Sri Gayatri Ashtottara Shatanamavali 1 – श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनामावली १

॥ श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनामावली १ ॥
(वसिष्ठ संहितानुसारिणी १०८ नाम-माला)
ओं श्रीगायत्र्यै नमः ।
ओं जगन्मात्रे नमः ।
ओं परब्रह्मस्वरूपिण्यै नमः ।
ओं परमार्थप्रदायै नमः ।
ओं जप्यायै नमः ।
ओं ब्रह्मतेजोविवर्धिन्यै नमः ।
ओं ब्रह्मास्त्ररूपिण्यै नमः ।
ओं भव्यायै नमः ।
ओं त्रिकालध्येयरूपिण्यै नमः ।
ओं त्रिमूर्तिरूपायै नमः ।
ओं सर्वज्ञायै नमः ।
ओं वेदमात्रे नमः ।
ओं मनोन्मन्यै नमः ।
ओं बालिकायै नमः ।
ओं तरुण्यै नमः ।
ओं वृद्धायै नमः ।
ओं सूर्यमण्डलवासिन्यै नमः ।
ओं मन्देहदानवध्वंसकारिण्यै नमः ।
ओं सर्वकारणायै नमः ।
ओं हंसारूढायै नमः ।
ओं वृषारूढायै नमः ।
ओं गरुडारोहिण्यै नमः ।
ओं शुभायै नमः ।
ओं षट्कुक्ष्यै नमः ।
ओं त्रिपदायै नमः ।
ओं शुद्धायै नमः ।
ओं पञ्चशीर्षायै नमः ।
ओं त्रिलोचनायै नमः ।
ओं त्रिवेदरूपायै नमः ।
ओं त्रिविधायै नमः ।
ओं त्रिवर्गफलदायिन्यै नमः ।
ओं दशहस्तायै नमः ।
ओं चन्द्रवर्णायै नमः ।
ओं विश्वामित्रवरप्रदायै नमः ।
ओं दशायुधधरायै नमः ।
ओं नित्यायै नमः ।
ओं सन्तुष्टायै नमः ।
ओं ब्रह्मपूजितायै नमः ।
ओं आदिशक्त्यै नमः ।
ओं महाविद्यायै नमः ।
ओं सुषुम्नाख्यायै नमः ।
ओं सरस्वत्यै नमः ।
ओं चतुर्विंशत्यक्षराढ्यायै नमः ।
ओं सावित्र्यै नमः ।
ओं सत्यवत्सलायै नमः ।
ओं सन्ध्यायै नमः ।
ओं रात्र्यै नमः ।
ओं प्रभाताख्यायै नमः ।
ओं साङ्ख्यायनकुलोद्भवायै नमः ।
ओं सर्वेश्वर्यै नमः ।
ओं सर्वविद्यायै नमः ।
ओं सर्वमन्त्रादये नमः ।
ओं अव्ययायै नमः ।
ओं शुद्धवस्त्रायै नमः ।
ओं शुद्धविद्यायै नमः ।
ओं शुक्लमाल्यानुलेपनायै नमः ।
ओं सुरसिन्धुसमायै नमः ।
ओं सौम्यायै नमः ।
ओं ब्रह्मलोकनिवासिन्यै नमः ।
ओं प्रणवप्रतिपाद्यार्थायै नमः ।
ओं प्रणतोद्धरणक्षमायै नमः ।
ओं जलाञ्जलिसुसन्तुष्टायै नमः ।
ओं जलगर्भायै नमः ।
ओं जलप्रियायै नमः ।
ओं स्वाहायै नमः ।
ओं स्वधायै नमः ।
ओं सुधासंस्थायै नमः ।
ओं श्रौषड्वौषड्वषट्क्रियायै नमः ।
ओं सुरभ्यै नमः ।
ओं षोडशकलायै नमः ।
ओं मुनिबृन्दनिषेवितायै नमः ।
ओं यज्ञप्रियायै नमः ।
ओं यज्ञमूर्त्यै नमः ।
ओं स्रुक्स्रुवाज्यस्वरूपिण्यै नमः ।
ओं अक्षमालाधरायै नमः ।
ओं अक्षमालासंस्थायै नमः ।
ओं अक्षराकृत्यै नमः ।
ओं मधुच्छन्दऋषिप्रीतायै नमः ।
ओं स्वच्छन्दायै नमः ।
ओं छन्दसां निधये नमः ।
ओं अङ्गुलीपर्वसंस्थानायै नमः ।
ओं चतुर्विंशतिमुद्रिकायै नमः ।
ओं ब्रह्ममूर्त्यै नमः ।
ओं रुद्रशिखायै नमः ।
ओं सहस्रपरमायै नमः ।
ओं अम्बिकायै नमः ।
ओं विष्णुहृद्गायै नमः ।
ओं अग्निमुख्यै नमः ।
ओं शतमध्यायै नमः ।
ओं दशावरायै नमः ।
ओं सहस्रदलपद्मस्थायै नमः ।
ओं हंसरूपायै नमः ।
ओं निरञ्जनायै नमः ।
ओं चराचरस्थायै नमः ।
ओं चतुरायै नमः ।
ओं सूर्यकोटिसमप्रभायै नमः ।
ओं पञ्चवर्णमुख्यै नमः ।
ओं धात्र्यै नमः ।
ओं चन्द्रकोटिशुचिस्मितायै नमः ।
ओं महामायायै नमः ।
ओं विचित्राङ्ग्यै नमः ।
ओं मायाबीजनिवासिन्यै नमः ।
ओं सर्वयन्त्रात्मिकायै नमः ।
ओं सर्वतन्त्ररूपायै नमः ।
