रय मान लेते हैं। यह "सर्वधर्मान् परित्यज्य" के गीता-संदेश का व्यावहारिक प्रयोग है।

इस पाठ का एक और महत्वपूर्ण पहलू "क्षमस्व" (क्षमा करें) की पुकार है। आचार्य ने उन सभी अपराधों (भगवदपचार, भागवतापचार) के लिए क्षमा मांगी है जो मनुष्य मन, वाणी और शरीर से करता है। कलियुग में, जहाँ अनजाने में पापों का संचय होता रहता है, यह गद्य एक आध्यात्मिक "शुद्धिकरण" (Purification) की सिद्ध प्रक्रिया है। भगवान वेंकटेश्वर स्वयं 'वरद' (वरदान देने वाले) हैं और इस पाठ से वे भक्त को "सालोक्य" और "सायुज्य" मुक्ति का वरदान साक्षात् देते हैं।

फलश्रुति: शरणागति गद्य पाठ के दिव्य लाभ (Benefits)

श्री रामानुजाचार्य और श्री वैष्णव आचार्यों के अनुसार, इस दिव्य गद्य के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • समस्त पापों का समूल नाश: "अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि" — भगवान स्वयं इस पाठ के माध्यम से साधक को आश्वासन देते हैं कि शरणागत होने के बाद उसे किसी भी पाप के फल से डरने की आवश्यकता नहीं है।

  • मानसिक शान्ति और निर्भयता: "मा शुचः" (शोक मत करो) के उपदेश के कारण, यह पाठ साधक के मन से मृत्यु का भय, दरिद्रता और भविष्य की चिन्ता को जड़ से मिटा देता है।

  • भगवान की स्थायी करुणा: "नित्यकैङ्कर्य" की प्राप्ति होती है, जिसका अर्थ है कि साधक को इस जीवन में और मृत्यु के उपरांत भी भगवान की सेवा का दिव्य सौभाग्य मिलता रहता है।

  • पारिवारिक और भौतिक मंगल: भगवान श्रीनिवास और माँ लक्ष्मी की संयुक्त आराधना से घर में सुख, समृद्धि और "स्थिर लक्ष्मी" का वास होता है, जिससे आर्थिक तंगी दूर होती है।

  • ग्रह दोष और बाधा निवारण: भगवान को "अखिलजगदाधार" मानने से राहु, केतु और शनि जैसे क्रूर ग्रहों का दुष्प्रभाव स्वतः ही शांत हो जाता है और जीवन में स्थिरता आती है।

पाठ विधि एवं साधना विधान (Ritual Method)

शरणागति गद्यम् का पाठ यदि नियमपूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से किया जाए, तो इसका फल तत्काल और अनन्त गुना बढ़ जाता है।

  • समय: शनिवार भगवान वेंकटेश्वर का प्रिय दिन है और "पङ्गुनी उतिरम" (फाल्गुन पूर्णिमा) इस पाठ के लिए महासिद्ध तिथि है। नित्य प्रातः काल स्नान के बाद पाठ करना सर्वोत्तम है।
  • शुद्धि: पाठ के समय स्वच्छ श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें।
  • पूजन सामग्री: भगवान लक्ष्मी-नारायण या वेंकटेश्वर स्वामी और श्री रामानुजाचार्य के चित्र के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाएं। उन्हें तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।
  • आसन: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर पाठ करें।
  • विशेष निर्देश: यह गद्य "संवाद" (Dialogue) के रूप में है, अतः इसे अत्यंत शांत और भक्तिपूर्ण स्वर में पढ़ें। पाठ के समापन पर "द्वय मन्त्र" का १०८ बार मानसिक जाप करना परम सिद्धिदायक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. शरणागति गद्यम् के रचयिता कौन हैं?
इस महान ग्रंथ की रचना ११वीं शताब्दी के महान दार्शनिक और आचार्य जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य ने की थी।
2. "प्रपत्ति" (Prapatti) का क्या अर्थ है?
प्रपत्ति का अर्थ है 'पूर्ण शरणागति'। यह वह मार्ग है जहाँ भक्त अपनी सारी शक्तियों का त्याग कर केवल भगवान को ही अपना एकमात्र रक्षक और गंतव्य स्वीकार करता है।
3. क्या यह पाठ तिरुपति बालाजी से संबंधित है?
हाँ, भगवान वेंकटेश्वर साक्षात् श्रीनिवास (नारायण) हैं। श्री रामानुजाचार्य ने तिरुमाला की पूजा पद्धति और परंपराओं को सुदृढ़ किया था, अतः यह पाठ उनकी विशेष कृपा दिलाता है।
4. पाठ में माँ लक्ष्मी से पहले प्रार्थना क्यों की जाती है?
माँ लक्ष्मी "पुरुषकार" (Mediatrix) हैं। वे अत्यंत करुणामयी हैं और भक्त की त्रुटियों को क्षमा कर भगवान से उसे स्वीकार करने की पुरजोर सिफारिश करती हैं।
5. "गद्यत्रयम्" (Gadyatrayam) क्या है?
श्री रामानुजाचार्य की तीन महान गद्य रचनाओं के समूह को गद्यत्रयम् कहते हैं— शरणागति गद्यम्, श्रीरङ्ग गद्यम् और श्रीवैकुण्ठ गद्यम्।
6. क्या महिलाएं इस गद्य का पाठ कर सकती हैं?
निश्चित रूप से। भगवान की करुणा में कोई भेद नहीं है। शुद्धता और श्रद्धा के साथ कोई भी श्रद्धालु (स्त्री या पुरुष) इस दिव्य शरणागति का पाठ कर सकता है।
7. "अशरण्यशरण्य" शब्द का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है— "वह जो उन लोगों को भी शरण देते हैं जिनका संसार में कोई सहारा नहीं है।" यह भगवान की असीम दया का द्योतक है।
8. क्या इस पाठ से गृह-कलह शांत हो सकता है?
हाँ, चूँकि यह पाठ मन को पूर्ण शान्ति और संतोष प्रदान करता है, इसके प्रभाव से घर का वातावरण सात्विक होता है और आपसी विवाद समाप्त होते हैं।
9. "द्वय मन्त्र" और शरणागति गद्य में क्या संबंध है?
शरणागति गद्यम् वास्तव में "द्वय मन्त्र" (Sriman Narayana Charanam Saranam Prapadye...) की ही विस्तृत और तात्विक व्याख्या है।
10. इस पाठ को सिद्ध करने की क्या विधि है?
नित्य १ बार श्रद्धापूर्वक पाठ करना पर्याप्त है। विशेष विपत्ति के समय २१ या ४१ दिनों तक निरंतर पाठ करना अत्यंत सिद्धदायक माना गया है।