ओं जगद्धितायै नमः ।
ओं मर्यादापालिकायै नमः ।
ओं मान्यायै नमः ।
ओं महामन्त्रफलप्रदायै नमः ।
॥ इति श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनामावली १ सम्पूर्णा ॥
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श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनामावली १ - विस्तृत आध्यात्मिक परिचय
श्री गायत्र्यष्टोत्तरशतनामावली १ (Sri Gayatri Ashtottara Shatanamavali 1) सनातन धर्म की सबसे पवित्र और तेजस्वी नामावलियों में से एक है। माँ गायत्री को 'वेदमाता' और समस्त ज्ञान का आदि स्रोत माना गया है। यह नामावली महर्षि वसिष्ठ द्वारा वर्णित 'वसिष्ठ संहिता' के सिद्ध स्तोत्र पर आधारित है। इसमें माँ गायत्री के १०८ (108) उन नामों का संकलन है जो साधक की चेतना को भौतिक धरातल से उठाकर ब्रह्म-ज्ञान की ऊंचाइयों तक ले जाते हैं।
नामावली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी 'अर्चन शक्ति' है। जहाँ स्तोत्र का पाठ गान के रूप में किया जाता है, वहीं नामावली का प्रत्येक नाम (जैसे- 'ओं जगन्मात्रे नमः') अपने आप में एक स्वतंत्र मन्त्र है। प्रत्येक नाम के पूर्व में स्थित 'ओं' (प्रणव) ब्रह्म की शक्ति को जाग्रत करता है और अंत में 'नमः' साधक के समर्पण भाव को माँ के चरणों में अर्पित करता है। यह १०८ नामों की माला साक्षात् गायत्री महामन्त्र की २४ शक्तियों का ही विस्तार है।
आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार, माँ गायत्री के ये १०८ नाम उनके तीन मुख्य स्वरूपों—ब्रह्माणी (प्रातः), वैष्णवी (मध्याह्न) और माहेश्वरी (सायंकाल)—के रहस्यों को उजागर करते हैं। नामावली में उन्हें 'त्रिवेदरूपा', 'महाविद्या' और 'सुषुम्नाख्या' कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि वे न केवल बाह्य जगत का संचालन करती हैं, बल्कि हमारे शरीर के भीतर स्थित योगिक नाड़ियों (प्राण शक्ति) का भी मूल आधार हैं।
वर्तमान काल में, जहाँ मनुष्य अज्ञान, मानसिक भ्रम और अशांति से घिरा है, माँ गायत्री की यह नामावली एक प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करती है। जो साधक नित्य श्रद्धापूर्वक इन नामों के साथ माँ का अर्चन करता है, उसका अंतःकरण गंगा के समान निर्मल हो जाता है और उसकी वाणी में 'वाक-सिद्धि' का समावेश होने लगता है। यह साक्षात् ब्रह्मतेज प्राप्त करने का सबसे सुलभ और शास्त्रीय मार्ग है।
नामावली का विशिष्ट महत्व और दार्शनिक आधार
श्री गायत्री अष्टोत्तरशतनामावली का महत्व इसके तात्विक गुणों और साधना के गूढ़ रहस्यों में निहित है:
- मन्त्र-वर्ण और शक्ति संगम: गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों की दिव्य ऊर्जा को इन १०८ नामों में प्रवाहित किया गया है। प्रत्येक नाम साधक के मस्तिष्क की विशिष्ट ग्रंथियों (Chakras) को सक्रिय करने की क्षमता रखता है।
- मन्देह दानव और अज्ञान का नाश: 'मन्देहदानवध्वंसकारिण्यै नमः' नाम यह संकेत देता है कि माँ प्रतिदिन ज्ञान के सूर्य को ढकने वाले अज्ञान और आलस्य रूपी राक्षसों का संहार करती हैं।
- पञ्चकोष शुद्धि: 'पञ्चवर्णमुख्यै नमः' और 'पञ्चशीर्षायै नमः' जैसे नाम यह दर्शाते हैं कि माँ गायत्री हमारे अस्तित्व के पांचों कोषों (अन्नमय, प्राणमय आदि) को शुद्ध कर जीव को साक्षात् शिव स्वरूप बनाती हैं।
- अद्वैत बोध: नामावली में माँ को 'परब्रह्मस्वरूपिण्यै' कहा गया है। यह अद्वैत दर्शन का सार है कि गायत्री ही वह एकमात्र पराशक्ति है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ओत-प्रोत है।
फलश्रुति लाभ: पुष्पार्चन से अनन्त सिद्धि
वसिष्ठ संहिता के अनुसार, इस नामावली के श्रद्धापूर्वक पाठ या अर्चन से निम्नलिखित दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं:
१. बौद्धिक और प्रज्ञा का उत्कर्ष
माँ गायत्री 'धी' (बुद्धि) की अधिष्ठात्री हैं। 'प्रज्ञा' और 'धी' नामों का अर्चन साधक की मेधा शक्ति को तीव्र करता है, जिससे विद्यार्थियों को ज्ञानार्जन और परीक्षाओं में अभूतपूर्व सफलता मिलती है।
२. समस्त पापों का प्रक्षालन
माँ को 'पापनाशिन्यै' और 'शुद्धायै' कहा गया है। जाने-अनजाने में हुए कायिक, वाचिक और मानसिक पापों का इस नामावली के पाठ से शमन होता है और साधक का प्रारब्ध सुधरता है।
३. सुरक्षा और अभय दान
'ब्रह्मास्त्ररूपिण्यै' और 'दशायुधधरायै' जैसे नाम यह सिद्ध करते हैं कि माँ गायत्री साधक की हर दिशा से रक्षा करती हैं। यह नामावली तान्त्रिक बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा का अभेद्य कवच है।
४. मन्त्र सिद्धि और मोक्ष प्राप्ति
नामावली का सबसे बड़ा फल 'सर्वमन्त्रसिद्धि' है। यह अन्य सुप्त मन्त्रों को जाग्रत करती है। अंत में साधक 'परमार्थ' (मोक्ष) को प्राप्त कर पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।
अर्चन विधि और साधना नियम (Ritual Guide)
गायत्री अष्टोत्तरशतनामावली का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित शास्त्रीय विधि अपनानी चाहिए:
- समय (Timing): प्रातः काल सन्ध्या (सूर्योदय से पूर्व) या सायं सन्ध्या का समय सर्वोत्तम है। रविवार, गायत्री जयन्ती और पूर्णिमा को अर्चन करना विशेष फलदायी है।
- शुद्धि और वस्त्र: स्नान के उपरान्त स्वच्छ, संभव हो तो पीले या सफ़ेद वस्त्र धारण करें। गायत्री साधना में शुचिता का सर्वोच्च स्थान है।
- अर्चन सामग्री: १०८ ताजे सफ़ेद पुष्प (जैसे- चमेली, मोगरा या सफ़ेद गुलाब), पीले अक्षत (हल्दी मिश्रित चावल) या शुद्ध कुमकुम एकत्रित करें।
- आसन और दिशा: पूर्व (East) या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुश या पीले ऊनी आसन पर बैठें।
- अर्चन क्रिया: प्रत्येक नाम का स्पष्ट उच्चारण करें—'ओं जगन्मात्रे नमः' बोलकर माँ गायत्री की प्रतिमा या चित्र पर एक पुष्प या अक्षत अर्पित करें।
- जप: नामावली अर्चन के उपरान्त कम से कम १०८ बार मूल गायत्री मन्त्र का जप करना साधना को पूर्णता प्रदान करता है।
विशेष: यदि पुष्प उपलब्ध न हों, तो केवल नामों का श्रद्धापूर्वक पाठ करना भी 'मानस पुष्पार्चन' के समान पुण्य फल प्रदान करता है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. यह नामावली १ अन्य गायत्री नामावलियों से कैसे अलग है?
यह नामावली वसिष्ठ संहिता के प्राचीन स्तोत्र पर आधारित है। अन्य नामावलियाँ (जैसे रुद्रयामल वाली) अधिक तान्त्रिक हो सकती हैं, जबकि यह नामावली सात्विक और वेदान्त परक है।
2. 'जलाञ्जलिसुसन्तुष्टायै नमः' नाम का क्या महत्व है?
इसका अर्थ है कि माँ गायत्री केवल अर्घ्य (जलाञ्जलि) मात्र से ही साधक पर प्रसन्न हो जाती हैं। यह नाम माँ की सहज करुणा और भक्त-वत्सलता को दर्शाता है।
3. क्या इस नामावली का पाठ रोगों से मुक्ति दिला सकता है?
हाँ, माँ गायत्री को 'आरोग्यप्रदायिनी' कहा गया है। श्रद्धापूर्वक नामों का अर्चन करने से मानसिक और शारीरिक व्याधियों में शांति मिलती है।
4. क्या बिना जनेऊ (यज्ञोपवीत) के यह पाठ किया जा सकता है?
हाँ, नाम जप और वन्दना के लिए शुद्धि और श्रद्धा मुख्य है। कोई भी जिज्ञासु भक्त पवित्रता के साथ इन नामों का अर्चन कर सकता है।
5. 'चतुर्विंशत्यक्षराढ्यायै' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है २४ अक्षरों से सुशोभित। यह माँ के उस स्वरूप का नमन है जो गायत्री मन्त्र के २४ बीजाक्षरों में समाहित है।
6. क्या केवल पाठ करने से भी लाभ मिलता है या अर्चन अनिवार्य है?
केवल पाठ करने से भी पूर्ण फल मिलता है। अर्चन (फूल चढ़ाना) एक विशेष भक्ति प्रक्रिया है जो एकाग्रता को बढ़ाती है।
7. गायत्री को 'ब्रह्मास्त्ररूपिणी' क्यों कहा गया है?
क्योंकि जिस प्रकार ब्रह्मास्त्र का प्रहार कभी खाली नहीं जाता, उसी प्रकार गायत्री साधना का फल कभी निष्फल नहीं होता। यह अज्ञान के समूल नाश का अचूक शस्त्र है।
8. पाठ के दौरान यदि कोई नाम गलत उच्चारित हो जाए तो क्या करें?
माँ गायत्री अत्यंत दयालु हैं। अनजाने में हुई भूल के लिए अंत में क्षमा प्रार्थना ('अपराध सहस्राणि...') करनी चाहिए। भाव की शुद्धता शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण है।
9. क्या इस नामावली से नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं?
बिल्कुल, माँ के दिव्य नामों का कंपन एक सुरक्षा कवच निर्मित करता है जिससे नजर दोष और तान्त्रिक बाधाएं दूर रहती हैं।
10. 'अव्ययायै' नाम का दार्शनिक अर्थ क्या है?
'अव्यया' का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो। माँ गायत्री वह अविनाशी शक्ति हैं जो सृष्टि के प्रलय के बाद भी शेष रहती हैं।